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मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

सियासत की नीयत में खोट






वर्तमान में देश का जो भी राजनीतिक परिदृश्य दिख रहा है वो शायद भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार , भाई भतीजावाद , परिवारवाद , और नैतिकता के पत्तन का चरम है । इससे पहले बेशक कई बार इस तरह होता दिखा है कि सत्ता में बैठी हुई सरकार , उसके मंत्री , और नुमाइंदे पूरी तरह भ्रष्टाचार में लिप्त रहे हैं , घपलों घोटालों की एक श्रंखला तब भी देखने को मिलती रही है । किंतु उन सबसे आगे बढकर इस बार तो जैसे बेशर्मी का लबादा ओढ कर सरकार , विपक्ष , और राजनीतिज्ञों के नाते रिश्तेदारों , बडे व्यापारिक घरानों और मीडिया हाउसेज़ तक ने एक ही उद्देश्य पर चलना शुरू किया है । जितना और जैसे भी हो सके ज्यादा से ज्यादा देश के धन संसाधनों को लूटना , उस लूट खसोट का पता चलने पर , पूरी ढिठाई के साथ उसे सिरे से दरकिनार करना , चीख चीख कर जांच जांच का शोर मचाना , क्योंकि उन्हें पता है कि आज तक किसी भी जांच किसी भी मुकदमें की अंतिम परिणति के रूप में किसी भी रसूखदार को कभी रत्ती भर भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा है । और अंत में फ़िर एक ही थाली के चट्टे बट्टे की तरह एक दूसरे की करतूतों पर पर्दा डाल देना , क्योंकि वे ये भी देख चुके हैं कि देश की सहिष्णु जनता , अशिक्षिति लोग और गरीम अवाम कभी भी खुल कर पश्विमी देशों की तरह अपनी लडाई पुरज़ोर तरीके से सडकों पर संगठित होकर लड नहीं सकती , राजनीतिक रूप से संगठित होकर परिवर्तन की लडाई भी दूर की कौडी है ।




पिछले कुछ वर्षों में कुछ गैर राजनीतिक लोगों द्वारा असाधारण माद्दा और दुसाहस दिखाने के प्रयासों को भी देश के तमाम राजनीतिज्ञों ने अपनी कुटिल नीतियों द्वारा बार बार हतोत्साहित करने का प्रयास जारी रखा है । बाबा रामदेवा द्वारा उठाया गया मुदा "विदेशों में भारतीयों द्वारा जमा किए गए काले धन की वापसी  " सिविल सोसायटी के सदस्यों द्वारा भ्रष्टाचार से लडने के लिए लोकपाल विधेयक बनाने का मुद्दा " । एक एक करके  लगभग सभी मंत्रियों के खिलाफ़ उजागर हुए बडे घोटालों के बाद उनके खिलाफ़ स्वतंत्र जांच और गिरफ़्तारी का मुद्दा , और अब अन्ना हज़ारे और जनरल वी के सिंह द्वारा उठाए जा रहे " राइट टू रिजेक्ट , जज़ेस अकाउंटिबिलिटी बिल आदि जैसे मुद्दों को सिरे से न सिर्फ़ दरकिनार करके , बल्कि इन मुद्दों को उठाने वालों के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार और इसे बार बार लोकतंत्र पर हमला , संसदीय अधिकार का हनन और जाने क्या क्या कहते फ़िर रहे हैं ।


राजनीतिक जमात को शायद ये भ्रम है , और क्यों न हो , आखिर उसने पिछली आधी शताब्दी में आम जनता को महंगाई , गरीबी , आतंकवाद , भ्रष्टाचार , न्यायिक दोहरापन सहते रहने के बावजूद बेहस धैर्यपूर्वक ,और सहनशील है , इतनी तो जरूर ही कि वो अपने हाथों में जंगल के उस कानून को नहीं ले रही है । पडोसी देशों की सेना और सुरक्षा एजेंसियों से विपरीत देश की सेना व सुरक्षा एजेंसियां बेहद निष्टावान और अनुशासित रही है , ये राजनीतिज्ञों के लिए दूसरी खुशकिस्मती रही है ।



आने वाले  वर्षों में देश में आम चुनाव होने वाले हैं । अभी बेशक स्थिति जो भी जैसी भी दिख रही हो किंतु इतिहास को देखते हुए कुछ नहीं कहा जा सकता कि चुनाव पूर्व परिदृश्य क्या होंगे और चुनाव परिणाम क्या होंगे । आम जनता के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण समय है , यकीनन अभी कोई स्पष्ट विकल्प ऐसा नहीं दिख रहा है जो हठात ही देश को कोई नई दिशा दे सके , किंतु आम जनता को फ़िर अपनी आंखे खुली रख के फ़ैसले के लिए तैयार होना होगा । और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि आज और अभी से अपने अपने हिस्से की लडाई को न सिर्फ़ शुरू करना होगा बल्कि उसे पूरी ताकत से लडना भी होगा । यदि आप सचमुच ही देश को बदलना चाहते हैं , अपनी हैसियत बदलना चाहते हैं तो आगे बढिए ...बेहिचक , बेझिझक , बेखौफ़ .........................

शुक्रवार, 7 नवंबर 2008

काश एक बराक ओबामा यहाँ भी होते !

इन दिनों जिधर भी जाता हूँ अमेरीकी चुनाव और बराक ओबामा की जीत की ही चर्चा चल रही होती है, स्वाभाविक भी है , और सच कहूँ तो मुझे इससे कोई परहेज़ भी नहीं है, मगर थोड़ा दुःख और आश्चर्य जरूर होता है, भविष्य में हामारे चुनाव भी तो आने वाले हैं। क्या हम कभी गंभीरतापूर्वक ये सोच सकते हैं की अमेरीकी चुनाव से हमें क्या क्या सीखना चाहिए।
ऐसी ही एक चर्चा के दौरान मेरे एक मित्र ने आह भरते हुए कहा की, काश ओबामा हमारे यहाँ होते, दूसरे ने तपाक से कहा की यदि यहाँ होते तो किसी धर्म, या जाति, या रंग के नाम पर वोट मांग रहे होते। मगर सच कहूँ तो मुझे दोनों ही तर्क जज्बाती लगे, अमेरिका को ख़ुद रंग के भेद से निकलने में २०० से ज्यादा साल लग गए। मगर इतना तो जरूर है की फ़िर भी हर लिहाज़ से वे आज भी सच्चे लोकतंत्र का निर्वाह कर पा रहे हैं , या कहूँ की वे ही कर रहे हैं, हम तो बस नाटक ही कर रहे हैं। क्या हम लोग, आम लोग, कभी चुनाव की तैयारी करते हैं ? प्रश्न आ सकता है की , हम क्या तैयारी करें भाई, हमने तो वोट डालना है, सोच कर डाल देंगे। और हम बस इतना ही करते हैं, कई बात सोच कर कई बार या अधिकतर किसी न किसे प्रभाव में आकर, और अब तो हम इससे भी आगे निकल चुके हैं , पिछले चुनाव में कई जगह मतदान का प्रतिशत तो ३० से भी कम जा चुका था, वाह क्या बात है, यानि की ७० प्रतिशत लोगों को मतदान से कोई लेना देना नहीं है।

क्या इतना भी नहीं किया जा सकता की वोट मांगे वालों से चाँद प्रश्न किए जाएँ, यदि उम्मेदवार पुराना है तो उसके कार्यों का सारा लेखा जोखा , वो भी प्रमाण सहित , सिर्फ़ बातों में नहीं, भविष्य में सांसद निधि या जो भी फंड है उनकी खर्च की योजना, सिर्फ़ सामयिक मुद्दों और जरूरतों , बिजली पानी से आगे, विज्ञानं , कन्या भ्रूण हत्या , भर्ष्टाचार आदि पर अपनी तैयारी करें, फ़िर परखें। बदकिस्मती से यहाँ अब तक आमने सामने परिचर्चा, संगोष्ठी आदि की कोई व्यवस्ता हम नहीं ढूंढ पाये हैं। और सबसे अहम् दो जरूरी बातें ये की किसी भी परिस्थिति में वो अपने विचारों से , दल से, अपने लोगों को ठेंगा दिखा कर सिर्फ़ कुर्सी के लिए ही ना लड़ते मरते रहे, और इसके लिए जरूरी है की उन्हें किसी भी समय या फ़िर किसी नियत समय पर वापस बुलाने का अधिकार मिलना चाहिए।

सबसे बड़ी विडंबना तो यही है की, ये सब करेगा कौन, जिस देश की राष्ट्रपति पद, पर , सबसे प्राभाव्शाली राजनितिक दल के मुखिया के पद पर और संसद में न जाने कितनी महिलाओं के होने के बावजूद महिला आरक्षण बिल नहीं पास होने दिया जा रहा है वहां ऐसे सुधारों को कौन लागू कर सकता है।
तो हम तो सिर्फ़ इतना कर सकते हैं की चुनाव से पहले अपना होम वर्क पूरा करें, मन लगा कर सचा प्रतिनिधि चुनें, क्योंकि ये हम कर सकते हैं, शायद यहां भी कोई ओबामा मिल जाए ............
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