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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

गांधी , गांधीवाद , गांधी ब्रांडवाद से गांधी परिवारवाद तक .....




2 अक्तूबर , को अब देश में गांधी जयंती के रूप में पहचान मिल चुकी है , हो भी क्यों न आखिर जिस देश को विश्व का सबसे बडे लोकतंत्र का रुतबा हासिल कराने के लिए , एक अकेले व्यक्ति ने अपने नायाब प्रयोगों और सोच से बिना किसी हिंसा , के विश्व के सबसे बडे जनसमूह को सैकडों वर्षों की गुलामी से आज़ादी दिला कर राष्ट्रपिता का दर्ज़ा ( ओह ! याद आया , अभी हाल ही में एक बच्ची द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के बाद सरकार ने खुलासा किया है कि मोहन दास करमचंद गांधी उर्फ़ बापू को कभी भी आधिकारिक रूप से "राष्ट्रपिता " का दर्ज़ा नहीं दिया गया है ) मिला , और न भी मिला तो भी देश के बापू का जन्मदिन होता है तो ऐसे में ये बिल्कुल ठीक जान पडता है । बेशक अब बहुत सारे कारणों और लोगों की उठती आवाज़ों के बाद इसी दिन जनमे और भारतीय राजनीति में एक और बेहद महत्वपूर्ण शख्स , पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री को भी अब गाहे बेगाहे सरकारी और गैरसरकारी तरीके से याद किया जाता ही है , लेकिन आम लोगों के लिए तो ये दिन यानि दो अक्तूबर , गांधी जयंती यानि वर्ष की तीन पक्की छुट्टियों ..26 जनवरी ,15 अगस्त और 2 अक्तूबर में से एक । दिल्ली जैसे महानगरों में तो चालान कटने के डर से बाज़ार दुकानों के बंद रखने का दिन और हां सबसे अहम तो छूट ही गया ..ड्राई डे ....यानि शराब की सरकारी दुकानों के भी बंदी का दिन , समझा जाए तो बेवडों के लिए एक दिन पहले ही अपने कोटे की बोतलें खरीद कर रख लेने का अल्टीमेटम ।



" गांधी " से परिचय की बात की जाए तो हम और हमारे बाद आने वाली तमाम नस्लें भी इतिहास , राजनीति , हिंदी के पाठ्यपुस्तकों में गांधी जी की जीवनी , उनके जीवन चरित , उनके सत्य और राजनीति से किए गए प्रयोगों , उनके योगदान , उनके बलिदान और राष्ट्रपिता बापू तक का सब कुछ अलग अलग तरह से पढते रहे हैं और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार प्रभावित आ अप्रभावित होते रहे हैं । ज्यादा आगे बढे पढे तो फ़िर सहमति असहमति , उनकी नीतियों के विरोध पक्ष में ,. आलोचना बहस आदि में भी पडते रहे हैं , और ये सिलसिला आगे भी चलता रहेगा । इससे इतर , देश के तमाम मौद्रिक प्रतीकों , मुद्राओं , नोटों पर लगभग एक जैसी छवि देखने के आदि हो चले हैं । बचपन में स्कूल की तरफ़ से दिखाए गए एकमात्र सिनेमा में ब्रिटिश अभिनेता बेन किंग्सले अभिनीत  " गांधी" तो हमारे ज़ेहन में फ़िर भी रहे किंतु आज और अब के बाद वालों के साथ भी वैसा ही कुछ हो या होगा इसमें संदेह जान पडता है । गांधी संग्राहलय , गांधीधाम , आदि को देखने समझने के भी अपने अपने अनुभव बहुतों या कहा जाए कि सवा अरब की जनसंख्या वाले देश के बहुत कम लोगों के पास सही , लेकिन हैं और होंगे भी ।



"गांधीवाद "...यदि मोटे मोटे रूप में याद किया जाए तो , ग्रामीण भारत के लिए गांधी जी के संकल्प , ग्रामोद्योगों और कुटीर उद्योगों के कायाकल्प की बात , हिंदी की शिक्षा सहित ग्राम्य शिक्षा की बात , राजनीति को समाज सेवा और सामाजित कुरीतियों से लडने का मार्ग बताने व मानने की बात , सर्वहारा मज़दूर किसान वर्ग के हित की बात , शराबबंदी की बात , जातिवाद की बाद , कुल मिलाकर सभी छोटी बडी बातें और आदर्शों को बाद के भारतीय लोकतंत्र में पलीता लगा के सुलगा दिया गया कहा जाए तो हठात कोई मना नहीं कर सकता । साठ वर्षों बाद आज भी देश का किसान , भूखा , गरीब , कर्ज़ से डूबा , आत्मह्त्या तक करने को मज़बूर है , अन्य सभी बातों का भी कमोबेश यही हश्र है । रही सही सारी कसर गांधी के नाम पर राजनीति करने वाले तमाम राजनेताओं , राजनीतिक दलों ने एक एक संकल्प की चिंदी उडा कर पूरी कर दी है , आगे अभी इसे और कितने गर्त में जाना ये भी देखने वाली बात होगी



"गांधी ब्रांडवाद "....पिछले दो दशकों में विश्व के सारे देश , सारे लोग , सारी सरकारें और सारे समीकरण भी सिर्फ़ बाज़ारवाद , उपभोक्तावाद , की धुरियों के बीच बंट गए तो ऐसे में ये एक नया जुमला देखने सुनने में आया "गांधी ब्रांडवाद " गांधी मार्का छाप राजनीति , गांधी मार्का छाप बाज़ार और उससे जुडी तमाम बातें । यहां एक दिलचस्प किस्सा याद आ रहा है , पिछले दिनों अचानक ही खबर पढने सुनने को मिली कि गांधी जी से जुडी कुछ अनमोल धरोहरें , मसलन उनका चश्मा , उनके कुछ खत और ऐसी ही कुछ अन्य वस्तुएं कहीं विदेश में नीलाम की जा रही हैं और भारत सरकार द्वारा उन्हें नीलामी से बचाने या फ़िर नीलामी में उन्हें खरीद कर देश में वापस लाने की असमर्थता के समय देश की एक कंपनी जो इन दिनों अपनी वायुसेवा कंपनी के दिवालिएपन का ढिंढोरापन पीटती नज़र आ रही है ने अपनी दूसरी शराब व मद्य व्यवसाय के लिए विख्यात कंपनी की बदौलत , उस नीलामी में वो सारी वस्तुएं खरीद लाई । अब इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि जिस शराबबंदी की वकालत पूरी जिंदगी गांधी जी करते रहे आखिरकार उसी शराब की दौलत से उनकी वस्तुओं और देश के सम्मान को बचाया जा सका ।

गांधी परिवारवाद ....इससे मुझे काफ़ी असहमति रही है । आज यदि किसी को अचानक पूछ लिया जाए कि क्या गांधी जी के पुत्रों , पौत्रों या प्रपौत्रों /पौत्रियो या प्रपौत्रियों के नाम या उनके विषय में बताएं तो वे शायद सोच में पडने के बावजूद भी कुछ न बता पाएं । हां जवाहरलाल नेहरू जी वंशबेल , इंदिरा नेहरू जो आगे जाकर स्व. इंदिरा गांधी , स्व. राजीव गांधी के बाद चलते हुए अभी और आगे तक जाएगी , और अब तो इटली की मूल निवासी सोनिया "गांधी " के वाया होते हुए दिनोंदिन मजबूत ही होती चली जा रही है । तो कुल मिला कर ये कि नेहरू वंश कालांतर में गांधी परिवार को दरकिनार करते हुए लेकिन "गांधी" उपनाम के साथ एक नए वंशवादी परंपरा पर चलते हुए अभी बहुत सालों तक भारतीय राजनीति को न भी प्रभावित कर सका तो भी अपनी पैठ तो बनाए ही रखेगा ही ।


बहरहाल , जो भी हो गांधी जयंती आने वाले वर्षों में एक सरकारी अवकाश से अधिक और कुछ के रूप में आम जन को याद रहेगी , या फ़िर कि उनके लिए और किसी भी तरह से प्रासंगिक रहेगी , गांधीवाद , गांधीदर्शन जैसा सबकुछ भविष्य की , आने वाली नस्लों की उनकी सोच और उनकी दिशा के लिए किस तरह से सामने आएगा ये देखने वाली बात होगी ।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

विश यू आल...हैप्पी बापू डे......

अरे आप क्यूं चौंक गये...यही मेसेज आज मुझे मेरे मोबाईल पर मिला....बताईये हमारा देश कितनी शिद्दत से बापू का जन्मदिन मना रहा है...वर्ना आज की नस्ल को क्या जरूरत है कि ...वेलेंटाईन डे की तरह इसे भी सेलिब्रेट करे...अजी बापू ने कौन सा उनके लिये ..आर्थिक उदारीकरण....या मल्टी नेशनल कंपनियों ...या ऐसा ही कुछ उनके लिये करके दिया था.....और अब तो पता चला है कि देश तो देर सवेर वैसे भी आजाद होने ही वाला था...वो तो उस समय कोई था नहीं ...सो लगे हाथ उन्हें क्रेडिट दे दिया गया...और सबसे बडी कमी तो रही कि उस समय कोई एसएमएस का महत्वपूर्ण अधिकार भी तो नहीं था...तो फ़िर कैसी क्रेडिबिलिटी जी उस डिसीजन की...जिसमें एसएमएस के नैसर्गिक अधिकार का उपयोग ही नहीं किया गया ..खैर.....

दो अक्तूबर ......जब स्कूलों मे थे ..तब बडा जोश हुआ करता था...कुछ अलग ही उत्साह था...गांधी जी से जुडी हुई प्रतियोगिताओं में भागीदारी...उनके जीवन से जुडे सभी पहलुओं पर आधारित प्रश्न पहेली में जीत जाने की ललक...और भी न जाने क्या क्या..मगर उस समय से लेकर अब तक इस दिन को गांधी जयंती के रूप में जाना...पता नहीं शास्त्री जी ने क्यूं मना कर दिया था.....थोडा आगे बढा जीवन तो कुछ सात्विक टाईप के मित्रों ने समझाया कि इसका असली मतलब होता है ...ड्राई डे....आंय....अमां ये कौन सा डे हुआ ...अच्छा अच्छा बरसात के मौसम के बाद जब दिन बदलते होंगे...तो.....अबे चुप...तेरे जैसे लोगों को यही समझ में आ सकता है...तेरे लिये तो ..साल के तीन सौ पैंसठ दिन...ड्राई डे ही होते हैं....मेरे कहने का मतलब था कि ..आज के दिन टुन्न होने का कोई चांस नहीं...या तो पहले ही.......आज पहली तारीख है....... सेलिब्रेट कर लो.......या फ़िर ..छुट्टी के बाद करो......

इसका मतलब जब नौकरी में आये तो पता चला.......अक्तूबर महीने की पहली छुट्टी जो बिल्कुल कंफ़र्म है....किसी तरह से आगे पीछे हो जाने की कोई गुंजाईश नहीं....यदि आगे पीछे ..शनिवार ..रविवार पडता हो...तो समझिये...कि अगली छुट्टी आपको शास्त्री जी के जन्मदिन की मिल रही है...आप उन्हें भी याद कर सकते हो..फ़ुर्सत से .....क्योंकि एक दिन में आखिर आप कितने जनों को जबरन याद कर सकते हैं.........

अब इतने समय बाद तो हालत और भी गज़ब है जी.....वो तो कहिये कि सर्किट ने और मुन्ना भाई ने....अपने अंदाज़ में बापू ..और उनके दर्शन को युवा पीढी के सामने रखा.....लोगों को पता भी चला कि ...ये भी थे कोई ..जिन्होंने ..अपने देश के लिये कुछ न कुछ तो किया ही था...तभी तो उनके उपर इतनी मजेदार पिक्चर बन पायी है....

जहां तक मेरी अपनी बात है...तो मुझे गांधी जी के व्यक्तित्व से कहीं ज्यादा उनका दर्शन.....उनके विचार....उनके उद्देश्य....पसंद हैं...क्योंकि वे आज भी उतने ही सार्थक और सामयिक हैं ....बल्कि कहूं कि अब कुछ ज्यादा हैं......जितने उनके समय में हुआ करते थे.....मगर अफ़सोस है कि ..आने वाली नस्लें...ये सब महसूस नहीं कर पायेंगी......और इसके लिये किसी को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता...क्योंकि सब दोषी हैं........शास्त्री जयंती कभी मनाई जायेगी......इसकी आशंका हमेशा ही रही है.....मगर शायद.....कभी.....

तो आप सबको एक बार फ़िर .......हैप्पी बापू डे....एंड..हैप्पी शास्त्री दिवस.....
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