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बुधवार, 21 मई 2008

ब्लॉगर के रूप में पहचान न बने , न सही, मगर.........

बहुत पहले किसी ने कहा था, की साहित्य असल में सिर्फ़ साहित्यकार के लिए होता है, और ठीक उसी तरह शायद ब्लॉग भी सिर्फ़ ब्लोग्गेर्स के लिए होता है, सिर्फ़ उन्ही के पढने और उन्ही के लिखने के लिए। पिछले छः सात महीनों तक यहाँ ब्लॉगजगत पर समय बिताने के बावजूद ब्लॉगर के रूप में मेरी क्या कितनी पहचान बन पायी है न इस बारे में कभी सोचा है न सोचना चाहता हूँ, मगर इतना जरूर है की आज जिन ब्लोग्गेर्स का नियमित तिप्प्निकारों के रूप में मैं आभारी हूँ , मैं चाहता हूँ की एक दिन मैं ख़ुद उस कतार में शामिल हो जाऊं। अहलंकी कुछ दिनों पहले जब मुझे मौका मिला था या कहूँ की ऑफिस में कम्पूटर और थोडा समय भी मिल गया था टू मैंने उसका पूरा फायदा उठाते हुए खूब सारी टिप्पणियाँ की थी, मगर यहाँ कफे में बैठ कर वो सम्भव अनाहीं हो पा रहा है और जैसे ही मैं अपना ख़ुद का कंप्युटर ले लूंगा तो जरूर ही भाई उड़नतश्तरी,डॉक्टर अनुराग आर्य, भाई महेंद्र, मित्र द्विवेदी जी मेहेक्क जी, और भी जो नियमित टिप्पणी करने वाले हैं उनमें से एक बन पाऊँगा और ऐसा जल्दी ही होगा ये मेरा विश्वास है। तब शायद ही कोई ऐसा ब्लॉग बचेगा जहाँ में घूम कर पढ़ कर और लिख कर नहीं आऊंगा।

अपने अगले पन्ने में आप सब ब्लॉगर से कुछ ख़ास बात या निवेदन या सलाह-मशवरा करने वाला हूँ, इस बारे मं की आप सब में से जो भी जानकार लोग हैं किसी एक विशेष ब्लॉग के माध्यम से हम सभी ब्लोग्गेर्स के प्रश्नों का कठिनाएइयों का समाधान कर सकें तो बड़ा उपकार होगा।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इच्छा पूरी होगी....आपकी जय हो...

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  2. शुभकामनायें अजय जी ।
    क्या नियमित टिप्पणी करने से ही ब्लॉगर के रूप में पहचान बन पाती है ? समझ में नहीं आता एक तरफ अग्रज समीर जी हैं नियमित टिप्पणीकार हैं दूसरी तरफ अग्रज प्रमोद सिंह जी हैं बहुत कम टिप्पणी करते हैं । आप भी यहां ज्यादा टिप्पणियों पर ही जोर दे रहे हैं ऐसे में प्रत्येक दिन अपने ब्लाग में ही उस दिन प्रकाशित सभी ब्लागपोस्ट के संबंध में टिप्पणियों का एक पोस्ट लिखना ज्यादा उचित प्रतीत होता है इससे कम समय लगेगा और यह काम आफिस से भी हो जायेगा ।

    उत्तर देंहटाएं

मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

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