विवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 11 जनवरी 2015

पीके ...अब क्यों बैठे हो मुंह सीके


पिछले साल से इस नए साल तक यदि कोई विवाद घिसटता चला आ रहा है तो उसमें से नि:संदेह एक हाल ही में प्रदर्शित सिनेमा पीके भी है । हालांकि इस सिनेमा के विषय या इसके प्रदर्शन से पहले भी इसके साथ विवाद तो तभी शुरू हो गया था जब इसका पहला पोस्टर जारी किया गया था जिसमें अभिनेता आमिर खान रेल की पटरी पर बिल्कुल नग्न खडे थे । हमेशा की तरह अपने नए प्रयोगों और नई सोच को सामने लाने के लिए विख्यात अभिनेता आमिर खान के इस पोस्टर के बाद सब अंदाज़ा लगाने लगे थे कि कुछ न कुछ नया ही परोसा जाने वाला है किंतु कहीं से भी किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि एक बार फ़िर से धर्म या कहा जाए कि धर्म के भीतर फ़ैले पाखंड और आडंबर को निशाने पे लिया जाएगा । किंतु हमेशा की तरह से फ़िर से आसान टार्गेट चुनते हुए बडी ही चतुराई से पूरी फ़िल्म में अधिकांशतया हिंदू धर्म , धर्म स्थल , हिंदू ईश एवं हिंदू धर्मगुरू को ही विषय बना कर उसके इर्द गिर्द सारा फ़िल्मी मसाला बुन कर परोस दिया गया , परिणाम ये कि आशा के अनुरूप फ़िल्म के कथानक , दृश्यांकन , डायलॉग आदि विवादित हुए और फ़िल्म ने सिने इतिहास की सबसे अधिक कमाई करने वाली , लगभग सवा तीन सौ करोड , फ़िल्म का रिकार्ड बना लिया ।

.

इस पोस्ट के लिखे जाने तक यूं तो इस फ़िल्म से जुडे सारे विवाद पार्श्व में जा चुके हैं और इसी बीच बदले हुए घटनाक्रम पर पूरे विश्व और भारत सहित पूरे समाज की नज़रें जा चुकी हैं , आस्ट्रेलिया से लेकर फ़्रांस तक पर मज़हब , इस्लामिक राज़्य और ज़िहाद के नाम आतंक का नंगा नाच किया जा रहा है । निर्दोष मगर निर्भीक लोगों , पत्रकारों , संपादकों तक की हत्या करके दशहत फ़ैलाने और अंजाम भुगतने का संदेश दिया जा रहा है अलग अलग आतंकी गुटों द्वारा , और स्थिति ये है कि कहीं भी किसी के मुंह से इसकी भर्त्सना तो दूर उलटे खुल्लम खुल्ला ऐसे आतंकियों को ईनाम देने और उन्हें इस घिनौनी करतूत के लिए शाबासी तक देने को आतुर हैं । खैर , दोबारा लौटते हैं फ़िल्म पीके की ओर ..
.

सवाल ये नहीं है कि धर्म और धर्म के नाम पर फ़ैले पाखंड और आडंबर को यदि सिने कलाकार अपने निशाने पर नहीं लेंगे उनपर चोट नहीं करेंगे तो फ़िर क्या आम आदमी करेगा , तो नि:संदेह ये उनका अधिकार भी है और कर्तव्य भी । और  ये किया भी जाता रहा है ,कुछ समय पूर्व एक ऐसी ही फ़िल्म ओ माय गॉड भी प्रदर्शित की गई थी जिसमें बडे ही तर्कपूर्ण तरीके से धर्म के नाम पर धर्मगुरूओं द्वारा फ़ैलाए गए माया जाल को निशाने पर लिया गया था । किंतु एक दर्शक के रूप में जो बातें इस फ़िल्म में किसी भी दर्शक इत्तेफ़ाकन अगर वो हिंदू धर्म का अनुयायी हो और संयोगवश आस्तिक भी है तो उसे जो नागवार गुज़री होंगी वो नि:संदेह यही रही होंगी ।
.

पहला , सिनेमा का ठीक ऐसे समय में प्रदर्शन जब भारतीय जनमानस धीरे धीरे संगठित होकर हिंदुस्तानी मर्म और हिंदू धर्म पर केंद्रित हो रहा था/है । इसका प्रमाण बहुत समय बाद भारतीय जनता पार्टी का इतने बडे बहुमत से शासन में आना , देश से लेकर प्रदेश तक लोगों की सामाजिक , राजनीतिक और धार्मिक सोच प्रबल रूप से हिंदुत्व के पुरातन गौरव के प्रति रुझान , ऐसे समय में यदि अनावश्यक रूप से उनके ईश और मान्यताओं का ऐसा उपहास सिर्फ़ व्यावसायिक लाभ कमाने के उद्देश्य से किया जाएगा तो ये आमंत्रित विवाद की तरह था । केंद्र में अभिनेता आमिर खान , इत्तेफ़ाकन मुस्लिम संप्रदाय से संबंधित थे , कथानक में प्रेमी जोडे में युवक पाकिस्तान का और युवती भारत की , क्या मुसलमान धोखेबाज होते हैं , लोग मूते नहीं इसलिए भगवान की फ़ोटो लगा देते हैं जैसे संवाद आदि इतने सारे तथ्यों को यदि संयोग भी मान लिया जाए तो फ़िर ये निंसंदेह घातक संयोग था । आखिरी और सबसे अहम बात जिसका ज़िक्र बार बार इस विवाद में हुआ कि क्या जितनी आसानी से हिंदू धर्म , धार्मिक स्थलों , हिंदू ईश , और हिंदू धर्म गुरुओं को निशाने पर लिया जाता है क्या वही हिम्मत किसी अन्य धर्म विशेषकर मुस्लिम मज़हब के लिए दिखाई जा सकती है ...विश्व आज इस्लामिक कट्टरपंथ से उपजे आतंकवाद का दंश झेल रहा है और इन सारे प्रश्नों का उत्तर पा रहा है ।


अंत में सिर्फ़ यही कहने का मन है कि ,



सोच रहा हूं कि अब आवाज़ दूं जोर से और पूछूं , अबे अब कहां हो बे पीके ,
दडबों से निकलो न ,बनाओ कुछ कठमुल्लों पे सिनेमा फ़िर दिखाओ जी के ..
सोच रहा हूं कि अब आवाज़ दूं जोर से और पूछूं , अबे, अब कहां हो बे पीके ,
धर्म नहीं मज़हब के नाम पर जब हुआ नंगा नाच , बैठ गए न मुंह सी के ..

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

आस्था का अर्थतंत्र







इस देश में आस्था का अर्थतंत्र यूं तो काफ़ी पुराना रहा है किंतु धर्म से आबद्ध होने की परंपरा से विलग स्वयंभू पूजनीयों के आडंबरों के ईर्द गिर्द जमा होने लगी । धर्म गुरूओं और इन अवतारनुमा लोगों ने न सिर्फ़ ढकोसलों और आडंबरों का बहुत बडा साम्राज्य खडा किया बल्कि समाज को बदले में लगभग कुछ भी दिए बगैर समाज के अर्थतंत्र का बहुत बडा हिसा अपने पास दबाए रखा । नैतिक मूल्यों के पतन का इससे अधिक प्रमाण और भला क्या हो सकता है कि धर्मक्षेत्र सेवा और समर्पण से कदाचार की ओर बढ चला है । 
.

हालिया प्रकरण तथाकथिक आशुतोष महाराज़्म की समाधिस्थ मृत्यु के बाद उनसे जुडी लगभग 1000 करोड की अथाह संपत्ति के अधिकार की रस्साकशी सा दिख रहा है । पुत्र अनशन पर बैठकर पिता के देह को अंतिम संस्कार के लिए मांग रहा है साथ ही पिता से आबद्ध संपत्ति में हिस्सेदारी भी , बिना ये तय किए कि अर्जित संपत्ति क्या सचमुच ही व्यक्तिगत थी या किसी न्यास उद्देश्य से संरक्षित थी । 
.

इससे इतर ये मसला सरकार व प्रशासन के सामने इस यक्ष प्रश्न की तरह भी खडा होता है कि आखिर क्यों नहीं किसी भी नियम कानून द्वारा इन धार्मिक निकायों , संस्थाओं को एक निश्चित सुरक्षित राशि के बाद बाकी सारी राशि को जनकल्याण हेतु व्यय करने के लिए बाध्य किया जाता । यूं तो ये व्यवस्था वर्तमान सामाजिक हालातों को देखते हुए स्वयं इन सभी धार्मिक संस्थानों को करनी चाहिए । शिक्षा, चिकित्सा, जनकल्याण , आश्रय स्थलों आदि के लिए यदि इन संपत्तियों व संसाधनों का उपयोग किया जाए तो इससे सार्थक और भला क्या हो सकता है । 
.

कहते हैं  कि प्रकृति ईश्वर के ज्यादा निकट हैत ओ फ़िर धर्मस्थानों व धार्मिक क्रियाकलापों को प्रकृति व समाज के सृजन के लिए अग्रसर होना चाहिए , न कि अर्थ संचय में सतत प्रयत्नशील । स्मरण रहना चाहिए कि आचरण और व्यवहार में जरा सी भी निम्नता सीधे एक बहुत बडे समूह की आस्था पर आघार जैसा होता है । य़ूं भी गरीब समाज के भगवानों को भी जरूरत से ज्यादा अमीर होते जाने की छूट नहीं दी जानी चाहिए । 
.

आशुतोष महाराज के परिवार ने इससे पूर्व पिता को पाने की कोई गंभीर कोशिश की हो दिखाई सुनाई नहीं दिया किंतु एक पुत्र के लिए पिता की देह का सम्मानजनक विसर्जन उसका निर्विवाद प्राकृतिक अधिकार है और इसे किसी भी आडंबरी भावना से दरकिनार नहीं किया जा सकता है । हैरानी होती है जब इस तरह के आडंबरी विवादों को आस्था से जोड कर राष्ट्रीय समाचारों की सुर्खियाम बनाने दिया जाता है । 
.

अब वक्त आ गया है जब आस्था को भी मानवीय कसौटियों पर कसने की पहले कर देनी चाहिए अन्यथा हाल ही में माता वैष्णो देवी ट्रस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में भक्तजनों द्वारा चढाए जा रहे दान में नकली द्रव्य चढाने का ज़िक्र करके स्थिति स्पष्ट कर ही दी है । 

सोमवार, 2 मई 2011

ब्लॉगिग , ब्लॉगर्स , पुरस्कार आयोजन , राजनीतिज्ञ , मीडियाकर्मी .....और कुछ कही अनकही .




अब तक कल के आयोजन पर इतना कुछ कहा सुना पढा जा चुका है कि कोई गुंजाईश बची नहीं है , लेकिन फ़िर भी एक ब्लॉगर होने के नाते , उस कार्यक्रम मे शिरकत करने के नाते और अब तक उस आयोजन में मुझे दिखी सकारात्मक बातों को ( हां बहुत ही अफ़सोस के साथ लिखना पड रहा है कि हिंदी ब्लॉगिंग में नकारात्मकता को जितनी तेज़ी से लोकप्रियता हासिल हो जाती है उसकी आधी गति से भी सकारात्मकता को प्रोत्साहन नहीं मिल पाता ) इस पोस्ट के जरिए यहां रख सकूं । पिछले दिनों मां के बाद अचानक पिताजी के देहावसान ने इतना आहत किया हुआ था कि मन में कोई उत्साह नहीं रह गया था यही कारण था कि कार्यक्रम से एक दिन पहले तक साथी ब्लॉगर्स द्वारा कार्यक्रम की उपस्थिति को लेकर मैं अपना संशय प्रकट करता रहा , किंतु रविंद्र प्रभात जी और अविनाश वाचस्पति जी द्वारा पिछले वर्ष देखे गए स्वपन .जिसे उन्होंने "परिकल्पना " नाम दिया था उसे साकार करने में कैसे उन्होंने दिन रात एक कर दिया था ये बखूबी समझ रहा था । चूंकि राजधानी दिल्ली में रहते हुए और दिनचर्या का एक बहुत बडा हिस्सा ब्लॉगिंग के नाम कर देने के कारण एक स्वाभाविक सी जिम्मेदारी ये भी लग रही थी कि कम से कम उन ब्लॉग मित्रों से जिंदगी में एक बार मिलने का , उन्हें कलेजे से लगा कर अपने भीतर महसूस करने का एक अवसर निश्चित रूप से गंवाने जैसा होगा वहां नहीं पहुंच पाना । सूचना मिल चुकी थी कि छत्तीसगढ से पूरी मंडली , पटना से ब्लॉगर साथियों का समूह इस कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए कूच कर चुके हैं , इसके अलावा जाने किस किस कोने से कौन कौन पहुंच रहा है ये भी उत्सुकता का विषय था । जहां तक कार्यक्रम की रूपरेखा और उसमें शामिल अतिथियों , आयोजन के दौरान प्रस्तावित कार्यक्रमों आदि की रूपरेखा तैयार करने की बात है तो  वो कार्यक्रम मूल रूप से एक प्रकाशन संस्था हिन्दी साहित्य सदन की पचासवीं सालगिरह के स्वर्णिम समारोह के साथ ही साझा किया जाना तय हुआ था । ऐसी क्यों किया गया , किसलिए किया गया ये सब आयोजनकर्ता ही बेहतर बता सकते हैं लेकिन फ़िर भी आसानी से इसे समझा तो जा ही सकता है कि वातानुकूलित हॉल में, बडी बडी हस्तियों , मीडिया , और साहित्य विभूतियों तथा मुख्यमंत्री स्तर के राजनीतिज्ञ द्वारा किसी ऐसे कार्यक्रम में ब्लॉगरों की न सिर्फ़ सहभागिता , बल्कि उनके सम्मान की व्यवस्था करना करवाना ही इसके पीछे उद्देश्य रहा होगा । सवाल उठाने वाले तो आसानी से कह सकते हैं कि जरूरत ही क्या थी . ब्लॉगरों का कार्यक्रम ब्लॉगर्स के बीच भी तो किया जा सकता था और तब फ़िर बडी आसानी से आयोजकों को निशाने पर लिया जाता कि हुंह क्या यही था वो परिकल्पना महोत्सव । खैर इस विषय पर आगे ..तो यही सोच कर मैंने कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करना जरूरी समझा ।


मुख्य द्वार पर ही मुझे ममता की प्रतिमूर्ति सी संगीता स्वरूप जी अपने पतिदेव के साथ मिल गईं , बाल कटे होने के कारण मैं टोपी पहने था और एक बार फ़िर इस कदर अलग था कि शायद आप इसी बात से यकीन करें कि जिससे भी मिला मुझे बार बार अपना परिचय नाम बताकर देना पडा और मेरी बगल में बैठे पाबला जी भी बहुत समय बाद मुझे पहचान पाए । अंदर पहुंचे तो चार बज चुके थे और स्टेज पर जहां रविंद्र जी , अविनाश भाई तैयारी में लगे थे वहीं गिरीश बिल्लौरे जी और पदम सिंह जी वेबकास्टिंग की तैयारी में लगे थे । 

गिरीश बिल्लौरे वेबकास्ट की तैयारी में

स्टेज पर रविंद्र प्रभात जी के साथ जिन्होंने कमान संभाल रखी थी उनका परिचय बाद में हिंदी साहित्य सदन के सचिव श्री गिरिराज शरण अग्रवाल की सुपुत्री गीतिका गोयल के रूप में बाद में हुआ । छत्तीसगढ के ब्लॉगर मित्र अभी नहीं पहुंचे थे , अपनी आदत के मुताबिक मैं घूम घूम कर चेहरे पहचान कर और अंदाज़े से मिल रहा था , ज़ाकिर अली रज़नीश जी , सलिल जी , प्रमोद तांबट जी , गिरीश बिल्लौरे जी , और जाने कितने ही ब्लॉगर मित्रों से मैं पहली बार मिल रहा था । इनके साथ ही जान पहचान वाले मित्र तो मिल ही रहे थे , हां नाम और पहचान जरूर मुझे सबको बतानी पड रही थी जिसका ज़िक्र मैं कर चुका हूं पहले ही ।



आगे की पंक्ति में सम्मानित अतिथि एवं प्रकाशन परिवार के सदस्य और ब्लॉगर मित्र भी बैठे हुए थे । समय बीत रहा था और मुख्य अतिथि रमेश पोखरयाल निशंक नहीं पहुंच सके थे कारण बताया गया कि मौसम और तेज़ हवाओं के कारण विमान के उतरने में विलंब हो रहा था । तब तक औपचारिक अनौपचारिक रूप से मंच संभाले हुए रविंद्र प्रभात जी ने हिंदी ब्लॉगिंग के कुछ पुराधाओं को अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया । सबसे पहले आमंत्रित किए गए श्री श्रीश शर्मा यानि ई पंडित जिन्होंने बडे ही धैर्यपूर्वक हिंदी ब्लॉगिंग के शुरूआती दिनों को याद करते हुए , अक्षरग्राम , नारद जैसे एग्रीगेटरों की चर्चा की और फ़िर ब्लॉग लिखने वाले विभिन्न प्लेटफ़ार्मों की भी जानकारी दी । इसके बाद श्री ज़ाकिर अली रजनीश जी ने विज्ञान को ब्लॉगिंग से जोडने और तस्लीम तथा साईंस ब्लॉगर्स एसोसिएशन की चर्चा करते हुए अपने सहयोगियों को धन्यवाद दिया । इसके बाद चौराहा ब्लॉग के पत्रकार ब्लॉगर और स्वाभिमान टाईम्स की संपादकीय टीम से जुडे हुए श्री चंडीदत्त शुक्ल जी ने बडी बेबाकी से ब्लॉग लेखन पर अपने विचार व्यक्त किए । इसके उपरांत विधि विशेषज्ञ ब्लॉअर श्री दिनेश राय द्विवेदी जी ने अपने विचार रखते हुए बताया कि ब्लॉग लेखन के लिए अलग से कोई कानून नहीं बने हैं और जो नियम कायदे कानून समाज में बोलने लिखने कहने पढने सुनने के बने हुए हैं वही सब ब्लॉग लेखन पर भी लागू होते हैं ।



श्री श्रीश शर्मा "ई पंडित "


श्री दिनेश राय द्विवेदी


अब धीरे धीरे घोषणा हो रही थी कि निशंक पधार चुके हैं ।




उनके आते ही पहले बारी बारी से उनका और उनके साथ उपस्थित अतिथियों का पुष्प एवं माल्यार्पण से स्वागत सत्कार किया गया । मां  सरस्वती की पूजा अर्चना के साथ ही कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत हो चुकी थी समय हो चुका था छ : बजकर बीस मिनट , कार्यक्रम में पहले हिन्दी साहित्य सदन की अब तक की यात्रा, श्री गिरिराज शरण अग्रवाल उनकी पत्नी डा. मीना अग्रवाल दोनों पुत्रिया एवं अन्य सहयोगियों की अथक यात्रा के बारे में पावर प्वाईंट प्रेजेंटेशन के साथ साथ धन्यवाद देने का कार्यक्रम चलता रहा । इसके बाद बारी आई पुस्तकों के लोकार्पण की । 





अब तक पढी लिखी गई सभी रिपोर्टों में भाई बंधुओं ने सब कुछ लिखा सिवाय इसके कि हिंदी ब्लॉगिंग पर एक भारीभरकम और लगभग बहुत से सक्रिय ब्लॉगर के अनुभव , उनके आलेख , और उनके परिचय को समेटे हुए पुस्तक का लोकार्पण किया गया , इसके साथ ही जैसा कि तय था रविंद्र प्रभात जी द्वारा रचित ताकि बचा रहे लोकतंत्र और आदरणीय रश्मि प्रभा जी द्वारा संपादित त्रैमासिक पत्रिका वटवृक्ष का लोकार्पण किया गया ।



 

अब तक लिखी गई तमाम पोस्टों में मैंने कहीं भी इस बेमिसाल और अपने तरह की अनोखी पत्रिका जिसके सारे आलेख , कविताएं , कहानियां सब कुछ विशुद्ध रूप से ब्लॉग पोस्टें ही हैं । शायद ही किसी ने इस बात पर गौर फ़रमाया और ये सोचने की ज़हमत उठाई हो कि जब ये पत्रिका आम पाठक के हाथों में पहुंचेगी और वे लेखक के नाम के साथ उनके यूआरएल पते को पढेंगे तो उत्सुकता से ब्लॉंगिंग की दुनिया में जरूर झांकेगा और क्या ये कम बडी उपलब्धि है , ब्लॉगिंग का विस्तार हो , ब्लॉगिंग का विस्तार हो ..ये कहा तो खूब जाता है हर बार , लेकिन कैसे हो ? समाचार पत्र अगर ब्लॉग पोस्टों को उठाते हैं तो उस पर आपत्ति जबकि खुद नेट पर ही रोज जाने कितने ब्लॉग पोस्टों को चोरी से इधर उधर किया जा रहा है जो कहीं पकड में ही नहीं आती हैं या बहुत दिनों बाद नज़र में आती हैं , ब्लॉगर समाचार पत्रों को धमकाने तक की बात करते हैं लेकिन इस प्रश्न पर कि उन ब्लॉगों का क्या जो समाचार पत्रों की खबर को ही पोस्ट बना बना कर डाल रहे हैं , पर सबकी चुप्पी अखर जाती है खैर ये अलग पोस्ट का विषय है जिसपर कभी खुलकर और कुछ लिखूंगा ।


इसके बाद ब्लॉगर को पुरस्कार देने का कार्यक्रम शुरू हुआ , यहां ये बात भी कहता चलूं कि लगभग डेढ घंटे तक लगातार खडे रह रह कर जिस तरह से वयोवृद्ध साहित्यकार पंडित रामदरस मिश्र , अशोक चक्रधर , गिरीराज शरण अग्रवाल और मुख्यमंत्री निशंक ने एक एक ब्लॉगर को धैर्यपूर्वक पुरस्कार दिए , उनसे हाथा मिला कर शुभकामनाएं दीं |

निर्मला कपिला जी पुरस्कार लेते हुए 


रश्मि प्रभा जी पुरस्कार लेते हुए 


प्रमोद तांबट जी पुरस्कार लेते हुए 

श्री संजीव तिवारी जी पुरस्कार लेते हुए 
संगीता स्वरूप जी पुरस्कार लेते हुए 

रिजवाना कश्यम "शमा " जी पुरस्कार लेते हुए


 उस जज़्बे का जिक्र करना भी किसी को मुनासिब नहीं लगा , और शायद लगता भी कैसे खासकर उन्हें जो उस हॉल के बाहर खडे होकर कहानियां तलाश रहे थे , कार्यक्रम की कमियां ढूंढ रहे थे और उन साहित्यकारों से मिल रहे थे जो जाने कब से हिन्दी भवन के बाहर बैठे हैं मगर उनकी भी नज़र तभी पडी उनपर । साथे ही मीडिया मित्र मंडली से बाहर बाहर ही चर्चा करके रिपोर्ट लगाने के लिए या फ़िर कार्टून बना कर " असली बात " पहुंचाने में तत्परता से लगे थे । लेकिन अपनी उस रिपोर्ट को लगाते समय वे ये बात भी भूल गए कि रविंद्र प्रभात जी ने कार्यक्रम की शुरूआत मे ही भडास का जिक्र दुनिया के सबसे बडे हिंदी सामूहिक ब्लॉग के रूप में ज़िक्र किया था और पूरे फ़ख्र के साथ किया था , खैर । पुरस्कार वितरण करते करते इतना समय हो गया था कि सब या तो बाहर का रुख करने लगे थे या फ़िर किसी बहाने से टहलने लगे थे । इसके बाद मंच संचालिका ने अतिथियों से एक एक करके आग्रह किया कि वे आकर कुछ कहें । सबने अपने अपने विचार अपने अनुरूप रखे । यहां भी एक अच्छी बात ये देखने कि मिली कि ब्लॉगिंग और ब्लॉगर्स का ज़िक्र सबने किया , जिसका जितना ज्ञान था जिसका जितना परिचय था उसीके अनुरूप सबने इस बात को कहा । इसके उपरांत अल्पाहार के लिए सब फ़िर बाहर निकले और मैं तो निकल ही आया और घर के लिए चल दिया ।


ये तो थी एक ब्लॉगर की आंखों देखी रपट । अब कुछ जरूरी गैरजरूरी बातें । पिछले एक आध आयोजनों को देखते हुए ये अनुभव हो गया है कि अव्वल तो ब्लॉगर बैठक , मीट , सम्मेलन को बुलाए जाने का ख्याल जिनके भी मन में आ रहा हो वे फ़ौरन उसे चूल्हे में झोंक दें अन्यथा आपका श्रम , आपका धन , आपकी निष्ठा और सब कुछ सिर्फ़ एक पोस्ट से ही चौराहे पर लटका दिया जा सकता है और वैसे भी इन आयोजनों से कौन सा नोबेल पुरस्कार दिया जाना होता है । इसके बावजूद भी यदि विचार मन में कुलबुलाए ही तो फ़िर उसे विशुद्ध रूप से सिर्फ़ ब्लॉगर्स और ब्लॉगिंग के इर्द गिर्द ही रहना चाहिए । इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनने में कोई भूल हुई हो या न हुई हो , लेकिन तय कार्यक्रम के अनुसार दूसरा भाग जो कि मीडिया विमर्श पर था उसे स्थगित कर दिया जाना और उससे भी ज्यादा मुख्य अतिथि तक को उपेक्षित सा महसूस हो जाना नि: संदेह ही दुखद और अफ़सोसजनक था जो कि नहीं होना चाहिए था कदापि नहीं । अगर किन्हीं कारणों से ऐसा हो रहा था तो कम से कम मुख्य अतिथि को विश्वास में लिया जाना चाहिए था और उन्हें पूरी स्थिति से अवगत कराना चाहिए था । यहां साथी ब्लॉगर खुशदीप सहगल जी की विवशता और क्षुब्ध होने का कारण समझ में आता है कि जब मुख्य अतिथि उनके ही कहने पर आए थे और उनकी उपेक्षित सी भावना दिख रही हो तो मेजबान के रूप में उन्हें कैसा लगा होगा । इसलिए बेहतर होता कि पहले ही देर हो चुके कार्यक्रम में बदलाव की सूचना और घोषणा जल्दी से जल्दी न सिर्फ़ मंच से बल्कि उन अतिथियों और मुख्य अतिथि को देनी चाहिए थी , वे कार्यक्रम में रुके रहते या चले जाते , आते या नहीं आते ये उनका निर्णय होता । अब बात एक मुख्यमंत्री या कहें कि राजनीतिज्ञ के हाथों पुरस्कृत होने के विरोध की । क्या निशंक अचानक ही बिना बताए वहा टपक पडे थे ? क्या सचमुच ही किसी को नहीं पता था कि वे मुख्य अतिथि होने वाले हैं कार्यक्रम के , यदि पुरस्कारों को उनके हाथों से नहीं लिए जाने के पीछे हजारों तर्क दिए जा सकते हैं तो फ़िर किसी और के हाथों से लिए जाने के विरोध में फ़िर से हज़ारों तर्क दिए जा सकते हैं । खुद अमिताभ बच्चन भी आकर दें तो बडे ही आराम से विरोध ये कह कर किया जा सकता है कि हुंह ये कौन से हिंदी भाषा के ब्लॉगर हैं ?


हिंदी ब्लॉगिंग में कोई भी विवाद दो चार दिनों से ज्यादा नहीं टिकता , और इसे टिकना भी नहीं चाहिए । सबको पता है कि हम यहां सिर्फ़्र पढने लिखने आए हैं । अन्य सभी बातें , लोगों ने तो तरह तरह के कयास भी इस तरह के लगाए हैं कि पुरस्कारों के चयन में धांधलेबाजी हुई है , सेटिंग की गई है और जाने क्या क्या मानो पुरस्कार राशि करोड डेढ करोड हो या फ़िर कि इन पुरस्कारों के विजेताओं को रातोंरात पूरा विश्व पहचानने लगेगा कि सिर्फ़ यही हैं हिदी ब्लॉगिंग के पुरोधा । नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है इसलिए मुगालते में न रहें और ऐसा भी कतई न कहें कि बिना देखे परखे पुरस्कार बांट दिए गए । सबसे जरूरी बात ...किसी को सम्मानित करना कम से कम किसी को अपमानित करने से तो कहीं बेहतर है । चलिए इस बात का यहीं पटाक्षेप करता हूं , वर्ष २०११ की ब्लॉगिंग गाथा को जब भी याद किया जाएगा तो अलग अलग कारणों से ही सही इस समारोह को और इससे जुडी सभी घटनाओं पोस्टों और कही सुनी गई बातों को भी ध्यान में रखा जाएगा । 


बुधवार, 15 जुलाई 2009

जब भी हम पगलायेंगे, इक पोस्ट लिख कर जायेंगे...

जब मैं कैफे में बैठ कर सिर्फ एक घंटे में ब्लॉग्गिंग किया करता था तो स्वाभाविक रूप से उतनी गहराई से ब्लॉग्गिंग का उतार चाढावों को भांप नहीं पाता था.बस सिमित समय में एक सिमित सी दुनिया बनी हुई थी, लिख दिए, अगले दिन tippnniyaan देखी , टीपने वालों के प्रति उत्सुकता हुई तो उनके ब्लॉग पर पहुंचे और पढ़ कर टीप दिया....बस हो गयी ब्लॉग्गिंग.

अभी ज्यादा समय नहीं बीता है कम्प्यूटर लिए..मगर निस्संदेह उतना तो मैं समझ ही चुका हूँ की यहाँ सब कुछ वैसा नहीं चल रहा है जैसा की हिंदी ब्लॉग्गिंग के बारे में पढ़ा और सुना था....नहीं मैं नकारात्मक रूप से नहीं सोच और कह रहा हूँ. बल्कि ये तो एक सुखद तथ्य है की जब ब्लॉग्गिंग शुरू की थी तब से अब तक इसके आकार और स्वरुप में बहुत बड़ा अंतर आ गया है.....यदि किसी चीज़ में अंतर नहीं आया है तो वो है....ब्लॉग्गिंग में नियमित रूप से चलने वाले विवाद....मैंने इन दिनों में जो अनुभव किया है और उससे जो भी निष्कर्ष निकाले हैं ..उसे आपके सामने रख रहा हूँ....नहीं नहीं कोई मकसद नहीं है मेरा ..बस उसे बांटने भर की कोशिश है .

ब्लॉगजगत में कुछ ब्लोग्गेर्स (महिला/पुरुष ) जानबूझकर अपनी पोस्टों में ....विवादित मुद्दों को .....या कहूँ की अनावश्यक रूप से किसी भी मुद्दे को विवादित करके लिखते हैं ...भाषा और शैली ...किसी ख़ास मकसद से उकसाने वाली होती है ....सबसे दुःख की बात ये है की ऐसी पोस्टें बहस के लिए नहीं.....बल्कि बत्कुततौअल्ल के लिए ही लिखी जाती हैं.....और यही कारण होता है की ज्वलंत विषयों पर...अक्सर ये लेखक/लेखिकाएं या तो कुछ लिखते नहीं,,या फिर ..ये लिख कर काम ख़त्म कर लेते हैं की...फलाना जगह, फलाना समाचारपत्र में ऐसा, वैसा छ्पा है....

इनकी ऐसी कमाल की पोस्टों में हमारे जैसे घुसेडू टाईप के घसीटू ब्लॉगर घुस जाते हैं...आव देखते हैं न ताव...बघार देते हैं अपना भाव...अजी तिप्प्न्नियों के रूप में ....और कई बार तो किसी की पोस्ट पर आयी किसी टिप्प्न्नी जो किसी ऊपर वर्णित लेखक के भाई/बहन .,,या फिर स्वयं लेखक ने ही लिख मारी होती है ...उसे अपने दिल पर लगा कर दे दाना दान टीप डालते हैं......इससे भी मन न भरा ..तो लिख डाली एक पोस्ट....बस ये विवाद जो शुरू होता है ...तो जंगल की आग की तरह फैलता चला जाता है......एक बार बहुत पहले सुना था की कई बार नकारात्मक स्थितियां ...बहुत सी अच्छी बातों को जन्म देती हैं...मुझे भी इन विवादों में ऐसी अच्छी बातों की प्रतीक्षा रहती थी....मगर लानत भेजिए जी.....यहाँ तो दो मिनट में बात इतनी भयानाक टाईप हो जाती है.....खुल्लम खुल्ला गाली गलौज.........और पता नहीं क्या क्या. ऐसा बहुत ही कम होता है ..या फिर की शायद मैंने देखा है की ...इन विवादों का कोई सार्थक अंत हुआ हो.......दुसरे की क्या कहूँ ,मैं खुद भुक्तभोगी हूँ........अभी पिछले दिनों ही भुगत चुका हूँ...खूब प्यार से......अच्छी अच्छी तिप्प्न्नियों से अपनी बात रखी.......न हुआ तो फिर जूता भीगा.......टाईप की रिक्वेस्ट भी कर ली.....थोड़े दिनों तक लगा ....चलो कुछ तो असर हुआ ही है न...तो कोई बात नहीं इतना विवाद ही सही....हो सकता है अब सब ठीक ही चले....मगर ये क्या.....वे लोग फिर से वही सब करने लगे...अब जलाओ अपना खून...उसमें स्याही डुबो डुबो कर.

मुझे तो लगता है की यदि आप अपनी रचनात्मकता को सचमुच ही बचाए रखना चाहते हैं, तो बजाय इसके की उसे इन विवादों में खर्च करने के ...अच्छी अच्छी बातें लिखने के, दूसरों की पोस्टें पढने के लिए, उनपर उत्साहवर्द्धक तिप्प्न्नियाँ करने के लिए व्यव्य की जाएँ....तो आपके मन को भी सुकून मिलेगा....हालांकि इससे भी उन पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला .....आप गांधी जी बनें या सुभाष , चंद्रशेखर वाला रास्ता पकडें.......अंग्रेजों के दुश्मन तो हैं ही..............तो फिर अपने लिए सही रास्ते का चुनाव करके आगे बढें....

मेरा एक दोस्त ब्लॉग्गिंग के लिए अक्सर कुछ पंक्तियाँ गुनगुनाता है

जब भी हम पगलायेंगे,
इक पोस्ट लिख कर जायेंगे,
जितना तुम तिलमिलाओगे ,
हम उतना लिखते जायेंगे,
फालतू में जो उकसाया तो,
आईना तुम्हें दिखाएँगे,
यूँ ही ना माने तो,
तुम्हें इक अलग राह दिखाएँगे,
जिस दिन मत्था घूम गया,
सीधे घर तुम्हारे आयेंगे,
या तुम कर देना इलाज हमारा,
या हम तुम्हारा कर आयेंगे,
जिस दिन सटका दिमाग हमारा,
तुम्हें दुनिया के सामने ले आयेंगे....
न तुम्हारी ढपली का राग सुनेंगे,
बोल्ड
न अपना ढोल बजायेंगे,
हम भी छोड़ देंगे ब्लॉग्गिंग,
तुमसे भी छुडायेंगे ,
जब भी पगलायेंगे,
इक पोस्ट लिख कर जायेंगे .


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...