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गुरुवार, 30 अक्तूबर 2008

भैया नहीं तो दूजा कौन ( सावधान इस पोस्ट का भैयादूज से कोई सम्बन्ध नहीं है )

भैया नहीं तो दूजा कौन :- आज निश्चय ही मनसे वालों के लिए गर्व का दिन रहा होगा, भाई एक एक कर वे भैया लोगों से निपटे, या कहूँ की निपटाते जा रहे हैं, पहले धनतेरस को एक को गिराया, फ़िर दिवाली की रात भी एक भैया को पर जम कर लात घूंसों के पटाखे बजाये , फ़िर अभी भैया दूज, उसके बाद छठ ,अभी तो न जाने कितने मौके और मिलने वाले हैं,मनसे तो सबकुछ मन और तन से करने के लिए, पता नहीं अभी तक भैया दूज का कोई सदुपयोग किया की नहीं उन्होंने। देर सवेर पता चल ही जायेगे, खैर।

जब बात किसी क्षेत्र विशेष की होता है तो बाआहार वालों पर जो आरोप लगता है या की पुरजोर तरीके से लगाया जाता है तो वो ये होता है की उनकी वजह से ही स्थानीय लोगों का हक़ मरता है, बिल्कुल एक दृष्टिकोण से देखें तो ये सही भी लगता है, मगर इस सन्दर्भ में मेरे सिर्फ़ दो तर्क हैं, क्या जो व्यवहार आज गरीब मजदूरों, क्षात्रों, के साथ खुलमखुल्ला किया जा रहा ही वो मनसे हो या उससे भी बिगड़ी हुई कोई संस्था, किस समर्थ व्यक्ति के साथ कर सकती है, केंद्रीय मंतीमंडल में बहुत से भैया जी लोग मंत्री हैं, अजी उन्हें भी कुछ गालियाँ, थप्पड़, का आशीर्वाद दीजिये न, आपके जितने भी सरकारी कारायालय हैं, वहां भी आपको थोक के भाव आपके भइया मिल जायेंगे, जरा उनके साथ भी ये हिम्मत दिखाइये न, ।
दूसरी बात कौन सा हक़ मर रहा है, रिक्शा चल्नाने का, सब्जी बेज्चने का, पान सुपाड़ी के खोखे लगाने का, मजदूरी करने का, क्या वे तमाम लोग जो अपने अधिकार और रोजगार के मरने की बात कर रहे हैं बता सकते हैं की कितने लोग ये ऊपर गिनाये गए प्रतिष्ठित काम और इन जैसे ही काम करने को तैयार हैं, मरे जा रहे हैं, और भैया लोगों की वजह से बेचारों को वो काम करने का मौका नहीं मिल रहा है, सोचने वाली बात है...
तो सवाल वही की भैया नहीं तो दूजा कौन ?

हड़ताल अच्छी भी हो सकती है :- मैंने जब से होश सम्भाला है , मेरी बदकिस्मती की जब भी किसी हड़ताल के बारे में पढा, सूना, देखा, भुगता , अनुभव बुरा ही रहा, कुल मिला कर जहाँ में एक ही बात आ गयी की , आम आदमी का नुक्सान। बिजली, पाने, वेतन। आरक्षण, नौकरी, पेंसन, पता नहीं किस किस बात के लिए हड़ताल, और बंद होते रहते हैं, और जाहिर सी बात है की हमें खूब परेशान भी करते हैं। लेकिन मुझे हाल ही में एक ऐसी हड़ताल के बारे में पता चल की मन खुश हो गया, हडताल और हड़तालियों के बारे में जान कर।

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में हड़ताल हुई, और पुरजोर हुई, मांग थी की वहां की सी टी स्कैन मशीन जो कई महीनों या शायद सालों से ख़राब थी को बदला जाए और नया लाया जाए, मगर हैरत की बात ये थी की इसके लिए हड़ताल पर जाने वाले वहां के रेजिडेंट डॉक्टर ही थे, जिन्होंने थक हार ख़ुद ही हड़ताल पर जाने का फैसला किए, परिणाम सकारात्मक निकला और त्वरित भी।

पुलिस , सिर्फ़ पुलिस होती है :- यूँ तो पुलिस से सम्बंधित बहुत सी बातें , रोज ही पढने , सुनने और देखने को मिल जाती हैं, कुछ तो प्रत्यक्ष भी , इसमें से अधिकांशतः कैसी होती हैं बताने की जरूरत नहीं हैं शायद। मगर जब भी मैं कुछ आगे सोचता हूँ, एक बात मेरे दिमाग में घूमती हैं , की पुलिस आपको वैसी ही मिलती है जैसे आप ख़ुद हैं, जैसा ये समाज है ,क्योंकि पुलिस भी उसी समाज में से आती है। पिछले दिनों दिल्ली पुलिस में भारती परिक्षा देने आए लगभग पचास हजार नव युवकों ने सरे आम दिन दहाड़े सड़कों पर भय और उदंडता का जो नंगा नाच किया उनसे तो साबित कर दिया की यदि इन्हइन में से हमारे रक्षक आयेंगे तो फ़िर तो भगवान् ही मालिक, दूसरे घटना मुंबई पुलिस की है ही, जिसने राज साहब के सआठ और बेचारे राज, रोहित राज के साथ क्या किया राज की बात है................

चलिए आज इतना ही, फ़िर मिलते हैं.............

2 टिप्‍पणियां:

  1. चलो, पढ़ लिया.अच्छा विचारा है.

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  2. ajee apne padh liya to hamara likhna bhee safal raha, warna to kai log raj kee baat nahin padh sun rahe hain.

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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