ये बात मैं उन दिनों की कर रहा हूँ जब लड़कपन से निकल कर थोडा आगे की तरफ़ बढ़ा था, मुझे ये तो याद नहीं की लिखने का शौक ठीक ठीक कब शुरू हुआ था मगर शायद ये बीज मुझ में पनपने बहुत पहले ही जन्म ले चुके थे। शुरुआत बिल्कुल वैसे ही हुई थी जैसे आम तौर पर हम में से सभी की हुई होगी, स्कूल कॉलेज के दिनों में जो भी दिल सोचता था , और यदि वो कलम के अनुरूप होता था तो कुछ न कुछ कागजों पर निकल ही आता था। मगर जहाँ तक मुझे याद है, जब बहुत दिनों के बाद मेरा गाँव जाना हुआ तो मुझे ये जानकर बहुत आश्चर्य हुआ की वहां कभी बिजली नहीं आती जबकि खंभे सालों से लगे हुए थे, मुझे तब पता नहीं था की इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए। वापस लौटा तो मन में एक कसमसाहट सी थी, अपने पड़ोस में रहने वाले वकील अंकल ने सुझाव दिया की क्यूँ न मैं एक पत्र सम्पादक के नाम लिखूं, मुझे तब ये नहीं पता था की ये सम्पादक के नाम पत्र क्या होता है.और वो शायद मेरा पहला आधिकारिक कुछ ऐसा था समाचार पत्र में छपा था । हालाँकि उसका असर सिर्फ़ ये हुआ की वहां के स्थानीय बिजली ऑफिस से कुछ लोग मेरे बारे में पूछते हुए घर (गाँव वाले) पर पहुंचे , किंतु ये बात भी मुझे रोमांचित कर गयी।
इसके बाद तो एक ऐसा अनथक सिलसिला शुरू हुआ की क्या कहूँ, समाचार पत्रों में, विभिन्न रेडियो प्रसारणों में, परिचितों, सम्बन्धियों को और यहाँ तक की बहुत से अपरिचितों को भी ढेरों पत्र लिखे मैंने। जो बीबीसी सुनते होंगे उन्होंने अक्सर एक नाम सुना होगा, अजय कुमार झा, दिलशाद गार्डेन से , वो मैं ही था। एक दिन एक मित्र की सलाह पर मैंने मदर टेरेसा को उनके , थोड़े दिनों बाद उनके आश्रम से धन्यवाद संदेश आया, इसने मेरे लिए एक और रास्ता खोल दिया। इसके बाद तो मैंने वोया हिन्दी सेवा के बंद होने पर अक्रीकी राष्ट्रपति से लेकर किरायेदार वेरीफिकेशन मुहीम के लिए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को , ढेरों पत्र विभिन्न मंत्रालयों को, भारतीय राष्ट्रपति को, और पता नहीं किन्हें किन्हें लिखता रहा हूँ या कहूँ की अब भी लिख ही रहा हूँ। ।
मुझसे मेरे शुरुआती दिनों में किस ने पूछा था की भाई आप जो इतना लिखते हैं उसका असर भी होता है कुछ, मुझे तो नहीं लगता की ऐसे लिखने से कोई क्रांति आयेगी। मगर उन सज्जन को मैंने यकीन दिलाया और मुझे बा भी पूरा विश्वास है की क्रांति जरूर आयेगी और उसमें हमारी लेखनी का भी बड़ा महत्वपूर्ण योगदान होगा। जहाँ तक मुझे प्राप्त सफलताओं की बात है तो वो भी बहुत लम्बी है, अभी सिर्फ़ इतना भर की आज जो भी मैं सोच पाता लिख पाता हूँ सब उन्हें दिनों की बदौलत है और हाँ इतना यकीन तो सबको दिला सकता हूँ की लेखनी से काम हो सकता है की धीरे धीरे हो मगर जब होता है न तो बस दुनिया देखती है, तो आप भी तैयार हैं मेरे साथ दुनिया को दिखाने के लिए की कलम से ही क्रांति आती है .............