सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

आस्था का अर्थतंत्र







इस देश में आस्था का अर्थतंत्र यूं तो काफ़ी पुराना रहा है किंतु धर्म से आबद्ध होने की परंपरा से विलग स्वयंभू पूजनीयों के आडंबरों के ईर्द गिर्द जमा होने लगी । धर्म गुरूओं और इन अवतारनुमा लोगों ने न सिर्फ़ ढकोसलों और आडंबरों का बहुत बडा साम्राज्य खडा किया बल्कि समाज को बदले में लगभग कुछ भी दिए बगैर समाज के अर्थतंत्र का बहुत बडा हिसा अपने पास दबाए रखा । नैतिक मूल्यों के पतन का इससे अधिक प्रमाण और भला क्या हो सकता है कि धर्मक्षेत्र सेवा और समर्पण से कदाचार की ओर बढ चला है । 
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हालिया प्रकरण तथाकथिक आशुतोष महाराज़्म की समाधिस्थ मृत्यु के बाद उनसे जुडी लगभग 1000 करोड की अथाह संपत्ति के अधिकार की रस्साकशी सा दिख रहा है । पुत्र अनशन पर बैठकर पिता के देह को अंतिम संस्कार के लिए मांग रहा है साथ ही पिता से आबद्ध संपत्ति में हिस्सेदारी भी , बिना ये तय किए कि अर्जित संपत्ति क्या सचमुच ही व्यक्तिगत थी या किसी न्यास उद्देश्य से संरक्षित थी । 
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इससे इतर ये मसला सरकार व प्रशासन के सामने इस यक्ष प्रश्न की तरह भी खडा होता है कि आखिर क्यों नहीं किसी भी नियम कानून द्वारा इन धार्मिक निकायों , संस्थाओं को एक निश्चित सुरक्षित राशि के बाद बाकी सारी राशि को जनकल्याण हेतु व्यय करने के लिए बाध्य किया जाता । यूं तो ये व्यवस्था वर्तमान सामाजिक हालातों को देखते हुए स्वयं इन सभी धार्मिक संस्थानों को करनी चाहिए । शिक्षा, चिकित्सा, जनकल्याण , आश्रय स्थलों आदि के लिए यदि इन संपत्तियों व संसाधनों का उपयोग किया जाए तो इससे सार्थक और भला क्या हो सकता है । 
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कहते हैं  कि प्रकृति ईश्वर के ज्यादा निकट हैत ओ फ़िर धर्मस्थानों व धार्मिक क्रियाकलापों को प्रकृति व समाज के सृजन के लिए अग्रसर होना चाहिए , न कि अर्थ संचय में सतत प्रयत्नशील । स्मरण रहना चाहिए कि आचरण और व्यवहार में जरा सी भी निम्नता सीधे एक बहुत बडे समूह की आस्था पर आघार जैसा होता है । य़ूं भी गरीब समाज के भगवानों को भी जरूरत से ज्यादा अमीर होते जाने की छूट नहीं दी जानी चाहिए । 
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आशुतोष महाराज के परिवार ने इससे पूर्व पिता को पाने की कोई गंभीर कोशिश की हो दिखाई सुनाई नहीं दिया किंतु एक पुत्र के लिए पिता की देह का सम्मानजनक विसर्जन उसका निर्विवाद प्राकृतिक अधिकार है और इसे किसी भी आडंबरी भावना से दरकिनार नहीं किया जा सकता है । हैरानी होती है जब इस तरह के आडंबरी विवादों को आस्था से जोड कर राष्ट्रीय समाचारों की सुर्खियाम बनाने दिया जाता है । 
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अब वक्त आ गया है जब आस्था को भी मानवीय कसौटियों पर कसने की पहले कर देनी चाहिए अन्यथा हाल ही में माता वैष्णो देवी ट्रस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में भक्तजनों द्वारा चढाए जा रहे दान में नकली द्रव्य चढाने का ज़िक्र करके स्थिति स्पष्ट कर ही दी है । 

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

जनलोकपाल : अस्तित्व में आने को संघर्ष करता कानून






अब से लगभग तीन वर्षों पहले भारतीय लोकतंत्र की पूरी तरह बर्बाद हो चुकी परिपाटी से त्रस्त लोगों को यदि कोई बात अपने घरों से बाहर निकल आने के लिए कारण बनी थी तो वो थी सरकार द्वारा भ्रष्टाचार से सख्ती से निपटने के लिए लोकपाल के रूप में ऐसी संस्था/व्यक्ति को लाने की तैयारी के लिए प्रस्ताविक कानून में फ़िर से मौजूद झोलझाल । सरकार को यूं तो इस नए कानून को लाने से पहले ऐसे पूर्व कानूनों/प्रयासों संस्थाओं की असफ़लता पर न सिर्फ़ गौर करना चाहिए था बल्कि लोगों को बताना भी चाहिए था । 
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ऐसी ही एक संस्था केंद्रीय सतर्कता आयोग रहा , जिसके खुद के प्रमुख तक की नियुक्ति का ही मामला कोर्ट द्वारा बेदखली के फ़रमान तक पहुंच गया । जबकि ठीक इसके उलट पूर्व के महालेख नियंत्रक श्री विनोद राय के तेवर और कार्यों ने लोगों की इस संस्था के प्रति आस्था और बढा दी । यह संस्था इतनी मुस्तैद और प्रखर रही कि विश्व के बेहतरीन अर्थशास्त्रियों में गिने जाने वाले अर्थशास्त्री के हाथों में देश की बागडोर होने के बावजूद भी कैग ने लगभग हर गबन पर अपनी नज़र बनाए रखी। 
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बीते दिनों एक एक करके जिस तरह से प्रशासनिक अधिकारी राजनीति और राजनैतिक दबावों के खिलाफ़ मुखर हो रहे हैं वो कहीं न कहीं ये ईशारा तो कर ही रहा है कि सबसे ज्यादा यदि किसी की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं तो वो विधायिका ही है । आखिर क्या वज़ह है कि आज़ादी के बाद से देश की विधायिका को लगातार कानून बनाने की जरूरत पड रही है और नए कानूनों को लाने का दबाव इतना ज्यादा है कि पिछले कानूनों के अनुपालन की सुनिश्चितता तय करने की फ़ुर्सत ही नहीं है । आरक्षण की वैकल्पिक व्यवस्था को पिछले साठ सालों से लगातार विस्तारित किए जाने के बावजूद हर बार नई गुंजाईश बनी रहती है एक भी विषय स्थाई तौर पर कहां हल किया जा सका है अब तक । 
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तथाकथित सिविल सोसायटी के धरने, अनशन और प्रदर्शन ने इस कानून को बहस में ला दिया , इतना कि सरकार उस पर गंभीर दिखने के प्रयास को लेकर उद्धत हुई । इस बीच सिविल सोसायटी का एक धडा खुद राजनीति में आ कूदा और राजधानी प्रदेश की बागडोर थाम ली । नौकरशाहों को खूब पता होता है कि सरकार द्वारा बनाए गए नियम कायदों को लागू होने करने में कितने ढके छिपे विकल्प मौजूद रखे जाते हैं । 
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नई सरकार ने सारे छिद्रों पर ढक्कन लगाने की तैयारी करके ऐसा कानून छाती पर ला पटका कि न सिर्फ़ खुद के गले को भी जांच के लिए आगे कर दिया बल्कि "न राधा के पास नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी" वाले फ़ार्मूले पर कानून रखा कि जो भी अपने श्रम और आय से ज्यादा का टीम टाम किए हुए , जांच की जाए और गडबड पाए जाने पर सीधा जब्ती कुर्की सब कुछ । मलाईदारों के रिश्तेदारों तक की निगेहबानी तक की गुंजाईश रखी जा रही है । अब इतने तेज़ाबी कानून को लाने की हिमाकत का परिणाम ये निकला है कि आम लोग बाग से लेकर खुद पुलिस और प्रशासन तक इसे दुश्मन मान बैठे हैं । 
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ताज़ा हालातों के मुताबिक कहा जा रहा है कि वर्ष 2002 में लाए गए एक आदेश के अनुसार बिना केंद्र सरकार की अनुमति के दिल्ली की प्रदेश सरकार द्वारा कोई विधेयक सदन पटल पर प्रस्तावित नहीं किया जा सकता अन्यथा इसे असंवैधानिक माना जाएगा । यकायक ही असंवैधानिक न होने के प्रति इतने संज़ीदा हो उठे हैं कि लगने लगा है मानो अब लोकतंत्र ठीक हो उठेगा । मगर ठीक ऐसे में सूचना ये मिलती है कि पूर्व सरकारें 11 बार ऐसा कर चुकी हैं । 
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अब ये स्पष्ट होता जा रहा है कि हम सब कहीं न कहीं अपने आपसे लडने को तैयार हो रहे हैं । जनलोकपाल हो या लोकपाल , देखना सिर्फ़ ये है कि इन ताकतों का इस्तेमाल करने वाले समाज और व्यवस्था को मुकम्मल करने की हिमायत करने वाले लोग हैं या इन संस्थाओं को शक्तिहीनता की ओर अग्रसर करने वाले । 

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

बसंत पंचमी , सरोसत्ती पूजा और रंग अबीर


ये मूर्तियां , मां शारदे की जय के नारे से गुण्जायमान हो रही होंगी


आज का ही दिन , बहुत बरसों पहले , बहुत बरसों पहले इसलिए कहा है क्योंकि दिल्ली में खानाबदोशी के जीवन से पहले जब एक स्थाई और बहुत ही खूबसूरत जिंदगी जिया करते थे उन दिनों , आज का दिन , यानि वसंत पंचमीं के दिन का मतलब था , सज़ा हुआ दालान , प्रसाद की खुशबू से गमकता -महकता हुआ आंगन और ऊपर रंग बिरंगी पताकाओं की लंबी लंबी लडियों से दूर दूर तक की सज़ावट , खूब जोर जोर से बजता हुआ भौंपू जिसमें हम अपने अपने स्वाद के हिसाब से गला फ़ाड साउंड में गाने चला के सुना करते थे । मगर रुकिए किस्सा यहां से नहीं शुरू होता था ।

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जैसा कि मैंने अनुभव किया है कि चाहे जो भी कहिए अपने देश का एक गज़ब का रिवाज़ है और वो है हमारे त्यौहारों पर्वों की अधिकता और विशिष्ट होने के कारण कमाल की रोचकता । अब देखिए न इत्ता खुशकिस्मत देश भी और कौन सा होगा या कितने होंगे जिन्हें शीत ऋतु , ग्रीष्म ऋतु , शरद और वसंत तक प्रकृति का हर रंग देखने को मिलता है , हम वसंत में रंगों से सराबोर हो उठते हैं , तो शीत ऋतु में रौशनियों की चकमकाहट , यानि कि हमारे पास जितने ज्यादा बदलते हुए मौसम हैं , उससे भी ज्यादा उन्हें सैलिब्रेट करने की वज़हें ।
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मुझे याद है कि सरस्वती पूजा , जिसे उन दिनों बच्चे फ़्लो में सरोसत्ती माता की जय ,सरोसत्ती पूजा कहते थे , की तैयारी तो संभवत: वर्ष के शुरूआती दिनों से ही हो जाती थी और उसमें सबसे पहले काम होता था प्रतिमा बनाने वाले कुम्हार को इसके लिए बेना(बयाना) देना । हम उन्हें जाकर बता देते थे कि हमें कितनी बडी ,छोटी और कैसी मूर्ति चाहिए । सरस्वती पूजा हम अपने ही दालान पर किया करते थे , वो भी जब देखा कि हमारे बहुत सारे मित्र अपने अपने दालानों घरों पर सरस्वती पूजा बडे ही मनोयोग से कर रहे हैं तब हम जो अपने टोले के कुछ मित्रों ने भी यही सोचा कि हमें भी मां शारदे की पूजा अर्चना के इस दिन को उत्साह पूर्वक मनाना ही चाहिए । हम सब मित्र इसके लिए साल भर में जमा किए हुए पैसों का उपयोग करते थे और जो कमती बढती होती थी उसके लिए अभिभावकों को पटाया जाता था ।
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स्थान और प्रतिमा का निर्धारण होने के बाद तैयारियां शुरू हो जाती थी , बाजा वाले को साटा देना (यानि उस दिन के लिए उसे बुक करना ) , दरी , सजावट का सामान , प्रसाद का सामान , पूजा सामग्री , आदि तमाम कार्य सबके जिम्मे लगाए जाते । असली तैयारी शुरू होती थी दो दिन पहले जब हम मेहराब ( बांस की बाति{हरे कच्चे बांस को चीर के बनाई गई लंबी छोटी खपच्चियां ) ,अशोक के पत्ते , रंगीन कागज़ों को तिकोनी कटाई और फ़िर उन्हें लंबी सुतरियों पे बांध के दूर दूर तक लगाई जाने वाली पताकाएं । और यहां से जो हमारी जीत तोड मेहनत और भाग दौड का सिलसिला शुरू होता था तो फ़िर वो प्रतिमा विसर्जन तक यूं ही चलता रहता था ।

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पूजा से एक दिन पहले हम बैलगाडी पर बैठ कर मूर्ति लाने के लिए निकलते थे , जहां से ये मूर्ति लाई जाती थी वो गांव लगभग सात आठ किलोमीटर था , कच्चे पक्के रास्ते और हिचकोले खाती हमारी बैलगाडी । मूर्ति को किसी भी झटके से बचाने के लिए बैलगाडी में खूब सारा पुआल बिछा कर उसे गद्देनुमा बना दिया जाता था और फ़िर कुछ ज्यादा सक्षम मित्र प्रतिमा को उस गांव से लेकर अपने दालान तक लाने के लिए विशेष जिम्मा उठाते थे । प्रतिमा को साडी या बडी चुनरी से अच्छी तरह ढांप कर खूब जोर जोर से गला फ़ाड नारे , सरोसत्ती माता की जय ,सरोसत्ती माता की जय ..मां सरस्वती को दालान पे बनाए गए चौकी प्लेटफ़ार्म पे स्थापित किया जाता था ।
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पूजा की सुबह से पहले की वो रात अब भी यूं की यूं याद है कि जब मां के जिम्मे प्रसाद , पूजा , आदि की तैयारी , के अलावा हम सबको रात भर दूध/चाय भिजवाते रहना ताकि दोस्तों की मंडली उर्ज़ा के साथ काम करती रहे । मूर्ति, पांडाल , पताकाएं , सब कुछ सजाते सजाते भोर हो जाती थी । अधिकांशत: पूजा पर भी मैं ही बैठता था और उसकी वज़ह थी , मुझे रंगीन धोती पहनने का बहुत ही शौक था , अब भी है , और संस्कृत के मंत्रोंच्चारण से प्यार । उन दिनों मुझे स्त्रोतरत्नावली से तांडव स्त्रोत सहित जाने कितने ही स्त्रोत यूं ही कंठस्थ हो चुके थे मैं नियमित रूप से सुबह पूजा भी किया करता था , ये बदस्तूर अब भी जारी है ।
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नियत समय पर पूजा अर्चना और प्रसाद वितरण के बाद होता था गला फ़ाड बाजा बजाने का सर्वप्रिय कार्यक्रम , हालत ये हो जाती थी कि जब तक आंगन से मां और चाचियां हमें दौडा कर पीटने को उतारू न हो जाती थीं तब तक उसका वोल्यूम यूं ही बढा रहता था । पूजा के बाद सभी दोस्तों की मंडली निकलती थी अन्य दोस्तों द्वारा की जा रही पूजा में शामिल होने के लिए , प्रसाद लेने के लिए और सज़ी धज़ी मां शारदे को देखने के लिए । एक दिलवस्प बात बताना ठीक होगा कि जैसा कि उन दिनों हम मानते थे कि मां शारदे के चरणों में सारी पुस्तकें रख देने से हमें जरूर अच्छे नंबर आएंगे और मैं तो सबसे ऊपर गणित की पुस्तक ही रखता था :) :) :) :) ।
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दोपहर को भजन कीर्तन का दौर चलता था , ढोल मंजीरे और तालियां मार मार के सारे सुरों की ऐसी तैसी करते हुए हम सरस्वती माता को प्रसन्न करने का फ़ुल टू जोर लगाते थे । शाम की पूजा के बाद गैस वाली पैट्रोमैक्स लाइट से रौशनी की जाती थी । और कार्यक्रम के नाम पर उन दिनों का एकमात्र और सबसे पसंदीदा आयोजन होता था , वीसीआर के साथ तीन पिक्चरों का दौर (वीसीआर और वो तीन पिक्चरें ---एक पोस्ट पढवाउंगा आपको इनसे जुडी यादों से भी ) ,सुबह तक हमें ये याद नहीं होता था कि कौन से पिक्चर का कौन सा संवाद था ।
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अगले दिन दोपहर के समय मूर्ति विसर्जन का समय होता था । बाद में तो प्रतिमा को दो तीन या जितने भी दिन मन हो रखा जाने लगा था , मगर उस समय हम यही करते थे । मां शारदे की विदाई का समय ठीक वैसा ही होता था जैसे कोई घर की बेटी गौना कराके ससुराल जाने की तैयारी में हो । बैलगाडी को खूब सज़ाया जाता था , और हम सब , जितने उस बैलगाडी पर लद सकते थे उतने सब , ढोल मंज़ीरों से लैस होकर बैठ जाया करते थे । उस दिन पहली बार फ़िज़ा में गुलाल की खुशबू और रंग जम कर उडाए जाते थे , और यूं लगता था मानो हमने वसंतोत्सव और फ़ागुन का आगाज़ कर दिया हो ।
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खूब गाते बजाते पूरे गांव घूमते हुए , बीचोबीच बने सरोवर में हम प्रतिमा को पूरी श्रद्धा के साथ विसर्जित करते थे । जनवरी फ़रवरी के गांव के बेहद सर्द दिनों में , सरोवर के जमा देने वाले पानी में जब हम दोस्त मां सरस्वती की प्रतिमा को हाथों में उठाए ज्यादा से ज्यादा आगे ले जाने की धुन में उतरते थे तो वो आनंद ही कुछ और होता था । थके हारे हुए वापस आने पर सबको ठंडाई मिलती थी वो भंग तरंग वाली , और शाम को जो रंग जमता था ,उसके क्या कहने .............। गांव से शहर आने के बाद भी ये सिलसिला चलता रहा शायद बहुत सालों तक , हमारी जगह अगली फ़ौज़ आई , उसके बाद उससे भी अगली , और अब भी ये चल रहा है .. अभी हाल ही में जब गांव गया था तो पोस्ट के ऊपर खींची हुई फ़ोटो इसका प्रमाण है । चलते चलते ..हमारे पवन भाई का कार्टून भी देखें आप







शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

नाम उसका मुहब्बत था शायद


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किसी मुझ जैसे की डायरी का एक पन्ना ..............

"नाम उसका मुहब्बत था शायद ,जिंदगी के हर मोड पे मुझसे टकराई थी वो ,
मैं चलता रहा और इश्क भी ,जाने खुद को और मुझको कहां ले आई थी वो "


"हम एक बार जीते हैं , एक ही बार मरते हैं और हमें प्यार भी एक ही बार होता है " फ़िल्म कुछ कुछ होता है का ये डायलॉग जब मैंने सुना तो मुझे वहीं पर शाहरूख खान से कहने का मन हुआ कि हां तुम्हारी तीन घंटे की इस रीलजिंदगी में ये एक बार से ज्यादा मुनासिब और मुफ़ीद है भी नहीं , मगर भईये ये जिंदगी उस तीन घंटे से बहुत बडीऔर उससे कई गुना ज्यादा अलग होती है ,और बेशक ये बात जरूर लागू होती होगी बहुत सारे लोगों की जिंदगी में ये सब एक बार ही होता होगा , मगर अपना क्या करें कि हम तो इस एक जिंदगी में जिए ही कई बार हैं और मरे  भी जाने कितनी ही बार हैं । एक जिंदगी ...मुझे तो लगता है कि हम एक ही दिन में कई बार जीते और मरते हैं,मगर मैं यहां जिंदगी और मौत के बीच जीने और मरने के बहीखाते का हिसाब मिलाने नहीं बैठा हूं , कम से कम ,अभी तो नहीं । आज प्यार मुहब्बत इश्क और जितने भी नाम इस अनुभूति , इस अनुभव , इस एहसास के हैं ,उसकी बात करेंगे ।
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मैं जब सिर्फ़ ग्यारह बारह वर्ष का था तब मुझे पहला प्यार हुआ था , मुझे नहीं पता कि वो प्यार था या कुछ और था,क्योंकि मैं आज तक प्यार को समझ नहीं पाया हूं , परिभाषित नहीं कर पाया हूं , उसके पैमाने तय नहीं कर पाया हूं,मगर इतना जरूर है कि उन दिनों बहुत अच्छा अच्छा सा लगता था और दुनिया की कोई भी ताकत कोई भी मजबूरी कोई भी परंपरा कोई भी नियम कानून विधि मुझे वो अच्छा अच्छा सा महसूस कराने से नहीं रोक सकती थी । सिर्फ़ एक साल
का साथ रहा मेरा और मेरे उस मुझसे भी नादान दोस्त का । मगर आज तक भी मुझे उसकी सूरत याद है और ताउम्र रहेगी,हां ये अलग बात है कि अब सामने आने पर मैं उसे पहचान भी न सकूं ,लेकिन प्यार तो बिना चेहरे ,बिना सूरत के भी होता है ....रहता है ।
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उम्र बढी और एहसास भी बदले , फ़िर प्यार हुआ दोस्तों के इश्क , उनकी मुहब्बत से ....अरे नहीं नहीं जी , उनकीप्रेयसी और प्रेमिकाओं से नहीं बल्कि प्यार हुआ उनकी दोस्ती , उनकी शिद्दत , उनकी मुहब्बत की पहल से ,इज़हार की हिम्मत,इंकार-इकरारकी दुविधा से, और ये वो वक्त था जब सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने दोस्तों की दोस्ती ,इश्क के लिए ,हम अपनी पूरी ताकत , पूरा समय और पूरा ध्यान भी दे दिया करते थे । शायद मैट्रिक की परीक्षा तक यही हाल रहा , हालांकि, बाद में मुझे ये भी पता चला कि कई दोस्तों में ये एहसास इतना ज्यादा तीव्र था कि बात तभी उनके अभिभावकों तक पहुंच गई थी ,और वे इस बात पर दृढ थे इतने कि बहुत सालों बाद पता चला कि कम से कम एक दोस्त और दोस्तनी को तो मैं जानता हूं जिन्होंने स्कूली दिनों की उस दोस्ती, इश्क को बाद में विवाह की मंज़िल तक पहुंचाया ।
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हालांकि प्रेम का मकसद सिर्फ़ विवाह ,या इश्क की मंज़िल सिर्फ़ सहमति से एक साथ रहने का कोई करार ही मात्र होता है,इस बात को मुझे मानने में बहुत ज्यादा दिक्कत होती है । और ऐसा इसलिए भी है क्योंकि आजतक जितने भी शाश्वत प्रेम कहानियां सुनी हैं उन सबके किरदारों ने एक दूसरे के प्यार को पाने के लिए जिंदगी दांव पर लगा दी और जान जाने तक भी,
वे विवाह जैसा कुछ कर नही सके ..रांझे को तो सुना है कि हीर से विवाह करने के बाद भी उसका साथ नसीब नहीं हुआ । चलिए इस फ़िलासफ़ी को यहीं छोडा जाए ...........
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तो इसके बाद लडकपन से युवापने की ओर बढे ।और वाह क्या रुत और रुतबा होता है उस अल्हड तरूणाई के मौसम का ,वो गीत आपने सुना है न जवानी जिंदाबांद । सच में जवानी जिंदाबाद ही होती है और शायद इसीलिए यही वो समय भी होता है जब जवानी जिंदाबाद ही तय करती है कि आगे जीवन आबाद होने वाला है या बर्बाद । मगर कहते हैं न इश्क अंधा होता है ,उसे कहां दिखती हैं जिम्मेदारियां उसे कहां दिखती हैं बंदिशें , सामाजिक दीवारें ,मान्यताएं परंपराएं ,वो तो बस कहीं भी पनप जाता है बिल्कुल बरसात की काई की तरह और फ़िर तेज़ धूप में उधड कर गिर भी जाता है ।

चलिए आगे की कहानी फ़िर कहूंगा .........................

बुधवार, 29 जनवरी 2014

"असहयोग द्वारा समर्थन" देने का गजब फ़ार्मूला





दिल्ली में रहते हुए अब ये सोचता हूं कि आखिर वो क्या वजह है कि "खबरों के संसार" के अधिकांश "देश" दिल्ली के गलियारों जैसे लगने लगते हैं ।और फ़िर इन दिनों तो यहां झाडू फ़िराई का कार्य प्रगति पर है । पॉलिटिकल स्ट्रैटजीज़ राजनीतिक मान्यताएं बगावत पर उतारू हैं , कहीं न कहीं लोग बाग खुद ही अब अपनी पूछों में आग लगाने को आतुर हो उठे हैं , उकताहट तो यकीनन ही हो गई है इस व्यवस्था से ।

दिलचस्प बात ये है कि आगामी लोकसभा चुनावों की अहमियत के दबाव के चलते कुल मिला कर कोई चीख चीख कर कुछ न कुछ कहना चाह रहा है । झुंझलाहट इतनी तीव्र है कि मुकाबले में दंगों के दर्द को उतारा जा रहा है जाने दीजीए साहेब वक्त से जुदा खुद अपनी नस्ल द्वारा सुनाई जाने वाली सबसे भयानक और पाश्विक सज़ा है जिस पर बीती हो वही जानता है ।

सबसे जुदा बात ये है कि इस शहर की राजनीतिक आबो हवा क्या बदली है मानिए जैसे सियासी ज़लज़ला सा चल रहा है देश में । जिस दिन से नई सोच नए विकल्प ने राजनीति में दखल दिया जाने कितने ही चक्रव्यूह लगातार रचे जा रहे हैं । हर कोई अपने मोर्चे खोल के बैठा है  ।

वे बडे पुख्ताई तरीके से बताते हैं कि कुछ नहीं जी सब हमारा चांस ससपिशियस करने केल इए मिल कर किया जा रहा है अगले दूसरे ही पल नई कैग जांच बिठा देने की घोषणा कर डालते हैं , फ़ंडा सिर्फ़ एक है "जो भी अपनी कमाई से ज्यादा की औकात में दिखे मिले , उसकी जांच तो बनती ही है बॉस। और बात इनती ज्यादा तीखी है कि पुलिस, प्रशासन , आयोग तक इन्हें बगावती अराजक आरोपी और दोषी साबित किए दे रहे हैं ,सभी ने जैसे "असहयोग द्वारा समर्थन" देने का गजब फ़ार्मूला ईज़ाद किया है ।


कोई करोडों बकाए का नोटिस थमा रहा है तो कोई तीस दिन के सरकार से पांच दस साल का रिपोर्ट कार्ड दिखा कर उसे मुर्गा बनाने पर उद्धत है । महामहिम का दफ़्तर चंद फ़ाइलें निपटान में इतनी देर किए रहा कि उसका फ़ायदा सीधे सीधे फ़ांसी पाए दुर्दांत अपराधियों को हुआ मगर महामहिम ने "अराजकता की चपत" आम आदमी के गाल पे जड दी ,वो भी मुस्कुराते हुए :) :) और इस रस्साकशी के बीच अच्छी बात ये है कि लोग अब अपने राजनीतिक विकल्प के प्रति ज्यादा संज़ीदा दिखाई दे रहे हैं । भारतीय राजनीति करवट ले रही है उम्मीद की जानी चाहिए कि उस करवट हसीन सपने सिर्फ़ पैदा नहीं होंगे वे , बढेंगे और बनेंगे भी ..................

सोमवार, 27 जनवरी 2014

आखिरी पोलिटिकल पोस्ट ..............


http://www.ispreview.co.uk/wp-content/gallery/article-illustrations/dynamic/computer_security_uk-nggid03451-ngg0dyn-275x300-00f0w010c010r110f110r010t010.jpg


मुझे लगता है कि फ़िलहाल जो और जैसा राजनीतिक माहौल बना है और दिल्ली जैसे शहर में रहने के बावजूद भी किसी तरह की राजनीतिक प्रतिक्रिया ज़ाहिर करने से पहले मन कुनैना सा होता हो तो फ़िर उससे बेहतर है कि सामाजिक मुद्दों पर ही फ़िलहाल ध्यान केंद्रित किया जाए क्योंकि , सरकार चाहे भारतीय जनता पार्टी की बने या किसी और की , आखिर मुद्दे तो उनके सामने भी हू बहू वही खडे हैं , सालों से मुंह बाए हुए , सो अब तय करता हूं कि फ़िलहाल इस राज़नीति जायके को मुंह में ही घुलने दिया जाए , क्यूं खामख्वा इतने शब्दों को अभी की राज़नीति के लिए ज़ाया किया जाए जो सिर्फ़ चंद महीनों बाद ही आउट डेटेड हो जाएंगी , बहुत कुछ घट बढ रहा है , बदल , उथल पुथल रहा है , क्यों नहीं उन्हें बनाया जाए अभी लेखनी का विषय , लेकिन चलते चलते चंद शब्द अपने हर खेमे के दोस्तों को कहना चाहूंगा ............


राजनीति , सियासत वालों के लिए बेशक प्रयोग का विषय रही है मगर आम लोगों के लिए ये एक विचारधारा को मानने सराहने जैसी रही है और  लोकतंत्र की सबसे बडी खूबियों में से एक होती है वैचारिक भिन्नता के बीच सामंजस्य । यूं तो एक दूसरे का परस्पर सम्मान करने की परिपाटी  अब एक भूली बिसरी परंपरा बन चुकी है आज की राजनीति पे बिल्कुल भी फ़िट नहीं बैठती और बैठे भी क्यूं , जब हम समाज में एक दूसरे के प्रति इतने असहिष्णु हो चुके हैं कि एक दूसरे की विचारधाराओं तक का सम्मान सिर्फ़ तभी तक करने लगे हैं जब तक उसमें असहमति का कोई वायरस न हो .............और क्या सचमुच ही हमें इस कदर आक्रामक हो जाने का हक सिर्फ़ इसलिए मिल जाना चाहिए कि फ़लां अपने जैसा नहीं सोच रहा या लिख रहा ।


जितनी भी मेरी राजनीति समझ है उसके हिसाब से अब आगे के लिए मुझे कुछ बातें बिल्कुल साफ़ साफ़ दिखाई दे रही है , आप की दिल्ली सरकार बहुत जल्द लुढकने वाली है , बस टोटल मिला के  प्रोग्राम ये बनाया जा रहा है कि लगे कि पोलिटिकल सुसाईड हाकिम लोगों ने खुद किया है , दूसरी बात कांग्रेस अब उस शरशैय्या पर पडी है कि उनके लिए पानी का इंतज़ाम भी उनके मुंह के करीब टोटी लगा कर ही करना बांकी है रह गया है , बची भारतीय जनता पार्टी , तो इस बात कि इस बार पूरे देश में ...नरेंद्र मोदी को जिस तरह राष्ट्र नायक के रूप में न सिर्फ़ देश बल्कि अब तो विश्व भी देख रहा है .....उसके बाद किसी शक शुबहे , चुनौती को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए मिशन 2014 की ओर अपना पूरा फ़ोकस रखना चाहिए । आजकल जितनी ज्यादा उर्ज़ा दिल्ली की राजनीति पार्टी जो सिर्फ़ तीस दिनों में , भारतीय राजनैतिक इतिहास की सबसे ज्यादा खटकने वाली पार्टी बन गई है , उसका पोस्टमार्टम करने में खर्च की जा रही है उसका ज्यादा अच्छा सदुपयोग , खुद को सबसे बेहतर विकल्प साबित करने और करके दिखाने के लिए किया जाना चाहिए ।


आपको देश चलाने के लिए जनता में एक गजब की कमिटमेंट दिख रही है , और कमाल की बात ये है कि अब ये खुलकर दिख रही है तो फ़िर ऐसे में लोग आपको सुनना चाहते हैं , बोलते कहते हुए देखना चाहते हैं , आपकी योजनाओं , आपका दृष्टिकोण , आपकी प्रक्रियाओं , आपके हुनर , आपकी जांबाजी की कायल होना चाहती है तो यकीनन ही आपको अपनी सारी उर्ज़ा सिर्फ़ और सिर्फ़ सकारात्मक बहसों/तथ्यों/कार्यों/विमर्शों/योजनाओं .....में ही व्यय करना चाहिए । चेहरा कोई भी हो , क्रांति का नायक कोई भी कहलाए , यकीन मानिए देश को उस पर फ़ख्र और सिर्फ़ फ़ख्र ही होगा ,लेकिन आप अपनी उन दूरगामी नीतियों को साझा तो करिए , ये देश की जनता है पिछले पैंसठ सालों में और कुछ समझी हो न हो कमबख्त इकोनोमिक्स और पॉलिटिक्स खूब अच्छे से समझती है ...........


तो अब मिला करूंगा आपसे , इसी जगह कुछ बेहद अहम सामाजिक मुद्दों के ऊपर अपनी नज़र डालते हुए

देश में बढते यौन अपराध : एक विश्लेषण ................जल्दी ही पढवाता हूं आपको

शनिवार, 25 जनवरी 2014

समर्थन या घमरथन


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आजकल शाम को टीवी पर आने वाली बहसों में सबसे ज्यादा दयनीय स्थिति दिल्ली कांग्रेस की दिखती है जो चीख चित्कार मचा सिर्फ़ तीस चालीस दिन की बालिग सरकार को भ्रष्टाचारी साबित करने का प्रमाण दे रहे होते हैं और ये पूछने पर कि फ़िर समर्थन काहे टिकाए हुए हैं पलट काहे नहीं देते गोरमिंट को , कि बस चिचियाहट रिरियाहट में बदलने लगती है ............

वैसे समर्थन से याद आया कि केंद्र सरकार ने इसे और जोरदार समर्थन भाव से उस व्यक्ति का तबादला कर दिया जिसे मुख्यमंत्री जी ने उस जांच की कमान देने के लिए उपयुक्त समझा जिसके पहले ही निशाने पर राष्ट्रमंडल खेल घोटाला केस होता ...उसका तबादला कर दिया गया ............सुना है कि पांडिचेरी अब इत्ती दूर से जित्ती जांच करनी हो कर डालें .....और शाम को ही फ़िर बडी बहस में घेर लिया जाएगा टोपी वालों को कि काम नहीं करते हो जबकि काम तो काम तो काम साला "जुकाम" तक की रिपोर्टिंग का आम चल रहा है ..............

समर्थन की बात पर ये भी याद आया कि जिस तरह से सरकार की मैय्यत निकालने के लिए दोनों बड्डे अपने अपने दांव चल रहे हैं एक बांस काट रहा है तो दूसरी डोरी तैयार करने को तत्पर है ,हर कोई मटका उलटा करके फ़ोडने को उद्धत मगर ये आदमी मुआं इत्ता खपा मरा लुटा हुआ है कि उअके जी को कोई रोग लगता दिख नहीं रहा है । लोगबाग भीतर ही भीतर ये सोच कर हैरान हो रहे हैं कि हर बार विलेन की तरह पेश एक खिदमत दिल्ली पुलिस अचानक ही इतनी चहेती बन गई कि मानो बताया जताया जा रहा हो कि हमारे पीठ पर अक्सर पडती आपकी लाठियां हमें तहे दिल से स्वीकार हैं दारोगा जी .................

मुझे लगता है पिछले कुछ वर्षों में नशे के कारोबार को पूरी योजना के साथ स्थापित किया गया है कि अवाम जितना अधिक होश खोकर जिएगी उतना ही अधिक जोश सरकार के अफ़सरी तेवरों में आएगा । तेवर बहुत बडी जिम्मेदार कडी है इस व्यवस्था के दोहरेपन की । सरकार अपने मुलाज़िमों के साथ काम करती हुई खुद भी मुलाज़िम की तरह पेश आनी चाहिए और बपौती तो कतई नहीं बननी चाहिए ......................फ़िलहाल तो सबको इस समर्थननुमा घमरथन में ने उलझा सा रखा है .......................
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