कुछ दिनों के अंतराल के बाद यहाँ चिट्ठाकार करने के लिए दोबारा पहुंचा तो पता चला कि आजकल किसी च जे ई की काफी चर्चा हो रही है । चारों तरफ सिर्फ उसी का गुणगान चल रहा है , परिचर्चाएँ हो रही हैं , शोध चल रहा है और तो और कई विद्वान् लोग तो बकायादा इस पर ग्रंथ तक रचने की योजना तक बना रहे हैं । हमने कहा ये तो हद हो थोडे दिन क्या दूर हुए यहाँ तो सारा माजरा ही बदला हुआ है । ये अचानक कौन सा नया सुतरा इस चित्थाकारे में अविह्स्कृत हो गया गुप चुप, चिंता में पड़ गए कि यदि जल्दी ही ना समझ पाए तो हो गयी सारी म्हणत बेकार। फिर ये भी लगा कि लानत है यार हम पर इतने दिनों तक क्या सिर्फ झक मारते रहे जो इतने महत्वपूर्ण सूत्र आदि के बारे में कुछ जान ना सके ; थोडी और गहराई में गए तो पता चला कि असली बात तो यही है हमारी तरह ही बांकी फालतू चिट्ठाकार बंधू भी इसी का भावार्थ तलाशने में लगे हुए हैं। काफी मंतःन और विश्लेषण के उपरांत अपने तमाम साहितिक अनुभव को लगते हुए हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचे और हमें जैसे अर्थ मिले वो ठीक ठीक वैसे ही आपके सामने रख रहे हैं।:-
च जे ई ;- यानी कि चले जाओ इहाँ से , मतबल फौरन से भी पेश्तर दफा हो जाओ इहाँ से , तुम जैसे चिरकुट लेखक और फटीचर विचार वालों कि यहाँ कई जरूरत नहीं है ,खामखा अपना पैसा और दूसरों का वक़्त खराब कर रहे हो । हमने सोचा ठीक ही कह रहा है , परन्तु भाई क्यों जाएँ यहाँ से , अबे जब हमसे भी सादे गले विचार यहाँ लोगों को झेलने को मिल रहे हैं तो हमारे भी झेलो ना यार प्लीज़।
च जे ई - चल झपट ईनाम :- हमें लगा कि हो न हो शायद यही मतलब होगा इसका , वैसे भी जब से ये पता चला ही कि ई ब्लोग्गिंग कर के बहुत लोग तो पता नहीं कितना नवां पीट रहे हैं हमें तो लगता है कि हे भगवान् किसी भी सूरत में हमें भी तो कम से कम शगुन के तौर पर ही सही सवा रुपैया ही सही मिलना तो चाहिए ही। तो शायद कूनो बाबु भैया तरस खा के कोई ईनाम विनाम देने के बारे में सोच रहे हों सो भैया खुलाम्खुल्ला दावत है झपट लो।
च जे ई ;- चाइना जगत का ईनाम , मतबल ये जैसा हम ब्लोग लिखते हैं उससे तो भैया यहे लगता है कि सिर्फ और सिर्फ चिना बाज़ार का हरेक माल पांच रुपैया के किसी इनाम के ही हक़दार हैं सिर्फ ।
तो ये सरे फूल फॉर्म ही वे थे जो हमारे जैसे उच्च विचार वाले ब्लोग साहित्यकार के दिमाग में आये ।
क्या आपको कोई अर्थ पता चला ?
रविवार, 13 जनवरी 2008
शुक्रवार, 11 जनवरी 2008
हर कोई सब कुछ नहीं कर सकता
मेरी पत्नी उस दिन अचानक गुनगुनाने लगीं, दरअसल वो जब भी कोई काम कर रही होती हैं और पूरी तसल्ली से कर रही होती हैं तो स्वाभाविक रुप से कुछ ना कुछ गुनगुनाने लगती हैं। और खुदा का लाख लाख शुक्र है कि उनका गला भी काफी अच्छा है । वैसे सुरों कि कोई समझ नहीं है मुझे मार इतना तो पता चल ही जाता है कि वे बेसुरा और नीरस नहीं गा रही हैं। उन्होने मुझे बताया था कि किस प्रकार उनके स्कूल के दिनों में उनके गायन कि रूचि को देखते हुए और उनकी आवाज़ को देखते हुए उन्हें उनकी टीचर ने संगीत कोअपना एक विषय बनाने को कहा था , और किस प्रकार बाद में कुछ कारणों से वो इसे जारी ना रख पायीं। अब जबकि पिछले कुछ सालों से लगातार टी वी पर संगीत, गायाँ आदि कि टैलेंट हंत प्रतियोगिताओं का आयोजन हो रहा है तो ऐसे में उन्हें इस बात का अफ़सोस ज्यादा होता है। यदाकदा वे इनमें अपनी दावेदारी पेश करने के लिए जोर आज्माएश भी करती रहती हैं। एक बार तो उनकी जिद पर मैं उन्हें संगीत की शिक्षा दिलवाने को भी तैयार हो गया, मगर थोडे ही दिनों में उन्हें वास्तविकता का पता चल गया। फिर मैंने उन्हें समझाया कि हर इंसान में बहुत सारी खूबियाँ होती हैं और ये इश्वर की देन होती है।
मेरा मानना ये है कि हर इंसान एक साथ सब कुछ नहीं कर सकता। हाँ , हो सकता है कि ऐसा सब के साथ ना हो और कुछ लोगों के लिए वो सब कुछ कर पाना संभव हो जो वे चाहते हों या फिर कि जो वे कर सकते हों। मगर आम तौर पर तो ऐसा ही होता है कि इंसान बहुत कुछ वैसा नहीं कर पाटा जैसा करना चाहता है तो मुझे तो लगता है कि आदमी को चाहिए कि बिना इसकी परवाह किये उसे वो करना चाहिए जो उसके बस में हो और उसमें अपना सब कुछ झोंक देना चाहिए परिणाम निश्चित ही सकारात्मक निकलेगा। और फिर निराश होने से पहले उनके बारे में सोचना चाहिए जो शायद जिन्दगी में बहुत कुछ करने कि चाहत और काबिलियत रखने के बावजूद कुछ भी नहीं कर पाते। मेरे कहने का मतलब ये है कि जिन्हें इस बात का अफ़सोस होता है कि वे महंगे जूते नहीं खरीद पाए नहीं पहन पाए उन्हें उनके बारे में सोचना चाहिए जिनके पास जूते पह्नने के लिए पाँव ही नहीं होते ।
शायद ये नज़रिया आदमी को ज्यादा सुकून दे ।
अगली पोस्ट :- आईये ब्लोग जगत को सार्थक बनायें .
मेरा मानना ये है कि हर इंसान एक साथ सब कुछ नहीं कर सकता। हाँ , हो सकता है कि ऐसा सब के साथ ना हो और कुछ लोगों के लिए वो सब कुछ कर पाना संभव हो जो वे चाहते हों या फिर कि जो वे कर सकते हों। मगर आम तौर पर तो ऐसा ही होता है कि इंसान बहुत कुछ वैसा नहीं कर पाटा जैसा करना चाहता है तो मुझे तो लगता है कि आदमी को चाहिए कि बिना इसकी परवाह किये उसे वो करना चाहिए जो उसके बस में हो और उसमें अपना सब कुछ झोंक देना चाहिए परिणाम निश्चित ही सकारात्मक निकलेगा। और फिर निराश होने से पहले उनके बारे में सोचना चाहिए जो शायद जिन्दगी में बहुत कुछ करने कि चाहत और काबिलियत रखने के बावजूद कुछ भी नहीं कर पाते। मेरे कहने का मतलब ये है कि जिन्हें इस बात का अफ़सोस होता है कि वे महंगे जूते नहीं खरीद पाए नहीं पहन पाए उन्हें उनके बारे में सोचना चाहिए जिनके पास जूते पह्नने के लिए पाँव ही नहीं होते ।
शायद ये नज़रिया आदमी को ज्यादा सुकून दे ।
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हर कोई सब कुछ नहीं कर सकता
मेरी पत्नी उस दिन अचानक गुनगुनाने लगीं, दरअसल वो जब भी कोई काम कर रही होती हैं और पूरी तसल्ली से कर रही होती हैं तो स्वाभाविक रुप से कुछ ना कुछ गुनगुनाने लगती हैं। और खुदा का लाख लाख शुक्र है कि उनका गला भी काफी अच्छा है । वैसे सुरों कि कोई समझ नहीं है मुझे मार इतना तो पता चल ही जाता है कि वे बेसुरा और नीरस नहीं गा रही हैं। उन्होने मुझे बताया था कि किस प्रकार उनके स्कूल के दिनों में उनके गायन कि रूचि को देखते हुए और उनकी आवाज़ को देखते हुए उन्हें उनकी टीचर ने संगीत कोअपना एक विषय बनाने को कहा था , और किस प्रकार बाद में कुछ कारणों से वो इसे जारी ना रख पायीं। अब जबकि पिछले कुछ सालों से लगातार टी वी पर संगीत, गायाँ आदि कि टैलेंट हंत प्रतियोगिताओं का आयोजन हो रहा है तो ऐसे में उन्हें इस बात का अफ़सोस ज्यादा होता है। यदाकदा वे इनमें अपनी दावेदारी पेश करने के लिए जोर आज्माएश भी करती रहती हैं। एक बार तो उनकी जिद पर मैं उन्हें संगीत की शिक्षा दिलवाने को भी तैयार हो गया, मगर थोडे ही दिनों में उन्हें वास्तविकता का पता चल गया। फिर मैंने उन्हें समझाया कि हर इंसान में बहुत सारी खूबियाँ होती हैं और ये इश्वर की देन होती है।
मेरा मानना ये है कि हर इंसान एक साथ सब कुछ नहीं कर सकता। हाँ , हो सकता है कि ऐसा सब के साथ ना हो और कुछ लोगों के लिए वो सब कुछ कर पाना संभव हो जो वे चाहते हों या फिर कि जो वे कर सकते हों। मगर आम तौर पर तो ऐसा ही होता है कि इंसान बहुत कुछ वैसा नहीं कर पाटा जैसा करना चाहता है तो मुझे तो लगता है कि आदमी को चाहिए कि बिना इसकी परवाह किये उसे वो करना चाहिए जो उसके बस में हो और उसमें अपना सब कुछ झोंक देना चाहिए परिणाम निश्चित ही सकारात्मक निकलेगा। और फिर निराश होने से पहले उनके बारे में सोचना चाहिए जो शायद जिन्दगी में बहुत कुछ करने कि चाहत और काबिलियत रखने के बावजूद कुछ भी नहीं कर पाते। मेरे कहने का मतलब ये है कि जिन्हें इस बात का अफ़सोस होता है कि वे महंगे जूते नहीं खरीद पाए नहीं पहन पाए उन्हें उनके बारे में सोचना चाहिए जिनके पास जूते पह्नने के लिए पाँव ही नहीं होते ।
शायद ये नज़रिया आदमी को ज्यादा सुकून दे ।
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मेरा मानना ये है कि हर इंसान एक साथ सब कुछ नहीं कर सकता। हाँ , हो सकता है कि ऐसा सब के साथ ना हो और कुछ लोगों के लिए वो सब कुछ कर पाना संभव हो जो वे चाहते हों या फिर कि जो वे कर सकते हों। मगर आम तौर पर तो ऐसा ही होता है कि इंसान बहुत कुछ वैसा नहीं कर पाटा जैसा करना चाहता है तो मुझे तो लगता है कि आदमी को चाहिए कि बिना इसकी परवाह किये उसे वो करना चाहिए जो उसके बस में हो और उसमें अपना सब कुछ झोंक देना चाहिए परिणाम निश्चित ही सकारात्मक निकलेगा। और फिर निराश होने से पहले उनके बारे में सोचना चाहिए जो शायद जिन्दगी में बहुत कुछ करने कि चाहत और काबिलियत रखने के बावजूद कुछ भी नहीं कर पाते। मेरे कहने का मतलब ये है कि जिन्हें इस बात का अफ़सोस होता है कि वे महंगे जूते नहीं खरीद पाए नहीं पहन पाए उन्हें उनके बारे में सोचना चाहिए जिनके पास जूते पह्नने के लिए पाँव ही नहीं होते ।
शायद ये नज़रिया आदमी को ज्यादा सुकून दे ।
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रविवार, 6 जनवरी 2008
क्या पुरानी पोस्टों ko दोबारा पढ़ कर देखा है कभी ?
ये बात मैं उन लोगों से कह रहा हूँ जो काफी समय से इस चिट्ठाकारी में मशगूल हैं और अक्सर नयी नयी बातें और विचार लिख कर उन्हें ब्लोग जगत पर डालते रहते हैं। यदि कभी कोई पुरानी पोस्ट देखता भी है तो जहाँ तक मेरा ख्याल है कि सिर्फ ये देखने के लिए कि कोई नयी तिप्प्न्नी तो नहीं आ गयी। मगर मेरा कहना कुछ और है यहाँ , आपको याद है वो जाना जब हम चिट्ठियां लिखा करते थे हमें चिट्ठियाँ आया करती थी। या फिर वो ज़माना जब आप या हम नियमित रुप से डायरी लिखा करते थे , बहुत से लोग तो शायद अब भी लिख रहे होंगे।
कभी अचानक कुछ ढूँढ़ते धान्दते अचानक कोई पुराने डायरी कोई पुरानी चिट्ठी पढ़ने को मिल जाये तो कैसा सुखद एहसास होता है । ऐसा लगता है जैसे कोई ठंडी हवा , चुपके से आकर मन को उन्ही दिनों कि यादों में ले कर चली गयी है । वे दिन वे सुख या कि दुःख , वे दोस्त , वो प्यार, वो फाकाकाशी, या कि वो दोस्तों कि मनमौजी महफिल सब कुछ अचानक ही आंखों के सामने चलचित्र कि तरह आ जाता है । है ना ?
चलिए छोडिये ये सब आप में से कितने लोगों ने कभी पलट कर अपनी पहली पोस्ट को देखा है या फिर कि कभी उन पोस्टों पर दोबारा नज़र डाली है जो बहुत पहले लिख कर छोड़ दिया। यदि भूले भटके कभी ऐसा हो जाता है तो मेरे क्या से यही सारे बातें होंगी हो आपके मन में आ सकती हैं :-
--- यार, ये थी मेरी पहली पोस्ट । कमाल है इतना थोडा सा लिखा था वो भी ऐसा बच्चों जैसा , इतना बचकाना, यार इसको यदि ऐसे लिखता तो ये पोस्ट और बढिया बन सकती थी। या फिर ये कि , यार, इतना बुरा तो नहीं लिखा था जब कि ये मेरी पहली पोस्ट थी भाई, और फिर लोगों कि टिप्पणियाँ भी तो आये थी।
---- जो पोस्टें या वे पोस्टें जिन पर आपको प्रशंशा मिली हो या फिर कि खूब सारी टिप्पणियाँ मिली हों वे तो हमेशा ही सबसे पसंदीदा पोस्टों में से एक रहती है । कई बार तो लगता है कि कमाल है यार कितना अच्छा लिख गया था और इतना पसंद आया था लोगों को । कम्बक्त बहुत दिनों से कुछ खास लिख ही नहीं पा रहा हूँ।
---- कभी कभी कोई पुराने पोस्ट , उसका विषय , या फिर कुछ और आपको कोई नया विचार , कुछ नया करने को प्रेरित कर सकते हैं आप लगेगा कि यार इसपर तो लिखना रह हे गया है , या फिर कि अभी तो इस पर और भी बहुत कुछ और लिखा जा सकता है ।
और आप बडे प्यार से थोडी देर तक उसे निहार सकते हैं जैसे कोई माँ अपने बच्चे को निहारती है । कम से कम ये काम उस दिन तो हो ही सकता है जिस दिन आप का मूड लिखने को ना कर रहा हो ।
कहिये आप क्या सोचते हैं ?
कभी अचानक कुछ ढूँढ़ते धान्दते अचानक कोई पुराने डायरी कोई पुरानी चिट्ठी पढ़ने को मिल जाये तो कैसा सुखद एहसास होता है । ऐसा लगता है जैसे कोई ठंडी हवा , चुपके से आकर मन को उन्ही दिनों कि यादों में ले कर चली गयी है । वे दिन वे सुख या कि दुःख , वे दोस्त , वो प्यार, वो फाकाकाशी, या कि वो दोस्तों कि मनमौजी महफिल सब कुछ अचानक ही आंखों के सामने चलचित्र कि तरह आ जाता है । है ना ?
चलिए छोडिये ये सब आप में से कितने लोगों ने कभी पलट कर अपनी पहली पोस्ट को देखा है या फिर कि कभी उन पोस्टों पर दोबारा नज़र डाली है जो बहुत पहले लिख कर छोड़ दिया। यदि भूले भटके कभी ऐसा हो जाता है तो मेरे क्या से यही सारे बातें होंगी हो आपके मन में आ सकती हैं :-
--- यार, ये थी मेरी पहली पोस्ट । कमाल है इतना थोडा सा लिखा था वो भी ऐसा बच्चों जैसा , इतना बचकाना, यार इसको यदि ऐसे लिखता तो ये पोस्ट और बढिया बन सकती थी। या फिर ये कि , यार, इतना बुरा तो नहीं लिखा था जब कि ये मेरी पहली पोस्ट थी भाई, और फिर लोगों कि टिप्पणियाँ भी तो आये थी।
---- जो पोस्टें या वे पोस्टें जिन पर आपको प्रशंशा मिली हो या फिर कि खूब सारी टिप्पणियाँ मिली हों वे तो हमेशा ही सबसे पसंदीदा पोस्टों में से एक रहती है । कई बार तो लगता है कि कमाल है यार कितना अच्छा लिख गया था और इतना पसंद आया था लोगों को । कम्बक्त बहुत दिनों से कुछ खास लिख ही नहीं पा रहा हूँ।
---- कभी कभी कोई पुराने पोस्ट , उसका विषय , या फिर कुछ और आपको कोई नया विचार , कुछ नया करने को प्रेरित कर सकते हैं आप लगेगा कि यार इसपर तो लिखना रह हे गया है , या फिर कि अभी तो इस पर और भी बहुत कुछ और लिखा जा सकता है ।
और आप बडे प्यार से थोडी देर तक उसे निहार सकते हैं जैसे कोई माँ अपने बच्चे को निहारती है । कम से कम ये काम उस दिन तो हो ही सकता है जिस दिन आप का मूड लिखने को ना कर रहा हो ।
कहिये आप क्या सोचते हैं ?
क्या पुरानी पोस्टों ko दोबारा पढ़ कर देखा है कभी ?
ये बात मैं उन लोगों से कह रहा हूँ जो काफी समय से इस चिट्ठाकारी में मशगूल हैं और अक्सर नयी नयी बातें और विचार लिख कर उन्हें ब्लोग जगत पर डालते रहते हैं। यदि कभी कोई पुरानी पोस्ट देखता भी है तो जहाँ तक मेरा ख्याल है कि सिर्फ ये देखने के लिए कि कोई नयी तिप्प्न्नी तो नहीं आ गयी। मगर मेरा कहना कुछ और है यहाँ , आपको याद है वो जाना जब हम चिट्ठियां लिखा करते थे हमें चिट्ठियाँ आया करती थी। या फिर वो ज़माना जब आप या हम नियमित रुप से डायरी लिखा करते थे , बहुत से लोग तो शायद अब भी लिख रहे होंगे।
कभी अचानक कुछ ढूँढ़ते धान्दते अचानक कोई पुराने डायरी कोई पुरानी चिट्ठी पढ़ने को मिल जाये तो कैसा सुखद एहसास होता है । ऐसा लगता है जैसे कोई ठंडी हवा , चुपके से आकर मन को उन्ही दिनों कि यादों में ले कर चली गयी है । वे दिन वे सुख या कि दुःख , वे दोस्त , वो प्यार, वो फाकाकाशी, या कि वो दोस्तों कि मनमौजी महफिल सब कुछ अचानक ही आंखों के सामने चलचित्र कि तरह आ जाता है । है ना ?
चलिए छोडिये ये सब आप में से कितने लोगों ने कभी पलट कर अपनी पहली पोस्ट को देखा है या फिर कि कभी उन पोस्टों पर दोबारा नज़र डाली है जो बहुत पहले लिख कर छोड़ दिया। यदि भूले भटके कभी ऐसा हो जाता है तो मेरे क्या से यही सारे बातें होंगी हो आपके मन में आ सकती हैं :-
--- यार, ये थी मेरी पहली पोस्ट । कमाल है इतना थोडा सा लिखा था वो भी ऐसा बच्चों जैसा , इतना बचकाना, यार इसको यदि ऐसे लिखता तो ये पोस्ट और बढिया बन सकती थी। या फिर ये कि , यार, इतना बुरा तो नहीं लिखा था जब कि ये मेरी पहली पोस्ट थी भाई, और फिर लोगों कि टिप्पणियाँ भी तो आये थी।
---- जो पोस्टें या वे पोस्टें जिन पर आपको प्रशंशा मिली हो या फिर कि खूब सारी टिप्पणियाँ मिली हों वे तो हमेशा ही सबसे पसंदीदा पोस्टों में से एक रहती है । कई बार तो लगता है कि कमाल है यार कितना अच्छा लिख गया था और इतना पसंद आया था लोगों को । कम्बक्त बहुत दिनों से कुछ खास लिख ही नहीं पा रहा हूँ।
---- कभी कभी कोई पुराने पोस्ट , उसका विषय , या फिर कुछ और आपको कोई नया विचार , कुछ नया करने को प्रेरित कर सकते हैं आप लगेगा कि यार इसपर तो लिखना रह हे गया है , या फिर कि अभी तो इस पर और भी बहुत कुछ और लिखा जा सकता है ।
और आप बडे प्यार से थोडी देर तक उसे निहार सकते हैं जैसे कोई माँ अपने बच्चे को निहारती है । कम से कम ये काम उस दिन तो हो ही सकता है जिस दिन आप का मूड लिखने को ना कर रहा हो ।
कहिये आप क्या सोचते हैं ?
कभी अचानक कुछ ढूँढ़ते धान्दते अचानक कोई पुराने डायरी कोई पुरानी चिट्ठी पढ़ने को मिल जाये तो कैसा सुखद एहसास होता है । ऐसा लगता है जैसे कोई ठंडी हवा , चुपके से आकर मन को उन्ही दिनों कि यादों में ले कर चली गयी है । वे दिन वे सुख या कि दुःख , वे दोस्त , वो प्यार, वो फाकाकाशी, या कि वो दोस्तों कि मनमौजी महफिल सब कुछ अचानक ही आंखों के सामने चलचित्र कि तरह आ जाता है । है ना ?
चलिए छोडिये ये सब आप में से कितने लोगों ने कभी पलट कर अपनी पहली पोस्ट को देखा है या फिर कि कभी उन पोस्टों पर दोबारा नज़र डाली है जो बहुत पहले लिख कर छोड़ दिया। यदि भूले भटके कभी ऐसा हो जाता है तो मेरे क्या से यही सारे बातें होंगी हो आपके मन में आ सकती हैं :-
--- यार, ये थी मेरी पहली पोस्ट । कमाल है इतना थोडा सा लिखा था वो भी ऐसा बच्चों जैसा , इतना बचकाना, यार इसको यदि ऐसे लिखता तो ये पोस्ट और बढिया बन सकती थी। या फिर ये कि , यार, इतना बुरा तो नहीं लिखा था जब कि ये मेरी पहली पोस्ट थी भाई, और फिर लोगों कि टिप्पणियाँ भी तो आये थी।
---- जो पोस्टें या वे पोस्टें जिन पर आपको प्रशंशा मिली हो या फिर कि खूब सारी टिप्पणियाँ मिली हों वे तो हमेशा ही सबसे पसंदीदा पोस्टों में से एक रहती है । कई बार तो लगता है कि कमाल है यार कितना अच्छा लिख गया था और इतना पसंद आया था लोगों को । कम्बक्त बहुत दिनों से कुछ खास लिख ही नहीं पा रहा हूँ।
---- कभी कभी कोई पुराने पोस्ट , उसका विषय , या फिर कुछ और आपको कोई नया विचार , कुछ नया करने को प्रेरित कर सकते हैं आप लगेगा कि यार इसपर तो लिखना रह हे गया है , या फिर कि अभी तो इस पर और भी बहुत कुछ और लिखा जा सकता है ।
और आप बडे प्यार से थोडी देर तक उसे निहार सकते हैं जैसे कोई माँ अपने बच्चे को निहारती है । कम से कम ये काम उस दिन तो हो ही सकता है जिस दिन आप का मूड लिखने को ना कर रहा हो ।
कहिये आप क्या सोचते हैं ?
शनिवार, 5 जनवरी 2008
ये ब्लोगिए चाहते क्या हैं ............
पिछले कुछ दिनों तक ब्लोग जगत पर समय बिताने के बाद जो महसूस किया वही लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। आप सबको कैसा लगेगा मुझे नहीं पता। और हाँ यदि इससे किसी को भी कोई कष्ट पहुंचता है तो उसके लिए मुझे अग्रिम क्षमा करें क्योंकि मेरा मकसद सिर्फ अपने अनुभवों को आपसे बाटना है । आप उससे कितने सहमत हैं या बिल्कुल असहमत ये तो आपकी मर्जी। मेरे ख्याल से तो नीचे लिखी यही वो बातें हैं जो कि कोई भी ब्लॉगर चाहता है :-
ब्लोग पर ढेर सारी बातें : दरअसल इतना समय बीत जाने के बाद भी ब्लोग्गिंग आज भी कम से कम भारत में तो कुछ नया और अजूबा ही है। इसलिए जो भी इससे जुडे हैं या वे जो जुड़ना चाहते हैं ये वे भी जो ब्लोग में रूचि रखते हैं वे सभी चाहते हैं कि ब्लोग्गिंग की बातें होती रहे। अब देखिए ना जब भी मैंने ब्लोग या उससे संबंधित किसी विषय पर कुछ भी लिखा है उसको पढ़ने की इच्छा सबने दिखाई है। हमारे बडे चिट्ठाकार तो इसपर भी नज़र रखे हुए रहते हैं कि ब्लोग जगत के बारे में कहाँ क्या लिखा पढा जा रहा है। यानी कि ब्लोग की बातें ब्लोग पर बातें सभी को पसंद आती हैं।
टिप्पणियाँ : अजी इसकी चाहत किसे नहीं होती । ये तो ऐसा तोनिक है कि यदि आमिर खान और बिपाशा बासु के ब्लोग को भी नहीं मिलता तो ये बेचारे कब का लिखना छोड़ चुके होते। हर ब्लोगिया चाहता है कि वो चाहे कुछ भी लिखे उसपर टिप्पणियाँ तो आनी ही चाहिए। खासकर नए और हमारे जैसे छोटे छोटे नौसिखिये ब्लॉगर तो इसी आस में अपने पुराने पोस्टों को भी कई कई बार खोल खोल कर देखते हैं। और फिर एक ये बात भी है कि यदि मेरे जैसे ब्लोगिए कि किसी पोस्ट पर अविनाश जी, आलोक जी, मीनाक्षी जी, शास्त्री जी, मिश्रा जी जैसे बडे लोग कभी टिप्पणी कर दें तो ख़ुशी के मारे मिर्गी के दौरे तक पद सकते हैं । पता नहीं उन्हें इस बात का अंदाजा है या नहीं। तो ये तय रहा कि दुसरी सबसे पसंदीदा बात जो हर ब्लोगिए को अच्छी लगती है वो है टिप्पणियाँ।
प्रशंशा :- जी हाँ प्रशंशा, मगर ये तो ब्लोगिए क्या हर इंसान बल्कि जानवर को भी पसंद आती है। मगर मेरे कहने का मतलब ये है कि आलोचना कि तुलना में प्रशंशा सबको ज्यादा भाती है । और कई लोग तो इतने जलेभुने बैठे होते हैं कि वो बेचारे कोम्प्लेक्स के मारे कभी किसी की प्रशंशा ही नहीं कर पाते हां आलोचना में उन्हें जन्मजात महारत हासिल होती है। अब मेरी एक पोस्ट पर एक मित्र ने लिखा ," वह क्या बकवास लिखा आपने मगर मैं पढ़ कर टिप्पणी कर रहा हूँ।" पढ़ने के बाद मेरे मन में जो बात आयी " वाह सरकार क्या भीगा भीगा कर मरा है , मज़ा आ गया। " मगर खबरदार आप सबकी आलोचना नहीं कर सकते , लेकिन यकीनन प्रशंशा कभी भी किसी की भी कर सकते हैं।
पैसा कमाना : - क्या कहा पैसा कमाना । तो क्या ब्लोग्गिंग से पैसा भी बनाया जा सकता है । जी हाँ , बिल्कुल यही प्रतिक्रिया थी मेरी जब मुझे ये पता चला कि ब्लोग्गिंग को एड जगत के साथ जोड़ कर उससे पैसा कमाया जा सकता है , बल्कि कई महारथी तो इसमें घुस कर इसे व्यावसायिक ब्लोग्गिंग का रुप दे चुके हैं। मगर अफ़सोस ना तो ये सभी को पता है ना ही ये सभी से संभव है। मेरे एक मित्र ने बताया कि इसके लिए आपको अंगरेजी में लिकना पडेगा। मैंने वहीं पर आत्मसमर्पण कर दिया । क्या पैसों के लिए अंग्रेजी में लिखना शूरोऊ कर दूं और फिर मेरी अंग्रेजी तो भैया अंग्रेजों को बड़ी मुश्किल से ही समझ आयेगी। खैर, कहने का मत्लन ये कि ब्लोग लिख कर पैसा कमाना भी हर ब्लोगिए को जरूर पसंद आता है।
अग्ग्रेगातोर्स के मुख्य पृष्ट पर हमेशा अपनी एक पोस्ट दिखती रहे। मुझे हमेह्सा ये लगता है कि जब भी कोई भी चिटठा संकलक का mukha पृष्ट kholoon हमेशा कम से कम एक पोस्ट तो मेरी dikhnee ही चाहिए भाई। aakhirkaar tabhee तो सब को पता chalegaa कि मैं भी ब्लोग्गिंग kartaa हूँ।
बस यही सब वे बातें हैं जो मुझे लगता है कि हरेक ब्लॉगर चाहे वो बड़ा हो या छोटा जरूर पसंद करता है । इस नए वर्ष में अपनी तो यही चाहत है कि मोहल्ला उर कस्बा बसा रहे , लिंकित मन पर मेरा प्रतिबिम्ब बँटा रहे, कहानिया बुनी जाती रहे, शास्त्री जी के नुस्खे मिलते रहे, तरकश के बानो से नुक्ताचीनी होते रहने के बावजूद विनयपत्रिका निरंतर चपटी रहे, और हँसते हुए कोई भी ब्लॉगर ब्लोग जगत के इस आलोक से नौ दो ग्यारह ना हो।
जय हो ब्लोग जगत की।
बस आपका
अजय कुमार झा
फोन ९८७१२०५७६७।
अगली पोस्ट का विषय :- कभी अपनी पुरानी पोस्टों को पढ़ कर देखा है क्या ?
ब्लोग पर ढेर सारी बातें : दरअसल इतना समय बीत जाने के बाद भी ब्लोग्गिंग आज भी कम से कम भारत में तो कुछ नया और अजूबा ही है। इसलिए जो भी इससे जुडे हैं या वे जो जुड़ना चाहते हैं ये वे भी जो ब्लोग में रूचि रखते हैं वे सभी चाहते हैं कि ब्लोग्गिंग की बातें होती रहे। अब देखिए ना जब भी मैंने ब्लोग या उससे संबंधित किसी विषय पर कुछ भी लिखा है उसको पढ़ने की इच्छा सबने दिखाई है। हमारे बडे चिट्ठाकार तो इसपर भी नज़र रखे हुए रहते हैं कि ब्लोग जगत के बारे में कहाँ क्या लिखा पढा जा रहा है। यानी कि ब्लोग की बातें ब्लोग पर बातें सभी को पसंद आती हैं।
टिप्पणियाँ : अजी इसकी चाहत किसे नहीं होती । ये तो ऐसा तोनिक है कि यदि आमिर खान और बिपाशा बासु के ब्लोग को भी नहीं मिलता तो ये बेचारे कब का लिखना छोड़ चुके होते। हर ब्लोगिया चाहता है कि वो चाहे कुछ भी लिखे उसपर टिप्पणियाँ तो आनी ही चाहिए। खासकर नए और हमारे जैसे छोटे छोटे नौसिखिये ब्लॉगर तो इसी आस में अपने पुराने पोस्टों को भी कई कई बार खोल खोल कर देखते हैं। और फिर एक ये बात भी है कि यदि मेरे जैसे ब्लोगिए कि किसी पोस्ट पर अविनाश जी, आलोक जी, मीनाक्षी जी, शास्त्री जी, मिश्रा जी जैसे बडे लोग कभी टिप्पणी कर दें तो ख़ुशी के मारे मिर्गी के दौरे तक पद सकते हैं । पता नहीं उन्हें इस बात का अंदाजा है या नहीं। तो ये तय रहा कि दुसरी सबसे पसंदीदा बात जो हर ब्लोगिए को अच्छी लगती है वो है टिप्पणियाँ।
प्रशंशा :- जी हाँ प्रशंशा, मगर ये तो ब्लोगिए क्या हर इंसान बल्कि जानवर को भी पसंद आती है। मगर मेरे कहने का मतलब ये है कि आलोचना कि तुलना में प्रशंशा सबको ज्यादा भाती है । और कई लोग तो इतने जलेभुने बैठे होते हैं कि वो बेचारे कोम्प्लेक्स के मारे कभी किसी की प्रशंशा ही नहीं कर पाते हां आलोचना में उन्हें जन्मजात महारत हासिल होती है। अब मेरी एक पोस्ट पर एक मित्र ने लिखा ," वह क्या बकवास लिखा आपने मगर मैं पढ़ कर टिप्पणी कर रहा हूँ।" पढ़ने के बाद मेरे मन में जो बात आयी " वाह सरकार क्या भीगा भीगा कर मरा है , मज़ा आ गया। " मगर खबरदार आप सबकी आलोचना नहीं कर सकते , लेकिन यकीनन प्रशंशा कभी भी किसी की भी कर सकते हैं।
पैसा कमाना : - क्या कहा पैसा कमाना । तो क्या ब्लोग्गिंग से पैसा भी बनाया जा सकता है । जी हाँ , बिल्कुल यही प्रतिक्रिया थी मेरी जब मुझे ये पता चला कि ब्लोग्गिंग को एड जगत के साथ जोड़ कर उससे पैसा कमाया जा सकता है , बल्कि कई महारथी तो इसमें घुस कर इसे व्यावसायिक ब्लोग्गिंग का रुप दे चुके हैं। मगर अफ़सोस ना तो ये सभी को पता है ना ही ये सभी से संभव है। मेरे एक मित्र ने बताया कि इसके लिए आपको अंगरेजी में लिकना पडेगा। मैंने वहीं पर आत्मसमर्पण कर दिया । क्या पैसों के लिए अंग्रेजी में लिखना शूरोऊ कर दूं और फिर मेरी अंग्रेजी तो भैया अंग्रेजों को बड़ी मुश्किल से ही समझ आयेगी। खैर, कहने का मत्लन ये कि ब्लोग लिख कर पैसा कमाना भी हर ब्लोगिए को जरूर पसंद आता है।
अग्ग्रेगातोर्स के मुख्य पृष्ट पर हमेशा अपनी एक पोस्ट दिखती रहे। मुझे हमेह्सा ये लगता है कि जब भी कोई भी चिटठा संकलक का mukha पृष्ट kholoon हमेशा कम से कम एक पोस्ट तो मेरी dikhnee ही चाहिए भाई। aakhirkaar tabhee तो सब को पता chalegaa कि मैं भी ब्लोग्गिंग kartaa हूँ।
बस यही सब वे बातें हैं जो मुझे लगता है कि हरेक ब्लॉगर चाहे वो बड़ा हो या छोटा जरूर पसंद करता है । इस नए वर्ष में अपनी तो यही चाहत है कि मोहल्ला उर कस्बा बसा रहे , लिंकित मन पर मेरा प्रतिबिम्ब बँटा रहे, कहानिया बुनी जाती रहे, शास्त्री जी के नुस्खे मिलते रहे, तरकश के बानो से नुक्ताचीनी होते रहने के बावजूद विनयपत्रिका निरंतर चपटी रहे, और हँसते हुए कोई भी ब्लॉगर ब्लोग जगत के इस आलोक से नौ दो ग्यारह ना हो।
जय हो ब्लोग जगत की।
बस आपका
अजय कुमार झा
फोन ९८७१२०५७६७।
अगली पोस्ट का विषय :- कभी अपनी पुरानी पोस्टों को पढ़ कर देखा है क्या ?
ये ब्लोगिए चाहते क्या हैं ............
पिछले कुछ दिनों तक ब्लोग जगत पर समय बिताने के बाद जो महसूस किया वही लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। आप सबको कैसा लगेगा मुझे नहीं पता। और हाँ यदि इससे किसी को भी कोई कष्ट पहुंचता है तो उसके लिए मुझे अग्रिम क्षमा करें क्योंकि मेरा मकसद सिर्फ अपने अनुभवों को आपसे बाटना है । आप उससे कितने सहमत हैं या बिल्कुल असहमत ये तो आपकी मर्जी। मेरे ख्याल से तो नीचे लिखी यही वो बातें हैं जो कि कोई भी ब्लॉगर चाहता है :-
ब्लोग पर ढेर सारी बातें : दरअसल इतना समय बीत जाने के बाद भी ब्लोग्गिंग आज भी कम से कम भारत में तो कुछ नया और अजूबा ही है। इसलिए जो भी इससे जुडे हैं या वे जो जुड़ना चाहते हैं ये वे भी जो ब्लोग में रूचि रखते हैं वे सभी चाहते हैं कि ब्लोग्गिंग की बातें होती रहे। अब देखिए ना जब भी मैंने ब्लोग या उससे संबंधित किसी विषय पर कुछ भी लिखा है उसको पढ़ने की इच्छा सबने दिखाई है। हमारे बडे चिट्ठाकार तो इसपर भी नज़र रखे हुए रहते हैं कि ब्लोग जगत के बारे में कहाँ क्या लिखा पढा जा रहा है। यानी कि ब्लोग की बातें ब्लोग पर बातें सभी को पसंद आती हैं।
टिप्पणियाँ : अजी इसकी चाहत किसे नहीं होती । ये तो ऐसा तोनिक है कि यदि आमिर खान और बिपाशा बासु के ब्लोग को भी नहीं मिलता तो ये बेचारे कब का लिखना छोड़ चुके होते। हर ब्लोगिया चाहता है कि वो चाहे कुछ भी लिखे उसपर टिप्पणियाँ तो आनी ही चाहिए। खासकर नए और हमारे जैसे छोटे छोटे नौसिखिये ब्लॉगर तो इसी आस में अपने पुराने पोस्टों को भी कई कई बार खोल खोल कर देखते हैं। और फिर एक ये बात भी है कि यदि मेरे जैसे ब्लोगिए कि किसी पोस्ट पर अविनाश जी, आलोक जी, मीनाक्षी जी, शास्त्री जी, मिश्रा जी जैसे बडे लोग कभी टिप्पणी कर दें तो ख़ुशी के मारे मिर्गी के दौरे तक पद सकते हैं । पता नहीं उन्हें इस बात का अंदाजा है या नहीं। तो ये तय रहा कि दुसरी सबसे पसंदीदा बात जो हर ब्लोगिए को अच्छी लगती है वो है टिप्पणियाँ।
प्रशंशा :- जी हाँ प्रशंशा, मगर ये तो ब्लोगिए क्या हर इंसान बल्कि जानवर को भी पसंद आती है। मगर मेरे कहने का मतलब ये है कि आलोचना कि तुलना में प्रशंशा सबको ज्यादा भाती है । और कई लोग तो इतने जलेभुने बैठे होते हैं कि वो बेचारे कोम्प्लेक्स के मारे कभी किसी की प्रशंशा ही नहीं कर पाते हां आलोचना में उन्हें जन्मजात महारत हासिल होती है। अब मेरी एक पोस्ट पर एक मित्र ने लिखा ," वह क्या बकवास लिखा आपने मगर मैं पढ़ कर टिप्पणी कर रहा हूँ।" पढ़ने के बाद मेरे मन में जो बात आयी " वाह सरकार क्या भीगा भीगा कर मरा है , मज़ा आ गया। " मगर खबरदार आप सबकी आलोचना नहीं कर सकते , लेकिन यकीनन प्रशंशा कभी भी किसी की भी कर सकते हैं।
पैसा कमाना : - क्या कहा पैसा कमाना । तो क्या ब्लोग्गिंग से पैसा भी बनाया जा सकता है । जी हाँ , बिल्कुल यही प्रतिक्रिया थी मेरी जब मुझे ये पता चला कि ब्लोग्गिंग को एड जगत के साथ जोड़ कर उससे पैसा कमाया जा सकता है , बल्कि कई महारथी तो इसमें घुस कर इसे व्यावसायिक ब्लोग्गिंग का रुप दे चुके हैं। मगर अफ़सोस ना तो ये सभी को पता है ना ही ये सभी से संभव है। मेरे एक मित्र ने बताया कि इसके लिए आपको अंगरेजी में लिकना पडेगा। मैंने वहीं पर आत्मसमर्पण कर दिया । क्या पैसों के लिए अंग्रेजी में लिखना शूरोऊ कर दूं और फिर मेरी अंग्रेजी तो भैया अंग्रेजों को बड़ी मुश्किल से ही समझ आयेगी। खैर, कहने का मत्लन ये कि ब्लोग लिख कर पैसा कमाना भी हर ब्लोगिए को जरूर पसंद आता है।
अग्ग्रेगातोर्स के मुख्य पृष्ट पर हमेशा अपनी एक पोस्ट दिखती रहे। मुझे हमेह्सा ये लगता है कि जब भी कोई भी चिटठा संकलक का mukha पृष्ट kholoon हमेशा कम से कम एक पोस्ट तो मेरी dikhnee ही चाहिए भाई। aakhirkaar tabhee तो सब को पता chalegaa कि मैं भी ब्लोग्गिंग kartaa हूँ।
बस यही सब वे बातें हैं जो मुझे लगता है कि हरेक ब्लॉगर चाहे वो बड़ा हो या छोटा जरूर पसंद करता है । इस नए वर्ष में अपनी तो यही चाहत है कि मोहल्ला उर कस्बा बसा रहे , लिंकित मन पर मेरा प्रतिबिम्ब बँटा रहे, कहानिया बुनी जाती रहे, शास्त्री जी के नुस्खे मिलते रहे, तरकश के बानो से नुक्ताचीनी होते रहने के बावजूद विनयपत्रिका निरंतर चपटी रहे, और हँसते हुए कोई भी ब्लॉगर ब्लोग जगत के इस आलोक से नौ दो ग्यारह ना हो।
जय हो ब्लोग जगत की।
बस आपका
अजय कुमार झा
फोन ९८७१२०५७६७।
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ब्लोग पर ढेर सारी बातें : दरअसल इतना समय बीत जाने के बाद भी ब्लोग्गिंग आज भी कम से कम भारत में तो कुछ नया और अजूबा ही है। इसलिए जो भी इससे जुडे हैं या वे जो जुड़ना चाहते हैं ये वे भी जो ब्लोग में रूचि रखते हैं वे सभी चाहते हैं कि ब्लोग्गिंग की बातें होती रहे। अब देखिए ना जब भी मैंने ब्लोग या उससे संबंधित किसी विषय पर कुछ भी लिखा है उसको पढ़ने की इच्छा सबने दिखाई है। हमारे बडे चिट्ठाकार तो इसपर भी नज़र रखे हुए रहते हैं कि ब्लोग जगत के बारे में कहाँ क्या लिखा पढा जा रहा है। यानी कि ब्लोग की बातें ब्लोग पर बातें सभी को पसंद आती हैं।
टिप्पणियाँ : अजी इसकी चाहत किसे नहीं होती । ये तो ऐसा तोनिक है कि यदि आमिर खान और बिपाशा बासु के ब्लोग को भी नहीं मिलता तो ये बेचारे कब का लिखना छोड़ चुके होते। हर ब्लोगिया चाहता है कि वो चाहे कुछ भी लिखे उसपर टिप्पणियाँ तो आनी ही चाहिए। खासकर नए और हमारे जैसे छोटे छोटे नौसिखिये ब्लॉगर तो इसी आस में अपने पुराने पोस्टों को भी कई कई बार खोल खोल कर देखते हैं। और फिर एक ये बात भी है कि यदि मेरे जैसे ब्लोगिए कि किसी पोस्ट पर अविनाश जी, आलोक जी, मीनाक्षी जी, शास्त्री जी, मिश्रा जी जैसे बडे लोग कभी टिप्पणी कर दें तो ख़ुशी के मारे मिर्गी के दौरे तक पद सकते हैं । पता नहीं उन्हें इस बात का अंदाजा है या नहीं। तो ये तय रहा कि दुसरी सबसे पसंदीदा बात जो हर ब्लोगिए को अच्छी लगती है वो है टिप्पणियाँ।
प्रशंशा :- जी हाँ प्रशंशा, मगर ये तो ब्लोगिए क्या हर इंसान बल्कि जानवर को भी पसंद आती है। मगर मेरे कहने का मतलब ये है कि आलोचना कि तुलना में प्रशंशा सबको ज्यादा भाती है । और कई लोग तो इतने जलेभुने बैठे होते हैं कि वो बेचारे कोम्प्लेक्स के मारे कभी किसी की प्रशंशा ही नहीं कर पाते हां आलोचना में उन्हें जन्मजात महारत हासिल होती है। अब मेरी एक पोस्ट पर एक मित्र ने लिखा ," वह क्या बकवास लिखा आपने मगर मैं पढ़ कर टिप्पणी कर रहा हूँ।" पढ़ने के बाद मेरे मन में जो बात आयी " वाह सरकार क्या भीगा भीगा कर मरा है , मज़ा आ गया। " मगर खबरदार आप सबकी आलोचना नहीं कर सकते , लेकिन यकीनन प्रशंशा कभी भी किसी की भी कर सकते हैं।
पैसा कमाना : - क्या कहा पैसा कमाना । तो क्या ब्लोग्गिंग से पैसा भी बनाया जा सकता है । जी हाँ , बिल्कुल यही प्रतिक्रिया थी मेरी जब मुझे ये पता चला कि ब्लोग्गिंग को एड जगत के साथ जोड़ कर उससे पैसा कमाया जा सकता है , बल्कि कई महारथी तो इसमें घुस कर इसे व्यावसायिक ब्लोग्गिंग का रुप दे चुके हैं। मगर अफ़सोस ना तो ये सभी को पता है ना ही ये सभी से संभव है। मेरे एक मित्र ने बताया कि इसके लिए आपको अंगरेजी में लिकना पडेगा। मैंने वहीं पर आत्मसमर्पण कर दिया । क्या पैसों के लिए अंग्रेजी में लिखना शूरोऊ कर दूं और फिर मेरी अंग्रेजी तो भैया अंग्रेजों को बड़ी मुश्किल से ही समझ आयेगी। खैर, कहने का मत्लन ये कि ब्लोग लिख कर पैसा कमाना भी हर ब्लोगिए को जरूर पसंद आता है।
अग्ग्रेगातोर्स के मुख्य पृष्ट पर हमेशा अपनी एक पोस्ट दिखती रहे। मुझे हमेह्सा ये लगता है कि जब भी कोई भी चिटठा संकलक का mukha पृष्ट kholoon हमेशा कम से कम एक पोस्ट तो मेरी dikhnee ही चाहिए भाई। aakhirkaar tabhee तो सब को पता chalegaa कि मैं भी ब्लोग्गिंग kartaa हूँ।
बस यही सब वे बातें हैं जो मुझे लगता है कि हरेक ब्लॉगर चाहे वो बड़ा हो या छोटा जरूर पसंद करता है । इस नए वर्ष में अपनी तो यही चाहत है कि मोहल्ला उर कस्बा बसा रहे , लिंकित मन पर मेरा प्रतिबिम्ब बँटा रहे, कहानिया बुनी जाती रहे, शास्त्री जी के नुस्खे मिलते रहे, तरकश के बानो से नुक्ताचीनी होते रहने के बावजूद विनयपत्रिका निरंतर चपटी रहे, और हँसते हुए कोई भी ब्लॉगर ब्लोग जगत के इस आलोक से नौ दो ग्यारह ना हो।
जय हो ब्लोग जगत की।
बस आपका
अजय कुमार झा
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