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सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

आस्था का अर्थतंत्र







इस देश में आस्था का अर्थतंत्र यूं तो काफ़ी पुराना रहा है किंतु धर्म से आबद्ध होने की परंपरा से विलग स्वयंभू पूजनीयों के आडंबरों के ईर्द गिर्द जमा होने लगी । धर्म गुरूओं और इन अवतारनुमा लोगों ने न सिर्फ़ ढकोसलों और आडंबरों का बहुत बडा साम्राज्य खडा किया बल्कि समाज को बदले में लगभग कुछ भी दिए बगैर समाज के अर्थतंत्र का बहुत बडा हिसा अपने पास दबाए रखा । नैतिक मूल्यों के पतन का इससे अधिक प्रमाण और भला क्या हो सकता है कि धर्मक्षेत्र सेवा और समर्पण से कदाचार की ओर बढ चला है । 
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हालिया प्रकरण तथाकथिक आशुतोष महाराज़्म की समाधिस्थ मृत्यु के बाद उनसे जुडी लगभग 1000 करोड की अथाह संपत्ति के अधिकार की रस्साकशी सा दिख रहा है । पुत्र अनशन पर बैठकर पिता के देह को अंतिम संस्कार के लिए मांग रहा है साथ ही पिता से आबद्ध संपत्ति में हिस्सेदारी भी , बिना ये तय किए कि अर्जित संपत्ति क्या सचमुच ही व्यक्तिगत थी या किसी न्यास उद्देश्य से संरक्षित थी । 
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इससे इतर ये मसला सरकार व प्रशासन के सामने इस यक्ष प्रश्न की तरह भी खडा होता है कि आखिर क्यों नहीं किसी भी नियम कानून द्वारा इन धार्मिक निकायों , संस्थाओं को एक निश्चित सुरक्षित राशि के बाद बाकी सारी राशि को जनकल्याण हेतु व्यय करने के लिए बाध्य किया जाता । यूं तो ये व्यवस्था वर्तमान सामाजिक हालातों को देखते हुए स्वयं इन सभी धार्मिक संस्थानों को करनी चाहिए । शिक्षा, चिकित्सा, जनकल्याण , आश्रय स्थलों आदि के लिए यदि इन संपत्तियों व संसाधनों का उपयोग किया जाए तो इससे सार्थक और भला क्या हो सकता है । 
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कहते हैं  कि प्रकृति ईश्वर के ज्यादा निकट हैत ओ फ़िर धर्मस्थानों व धार्मिक क्रियाकलापों को प्रकृति व समाज के सृजन के लिए अग्रसर होना चाहिए , न कि अर्थ संचय में सतत प्रयत्नशील । स्मरण रहना चाहिए कि आचरण और व्यवहार में जरा सी भी निम्नता सीधे एक बहुत बडे समूह की आस्था पर आघार जैसा होता है । य़ूं भी गरीब समाज के भगवानों को भी जरूरत से ज्यादा अमीर होते जाने की छूट नहीं दी जानी चाहिए । 
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आशुतोष महाराज के परिवार ने इससे पूर्व पिता को पाने की कोई गंभीर कोशिश की हो दिखाई सुनाई नहीं दिया किंतु एक पुत्र के लिए पिता की देह का सम्मानजनक विसर्जन उसका निर्विवाद प्राकृतिक अधिकार है और इसे किसी भी आडंबरी भावना से दरकिनार नहीं किया जा सकता है । हैरानी होती है जब इस तरह के आडंबरी विवादों को आस्था से जोड कर राष्ट्रीय समाचारों की सुर्खियाम बनाने दिया जाता है । 
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अब वक्त आ गया है जब आस्था को भी मानवीय कसौटियों पर कसने की पहले कर देनी चाहिए अन्यथा हाल ही में माता वैष्णो देवी ट्रस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में भक्तजनों द्वारा चढाए जा रहे दान में नकली द्रव्य चढाने का ज़िक्र करके स्थिति स्पष्ट कर ही दी है । 

6 टिप्‍पणियां:

  1. एक नया ही विश्व आस्थाओं और अंबार का।

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  2. बहुत विचारणीय..... आस्था पांखड नहीं हो सकती

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया और आभार आपका डाग्दर दोस्त जी

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  3. आजकल सबसे ज्यादा मालामाल तो धार्मिक गुरु ही हैं ! जिन्हे मोह माया से दूर रहना चाहिये , वही इसके जाल मे फंसे रहते हैं !

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    1. सर इक्वेशन ही तो ससुरा बदल कर रह गया है अब

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

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