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सोमवार, 19 मई 2008

सच का कच्चा चिटठा

आजकल लिखने का कम मगर पढने का ज्यादा मन कर रहा है , और मज़ा भी उसी में आ रहा है, अभी हाल ही में मित्र देवेन्द्र आर्य की कलम से निकली कुछ गज़लें पढी ,लीजिये आप भी नोश फरमाएं।


पहले सच का कच्छ चिटठा खोला जाता है,
फ़िर जाके एक झूठ हवा में घोला जाता है॥

आख़िर कैसे मंडी से मुठभेड़ किया जाए,
गंगा बचती है तो कोका कोला जाता है.।

ये तो सदियों से होता आया है भाई जी,
कंगालों का ही ईमान टटोला जाता है॥

कोई वसूली करते मुझको पकड़े तो जानू,
मैं थोड़े जाता हूँ, मेरा झोला जाता है॥

सीट सुरक्षित है लेकिन अब भी हर प्रत्याशी,
चमरौती के पहले बामन तोला जाता है॥

जिसकी निर्धनता के आगे नतमस्तक था धन ,
वह गांधी भी अब सिक्कों से तौला जाता है॥

मुझको लगता है मैं अब भी सीखा नहीं पाया,
चुप रहकर कविता में कैसे बोला जाता है...

कैसी लगी जरूर बतायें........

4 टिप्‍पणियां:

  1. मुझको लगता है मैं अब भी सीखा नहीं पाया,
    चुप रहकर कविता में कैसे बोला जाता है...
    bhaut badhiya...unki kuch gajle shayad rachnakaar me padhi thi...ve bhi behad pasand aayi thi.

    उत्तर देंहटाएं
  2. देवेन्द्र आर्य जी की रचना पसंद आई. आभार प्रस्तुति का.

    उत्तर देंहटाएं
  3. पहल-८८ में भी दैवेन्द्र आर्य के अच्छे गीत है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. aap sabko pasand aayaa iske liye bahut bahut dhanyavaad.

    उत्तर देंहटाएं

मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

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