
तुम्हारा साथ
तुम्हारा नाम,
तुम्हारी सोच,
तुम्हारे सपने,
तुम्हारी कल्पना,
तुम्हारा यथार्थ,
तुम्हारी छवि,
तुम्हारा एहसास,
मन को हमेशा सुकून पहुंचाते हैं,
मगर जाने क्यूँ हम किस जूनून में पड़ कर,
तुम्हारा वजूद,
तुम्हारी कोमलता,
तुम्हारी मौलिकता,
तुम्हारी नश्वरता,
तुम्हारी निश्छलता,
तुम्हारा स्वरुप।
तुम्हारा सब कुछ,
मिटाने पर तुले हैं, उफ़ प्रकृति तुम कभी कुछ कहती भी तो नहीं.