आपने कल बीबीसी रेडियो कि हिन्दी सेवा सुनी थी क्या? अरे अरे, ये क्या पूछ बैठा मैं , खासकर शहर में रहने वाले अपने मित्रों से । हाँ शहर में अव्वल तो कोई रेडियो सुनता नहीं यदि सुनता भी है तो सिर्फ अफ ऍम रेडियो पर गाने ही सुनता। शहर में तो मुझ जैसे एक आध मूढ़ ही शोर्ट वाव रेडियो पर बीबीसी हिन्दी सेवा सुनते होंगे। खैर मुझे तो ये आदत बरसों पुरानी है । लेकिन यहाँ ये बात मैंने इसलिए पूछी है क्योंकि ये उनके लिए बेहद यादगार शाम साबित हो सकती थी जो कविता हिन्दी काव्य के प्रेमी लोग हैं।
बीबीसी हिन्दी ने प्रत्येक वर्ष कि भांति इस बार भी वर्षांत पर अपनी विश्सेश प्रस्तुतियों कि श्रंखला जारी राखी है । कल बीबीसी के वरिष्ट संपादक शिवकांत जी ने एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया था। जी नहीं ये कोई मामूली काव्य गोष्ठी नहीं थी । इसमें सुमित्रा नंदन पन्त, दिनकर, बच्हन, त्रिलोचन, अगेयेया, फैज़ अहमद, जयशंकर प्रसाद, और बेकल उत्साही कि प्रमुख रचनाओं का पाठ किया गया। और ये भी तो सुनिए कि काव्य पाठ खुद इन महान कवियों ने ही किया । आप खुद ही सोच सकते हैं कि इन महान काव्य विभूतियों को खुद उनकी आवाज़ में सुनना किसी सुखद अनुभव से कम नहीं। ऐसा संभव हो सका बीबीसी की अनमोल औडियो लिब्ररी के कारण। इनमें से कोई आवाज़ २८ साल पहले तो कोई आवाज़ १७ साल पहले अलग अलग महफिलों में रेकोर्ड की गयी थी।
आप निराश ना हों यदि आप अब भी उन्हें सुनना चाहते हैं तो बीबीसी हिन्दी .कॉम पर जाकर उन्हें सुन सकते हैं। यकीन मानिए आपको निराशा नहीं होगी।
और जब कविता कि बात चली है तो सोचा मैं भी कुछ लिखता चलूँ:-
जाने तेरी इन काली,मोटी,गहरी, आखों में,
कभी क्यों मेरे सपने नहीं आते,
तू तो ग़ैर है फिर क्यों करूं तुझसे शिक़ायत,
जब पास मेरे, मेरे अपने नहीं आते।
उन्हें maalom है कि हर बार में ही माँग loongaa maafi,
इसलिए वो कभी मुझसे लड़ने नहीं आते।
जो shammaaon को पद जाये पता,कि उनकी roshnee से,
parwaane lipat के देते हैं जान, वे कभी jalne नहीं आते।
jabse पता चला है कि यूं जान देने वालों को sukun नहीं मिलता,
hum कोशिश तो करते हैं पर कभी मरने नहीं पाते।
जो कभी किसी ने पूछ लिया होता, मुझसे इस कलाम्जोरी का राज़,
खुदा कसम हम कभी यूं लिखने नहीं पाते।
पर किसी ने कभी पूछा नहीं इसलिए लिखी चले जा रहे हैं .
बीबीसी की एक यादगार प्रस्तुति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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गुरुवार, 27 दिसंबर 2007
कल bbc सूना tha क्या?
आपने कल बीबीसी रेडियो कि हिन्दी सेवा सुनी थी क्या? अरे अरे, ये क्या पूछ बैठा मैं , खासकर शहर में रहने वाले अपने मित्रों से । हाँ शहर में अव्वल तो कोई रेडियो सुनता नहीं यदि सुनता भी है तो सिर्फ अफ ऍम रेडियो पर गाने ही सुनता। शहर में तो मुझ जैसे एक आध मूढ़ ही शोर्ट वाव रेडियो पर बीबीसी हिन्दी सेवा सुनते होंगे। खैर मुझे तो ये आदत बरसों पुरानी है । लेकिन यहाँ ये बात मैंने इसलिए पूछी है क्योंकि ये उनके लिए बेहद यादगार शाम साबित हो सकती थी जो कविता हिन्दी काव्य के प्रेमी लोग हैं।
बीबीसी हिन्दी ने प्रत्येक वर्ष कि भांति इस बार भी वर्षांत पर अपनी विश्सेश प्रस्तुतियों कि श्रंखला जारी राखी है । कल बीबीसी के वरिष्ट संपादक शिवकांत जी ने एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया था। जी नहीं ये कोई मामूली काव्य गोष्ठी नहीं थी । इसमें सुमित्रा नंदन पन्त, दिनकर, बच्हन, त्रिलोचन, अगेयेया, फैज़ अहमद, जयशंकर प्रसाद, और बेकल उत्साही कि प्रमुख रचनाओं का पाठ किया गया। और ये भी तो सुनिए कि काव्य पाठ खुद इन महान कवियों ने ही किया । आप खुद ही सोच सकते हैं कि इन महान काव्य विभूतियों को खुद उनकी आवाज़ में सुनना किसी सुखद अनुभव से कम नहीं। ऐसा संभव हो सका बीबीसी की अनमोल औडियो लिब्ररी के कारण। इनमें से कोई आवाज़ २८ साल पहले तो कोई आवाज़ १७ साल पहले अलग अलग महफिलों में रेकोर्ड की गयी थी।
आप निराश ना हों यदि आप अब भी उन्हें सुनना चाहते हैं तो बीबीसी हिन्दी .कॉम पर जाकर उन्हें सुन सकते हैं। यकीन मानिए आपको निराशा नहीं होगी।
और जब कविता कि बात चली है तो सोचा मैं भी कुछ लिखता चलूँ:-
जाने तेरी इन काली,मोटी,गहरी, आखों में,
कभी क्यों मेरे सपने नहीं आते,
तू तो ग़ैर है फिर क्यों करूं तुझसे शिक़ायत,
जब पास मेरे, मेरे अपने नहीं आते।
उन्हें maalom है कि हर बार में ही माँग loongaa maafi,
इसलिए वो कभी मुझसे लड़ने नहीं आते।
जो shammaaon को पद जाये पता,कि उनकी roshnee से,
parwaane lipat के देते हैं जान, वे कभी jalne नहीं आते।
jabse पता चला है कि यूं जान देने वालों को sukun नहीं मिलता,
hum कोशिश तो करते हैं पर कभी मरने नहीं पाते।
जो कभी किसी ने पूछ लिया होता, मुझसे इस कलाम्जोरी का राज़,
खुदा कसम हम कभी यूं लिखने नहीं पाते।
पर किसी ने कभी पूछा नहीं इसलिए लिखी चले जा रहे हैं .
बीबीसी हिन्दी ने प्रत्येक वर्ष कि भांति इस बार भी वर्षांत पर अपनी विश्सेश प्रस्तुतियों कि श्रंखला जारी राखी है । कल बीबीसी के वरिष्ट संपादक शिवकांत जी ने एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया था। जी नहीं ये कोई मामूली काव्य गोष्ठी नहीं थी । इसमें सुमित्रा नंदन पन्त, दिनकर, बच्हन, त्रिलोचन, अगेयेया, फैज़ अहमद, जयशंकर प्रसाद, और बेकल उत्साही कि प्रमुख रचनाओं का पाठ किया गया। और ये भी तो सुनिए कि काव्य पाठ खुद इन महान कवियों ने ही किया । आप खुद ही सोच सकते हैं कि इन महान काव्य विभूतियों को खुद उनकी आवाज़ में सुनना किसी सुखद अनुभव से कम नहीं। ऐसा संभव हो सका बीबीसी की अनमोल औडियो लिब्ररी के कारण। इनमें से कोई आवाज़ २८ साल पहले तो कोई आवाज़ १७ साल पहले अलग अलग महफिलों में रेकोर्ड की गयी थी।
आप निराश ना हों यदि आप अब भी उन्हें सुनना चाहते हैं तो बीबीसी हिन्दी .कॉम पर जाकर उन्हें सुन सकते हैं। यकीन मानिए आपको निराशा नहीं होगी।
और जब कविता कि बात चली है तो सोचा मैं भी कुछ लिखता चलूँ:-
जाने तेरी इन काली,मोटी,गहरी, आखों में,
कभी क्यों मेरे सपने नहीं आते,
तू तो ग़ैर है फिर क्यों करूं तुझसे शिक़ायत,
जब पास मेरे, मेरे अपने नहीं आते।
उन्हें maalom है कि हर बार में ही माँग loongaa maafi,
इसलिए वो कभी मुझसे लड़ने नहीं आते।
जो shammaaon को पद जाये पता,कि उनकी roshnee से,
parwaane lipat के देते हैं जान, वे कभी jalne नहीं आते।
jabse पता चला है कि यूं जान देने वालों को sukun नहीं मिलता,
hum कोशिश तो करते हैं पर कभी मरने नहीं पाते।
जो कभी किसी ने पूछ लिया होता, मुझसे इस कलाम्जोरी का राज़,
खुदा कसम हम कभी यूं लिखने नहीं पाते।
पर किसी ने कभी पूछा नहीं इसलिए लिखी चले जा रहे हैं .
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