भारतीय गांव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भारतीय गांव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

समाज सिर्फ़ महानगरों में ही नहीं है , जरा गांव में भी झांकिए न ......

आखिर किस शहर में है ये खूबसूरती और सकून


जब भी अपने आसपास की खबरों पर नज़र डालता हूं तो देखता और पाता हूं कि हमेशा ही जिस समाज की , उसमें हो रहे बदलावों की , वो अपनाए जा रहे चलनों की बात होती है तो वो सिर्फ़ और सिर्फ़ शहरी समाज तक ही सीमित होकर रह जाती है । सब कुछ जैसे शहरों में ही घट रहा हो , वहीं पर रह रहे लोगों मात्र का ही अस्तित्व हो जैसे इस देश में , इस समाज में इससे परे कहीं कुछ भी नहीं हो रहा है । और शहरों में भी त सब कुछ जैसे एक मशीनी ढर्रे पर ही चलता है ।वो चाहे किसी परिवार की दिनचर्या हो या किसी अपराध की बात हो या किसी दुर्घटना की , देख सुन कर तो यही लगता है , अरे ये तो अभी बस अभी कुछ देर पहले , कुछ दिन पहले ही तो घटा था । इतना ही नहीं कमोबेश यही हाल यहां मनाए जा रहे त्यौहारों , उत्सवों , और निजि दावतों का भी है । किसी भव्य स्थान पर बनावटी पंडालों और मसालेदार लजीज़ खानों के बीच सभी पुते हुए चेहरे , दुकान से कोई उपहार खरीद कर और उस पर जबरद्स्त सी एक कृत्रिम मुस्कुराहट की पैकिंग करके पकडाते हुए ऐसे लगते हैं , मानो जैसे आप सुबह उठ कर रोज नित्य क्रिया से निवृत्त हो रहे हों । यहां सब कुछ वही होते हुए भी वही नया है , वही खबर है , वही चलन है , वही फ़ैशन है । मगर क्या सचमुच ही ही बस यही है देश , यही है समाज है ।

मेरे मोबाईल से ,गांव में लगे हुए एक साप्ताहिक हाट की फ़ोटो

      बेशक आज ग्रामीण क्षेत्र की आधी से अधिक आबादी अनेक कारणों से शहर की ओर पलायन कर चुकी है । बेशक कभी सुदूर देहात कहलाने वाले गांव कस्बे भी अब बहुत से नए साधनों और संसाधनों से लैस होकर छोटे नगर का रूप धारण कर चुके हैं । इसके बावजूद भी अभी भी गावों में भारतीय परंपरा, संस्कार, अपनापन , आपसी सहभागिता का जो स्थायित्व बना हुआ है वो ही असली भारत की पहचान है । बेशक आज भारत इस बात पर इतराए कि उसने अपने दम पर चांद पर अपना कदम रख दिया है मगर भारत की असली उपलब्धि तो यही होगी कि सवा अरब की जनसंख्या को खिलाने पिलाने लायक अन्न जल उसके पास मौजूद है । और यदि ऐसा संभव है तो ये सिर्फ़ ग्रामीण समाज में रह रहे उन किसानों , उन श्रमिकों के कारण ही है जिन्हें आज के इस आधुनिक शहरी समाज ने अपने पीछे उपेक्षित छोडा हुआ है । इतना ही नहीं आज जिस प्रदूषण को बढते हुए चुपचाप शहरी समाज देख रहा है और इसके बाद भी उसमें वृद्धि के लिए जिम्मेदार बन रहा है , यदि वो अब तक पूरे शहरों को लील नहीं गई है तो वो सिर्फ़ इसलिए कि आज भी हर साल गावों में सैकडों पेड पौधे लगाए जाते हैं । आज जो भी हरी सब्जियां ,और  जो मौसमी फ़ल स्वाद ले ले शहर के लोग खा रहे हैं वो सब उसी ग्रामीण समाज की बदौलत है ।

डा. अनीता कुमार जी के ब्लोग से साभार

इस समाज की सुध लेने वाला आज कोई नहीं है । किसी भी समाचार माध्यम , किसी भी स्वयंसेवी संस्था ,किसी बडे अधिकारी , मंत्री को आज फ़ुर्सत नहीं है कि वो इनके लिए कुछ सोचे करे भी । और तो और जरा इस तथ्य पर नज़र डालिए । पिछले दिनों जब कुछ चिकित्सकों से कहा गया कि उन्हें अपनी सेवा का थोडा सा कार्यकाल ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी देना होगा तो उन्होंने उससे बेहतर त्यागपत्र देना समझा ,और दे दिया । ग्रामीण क्षेत्र में आज जिस बात की सबसे ज्यादा जरूरत है वो है , शिक्षा और चिकित्सा  की समुचित व्यवस्था । सबसे दुखद बात तो ये है कि आज उनकी उपेक्षा वो भी कर रहे हैं जो वहां से निकल कर यहां बडे बडे महानगरों की चकाचौंध में कहीं खोए इतराए फ़िर रहे हैं । आज तो हालत ये हो चुकी है कि अब तो उन्हें अपने परिचय के पार्श्व से उस स्थान, उस कस्बे, उस गांव का नाम जुडे होने में भी कोफ़्त होने लगती है जिसके बिना शायद उनका वजूद ही नहीं होता । ठीक है जी ठीक है , करो जो करना है , अभी तो जिस पानी की कमी , आटे दाल , दूध सबजी की महंगाई का रोना लेकर चीख पुकार मची हुई है , समय आने पर उन सबकी तलाश में ही सही उन गावों की , उन खेतों खलिहानों की सुध तो ली ही जाएगी ।


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...