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सोमवार, 3 दिसंबर 2007

काके भैया नहीं रहे

दोपहर ढाई बजे अचानक फ़ोन बजा, " हेलो , सुन रहे हो काके भैया नहीं रहे ।"

क्या बकवास कर रही हो , मैंने अपनी पत्नी से यही कहा। बात इतनी अप्र्ताषित थी कि मेरे मुँह से यही निकला।

काके भैया , नहीं कोई बहुत बड़ी हस्ती नहीं थे, ना ही सीधे तौर पर हमारा कोई संबंध था। दरअसल वो मेरे साडू साहब के छोटे भाए साहब थे । हमसे उनका वाकिफाना कुछ इस लिए था क्योंकि हमारे सभी विशेष पलों ,खास समारोहों को उन्होने ही सहेज कर हमें सौंप दिया था। उनका फोटोग्राफी /विदेओग्रफी का काम था।

मगर मेरी हैरानी का कारण कुछ और था, ये कैसे हो सकता था, अभी पिछले शनिवार को तो उनके पिताजी का निधन हुआ था। अभी तो उनकी कीरिया भी नहीं हो पायी थी और फिर अभी कल ही तो उनसे मुलाक़ात हुई थी , पैरों का प्लास्टर उतर गया था , और टांका भी काट दिया था डाक्टर ने और कहा था कि अब हलकी हलकी कसरत करवाते रहे पैरों कि। दरअसल पिताजी कि बीमारी के समय ही उनके लिए दवाई लाते समय उनका एक्सीडेंट हो गया था, मगर सब कुछ तो ठीक हो गया था। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया।

घर पहुंचा तो पता चला कि हार्ट अटैक हुआ था , इससे पहले कि कोई कुछ समझ या कर पाटा सब कुछ ख़त्म हो चुका था। डॉक्टरों का कहना था कि हॉस्पिटल लाने से पहले ही वे जा चुके थे।

उफ़, मगर उन्हें मरने का अभी कोई हक नहीं था , घर की रीढ़ की हड्डी टूट गयी। किसी ने कहा कि पिताजी को अन्तिम समय में पाकर भी वे उनके लिए कुछ ना कर पाए यहाँ तक कि शमशान घात तक भी उन्हें बड़ी मुश्किल से गाडी में ले जाया जा सका था , इस बात को वे दिल से लगा बैठे थे । मगर के पिटा के प्रति इतनी आसक्ति ने उनको इतना परेशान कर दिया कि वे अपने जुद्वान बच्चों को अनाथ छोड़ चले गए।

उनकी मौत ने सचमुच हिला कर रख दिया। मैं इश्वर से सिर्फ यही कह रहा था कि हे इश्वर यदि यूं ही अकाल मौत देनी है तो कम से कम उसे आने वाली मौत का अहसास तो दे दिया कर और इतना वक़्त भी कि वो कम से कम वो काम कर ले जो उसके अपनों को थोडा सुकून दे सकें,
मगर इश्वर मेरी सुनता कहाँ है। किसी अपने का जाना वो भी इस तरह , बहुत दर्द देता है।

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