जी हां कोई भूमिका नहीं, कोई संदर्भ नहीं, कोई सफ़ाई नहीं, कोई आरोप भी नहीं ..और किसी से कोई शिकायत भी नहीं।मुझे लगता था कि मैं जब भी किसी की कोई पोस्ट पढूं तो जब उस पर कुछ भी टिप्पणी करूं तो पोस्ट लिखने वाले को भी उतना नहीं तो कम से कम उससे थोडा कम ही सही आनंद आये जितन उन्हें पोस्ट लिखते समय आया हो। पता नहीं कोशिश में कितन कामयाब होता हूं..मगर विश्वास रहता है कि कम से कम ..मेरी लेखनी को पढने के बाद जो भी जैसी भी छवि मेरी उनके मन में बनी हुई है..उसको और मेरी टीप को देखते हुए..किसी भी सूरत में ..मेरी टिप्पणी किसी के लिये दुख का कारण तो नहीं बन सकती है।मगर जाने अनजाने शायद ऐसा हो जाता है....और तब लगता है कि क्या पढना कम कर दूं ...नहीं तो फ़िर जिसे पढूं ..उस पर टीपना बंद कर दूं.....नहीं तो करूं क्या.....सोचा सीधे सीधे आपही से पूछा जाए...कि क्या वाकई मेरी टिप्पणियां ..आपको कष्ट पहुंचाती हैं...और आपसे भी सीधे सीधे .....अपना विचार रख देने की अपेक्षा रहेगी....।
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रविवार, 1 नवंबर 2009
क्या मेरी टिप्पणियां आपको कष्ट पहुंचाती हैं.....?
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