क्यों तन्हा ,
और,
वीरान है जिन्दगी॥
ना जाने,
किस गम से,
परेशान है जिन्दगी॥
साँसे तो हैं,
इस दिल में , पर,
बेजान है जिन्दगी॥
इतनी आबादियों के ,
बीच भी,
सुनसान है जिन्दगी॥
बीते और आने वाले ,
कल के बीच ,
वर्तमान है जिन्दगी॥
युगों युगों की दौड़ में,
चंद बरसों की,
मेहमान है जिन्दगी॥
प्रेम-द्वेष, सुख-दुःख,
हर फलसफे, हर एहसास की ,
पहचान है जिन्दगी॥
बहुत जाना , बहुत समझा,
लेकिन अब भी ,
अनजान है जिन्दगी॥
दोनो सच्चे पहलू हैं,
कभी दर्द का कतरा,
कभी मुस्कान है जिन्दगी॥
कहिये आप क्या कहते हैं जिन्दगी के बारे में.
सोमवार, 4 फ़रवरी 2008
जिन्दगी (एक कविता )
क्यों तन्हा ,
और,
वीरान है जिन्दगी॥
ना जाने,
किस गम से,
परेशान है जिन्दगी॥
साँसे तो हैं,
इस दिल में , पर,
बेजान है जिन्दगी॥
इतनी आबादियों के ,
बीच भी,
सुनसान है जिन्दगी॥
बीते और आने वाले ,
कल के बीच ,
वर्तमान है जिन्दगी॥
युगों युगों की दौड़ में,
चंद बरसों की,
मेहमान है जिन्दगी॥
प्रेम-द्वेष, सुख-दुःख,
हर फलसफे, हर एहसास की ,
पहचान है जिन्दगी॥
बहुत जाना , बहुत समझा,
लेकिन अब भी ,
अनजान है जिन्दगी॥
दोनो सच्चे पहलू हैं,
कभी दर्द का कतरा,
कभी मुस्कान है जिन्दगी॥
कहिये आप क्या कहते हैं जिन्दगी के बारे में.
और,
वीरान है जिन्दगी॥
ना जाने,
किस गम से,
परेशान है जिन्दगी॥
साँसे तो हैं,
इस दिल में , पर,
बेजान है जिन्दगी॥
इतनी आबादियों के ,
बीच भी,
सुनसान है जिन्दगी॥
बीते और आने वाले ,
कल के बीच ,
वर्तमान है जिन्दगी॥
युगों युगों की दौड़ में,
चंद बरसों की,
मेहमान है जिन्दगी॥
प्रेम-द्वेष, सुख-दुःख,
हर फलसफे, हर एहसास की ,
पहचान है जिन्दगी॥
बहुत जाना , बहुत समझा,
लेकिन अब भी ,
अनजान है जिन्दगी॥
दोनो सच्चे पहलू हैं,
कभी दर्द का कतरा,
कभी मुस्कान है जिन्दगी॥
कहिये आप क्या कहते हैं जिन्दगी के बारे में.
रविवार, 3 फ़रवरी 2008
शहरी होने की कीमत
कल ही गाँव से माँ का फोन आया, कहने लगी " बेटा दुर्गा पूजा गयी, छत पूजा भी हो गयी, मकर सक्रान्ति बीता, और बसंत पंचमी भी आने को है, और लगता नहीं है कि होली पर भी तेरी सूरत देख पाउंगी, तेरे शहरी होने की मैं और कितनी कीमत चुकाउंगी रे "।
मैं हमेशा की तरह अवाक और चुप था। मगर इस बार माँ के इस सवाल ने मुझे झिन्झोर कर रख दिया। गाँव से शहर आना मजबूरी थी और शहरी बन जाना नियति। पढाई के बाद और नौकरी में आने से पहले के बीच के वक़्त में जो सोच , जो तनाव मन मस्तिष्क में था उस ने कभी ये मौका ही नहीं दिया कि मैं ये अंदाजा भी लगा सकूं कि कितना कुछ खोना पडा और उस वक़्त इसकी गुंजाइश भी नहीं थी। पर मुझे क्या पता था कि मैं यहाँ का हुआ तो फिर यहीं का होकर रह जाऊँगा।
यहाँ नौकरी, ओहदा, सम्मान, सब कुछ हासिल कर लिया। मगर वो मासूमियत, वो अपनेपन का एहसास, दूसरों के दर्द और अपनी खुशियों को साझा करने का सुख , वो कुछ कर गुजरने की तमन्ना, कुछ बदल डालने की ललक, वो दोस्तों का साथ, माँ पिताजी, दादी, नानी, आम के बाग़, सब कुछ खो गया। ना जाने कहाँ, कब, कितना पीछे॥
मगर सबसे बड़ी कीमत चुकाई मेरे माँ पिताजी ने जो बिल्कुल उस माली के तरह हैं जिसके ऊगाये चंदन के पेड़ से सारा जहाँ महकता है सिवाय उसके अपने आँगन के ।
मैं हमेशा की तरह अवाक और चुप था। मगर इस बार माँ के इस सवाल ने मुझे झिन्झोर कर रख दिया। गाँव से शहर आना मजबूरी थी और शहरी बन जाना नियति। पढाई के बाद और नौकरी में आने से पहले के बीच के वक़्त में जो सोच , जो तनाव मन मस्तिष्क में था उस ने कभी ये मौका ही नहीं दिया कि मैं ये अंदाजा भी लगा सकूं कि कितना कुछ खोना पडा और उस वक़्त इसकी गुंजाइश भी नहीं थी। पर मुझे क्या पता था कि मैं यहाँ का हुआ तो फिर यहीं का होकर रह जाऊँगा।
यहाँ नौकरी, ओहदा, सम्मान, सब कुछ हासिल कर लिया। मगर वो मासूमियत, वो अपनेपन का एहसास, दूसरों के दर्द और अपनी खुशियों को साझा करने का सुख , वो कुछ कर गुजरने की तमन्ना, कुछ बदल डालने की ललक, वो दोस्तों का साथ, माँ पिताजी, दादी, नानी, आम के बाग़, सब कुछ खो गया। ना जाने कहाँ, कब, कितना पीछे॥
मगर सबसे बड़ी कीमत चुकाई मेरे माँ पिताजी ने जो बिल्कुल उस माली के तरह हैं जिसके ऊगाये चंदन के पेड़ से सारा जहाँ महकता है सिवाय उसके अपने आँगन के ।
शहरी होने की कीमत
कल ही गाँव से माँ का फोन आया, कहने लगी " बेटा दुर्गा पूजा गयी, छत पूजा भी हो गयी, मकर सक्रान्ति बीता, और बसंत पंचमी भी आने को है, और लगता नहीं है कि होली पर भी तेरी सूरत देख पाउंगी, तेरे शहरी होने की मैं और कितनी कीमत चुकाउंगी रे "।
मैं हमेशा की तरह अवाक और चुप था। मगर इस बार माँ के इस सवाल ने मुझे झिन्झोर कर रख दिया। गाँव से शहर आना मजबूरी थी और शहरी बन जाना नियति। पढाई के बाद और नौकरी में आने से पहले के बीच के वक़्त में जो सोच , जो तनाव मन मस्तिष्क में था उस ने कभी ये मौका ही नहीं दिया कि मैं ये अंदाजा भी लगा सकूं कि कितना कुछ खोना पडा और उस वक़्त इसकी गुंजाइश भी नहीं थी। पर मुझे क्या पता था कि मैं यहाँ का हुआ तो फिर यहीं का होकर रह जाऊँगा।
यहाँ नौकरी, ओहदा, सम्मान, सब कुछ हासिल कर लिया। मगर वो मासूमियत, वो अपनेपन का एहसास, दूसरों के दर्द और अपनी खुशियों को साझा करने का सुख , वो कुछ कर गुजरने की तमन्ना, कुछ बदल डालने की ललक, वो दोस्तों का साथ, माँ पिताजी, दादी, नानी, आम के बाग़, सब कुछ खो गया। ना जाने कहाँ, कब, कितना पीछे॥
मगर सबसे बड़ी कीमत चुकाई मेरे माँ पिताजी ने जो बिल्कुल उस माली के तरह हैं जिसके ऊगाये चंदन के पेड़ से सारा जहाँ महकता है सिवाय उसके अपने आँगन के ।
मैं हमेशा की तरह अवाक और चुप था। मगर इस बार माँ के इस सवाल ने मुझे झिन्झोर कर रख दिया। गाँव से शहर आना मजबूरी थी और शहरी बन जाना नियति। पढाई के बाद और नौकरी में आने से पहले के बीच के वक़्त में जो सोच , जो तनाव मन मस्तिष्क में था उस ने कभी ये मौका ही नहीं दिया कि मैं ये अंदाजा भी लगा सकूं कि कितना कुछ खोना पडा और उस वक़्त इसकी गुंजाइश भी नहीं थी। पर मुझे क्या पता था कि मैं यहाँ का हुआ तो फिर यहीं का होकर रह जाऊँगा।
यहाँ नौकरी, ओहदा, सम्मान, सब कुछ हासिल कर लिया। मगर वो मासूमियत, वो अपनेपन का एहसास, दूसरों के दर्द और अपनी खुशियों को साझा करने का सुख , वो कुछ कर गुजरने की तमन्ना, कुछ बदल डालने की ललक, वो दोस्तों का साथ, माँ पिताजी, दादी, नानी, आम के बाग़, सब कुछ खो गया। ना जाने कहाँ, कब, कितना पीछे॥
मगर सबसे बड़ी कीमत चुकाई मेरे माँ पिताजी ने जो बिल्कुल उस माली के तरह हैं जिसके ऊगाये चंदन के पेड़ से सारा जहाँ महकता है सिवाय उसके अपने आँगन के ।
शनिवार, 2 फ़रवरी 2008
जाने क्यूँ (एक कविता )
जाने क्यूँ,
आज,
हरेक शख्श,
हर एक बात पर,
खफा खफा सा है ??
जाने क्यूँ,
काफिले का,
हर राहगीर,
और महफ़िल,
सजाने वाला भी,
जुदा जुदा सा है॥
अब तो ,
कुछ भी,
नया नहीं लगता,
हर दर्द, हर चोट,
हरेक हादसा,
मुझको, लगता ,
सुना सुना सा है॥
पहली किरण की,
थपकी से,
जिस कली ने,
बाहें है फैलाई,
सुबह सुबह ही,
वो फूल भी लगता,
थका थका सा है॥
तारीखें तो ,
बदल रही हैं,
मगर ,
जाने क्यूँ,
कब से ,
ये वक़्त,
रुका रुका सा है।
आज,
हरेक शख्श,
हर एक बात पर,
खफा खफा सा है ??
जाने क्यूँ,
काफिले का,
हर राहगीर,
और महफ़िल,
सजाने वाला भी,
जुदा जुदा सा है॥
अब तो ,
कुछ भी,
नया नहीं लगता,
हर दर्द, हर चोट,
हरेक हादसा,
मुझको, लगता ,
सुना सुना सा है॥
पहली किरण की,
थपकी से,
जिस कली ने,
बाहें है फैलाई,
सुबह सुबह ही,
वो फूल भी लगता,
थका थका सा है॥
तारीखें तो ,
बदल रही हैं,
मगर ,
जाने क्यूँ,
कब से ,
ये वक़्त,
रुका रुका सा है।
जाने क्यूँ (एक कविता )
जाने क्यूँ,
आज,
हरेक शख्श,
हर एक बात पर,
खफा खफा सा है ??
जाने क्यूँ,
काफिले का,
हर राहगीर,
और महफ़िल,
सजाने वाला भी,
जुदा जुदा सा है॥
अब तो ,
कुछ भी,
नया नहीं लगता,
हर दर्द, हर चोट,
हरेक हादसा,
मुझको, लगता ,
सुना सुना सा है॥
पहली किरण की,
थपकी से,
जिस कली ने,
बाहें है फैलाई,
सुबह सुबह ही,
वो फूल भी लगता,
थका थका सा है॥
तारीखें तो ,
बदल रही हैं,
मगर ,
जाने क्यूँ,
कब से ,
ये वक़्त,
रुका रुका सा है।
आज,
हरेक शख्श,
हर एक बात पर,
खफा खफा सा है ??
जाने क्यूँ,
काफिले का,
हर राहगीर,
और महफ़िल,
सजाने वाला भी,
जुदा जुदा सा है॥
अब तो ,
कुछ भी,
नया नहीं लगता,
हर दर्द, हर चोट,
हरेक हादसा,
मुझको, लगता ,
सुना सुना सा है॥
पहली किरण की,
थपकी से,
जिस कली ने,
बाहें है फैलाई,
सुबह सुबह ही,
वो फूल भी लगता,
थका थका सा है॥
तारीखें तो ,
बदल रही हैं,
मगर ,
जाने क्यूँ,
कब से ,
ये वक़्त,
रुका रुका सा है।
गुरुवार, 31 जनवरी 2008
अब साइमंड्स कटघरे में
अपने भज्जी मियां तो फालतू के आरोपों से बारी हो गए। फालतू के इसलिए क्योंकि ये कौन मान सकता है कि जो भारतीय खुद नस्लभेद का शिकार रहे हों वे खुद किसी पर नस्लभेदी टिप्पणी करेंगे। मगर यहाँ माजरा कुछ ज्यादा बढ़ गया है।
सुनने में आया है कि वानार्जगत ने अन्द्र्यु साइमंड्स को कटघरे में खडा करने का निर्णय लिया है। कल ही उन्होने साइमंड्स को पकड़ लिया और खूब खरी खोटी सुनाई॥
"क्यों बे, तुझे यदि भज्जी ने बन्दर कहा तो वो गाली कैसे हो गयी बे ? तूने अपनी शक्ल देखी है , पता ही नहीं चलता है कि तू कौन सा प्राणी है , नीचे चिद्दी सी दाढी , और सर पर ढेर सारी जता। और फिर तुम इंसान तो एक दुसरे को ना जाने कब से और ना जाने कितनी ही बार गधा , कुत्ता, बन्दर उल्लू, कहते आ रहे हो हमने तो आज तक बुरा नहीं माना। ये क्यों भूल गया कि तुम सब इंसा बन्दर की औलाद हो। ये अलग बात है कि अब तुम बन्दर रहे नहीं और इंसान बन नहीं पाए ।
लेकिन सर , वो नस्लभेदी तिप्नी थी। एंड्र्यू ने सफाई देनी चाही।
अबे चुप, कहे का नस्लभेद और कहे कि टिप्पणी । तुम लोग भी एक मैच जीतने के लिए क्या कया नाटक करते हो यार। अबे इससे अच्छा तो ये होता कि मैच फ़िक्सिंग कर लेते। बड़ा ही सेफ रास्ता है।
सुनने में आया है कि वानार्जगत ने अन्द्र्यु साइमंड्स को कटघरे में खडा करने का निर्णय लिया है। कल ही उन्होने साइमंड्स को पकड़ लिया और खूब खरी खोटी सुनाई॥
"क्यों बे, तुझे यदि भज्जी ने बन्दर कहा तो वो गाली कैसे हो गयी बे ? तूने अपनी शक्ल देखी है , पता ही नहीं चलता है कि तू कौन सा प्राणी है , नीचे चिद्दी सी दाढी , और सर पर ढेर सारी जता। और फिर तुम इंसान तो एक दुसरे को ना जाने कब से और ना जाने कितनी ही बार गधा , कुत्ता, बन्दर उल्लू, कहते आ रहे हो हमने तो आज तक बुरा नहीं माना। ये क्यों भूल गया कि तुम सब इंसा बन्दर की औलाद हो। ये अलग बात है कि अब तुम बन्दर रहे नहीं और इंसान बन नहीं पाए ।
लेकिन सर , वो नस्लभेदी तिप्नी थी। एंड्र्यू ने सफाई देनी चाही।
अबे चुप, कहे का नस्लभेद और कहे कि टिप्पणी । तुम लोग भी एक मैच जीतने के लिए क्या कया नाटक करते हो यार। अबे इससे अच्छा तो ये होता कि मैच फ़िक्सिंग कर लेते। बड़ा ही सेफ रास्ता है।
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