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मंगलवार, 21 अक्तूबर 2008

ब्लॉग्गिंग के कुछ आजमाए नुस्खे - भाग दो

मैंने to सोचा था की , अपनी एक ही पोस्ट में आप सबको ब्लॉग्गिंग के बारे में जो भी बातें जानी समझी हैं बता दूंगा, मगर फ़िर लगा की ये थोडा लंबा हो जायेगा और शायद बोरिंग भी सो दो भागों में बाँट दिया, लीजिये कल से आगे

लेखन का विषय :- वैसे तो यहाँ पर सभी ने अपने अपने पसंद और महारत के हिसाब से अपनी लेखनी का विषय चुना हुआ है और कईयों ने तो अपने चिट्ठों को नाम भी उसी के अनुरूप दिया हुआ है। ये ठीक भी है, चिट्ठे के नाम से ही पता चल जाता है की अमुक विषय पर आधारित ही होगा। मगर चूँकि अभी हिन्दी ब्लोग्जगर संख्या के हिसाब से इतना ज्यादा बड़ा नहीं है इसलिए स्वाभाविक रूप से किसी न किसी ट्रेंड में ढल कर उसी के अनुसार ही चलता चला जाता है। सबसे प्रचलित प्रवृत्ति होती है किसी भी सामयिक विषय पर लिखना, सबसे अच्छी बात ये है की देखने में ये आया है की किसी भी ज्वलंत विषय पर ब्लॉग्गिंग में सामयिक लेखन , जो कि अक्सर बहस में बदल जाता है वो मडिया में उससे सम्बंधित किसी भी तर्क वितर्क से ज्यादा निष्पक्ष और ज्यादा स्तरहीन होता है और ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि ब्लॉगजगत में विचारों की स्वतन्त्रता है । मेरे ख्याल से किसी भी नए ब्लॉगर के लिए ये एक आसान विकल्प होता है कि उस सामयिक विषय पर चल रही बहस का हिस्सा बन जाए, अपने विचार और तर्क रखे। इनसे अलग जो लोग विशिष्ट विषयों, संगीत, क़ानून, स्वास्थय , आदि पर लिख रहे हैं उनका तो कहना ही क्या, मैं तो लवली जी के सापों वाले ब्लॉग को देख कर हैरान रह गया, ये तो बिल्कुल पश्चिमी देशों की खोजी जानकारी वाले चैनेल जैसी थी।

तिप्प्न्नियाँ : - ये तो एक ऐसा विषय है कि जिस पर न जाने कितने ब्लॉगर कितनी ही बार क्या क्या कह और लिख चुके हैं, ख़ुद में भी कई बार काफी कुछ लिख चुका हूँ। पिछले दिनों भी शास्त्री जी से किसी ने तिप्प्न्नियों को लेकर ही कुछ सवाल किए थे जिसका उत्तर उन्होंने बड़े ही वैज्ञानिक और तार्किक रूप से दिया था। दरअसल हर ब्लॉगर चाहता है कि जब वो कुछ लिखे तो सब उसे पढ़ें और बताएं कि कैसा लगा, खासकर नया नया कोई यहाँ आया तो तरसता रहता है तिप्प्न्नियों के लिए, मैंने पहले भी सुझाव दिया था कि कुछ लोगों कि ऐसी टीम बनाए जाए जो कि नए ब्लोग्गेर्स को न सिर्फ़ प्रोत्साहित करने के लिए टिप्पणियाँ करें बल्कि उनका मार्ग दर्शन भी करें, वैसे ये व्यवस्था यदि संकलकों की तरफ़ से हो पाती तो क्या बात थी। यहाँ यदि उड़नतश्तरी जी, महेंद्र भाई, पी दी जी, ममता जी, शास्त्री जी, अलोक भाई आदि की चर्चा न करूँ तो ग़लत होगा , सच तो ये है कि ब्लॉगजगत के नए ब्लॉगर और पुराने भी इनकी तिप्प्न्नियों के बगैर तो अधूरे हैं। एक बात तिप्प्न्नियों के बारे में हमेशा उठती है कि क्या ये ठीक है कि हम किसी को टिप्प्न्नी करें तो बदले में वो टिप्प्न्नी करे, बल्कि जिसे जो अच्छा लगा वो ख़ुद ही टिप्प्न्नी करे, मेरे ख्याल से तो ये एक परिवार है , जहाँ सब कुछ परस्पर ही होता है । ये ठीक है कि जब आप उस स्थान पर पहुँच जायेंगे जब लोग आपकी लेखनी का इंतज़ार करेंगे तो शायद आप कभी कभी टिप्प्न्नी न भी करें तो चलेगा, मगर महाराज कसम खा लेना कि टिप्प्न्नी नहीं ही करनी है तो फ़िर तो ये शायद ग़लत हा। एक बात और कई लोगों कि या बहुतों कि ये आदत होती है कि टिप्प्न्नी पढ़ कर उसके बाद कोई प्रतिक्रया नहीं देते, ऐसा ना करें। हो सकता कि कोई दोबारा जाकर अपनी बात पर आपकी बात पढ़ना चाहता हो। और हाँ अनाम जी की टिप्प्न्नी का कभी बुरा न माने वे तो बेचारे शायद मनसे ( अजी वही मुंबई वाली ) के सदस्य लगते हैं।

पसंद सूची :- अपने ब्लॉग पर अपने पसंद के ब्लोग्गेर्स की उनके चिट्ठे की सूची जरूर बनाएं , जरूरी नहीं कि ये संख्या में कितनी हो या कि एक बार बना दी तो बना दी, उसे अपनी पसंद के हिसाब से बदल सकते हैं। मेरे कहने का मतलब ये है कि ये एक नेट वर्क की तरह का काम करता है, हो सकता है कि किसी को आपका ब्लॉग भी पसंद आ जाए और वो उसे अपनी पसंद सूची में दाल दे ।

विभिन्न विषयों में लेखन :- ये हिन्दी ब्लॉग जगत के लिए अच्छी बात है कि इसमें न सिर्फ़ हिन्दी में बल्कि लोग अपनी मातरि भाषा में भी लिख रहे हैं, विशेह्स्कर भोजपुरी और मैथिलि के तो कई सारे चिट्ठे लिखे जा रहे हैं, मगर न जाने क्यों उनमें भी आपस में कोई संपर्क नहीं है, या शायद किसी वजह से रखना नहीं चाहते, यदि ऐसा है तो ग़लत है, मैं पहले भी कह रहा हूँ कि दायारा बनाने से आपका और इस ब्लॉगजगत का दोनों का ही फायदा है, और हाँ एक चिटठा कम से कम हिन्दी में जरूर ही बन्याएं, आख़िर जिस लिपि और भाषा का प्रयोग आप कर रहे हैं उसके प्रति आपका भी तो कुछ फ़र्ज़ बँटा है ।

सामूहिक ब्लॉग का न्योता झट से स्वीकार करें : - वैसे तो ये कम ही होता है, कम से कम मुझे तो आज तक किसी ने ये मौका नहीं दिया, लेकिन यदि आपको कोई देता है तो जरूर स्वीकार करें, यकीन मानिए इससे आपका मंच और मजबूत होगा।

तो फ़िर अभी के लिए इतना ही, आशा है कि आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे .

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपने सही सुझाव दिए है लेकिन टिप्पणीकारों का दल बनाने की बजाय हम सभी नियम बना ले की रोजाना कम से कम १० चिट्ठों पर टिप्पणी जरुर करेंगे | मेने तो कई दिनों से यह कार्य शुरू भी कर रखा है इससे सबसे बड़ा फायदा तो चिट्ठे पढने से मिलने वाला ज्ञान है |

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  2. vivek bahi, aapne bade hee pate kee baat kahee hai, mujhe yakeen hai ki der sawer sabko ye aadat padne hee walee hai.

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  3. अच्छी सीख-बहुत अच्छा आलेख एवं सलाह!! बधाई!

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  4. अजय जी ,
    आपकी सलाहें नेक हैं । लेकिन उअनका क्या जो एकला चालो रे के सिद्धांत पर अंगद के पैर की तरह जमे रहना चाहते हैं । मैं तो यही मानती हूं कि पूरी ईमान्दारी और शिद्दत के साथ अपना काम करते रहो । रही बात पाठकों की ,तो बात में यदि दमखम होगा और अंदाज़े बयां निराला होगा ्फ़िर तो कच्चे धागे से सरकार [पाठक] खिंचे आएंगे । क्या ख्याल है आपका ....

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  5. राम प्रसाद ढीमर23 फ़रवरी 2009 को 10:07 am

    अजय जी' आपके विचारों का मै समर्थन करता हूँ. बहुत बदिया सुझाव है.

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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