कल की सबसे बड़ी ख़बर यही थी की शाहरुख़ खान का ऑपरेशन सफल रहा। कमाल है, सवा अरब की जनसंख्या वाले देश की सबसे बड़ी ख़बर यही थी। यकीनन शाहरुक आज उस मुकाम पर हैं जहाँ की उनसे जुडी हर ख़बर एक ख़बर ही है, पर क्या यही इकलौती ख़बर है। ऐसा भी नहीं है की मीडिया ने ये कारनामा पहली बार किया है। सच तो ये है की आज एलोक्त्रिनिक मीडिया का स्वरुप और कार्यशैली ही कुछ ऐसी बन चुकी है की एक आम आदमी भी सोचने पर मजबूर है की इन चैनल वालों के पास समाचार के आलावा सब कुछ है।
अभी कुछ समय पूर्व बीबी सी हिन्दी सेवा द्वारा कराये गए एक सर्वेक्षण में ६७ प्रतिशत लोगों ने माना की भारतीय मीडिया दिशाहें है। विवादित और सनसनी पैदा करने वाली ख़बरों के पीछे भाग रहा है। कई लोगों का विचार तो ये था की बहुत से मामलों में तो मीडिया स्वयं ही ख़बरों को विवादित और उत्तेजना से भर कर पेश करता है, जो एक हद तक सच भी लगता है। अफ़सोस की आज समाज के हरेक वर्ग और पेशे में व्याप्त हो रही कुरीतियों से मीडिया भी ख़ुद को बचा नहीं पाया है।
भारतीय एलेक्रोनिक मीडिया का सबसे बड़ा दोष है समाचारों की संवेदनशीलता और परिणाम को ना भांपते हुए, महज आगे रहे की होड़ में शामिल रहना। हलाँकि विश्लेषक बताते हैं की इसका कारण ये है की सभी समाचार चैनलों को चौबीस घंटे समाचार प्रसारित करने होते है। उस समय तो सब ठीक रहता है जब वास्तव में कुछ घटित होता है। स्थिति तब ख़राब हो जाती है जब सचमुच कुछ ऐसा न हो रहा हो जो आम लोगों से जुदा और समाचार बनने लायक हो। ऐसे में जबरन ख़बर बनने और समाचारों को जमन देने के लिए मीडिया जो कुछ भी करता है वह अक्सर नैतिकता को परे रख कर किया जता है।
आज समाचार चैनलों के सम्पादक और थिंक टैंक इतने अक्रियाशील हो गए हैं की विषयों के चयन से लेकर समाचार सम्पादन तथा कार्यक्रमों के निर्माण तक में मौलिकता तो दूर सिर्फ़ नक़ल और एक ही शैली पर चलते जाने का प्रचलन सा बन गया है। हद तो ये है की अपराध आधारित कार्यक्रमों को बनाने परोसने में विभिन्न समाचार चैनलों ने सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया है। समाचार चैनलों में व्याप्त बेतरतीबी का एक मुख्या कारण है व्यावसायिक दबाव। यानि हमेशा मुनाफे का कारोबार करने वाली ख़बरों की तलाश। टी आर पी की लम्बी उछल देने के लिए घटनाओं की प्रतीख्सा करते समाचार चैनल । एक सर्वेक्षण के मुताबिक नियमित दर्शकों में से लगभग ४२ प्रतिशत लोग अपराध समाचारों और ऐसी ही ख़बरों को देखना पसंद करते हैं,
मगर अब समय आ गया है की मीडिया को अपने चौथे स्तम्भ वाली भूमिका को निभाना चाहिए.
बुधवार, 18 फ़रवरी 2009
सोमवार, 9 फ़रवरी 2009
जो नहीं बिके , उन्हें खरीदा जाए
जो नहीं बिके , उन्हें खरीदा जाए :-
मेरे मित्र जो आई पी एल , की नीलामी पर पहले से ही बुरी निगाह डाले थे, जबकि मैं जानता था कि , क्रिकेट के देश में बचे कुछ ही दुश्मनों में से वे भी एक थे, जब पूरा दिन बैठ कर नीलामी की खबरें देखते रहे तो मेरे से नहीं रहा गया।
क्या हुआ , महाराज, आज ये क्रिकेट प्रेम कैसा, कहीं ऐसा तो नहीं कोई और ही चक्कर है, या कहीं आप ये तो नहीं समझ रहे कि इस आई पी एल की नीलामी में किसी पार्टी का टिकट भी नीलाम हो रहा है और आप जाहिर है इन उसे अगले चुनाव के लिए आजमाना चाह रहे हों। अच्छा अच्छा, ये सब कहीं हीरोइन लोगन को देखने के लिए तो नहीं था , आख़िर माजरा क्या था यार ?
अरे नहीं यार , कोई ख़ास नहीं, दरअसल मैं उन खिलाड़ियों के बारे में सोच रहा था जो बिके नहीं, मतलब किसी ने भी उन्हें नहीं खरीदा, सोच रहा हूँ कि क्यों न मैं ही उन में से कुछ को खरीद लूँ ?
मेरे अचंभित भाव वाले चेहरे को देख कर वे भी बौखला कर बोले,
क्यों यार , तुम ऐसे क्यों देख रहे हो, भाई जब मैं चालीस रुपैये, किलो टमाटर और प्याज खरीद सकता हूँ, पच्चीस रुपैये किलो चीनी खरीद सकता हूँ, जब हर महीने मैं अपने फोन में नयी नयी रिंग टोन भरवा सकता हूँ, इमरान हाशमी, सिकंदर खेर, हर्मन बवेजा की पिक्चरों की टिकट खरीद सकता हूँ और डूबने के बावजूद शेयर खरीद सकता हूँ तो फ़िर यार इन्हें क्यों नहीं खरीद सकता। हाँ हाँ, अब तुम ये पूछोगे कि मैं खरीदना क्यों चाहता हूँ। यार सच बताऊँ तो अभी तो मैंने भी नहीं सोचा है, मगर जब खरीद लूंगा तो करवा लूंगा कुछ भी। कभी मेरे बच्चों के साथ वीडीयो गेम खेल लेंगे, जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं खेल पाता, कभी सब्जी भाजी ला दिया करेंगे, कभी मेरे साथ ताश वैगेरह खेल लिया करेंगे।
मगर ऐसा वे क्यों करेंगे भला,
अरे सब करेंगे, तुमने नहीं देखा पिछली बार तो जिंटा ने कुछ खिलाड़ियों को आधी रात को होटल से भगा दिया था, फ़िर मैं तो उनपर २० २० जीतने का कोई दबाव भी नहीं डालूँगा, और यार जब उन्हें किसी ने खरीदा ही नहीं तो फ़िर इससे अच्छा ऑफर उन्हें कहाँ मिलेगा ?
मेरे मित्र जो आई पी एल , की नीलामी पर पहले से ही बुरी निगाह डाले थे, जबकि मैं जानता था कि , क्रिकेट के देश में बचे कुछ ही दुश्मनों में से वे भी एक थे, जब पूरा दिन बैठ कर नीलामी की खबरें देखते रहे तो मेरे से नहीं रहा गया।
क्या हुआ , महाराज, आज ये क्रिकेट प्रेम कैसा, कहीं ऐसा तो नहीं कोई और ही चक्कर है, या कहीं आप ये तो नहीं समझ रहे कि इस आई पी एल की नीलामी में किसी पार्टी का टिकट भी नीलाम हो रहा है और आप जाहिर है इन उसे अगले चुनाव के लिए आजमाना चाह रहे हों। अच्छा अच्छा, ये सब कहीं हीरोइन लोगन को देखने के लिए तो नहीं था , आख़िर माजरा क्या था यार ?
अरे नहीं यार , कोई ख़ास नहीं, दरअसल मैं उन खिलाड़ियों के बारे में सोच रहा था जो बिके नहीं, मतलब किसी ने भी उन्हें नहीं खरीदा, सोच रहा हूँ कि क्यों न मैं ही उन में से कुछ को खरीद लूँ ?
मेरे अचंभित भाव वाले चेहरे को देख कर वे भी बौखला कर बोले,
क्यों यार , तुम ऐसे क्यों देख रहे हो, भाई जब मैं चालीस रुपैये, किलो टमाटर और प्याज खरीद सकता हूँ, पच्चीस रुपैये किलो चीनी खरीद सकता हूँ, जब हर महीने मैं अपने फोन में नयी नयी रिंग टोन भरवा सकता हूँ, इमरान हाशमी, सिकंदर खेर, हर्मन बवेजा की पिक्चरों की टिकट खरीद सकता हूँ और डूबने के बावजूद शेयर खरीद सकता हूँ तो फ़िर यार इन्हें क्यों नहीं खरीद सकता। हाँ हाँ, अब तुम ये पूछोगे कि मैं खरीदना क्यों चाहता हूँ। यार सच बताऊँ तो अभी तो मैंने भी नहीं सोचा है, मगर जब खरीद लूंगा तो करवा लूंगा कुछ भी। कभी मेरे बच्चों के साथ वीडीयो गेम खेल लेंगे, जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं खेल पाता, कभी सब्जी भाजी ला दिया करेंगे, कभी मेरे साथ ताश वैगेरह खेल लिया करेंगे।
मगर ऐसा वे क्यों करेंगे भला,
अरे सब करेंगे, तुमने नहीं देखा पिछली बार तो जिंटा ने कुछ खिलाड़ियों को आधी रात को होटल से भगा दिया था, फ़िर मैं तो उनपर २० २० जीतने का कोई दबाव भी नहीं डालूँगा, और यार जब उन्हें किसी ने खरीदा ही नहीं तो फ़िर इससे अच्छा ऑफर उन्हें कहाँ मिलेगा ?
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009
क्या अन्य ब्लॉग बंद कर दूँ ?
आज हिन्दी ब्लॉग टिप्स की मदद से मैंने अपने दो ब्लोगों को एक करने की कोशिश की । दरअसल मैं एक साथ बहुत से ब्लोगों में नहीं लिख पा रहा था, फ़िर लगा की शायद इससे मैं अपनी बात जयादा अच्छी तरह से कह पाउँगा। मगर अब जबकि मैंने रद्दी की टोकरी को कुछ भी कभी भी में मिला दिया है तो उसमें पोस्ट की कवितायें दो दो बार दिख रही हैं, मगर उससे अधिक मैं अब ये नहीं समझ पा रहा हूँ की क्या अब एक ब्लॉग को हटा दूँ या रहने दूँ,
मैं तो बिल्कुल कन्फुज हूँ , आप लोग ही बताएं क्या करूँ ?
मैं तो बिल्कुल कन्फुज हूँ , आप लोग ही बताएं क्या करूँ ?
गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009
बग,ब्लॉग,, बिलियेनेयर
मित्र जब भी मुझे चिंताग्रस्त देखते तो पता नहीं किस भावना से वशीभूत होकर , पता नहीं उन्हें कौन सा कीडा काट लेता है की, जरूर मुझसे मेरी चिंता का कारण पूछने लगते ,और इसका परिणाम ये होता की अक्सर उस चिंता से कई बार कई तरह के फ़साने और अफ़साने निकल जाते थे।
क्या हुआ, झा जी, किस चिंता में पड़े हुए हो आप। क्या ये सोच रहे हो की भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, यदि ऐसा कुछ सोच रहे हो तो छोड़ दो, अजी ये लोकतंत्र हैं, और फ़िर जबसे हरदन हल्ली देवे गुदा प्रधानमंत्री बने तभी से सबने प्रधानमंत्री के नाम का अंदाजा लगाना छोड़ diya ,और यार आप तो ऐसे सोच रहे हो जैसे आपके फैसले पर ही देश की अगली तकदीर निर्भर है।
मेरी तरफ़ से प्रतिक्रया नहीं देख कर वे फ़िर बोले, क्या बात है यार, अमा तुम्हारे सोचने से तो दुनिया के आर्थिक संकट पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला, और तुम तो बस ये सोच कर खुश होते रहा करो की चुनाव और सरकार बनने तक पैट्रोल गैस, सब सस्ते मिलेंगे।
अब मेरे बर्दाश्त से बाहर हो रहा था, नहीं भाई, मैं इन हलके मुद्दों पर अब अपना समय नहीं खर्च करता हूँ। दरअसल बात कुछ और ही है, मैं तुम्हें विस्तार से बताता हूँ। यार, बताओ अब तो सुना है की चाँद और फिजा पार भी एक ;पिक्चर बन दरही है, इससे पहले तो झुग्गी के कुत्तों पर भी एक बड़ी पिक्चर बन गयी है, बताओ यार, हम तो कुत्तों से भी गए गुजरे हो गए, कम्भाक्त कोई हमपे पिक्चर बनाए को राजी ही नहीं है, मैं तो इससे सोच में पडा हूँ।
जबकि तुम नहीं जानते क्या की हमारी हालत तो झुग्गी वालों और कुत्तों से भी बदतर है। हम तो किरायेदार हैं, झुग्गी वाले तो फ़िर भी मालिक हैं। और रही कुत्तों की बात तो तुम्हें क्या बताएं अक्सर अपनी हालत कुत्तों जैसी ही रहती है।
बल्कि मैं तो पहले भी सोच रहा था की राम गोपाल जी अपने शोले के पीटने के बाद जरूर ही हम पर कुछ बनायेंगे, मगर निराश होने के बाद अब तो किसी बोल्लीवुद के डाईरेक्टर से ही मिलने का इरादा है,
पिक्चर का नाम होगा, बग , ब्लॉग, बिलीयेनायर ।
आएँ , ये कैसी पिक्चर है भाई, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया।
देखो यार अब मेरा मुंह मत खुलवाओ, स्लम डॉग मिलियेनेयर में ही कौन सा किसके साथ सम्बन्ध है जरा यही बताओ। खैर, सुनो बग यानि, कीडा, वो तो हम हैं ही, कम से कम अपनी पत्नी की नजरों में तो हम किताबी कीडे हैं ही, ब्लॉग भी अपना है ही, अबे इसमें भी शक है क्या, और रही बिलियेनायर की बात तो उससे सीधे सीधे तो हम नहीं जुड़े हैं मगर इसे यूँ समझ लो की जो पैसे हम पागलों की तरह मोबाईल पर और तरह तरह की रिंग टन पर खर्च करते हैं, एस ऍम एस करते हैं आख़िर उन्ही पैसों से तो नोकिया और ऐर्तेल के मालिक अरबपति बन जाते हैं।
तो इन्तजार करो एक न एक दिन बग ब्लॉग बिलियेनेयर को भी ऑस्कर का नामांकन मिल ही जायेगा.
क्या हुआ, झा जी, किस चिंता में पड़े हुए हो आप। क्या ये सोच रहे हो की भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, यदि ऐसा कुछ सोच रहे हो तो छोड़ दो, अजी ये लोकतंत्र हैं, और फ़िर जबसे हरदन हल्ली देवे गुदा प्रधानमंत्री बने तभी से सबने प्रधानमंत्री के नाम का अंदाजा लगाना छोड़ diya ,और यार आप तो ऐसे सोच रहे हो जैसे आपके फैसले पर ही देश की अगली तकदीर निर्भर है।
मेरी तरफ़ से प्रतिक्रया नहीं देख कर वे फ़िर बोले, क्या बात है यार, अमा तुम्हारे सोचने से तो दुनिया के आर्थिक संकट पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला, और तुम तो बस ये सोच कर खुश होते रहा करो की चुनाव और सरकार बनने तक पैट्रोल गैस, सब सस्ते मिलेंगे।
अब मेरे बर्दाश्त से बाहर हो रहा था, नहीं भाई, मैं इन हलके मुद्दों पर अब अपना समय नहीं खर्च करता हूँ। दरअसल बात कुछ और ही है, मैं तुम्हें विस्तार से बताता हूँ। यार, बताओ अब तो सुना है की चाँद और फिजा पार भी एक ;पिक्चर बन दरही है, इससे पहले तो झुग्गी के कुत्तों पर भी एक बड़ी पिक्चर बन गयी है, बताओ यार, हम तो कुत्तों से भी गए गुजरे हो गए, कम्भाक्त कोई हमपे पिक्चर बनाए को राजी ही नहीं है, मैं तो इससे सोच में पडा हूँ।
जबकि तुम नहीं जानते क्या की हमारी हालत तो झुग्गी वालों और कुत्तों से भी बदतर है। हम तो किरायेदार हैं, झुग्गी वाले तो फ़िर भी मालिक हैं। और रही कुत्तों की बात तो तुम्हें क्या बताएं अक्सर अपनी हालत कुत्तों जैसी ही रहती है।
बल्कि मैं तो पहले भी सोच रहा था की राम गोपाल जी अपने शोले के पीटने के बाद जरूर ही हम पर कुछ बनायेंगे, मगर निराश होने के बाद अब तो किसी बोल्लीवुद के डाईरेक्टर से ही मिलने का इरादा है,
पिक्चर का नाम होगा, बग , ब्लॉग, बिलीयेनायर ।
आएँ , ये कैसी पिक्चर है भाई, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया।
देखो यार अब मेरा मुंह मत खुलवाओ, स्लम डॉग मिलियेनेयर में ही कौन सा किसके साथ सम्बन्ध है जरा यही बताओ। खैर, सुनो बग यानि, कीडा, वो तो हम हैं ही, कम से कम अपनी पत्नी की नजरों में तो हम किताबी कीडे हैं ही, ब्लॉग भी अपना है ही, अबे इसमें भी शक है क्या, और रही बिलियेनायर की बात तो उससे सीधे सीधे तो हम नहीं जुड़े हैं मगर इसे यूँ समझ लो की जो पैसे हम पागलों की तरह मोबाईल पर और तरह तरह की रिंग टन पर खर्च करते हैं, एस ऍम एस करते हैं आख़िर उन्ही पैसों से तो नोकिया और ऐर्तेल के मालिक अरबपति बन जाते हैं।
तो इन्तजार करो एक न एक दिन बग ब्लॉग बिलियेनेयर को भी ऑस्कर का नामांकन मिल ही जायेगा.
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009
देश का सबसे बड़ा टैलेंट शो होने जा रहा है, तैयार हैं न
देश का सबसे बड़ा टैलेंट शो होने जा रहा है, तैयार हैं न :-
मुनादी हो चुकी है। विश्व के बहुत मजबूत कहे , मने जाने वाले लोकतंत्र की पहरेदारी के लिए "इंडीयन लीडर की तलाश " , संख्या पता नहीं कौन सी, नामक टैलेंट हंट शुरू हो चुका है। जनता गली , मोहल्ले, कसबे-कूचे , गाँव शहर हर जगह औदीशन ले रही है। कोई नया चेहरा तलाश रहा है तो कोई पुराने का हे मेकओवर करवा रहा है। पहले से इस क्षेत्र में मौजूद गुरुघंतालों के घरानू से भी प्रतियोगी जो आजमाईश कर रहे हैं। लेकिन कहीं किसी भी कोने से किसी नयी सोच, नए चरित्र या नयी हिम्मत वाले किसी प्रतियोगी मिलने की आशा लगभग न के बराबर है। सबसे अहम् बात , अभी से लेकर चुनाव तक ये सभी कलाकार तरह तरह से वोट अपील करेंगे और फ़िर आम जनता एक ही दिन वोट करेगी । कोई दूसरा राउंड नहीं , कोई वाईल्ड कार्ड एंट्री नहीं । तो तैयार हैं न आप सब, नए टैलेंट सो चाहिए एक अच्छा नेता के लिए।
ध्यान से , यदि चूक गए तो पाँच साल तक हाथ मलेंगे।
मॉडर्न :-
रवि आज सुबह से ही काफी खुश लग रहा था, आख़िर इतने दिनों बाद उसके पुराने मित्र ने उसी घर पर मिलने को बुलाया था, वो भी अपनी आलीशान कोठी में, वरना आजकल कौन सम्बन्ध रखता है गरीबों से। उसने तो पहले ही तय कर लिया था, की चाहे जो भी हो आज वो अमित से अपने पुत्र के नए स्कूल अमें एड्मीसन के बारे में बात जरूर कर लेगा, चाहे उसे कर्ज ही क्यों न लेना पड़े, मगर वो अपने बेटे को कोंवैंत में जरूर पढाएगा,। रवि जानता था की अमित जैसा बड़ा उद्योगपति जब सिफारिश करेगा तो उसके बेटे को दाखिला जरूर मिल जायेगा।
अमित के बंगले पर पहुँचते ही , उसने देखा की अमित उसका लॉन में ही चाय पर इन्तजार कर रहा है। उसने बड़ी गर्मजोशी से उसका स्वागत किया। फ़िर इधर उधर की बातें होने लगी। तभी अमित का पुत्र किशोर बाहर जाने के लिए वहां से निकला,
अरे किशोर , यहाँ आओ बेटा , देखो रवि अंकल आए हैं, आओ यहाँ आकर इनके पाँव छो कर आशीर्वाद लो।
डैड , क्या आप भी पुरानी दकियानूसी आदतें न ख़ुद छोड़ते हैं और हमें भी ऐसा करने लिए कहते रहते हैं, हम लोग मॉडर्न हैं ये सब ठीक नहीं लगता।
जहाँ अमित के चेहरे पर खीज भरी मुस्कराहट थी , वहीँ रवि के चेहरे पर संतोष , की उसने अब तक अपने बेटे को मॉडर्न स्कूल में पढाने के लिए अमित से बात नहीं की थी.
मुनादी हो चुकी है। विश्व के बहुत मजबूत कहे , मने जाने वाले लोकतंत्र की पहरेदारी के लिए "इंडीयन लीडर की तलाश " , संख्या पता नहीं कौन सी, नामक टैलेंट हंट शुरू हो चुका है। जनता गली , मोहल्ले, कसबे-कूचे , गाँव शहर हर जगह औदीशन ले रही है। कोई नया चेहरा तलाश रहा है तो कोई पुराने का हे मेकओवर करवा रहा है। पहले से इस क्षेत्र में मौजूद गुरुघंतालों के घरानू से भी प्रतियोगी जो आजमाईश कर रहे हैं। लेकिन कहीं किसी भी कोने से किसी नयी सोच, नए चरित्र या नयी हिम्मत वाले किसी प्रतियोगी मिलने की आशा लगभग न के बराबर है। सबसे अहम् बात , अभी से लेकर चुनाव तक ये सभी कलाकार तरह तरह से वोट अपील करेंगे और फ़िर आम जनता एक ही दिन वोट करेगी । कोई दूसरा राउंड नहीं , कोई वाईल्ड कार्ड एंट्री नहीं । तो तैयार हैं न आप सब, नए टैलेंट सो चाहिए एक अच्छा नेता के लिए।
ध्यान से , यदि चूक गए तो पाँच साल तक हाथ मलेंगे।
मॉडर्न :-
रवि आज सुबह से ही काफी खुश लग रहा था, आख़िर इतने दिनों बाद उसके पुराने मित्र ने उसी घर पर मिलने को बुलाया था, वो भी अपनी आलीशान कोठी में, वरना आजकल कौन सम्बन्ध रखता है गरीबों से। उसने तो पहले ही तय कर लिया था, की चाहे जो भी हो आज वो अमित से अपने पुत्र के नए स्कूल अमें एड्मीसन के बारे में बात जरूर कर लेगा, चाहे उसे कर्ज ही क्यों न लेना पड़े, मगर वो अपने बेटे को कोंवैंत में जरूर पढाएगा,। रवि जानता था की अमित जैसा बड़ा उद्योगपति जब सिफारिश करेगा तो उसके बेटे को दाखिला जरूर मिल जायेगा।
अमित के बंगले पर पहुँचते ही , उसने देखा की अमित उसका लॉन में ही चाय पर इन्तजार कर रहा है। उसने बड़ी गर्मजोशी से उसका स्वागत किया। फ़िर इधर उधर की बातें होने लगी। तभी अमित का पुत्र किशोर बाहर जाने के लिए वहां से निकला,
अरे किशोर , यहाँ आओ बेटा , देखो रवि अंकल आए हैं, आओ यहाँ आकर इनके पाँव छो कर आशीर्वाद लो।
डैड , क्या आप भी पुरानी दकियानूसी आदतें न ख़ुद छोड़ते हैं और हमें भी ऐसा करने लिए कहते रहते हैं, हम लोग मॉडर्न हैं ये सब ठीक नहीं लगता।
जहाँ अमित के चेहरे पर खीज भरी मुस्कराहट थी , वहीँ रवि के चेहरे पर संतोष , की उसने अब तक अपने बेटे को मॉडर्न स्कूल में पढाने के लिए अमित से बात नहीं की थी.
देश का सबसे बड़ा टैलेंट शो होने जा रहा है, तैयार हैं न
देश का सबसे बड़ा टैलेंट शो होने जा रहा है, तैयार हैं न :-
मुनादी हो चुकी है। विश्व के बहुत मजबूत कहे , मने जाने वाले लोकतंत्र की पहरेदारी के लिए "इंडीयन लीडर की तलाश " , संख्या पता नहीं कौन सी, नामक टैलेंट हंट शुरू हो चुका है। जनता गली , मोहल्ले, कसबे-कूचे , गाँव शहर हर जगह औदीशन ले रही है। कोई नया चेहरा तलाश रहा है तो कोई पुराने का हे मेकओवर करवा रहा है। पहले से इस क्षेत्र में मौजूद गुरुघंतालों के घरानू से भी प्रतियोगी जो आजमाईश कर रहे हैं। लेकिन कहीं किसी भी कोने से किसी नयी सोच, नए चरित्र या नयी हिम्मत वाले किसी प्रतियोगी मिलने की आशा लगभग न के बराबर है। सबसे अहम् बात , अभी से लेकर चुनाव तक ये सभी कलाकार तरह तरह से वोट अपील करेंगे और फ़िर आम जनता एक ही दिन वोट करेगी । कोई दूसरा राउंड नहीं , कोई वाईल्ड कार्ड एंट्री नहीं । तो तैयार हैं न आप सब, नए टैलेंट सो चाहिए एक अच्छा नेता के लिए।
ध्यान से , यदि चूक गए तो पाँच साल तक हाथ मलेंगे।
मॉडर्न :-
रवि आज सुबह से ही काफी खुश लग रहा था, आख़िर इतने दिनों बाद उसके पुराने मित्र ने उसी घर पर मिलने को बुलाया था, वो भी अपनी आलीशान कोठी में, वरना आजकल कौन सम्बन्ध रखता है गरीबों से। उसने तो पहले ही तय कर लिया था, की चाहे जो भी हो आज वो अमित से अपने पुत्र के नए स्कूल अमें एड्मीसन के बारे में बात जरूर कर लेगा, चाहे उसे कर्ज ही क्यों न लेना पड़े, मगर वो अपने बेटे को कोंवैंत में जरूर पढाएगा,। रवि जानता था की अमित जैसा बड़ा उद्योगपति जब सिफारिश करेगा तो उसके बेटे को दाखिला जरूर मिल जायेगा।
अमित के बंगले पर पहुँचते ही , उसने देखा की अमित उसका लॉन में ही चाय पर इन्तजार कर रहा है। उसने बड़ी गर्मजोशी से उसका स्वागत किया। फ़िर इधर उधर की बातें होने लगी। तभी अमित का पुत्र किशोर बाहर जाने के लिए वहां से निकला,
अरे किशोर , यहाँ आओ बेटा , देखो रवि अंकल आए हैं, आओ यहाँ आकर इनके पाँव छो कर आशीर्वाद लो।
डैड , क्या आप भी पुरानी दकियानूसी आदतें न ख़ुद छोड़ते हैं और हमें भी ऐसा करने लिए कहते रहते हैं, हम लोग मॉडर्न हैं ये सब ठीक नहीं लगता।
जहाँ अमित के चेहरे पर खीज भरी मुस्कराहट थी , वहीँ रवि के चेहरे पर संतोष , की उसने अब तक अपने बेटे को मॉडर्न स्कूल में पढाने के लिए अमित से बात नहीं की थी.
मुनादी हो चुकी है। विश्व के बहुत मजबूत कहे , मने जाने वाले लोकतंत्र की पहरेदारी के लिए "इंडीयन लीडर की तलाश " , संख्या पता नहीं कौन सी, नामक टैलेंट हंट शुरू हो चुका है। जनता गली , मोहल्ले, कसबे-कूचे , गाँव शहर हर जगह औदीशन ले रही है। कोई नया चेहरा तलाश रहा है तो कोई पुराने का हे मेकओवर करवा रहा है। पहले से इस क्षेत्र में मौजूद गुरुघंतालों के घरानू से भी प्रतियोगी जो आजमाईश कर रहे हैं। लेकिन कहीं किसी भी कोने से किसी नयी सोच, नए चरित्र या नयी हिम्मत वाले किसी प्रतियोगी मिलने की आशा लगभग न के बराबर है। सबसे अहम् बात , अभी से लेकर चुनाव तक ये सभी कलाकार तरह तरह से वोट अपील करेंगे और फ़िर आम जनता एक ही दिन वोट करेगी । कोई दूसरा राउंड नहीं , कोई वाईल्ड कार्ड एंट्री नहीं । तो तैयार हैं न आप सब, नए टैलेंट सो चाहिए एक अच्छा नेता के लिए।
ध्यान से , यदि चूक गए तो पाँच साल तक हाथ मलेंगे।
मॉडर्न :-
रवि आज सुबह से ही काफी खुश लग रहा था, आख़िर इतने दिनों बाद उसके पुराने मित्र ने उसी घर पर मिलने को बुलाया था, वो भी अपनी आलीशान कोठी में, वरना आजकल कौन सम्बन्ध रखता है गरीबों से। उसने तो पहले ही तय कर लिया था, की चाहे जो भी हो आज वो अमित से अपने पुत्र के नए स्कूल अमें एड्मीसन के बारे में बात जरूर कर लेगा, चाहे उसे कर्ज ही क्यों न लेना पड़े, मगर वो अपने बेटे को कोंवैंत में जरूर पढाएगा,। रवि जानता था की अमित जैसा बड़ा उद्योगपति जब सिफारिश करेगा तो उसके बेटे को दाखिला जरूर मिल जायेगा।
अमित के बंगले पर पहुँचते ही , उसने देखा की अमित उसका लॉन में ही चाय पर इन्तजार कर रहा है। उसने बड़ी गर्मजोशी से उसका स्वागत किया। फ़िर इधर उधर की बातें होने लगी। तभी अमित का पुत्र किशोर बाहर जाने के लिए वहां से निकला,
अरे किशोर , यहाँ आओ बेटा , देखो रवि अंकल आए हैं, आओ यहाँ आकर इनके पाँव छो कर आशीर्वाद लो।
डैड , क्या आप भी पुरानी दकियानूसी आदतें न ख़ुद छोड़ते हैं और हमें भी ऐसा करने लिए कहते रहते हैं, हम लोग मॉडर्न हैं ये सब ठीक नहीं लगता।
जहाँ अमित के चेहरे पर खीज भरी मुस्कराहट थी , वहीँ रवि के चेहरे पर संतोष , की उसने अब तक अपने बेटे को मॉडर्न स्कूल में पढाने के लिए अमित से बात नहीं की थी.
अफजल ने लिखी कसाब को चिट्ठी ( पढ़ लीजिये मगर बताइयेगा नहीं ,संवेदनशील है )
अफजल ने लिखी कसाब को चिट्ठी :-
जैसे ही अफजल गुरु (अरे वही गुरुघंटाल , जिसने अपने जिहादियों , मेरा मतलब साथियों के साथ , देश की संसद पर हमला करने जैसा बकवास काम किया था, बकवास इसलिए की एक भी बेकार नेता कम नहीं करे पाये वे हमारे देश से, खैर ) को जेल में पता चला की ताजातरीन मुम्बई हमले में जिंदा पकड़े गए हमलावर कसाब ने पाकिस्तान सरकार को चिट्ठी वैगेरह लिखी है उसने फ़ौरन कसाब को एक दूसरी चिट्ठी लिखी।
मुबारक हो कसाब मियां, भारत पर पदूसी द्वारा हुए सारे आतंकी हमलों में से सबसे बढिया स्कोर तुम लोगों का ही रहा, सोचा तो हमने भी था की कुछ बड़ा करेंगे पर कर नहीं पाए। मगर ये क्या सुन रहा हूँ आपने अपनी हुकूमत को कोई पैगाम वैगेरह भेज कर शायद रहम की अपील की है। क्यों ? किसलिए ? अमा, कसाब मिया तुम यहाँ के बारे में कुछ नहीं जानते । बिल्कुल मत दरो, ठाठ से रहो। समझो सरकार के दामाद बन गए हो। चलो तुमें पूरी बात खोल कर बता ही देता हूँ।
पहले जांच चलेगी, यहाँ की पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली तुम्हें पता ही है। यहाँ पर एक सी बी आई , नाम की पुलिस है, बेचारे मंत्री जी के कुत्ते की गुमशुदगी से लेकर घपले, घोटाले, मर्डर, तक का सारा काम इसी के जिम्मे दाल दिया जाता है, शायद इसलिए कुछ भी नहीं कर पाती। इसके बाद चलेगा मुकदमा। कसाब भाई तुम्हें एक कमाल की बात बताता हूँ वैसे तोस्द ये देश अमनपसंद है, मगर पता है यहाँ की अदालतों में साधे तीन करोड़ मुकदमें लंबित हैं, साधे तीन करोड़। तो बस उनमें से एक तुमाहारा भी होगा, चलेगा सालों साल। फ़िर होगा फैसला, फ़िर अपील, फ़िर उसका फैसला। मान लिया की सब कुछ होने के बाद तुम्हें फांसी की सजा ही मिलती है , तो भी क्या, अजी यहाँ फांसी लगती किसे है, मुझे ही कौन लटका रहा है।
बीच बीच में मानवाधिकार वाले इंसानियत की दुहाई देकर तुम्हारे लिए न्याय मांगेंगे या फ़िर हो सकता है की अपने जिहादी भाई कोई प्लेन ट्रेन हाईजैक करके हमें छुद्वान लें । तो इसलिए मेरी सलाह मानो और टेंशन छोडू कर मजे लो। हप्पी वलैन्ताईन दे कसाब मिया इन एडवांस .
जैसे ही अफजल गुरु (अरे वही गुरुघंटाल , जिसने अपने जिहादियों , मेरा मतलब साथियों के साथ , देश की संसद पर हमला करने जैसा बकवास काम किया था, बकवास इसलिए की एक भी बेकार नेता कम नहीं करे पाये वे हमारे देश से, खैर ) को जेल में पता चला की ताजातरीन मुम्बई हमले में जिंदा पकड़े गए हमलावर कसाब ने पाकिस्तान सरकार को चिट्ठी वैगेरह लिखी है उसने फ़ौरन कसाब को एक दूसरी चिट्ठी लिखी।
मुबारक हो कसाब मियां, भारत पर पदूसी द्वारा हुए सारे आतंकी हमलों में से सबसे बढिया स्कोर तुम लोगों का ही रहा, सोचा तो हमने भी था की कुछ बड़ा करेंगे पर कर नहीं पाए। मगर ये क्या सुन रहा हूँ आपने अपनी हुकूमत को कोई पैगाम वैगेरह भेज कर शायद रहम की अपील की है। क्यों ? किसलिए ? अमा, कसाब मिया तुम यहाँ के बारे में कुछ नहीं जानते । बिल्कुल मत दरो, ठाठ से रहो। समझो सरकार के दामाद बन गए हो। चलो तुमें पूरी बात खोल कर बता ही देता हूँ।
पहले जांच चलेगी, यहाँ की पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली तुम्हें पता ही है। यहाँ पर एक सी बी आई , नाम की पुलिस है, बेचारे मंत्री जी के कुत्ते की गुमशुदगी से लेकर घपले, घोटाले, मर्डर, तक का सारा काम इसी के जिम्मे दाल दिया जाता है, शायद इसलिए कुछ भी नहीं कर पाती। इसके बाद चलेगा मुकदमा। कसाब भाई तुम्हें एक कमाल की बात बताता हूँ वैसे तोस्द ये देश अमनपसंद है, मगर पता है यहाँ की अदालतों में साधे तीन करोड़ मुकदमें लंबित हैं, साधे तीन करोड़। तो बस उनमें से एक तुमाहारा भी होगा, चलेगा सालों साल। फ़िर होगा फैसला, फ़िर अपील, फ़िर उसका फैसला। मान लिया की सब कुछ होने के बाद तुम्हें फांसी की सजा ही मिलती है , तो भी क्या, अजी यहाँ फांसी लगती किसे है, मुझे ही कौन लटका रहा है।
बीच बीच में मानवाधिकार वाले इंसानियत की दुहाई देकर तुम्हारे लिए न्याय मांगेंगे या फ़िर हो सकता है की अपने जिहादी भाई कोई प्लेन ट्रेन हाईजैक करके हमें छुद्वान लें । तो इसलिए मेरी सलाह मानो और टेंशन छोडू कर मजे लो। हप्पी वलैन्ताईन दे कसाब मिया इन एडवांस .
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