रविवार, 8 मई 2011

ब्लॉगिंग ,ब्लॉगर सूक्त वाक्य







यूं तो आप अभी सिर्फ़ लादेन से जुडी खबरों पर विषयों पर और उसकी दाढी मूंछ न काट कटा पाने पर भी लिख सकते हैं अगले एक महीने तक ..( सिंपल है जी , जब लादेन से जुडी बातें खत्म हो तो उसके बच्चों , पोते पोतियों सब पर भिड जाइए ) लेकिन चूंकि पिछले दिनों हिंदी ब्लॉग जगत के अति संवेदनशील घोषित किए जाए चुके भूभाग पर फ़िर से कुछ ब्लॉग हलचलें देखी गई और ब्लॉगटर ( ये रिक्टर पैमाने का एक गूगलीय वर्जन है ) पे इसकी तीव्रता ..अरे अभी आंकी कहां गई है अभी तो लोग नापिए रहे हैं ..अलग अलग थर्मामीटर से ..तो इसलिए ये हमारा  फ़र्ज़ बनता है ...जब उनका बन सकता है जो इस हलचल से हुए नुकसान की .गहराई .वो......दूर से माप रहे थे तो फ़िर हमारा तो जैसे धर्म कर्म मर्म चर्म सब कुछ बनता था इससे रिलेटेड ( देखिए इसके लिए तो अब खास टराई भी नहीं करना होता ..बस कौमा क्वेश्चन मार्क भी लगा देंगे तो भाई लोग खुद रिलेट कर लेंगे ) कुछ लिखने पढने का । सो पढ तो हमने पोस्ट से लेकर अखबार की कतरन तक सब डाली , लेकिन अपना कर्मबोध और जोर मारने लगा तो सोचा कि ये पोस्ट लिखनी भी निहायत ही जरूरी है ,इसलिए लिख ही डाली ।


तो पहला सूक्त नियम ये है कि आप हिंदी ब्लॉगिंग को समय समय पर गरियाते रहें , उसे कोसते रहें , माखौल उडाते रहें , खिल्ली उडाते रहें , और इस काम में आपका सहयोग भी कुछ साहित्यकार , कुछ पत्रकार , कुछ समाचार आदि भरपूर साथ निभाएंगे , और कमाल कि बात ये है कि इसके लिए ये कतई जरूरी नहीं है कि आपने ब्लॉग लेखन कब शुरू किया , पिछली दस पोस्टें भी पढीं हों या न हों ..आप तो शुरूआत ही एक गरियायमान पोस्ट से कर सकते हैं और उससे तो अपके हिट होने के चांसेज़ उसी तरह से हो जाते हैं जैसे ऋतिक रोशन की कहो न प्यार है से एंट्री सुपर डुपर हिट हुई थी । अरे नहीं नहीं, ये जिस थाली में खाया  उसी में छेद किया वाली फ़ीलींग मन में मत रखिए जी , हम तो कहते हैं कि ब्लॉगिंग में उतरे हैं तो मन ही नहीं रखा करिए , बस ढेला उठाया और दन्न से उछाल दिया , देखा कित्ता आसान है । और इसके लिए आप बहाने भी आराम से ढूंढ सकते हैं , बल्कि ये कहना चाहिए कि ..आपका मन होना चाहिए बखिया उधेडने का , बहाना सब आपको खुद तलाश लेगा ।


दूसरा नियम , अगर आप ब्लॉगिंग को मेंटल टाईप से चाहने लगे हों तो फ़िर आपको कम से कम एक बार ब्लॉग बैठक , ब्लॉगर मीट , ब्लॉगर सम्मेलन जरूर करवाना चाहिए , देखिए इससे क्या होगा कि आपके मन में फ़ौरन ही ब्लॉग  अनुरक्ति और ब्लॉगर विरक्ति के भाव उत्पन्न होंगे । और हां एक बात और चाहे आप ब्लॉगर मीट की पूरी तैयारी योजना आयोग को भी सौंप दें और मेट्रो परियोजना के कर्तधर्ता  श्रीधरन जी खुद भी इसे सफ़ल करने पर तुल जाएं तो मजाल है कि उसकी गारंटी कोई ले , सिर्फ़ एक पोस्ट . एक पोस्ट ...हां आगे आपने बिल्कुल ठीक सोचा ..लेकिन फ़िर भी आपको एक बार तो करना ही चाहिए , । चलिए ठीक है इतना भी कंपलसरी नहीं है , लेकिन आप किसी सम्मेलन में शामिल होकर वहां आराम से दांति चियार चियार के दोस्तों के साथ सब बात मुलाकात ,( उनसे भी जिनकी आपसे मुक्कालात तक हुई हो )करने के बाद घर आकर उसका पोस्टमार्टम करने की अपेक्षा तो रहती ही है ,और इस अपेक्षा पर आपको खरा उतरना ही चाहिए , । यकीन जानिए कि इससे आपको भी फ़ायदा पहुंचने की पूरी गुंजाईश रहती है ।


देखिए जी ब्लॉगजगत का एक बहुत ही बेतुका , बेबुनियादी , बे ..हां मतलब अबे टाईप का चलन हो गया है , कोई कितना भी बडा , महान , ग्रेट स्टेटस वाला ब्लॉगर ब्लॉगिंग करने मैदान में उतरता तो ये नहीं कि उसका स्वागत गाजे बाजे से किया जाए , ये नहीं कि उसके पाव भर की पोस्ट पर क्विंटल भर की टिप्पणियां करे और पोस्टों से ये साबित कर दे कि फ़लां बाबू ने हिंदी में ब्लॉगिंग में खासकर हिंदी में ब्लॉगिंग करने का निर्णय़ लेकर मानो हिंदी ब्लॉगिंग पर उपकार किया है ..अरे कुछ भी नहीं करते हैं भाई लोग जी ..यहां तक कि नीतिश कुमार का ब्लॉग , मनोज वाजपेयी का ब्लॉग भी बे भाव के ही साईड लगा रहता है । माने आप कितना भी बडे ओहदे , साईज़ , शेप वाले हों ब्लॉगिंग के मैदान मे तो भईया आब निरे ब्लॉगर ही माने जाने जाएंगे तो ई भी गांठ बांध ही लीजीए ..
ओह सारे सूक्त वचन अब एक ही बार में पढिएगा क्या ...अरे रुकिए महाराज रुकिए अभी ..आगे की कथा ज़ारी रहेगी ..अरे हां इस ब्लॉग पर आज एक पोस्ट आएगी  कुछ ब्लॉगर्स को अपने ब्लॉग के साथ बातचीत करते हुए सुना गया है देखिएगा किसने क्या कहा सुना ...शाम तक मिलता हूं फ़िर


सोमवार, 2 मई 2011

ब्लॉगिग , ब्लॉगर्स , पुरस्कार आयोजन , राजनीतिज्ञ , मीडियाकर्मी .....और कुछ कही अनकही .




अब तक कल के आयोजन पर इतना कुछ कहा सुना पढा जा चुका है कि कोई गुंजाईश बची नहीं है , लेकिन फ़िर भी एक ब्लॉगर होने के नाते , उस कार्यक्रम मे शिरकत करने के नाते और अब तक उस आयोजन में मुझे दिखी सकारात्मक बातों को ( हां बहुत ही अफ़सोस के साथ लिखना पड रहा है कि हिंदी ब्लॉगिंग में नकारात्मकता को जितनी तेज़ी से लोकप्रियता हासिल हो जाती है उसकी आधी गति से भी सकारात्मकता को प्रोत्साहन नहीं मिल पाता ) इस पोस्ट के जरिए यहां रख सकूं । पिछले दिनों मां के बाद अचानक पिताजी के देहावसान ने इतना आहत किया हुआ था कि मन में कोई उत्साह नहीं रह गया था यही कारण था कि कार्यक्रम से एक दिन पहले तक साथी ब्लॉगर्स द्वारा कार्यक्रम की उपस्थिति को लेकर मैं अपना संशय प्रकट करता रहा , किंतु रविंद्र प्रभात जी और अविनाश वाचस्पति जी द्वारा पिछले वर्ष देखे गए स्वपन .जिसे उन्होंने "परिकल्पना " नाम दिया था उसे साकार करने में कैसे उन्होंने दिन रात एक कर दिया था ये बखूबी समझ रहा था । चूंकि राजधानी दिल्ली में रहते हुए और दिनचर्या का एक बहुत बडा हिस्सा ब्लॉगिंग के नाम कर देने के कारण एक स्वाभाविक सी जिम्मेदारी ये भी लग रही थी कि कम से कम उन ब्लॉग मित्रों से जिंदगी में एक बार मिलने का , उन्हें कलेजे से लगा कर अपने भीतर महसूस करने का एक अवसर निश्चित रूप से गंवाने जैसा होगा वहां नहीं पहुंच पाना । सूचना मिल चुकी थी कि छत्तीसगढ से पूरी मंडली , पटना से ब्लॉगर साथियों का समूह इस कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए कूच कर चुके हैं , इसके अलावा जाने किस किस कोने से कौन कौन पहुंच रहा है ये भी उत्सुकता का विषय था । जहां तक कार्यक्रम की रूपरेखा और उसमें शामिल अतिथियों , आयोजन के दौरान प्रस्तावित कार्यक्रमों आदि की रूपरेखा तैयार करने की बात है तो  वो कार्यक्रम मूल रूप से एक प्रकाशन संस्था हिन्दी साहित्य सदन की पचासवीं सालगिरह के स्वर्णिम समारोह के साथ ही साझा किया जाना तय हुआ था । ऐसी क्यों किया गया , किसलिए किया गया ये सब आयोजनकर्ता ही बेहतर बता सकते हैं लेकिन फ़िर भी आसानी से इसे समझा तो जा ही सकता है कि वातानुकूलित हॉल में, बडी बडी हस्तियों , मीडिया , और साहित्य विभूतियों तथा मुख्यमंत्री स्तर के राजनीतिज्ञ द्वारा किसी ऐसे कार्यक्रम में ब्लॉगरों की न सिर्फ़ सहभागिता , बल्कि उनके सम्मान की व्यवस्था करना करवाना ही इसके पीछे उद्देश्य रहा होगा । सवाल उठाने वाले तो आसानी से कह सकते हैं कि जरूरत ही क्या थी . ब्लॉगरों का कार्यक्रम ब्लॉगर्स के बीच भी तो किया जा सकता था और तब फ़िर बडी आसानी से आयोजकों को निशाने पर लिया जाता कि हुंह क्या यही था वो परिकल्पना महोत्सव । खैर इस विषय पर आगे ..तो यही सोच कर मैंने कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करना जरूरी समझा ।


मुख्य द्वार पर ही मुझे ममता की प्रतिमूर्ति सी संगीता स्वरूप जी अपने पतिदेव के साथ मिल गईं , बाल कटे होने के कारण मैं टोपी पहने था और एक बार फ़िर इस कदर अलग था कि शायद आप इसी बात से यकीन करें कि जिससे भी मिला मुझे बार बार अपना परिचय नाम बताकर देना पडा और मेरी बगल में बैठे पाबला जी भी बहुत समय बाद मुझे पहचान पाए । अंदर पहुंचे तो चार बज चुके थे और स्टेज पर जहां रविंद्र जी , अविनाश भाई तैयारी में लगे थे वहीं गिरीश बिल्लौरे जी और पदम सिंह जी वेबकास्टिंग की तैयारी में लगे थे । 

गिरीश बिल्लौरे वेबकास्ट की तैयारी में

स्टेज पर रविंद्र प्रभात जी के साथ जिन्होंने कमान संभाल रखी थी उनका परिचय बाद में हिंदी साहित्य सदन के सचिव श्री गिरिराज शरण अग्रवाल की सुपुत्री गीतिका गोयल के रूप में बाद में हुआ । छत्तीसगढ के ब्लॉगर मित्र अभी नहीं पहुंचे थे , अपनी आदत के मुताबिक मैं घूम घूम कर चेहरे पहचान कर और अंदाज़े से मिल रहा था , ज़ाकिर अली रज़नीश जी , सलिल जी , प्रमोद तांबट जी , गिरीश बिल्लौरे जी , और जाने कितने ही ब्लॉगर मित्रों से मैं पहली बार मिल रहा था । इनके साथ ही जान पहचान वाले मित्र तो मिल ही रहे थे , हां नाम और पहचान जरूर मुझे सबको बतानी पड रही थी जिसका ज़िक्र मैं कर चुका हूं पहले ही ।



आगे की पंक्ति में सम्मानित अतिथि एवं प्रकाशन परिवार के सदस्य और ब्लॉगर मित्र भी बैठे हुए थे । समय बीत रहा था और मुख्य अतिथि रमेश पोखरयाल निशंक नहीं पहुंच सके थे कारण बताया गया कि मौसम और तेज़ हवाओं के कारण विमान के उतरने में विलंब हो रहा था । तब तक औपचारिक अनौपचारिक रूप से मंच संभाले हुए रविंद्र प्रभात जी ने हिंदी ब्लॉगिंग के कुछ पुराधाओं को अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया । सबसे पहले आमंत्रित किए गए श्री श्रीश शर्मा यानि ई पंडित जिन्होंने बडे ही धैर्यपूर्वक हिंदी ब्लॉगिंग के शुरूआती दिनों को याद करते हुए , अक्षरग्राम , नारद जैसे एग्रीगेटरों की चर्चा की और फ़िर ब्लॉग लिखने वाले विभिन्न प्लेटफ़ार्मों की भी जानकारी दी । इसके बाद श्री ज़ाकिर अली रजनीश जी ने विज्ञान को ब्लॉगिंग से जोडने और तस्लीम तथा साईंस ब्लॉगर्स एसोसिएशन की चर्चा करते हुए अपने सहयोगियों को धन्यवाद दिया । इसके बाद चौराहा ब्लॉग के पत्रकार ब्लॉगर और स्वाभिमान टाईम्स की संपादकीय टीम से जुडे हुए श्री चंडीदत्त शुक्ल जी ने बडी बेबाकी से ब्लॉग लेखन पर अपने विचार व्यक्त किए । इसके उपरांत विधि विशेषज्ञ ब्लॉअर श्री दिनेश राय द्विवेदी जी ने अपने विचार रखते हुए बताया कि ब्लॉग लेखन के लिए अलग से कोई कानून नहीं बने हैं और जो नियम कायदे कानून समाज में बोलने लिखने कहने पढने सुनने के बने हुए हैं वही सब ब्लॉग लेखन पर भी लागू होते हैं ।



श्री श्रीश शर्मा "ई पंडित "


श्री दिनेश राय द्विवेदी


अब धीरे धीरे घोषणा हो रही थी कि निशंक पधार चुके हैं ।




उनके आते ही पहले बारी बारी से उनका और उनके साथ उपस्थित अतिथियों का पुष्प एवं माल्यार्पण से स्वागत सत्कार किया गया । मां  सरस्वती की पूजा अर्चना के साथ ही कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत हो चुकी थी समय हो चुका था छ : बजकर बीस मिनट , कार्यक्रम में पहले हिन्दी साहित्य सदन की अब तक की यात्रा, श्री गिरिराज शरण अग्रवाल उनकी पत्नी डा. मीना अग्रवाल दोनों पुत्रिया एवं अन्य सहयोगियों की अथक यात्रा के बारे में पावर प्वाईंट प्रेजेंटेशन के साथ साथ धन्यवाद देने का कार्यक्रम चलता रहा । इसके बाद बारी आई पुस्तकों के लोकार्पण की । 





अब तक पढी लिखी गई सभी रिपोर्टों में भाई बंधुओं ने सब कुछ लिखा सिवाय इसके कि हिंदी ब्लॉगिंग पर एक भारीभरकम और लगभग बहुत से सक्रिय ब्लॉगर के अनुभव , उनके आलेख , और उनके परिचय को समेटे हुए पुस्तक का लोकार्पण किया गया , इसके साथ ही जैसा कि तय था रविंद्र प्रभात जी द्वारा रचित ताकि बचा रहे लोकतंत्र और आदरणीय रश्मि प्रभा जी द्वारा संपादित त्रैमासिक पत्रिका वटवृक्ष का लोकार्पण किया गया ।



 

अब तक लिखी गई तमाम पोस्टों में मैंने कहीं भी इस बेमिसाल और अपने तरह की अनोखी पत्रिका जिसके सारे आलेख , कविताएं , कहानियां सब कुछ विशुद्ध रूप से ब्लॉग पोस्टें ही हैं । शायद ही किसी ने इस बात पर गौर फ़रमाया और ये सोचने की ज़हमत उठाई हो कि जब ये पत्रिका आम पाठक के हाथों में पहुंचेगी और वे लेखक के नाम के साथ उनके यूआरएल पते को पढेंगे तो उत्सुकता से ब्लॉंगिंग की दुनिया में जरूर झांकेगा और क्या ये कम बडी उपलब्धि है , ब्लॉगिंग का विस्तार हो , ब्लॉगिंग का विस्तार हो ..ये कहा तो खूब जाता है हर बार , लेकिन कैसे हो ? समाचार पत्र अगर ब्लॉग पोस्टों को उठाते हैं तो उस पर आपत्ति जबकि खुद नेट पर ही रोज जाने कितने ब्लॉग पोस्टों को चोरी से इधर उधर किया जा रहा है जो कहीं पकड में ही नहीं आती हैं या बहुत दिनों बाद नज़र में आती हैं , ब्लॉगर समाचार पत्रों को धमकाने तक की बात करते हैं लेकिन इस प्रश्न पर कि उन ब्लॉगों का क्या जो समाचार पत्रों की खबर को ही पोस्ट बना बना कर डाल रहे हैं , पर सबकी चुप्पी अखर जाती है खैर ये अलग पोस्ट का विषय है जिसपर कभी खुलकर और कुछ लिखूंगा ।


इसके बाद ब्लॉगर को पुरस्कार देने का कार्यक्रम शुरू हुआ , यहां ये बात भी कहता चलूं कि लगभग डेढ घंटे तक लगातार खडे रह रह कर जिस तरह से वयोवृद्ध साहित्यकार पंडित रामदरस मिश्र , अशोक चक्रधर , गिरीराज शरण अग्रवाल और मुख्यमंत्री निशंक ने एक एक ब्लॉगर को धैर्यपूर्वक पुरस्कार दिए , उनसे हाथा मिला कर शुभकामनाएं दीं |

निर्मला कपिला जी पुरस्कार लेते हुए 


रश्मि प्रभा जी पुरस्कार लेते हुए 


प्रमोद तांबट जी पुरस्कार लेते हुए 

श्री संजीव तिवारी जी पुरस्कार लेते हुए 
संगीता स्वरूप जी पुरस्कार लेते हुए 

रिजवाना कश्यम "शमा " जी पुरस्कार लेते हुए


 उस जज़्बे का जिक्र करना भी किसी को मुनासिब नहीं लगा , और शायद लगता भी कैसे खासकर उन्हें जो उस हॉल के बाहर खडे होकर कहानियां तलाश रहे थे , कार्यक्रम की कमियां ढूंढ रहे थे और उन साहित्यकारों से मिल रहे थे जो जाने कब से हिन्दी भवन के बाहर बैठे हैं मगर उनकी भी नज़र तभी पडी उनपर । साथे ही मीडिया मित्र मंडली से बाहर बाहर ही चर्चा करके रिपोर्ट लगाने के लिए या फ़िर कार्टून बना कर " असली बात " पहुंचाने में तत्परता से लगे थे । लेकिन अपनी उस रिपोर्ट को लगाते समय वे ये बात भी भूल गए कि रविंद्र प्रभात जी ने कार्यक्रम की शुरूआत मे ही भडास का जिक्र दुनिया के सबसे बडे हिंदी सामूहिक ब्लॉग के रूप में ज़िक्र किया था और पूरे फ़ख्र के साथ किया था , खैर । पुरस्कार वितरण करते करते इतना समय हो गया था कि सब या तो बाहर का रुख करने लगे थे या फ़िर किसी बहाने से टहलने लगे थे । इसके बाद मंच संचालिका ने अतिथियों से एक एक करके आग्रह किया कि वे आकर कुछ कहें । सबने अपने अपने विचार अपने अनुरूप रखे । यहां भी एक अच्छी बात ये देखने कि मिली कि ब्लॉगिंग और ब्लॉगर्स का ज़िक्र सबने किया , जिसका जितना ज्ञान था जिसका जितना परिचय था उसीके अनुरूप सबने इस बात को कहा । इसके उपरांत अल्पाहार के लिए सब फ़िर बाहर निकले और मैं तो निकल ही आया और घर के लिए चल दिया ।


ये तो थी एक ब्लॉगर की आंखों देखी रपट । अब कुछ जरूरी गैरजरूरी बातें । पिछले एक आध आयोजनों को देखते हुए ये अनुभव हो गया है कि अव्वल तो ब्लॉगर बैठक , मीट , सम्मेलन को बुलाए जाने का ख्याल जिनके भी मन में आ रहा हो वे फ़ौरन उसे चूल्हे में झोंक दें अन्यथा आपका श्रम , आपका धन , आपकी निष्ठा और सब कुछ सिर्फ़ एक पोस्ट से ही चौराहे पर लटका दिया जा सकता है और वैसे भी इन आयोजनों से कौन सा नोबेल पुरस्कार दिया जाना होता है । इसके बावजूद भी यदि विचार मन में कुलबुलाए ही तो फ़िर उसे विशुद्ध रूप से सिर्फ़ ब्लॉगर्स और ब्लॉगिंग के इर्द गिर्द ही रहना चाहिए । इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनने में कोई भूल हुई हो या न हुई हो , लेकिन तय कार्यक्रम के अनुसार दूसरा भाग जो कि मीडिया विमर्श पर था उसे स्थगित कर दिया जाना और उससे भी ज्यादा मुख्य अतिथि तक को उपेक्षित सा महसूस हो जाना नि: संदेह ही दुखद और अफ़सोसजनक था जो कि नहीं होना चाहिए था कदापि नहीं । अगर किन्हीं कारणों से ऐसा हो रहा था तो कम से कम मुख्य अतिथि को विश्वास में लिया जाना चाहिए था और उन्हें पूरी स्थिति से अवगत कराना चाहिए था । यहां साथी ब्लॉगर खुशदीप सहगल जी की विवशता और क्षुब्ध होने का कारण समझ में आता है कि जब मुख्य अतिथि उनके ही कहने पर आए थे और उनकी उपेक्षित सी भावना दिख रही हो तो मेजबान के रूप में उन्हें कैसा लगा होगा । इसलिए बेहतर होता कि पहले ही देर हो चुके कार्यक्रम में बदलाव की सूचना और घोषणा जल्दी से जल्दी न सिर्फ़ मंच से बल्कि उन अतिथियों और मुख्य अतिथि को देनी चाहिए थी , वे कार्यक्रम में रुके रहते या चले जाते , आते या नहीं आते ये उनका निर्णय होता । अब बात एक मुख्यमंत्री या कहें कि राजनीतिज्ञ के हाथों पुरस्कृत होने के विरोध की । क्या निशंक अचानक ही बिना बताए वहा टपक पडे थे ? क्या सचमुच ही किसी को नहीं पता था कि वे मुख्य अतिथि होने वाले हैं कार्यक्रम के , यदि पुरस्कारों को उनके हाथों से नहीं लिए जाने के पीछे हजारों तर्क दिए जा सकते हैं तो फ़िर किसी और के हाथों से लिए जाने के विरोध में फ़िर से हज़ारों तर्क दिए जा सकते हैं । खुद अमिताभ बच्चन भी आकर दें तो बडे ही आराम से विरोध ये कह कर किया जा सकता है कि हुंह ये कौन से हिंदी भाषा के ब्लॉगर हैं ?


हिंदी ब्लॉगिंग में कोई भी विवाद दो चार दिनों से ज्यादा नहीं टिकता , और इसे टिकना भी नहीं चाहिए । सबको पता है कि हम यहां सिर्फ़्र पढने लिखने आए हैं । अन्य सभी बातें , लोगों ने तो तरह तरह के कयास भी इस तरह के लगाए हैं कि पुरस्कारों के चयन में धांधलेबाजी हुई है , सेटिंग की गई है और जाने क्या क्या मानो पुरस्कार राशि करोड डेढ करोड हो या फ़िर कि इन पुरस्कारों के विजेताओं को रातोंरात पूरा विश्व पहचानने लगेगा कि सिर्फ़ यही हैं हिदी ब्लॉगिंग के पुरोधा । नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है इसलिए मुगालते में न रहें और ऐसा भी कतई न कहें कि बिना देखे परखे पुरस्कार बांट दिए गए । सबसे जरूरी बात ...किसी को सम्मानित करना कम से कम किसी को अपमानित करने से तो कहीं बेहतर है । चलिए इस बात का यहीं पटाक्षेप करता हूं , वर्ष २०११ की ब्लॉगिंग गाथा को जब भी याद किया जाएगा तो अलग अलग कारणों से ही सही इस समारोह को और इससे जुडी सभी घटनाओं पोस्टों और कही सुनी गई बातों को भी ध्यान में रखा जाएगा । 


रविवार, 10 अप्रैल 2011

इस जनांदोलन की शुरूआत ने किसे क्या दिया ?? ............अजय कुमार झा


एक आगाज़ है ये , अंजाम तो अभी बांकी है


पिछले पांच दिनों में जो कुछ देश ने देखा , जो कुछ भारतीय अवाम ने किया , वो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में शायद आजादी के बाद पहली बार ही हुआ था । हालांकि बहुत से मुद्दों पर इससे बडे बडे जनसमूह ने अपनी मांगों को लेकर इससे भी बडे प्रयास किए और जीते भी हैं लेकिन फ़िर भी आजादी के बासठ वर्षों के बाद पिछले पांच दिनों में ही लोकतंत्र की आत्मा को उसकी ताकत को सबने एक स्वर में महसूस किया है । अब चूंकि ये जनांदोलन अपना रंग दिखाने लगा है तो ये बहुत जरूरी है कि इस माहौल को , वातावरण को  बरकरार रखा जाए और आज जनमानस के सामने यही सबसे बडी चुनौती है । अब सबको ये समझ लेना चाहिए कि ये आग जो अन्ना की एक हुंकार पर लोगों के भीतर सुलग उठी है उसे अपने अपने स्तर पर अपने अपने दायरे में , अपने घरों दफ़्तरों , मुहल्लों , गलियों शहरों में उबालते रहना होगा अगर वाकई सब चाहते हैं कि देश बदले देश की तकदीर बदले । जो लोग इस आंदोलन को क्षणिक आवेश मात्र मान रहे हैं उन्हें कुछ बताना जरूरी हो जाता है कि इस शुरूआत ने आखिर इस देश को इस समाज को , इस सरकार को  , और सबको क्या क्या दिया ।
आंदोलन का जयघोष हो चुका है


सबसे पहले बात राजनेताओं की , इस आंदोलन ने उन्हें ये सबक दे दिया है कि अब अवाम किसी भी राजनीतिक दल की मोहताज़ नहीं रहेगी वो अब चोरों में से एक चोर चुनने के लिए ही मजबूर होकर नहीं बैठेगी , वो अपना हीरो अपने बीच में से ही खुद चुन लेगी ..और अगर हीरो न भी मिला तो खुद ही हीरो हो लेगी । अब उसे धर्म , जाति , क्षेत्र आदि के सहारे बंट कर या बांट कर लडने की जरूरत नहीं रह जाएगी , वो आएगी , ऐसे ही किसी मुद्दे को पकडेगी , सरकार को घेरेगी , सत्ता को ललकारेगी और फ़िर जीत कर उसके मुंह पर तमाचा मार के चल देगी । कुछ राजनीतिज्ञ जो इस कोशिश में आंदोलन के दौरान अपनी किस्मत चमकाने की गर्ज़ से आए भी थे वे भी अपना सा मुंह लेकर चलते बने क्योंकि उस वक्त जनता अपनी आंखें खोले पूरी तरह बेशर्म निर्लज्ज , बेखौफ़ और बेलिहाज़ होकर बैठी थी सो वहीं से उलटे पांव खदेड दिया उनको ।
सजग मीडिया , चुस्त और मुस्तैद

इस आंदोलन ने मीडिया को ये बता दिया कि अगर वे सच्चाई का साथ देंगे , अगर वे पत्रकारिता के धर्म को निर्वाह करने का जज़्बा दिखाएंगे . जो कि उन्हें अपना बाज़ार बचाए रखने के लिए भी देना ही होगा क्योंकि आखिर उस बाज़ार के खरीददार जब खुद ही उन समाचारों के , उन खबरों के केंद्र में होंगे तो ही वे खुद पर विश्वास को जीत पाएंगे और जनता के दिल में भी अपने लिए वही जगह बना सकेंगें जिसके लिए उन्हें लोकतंत्र का चौथा खंबा माना कहा जाता रहा है । जीत के जश्न में कुछ खुद को बहुत ही प्रबुद्ध पत्रकार समझने वाले लोग जब जबरन घुस कर वहां अपना मीडियापन दिखाने की कोशिश करने की जुगत में थे तो अवाम ने उनके साथ भी वही सलूक किया जो उन्होंने राजनेताओं के साथ किया था । मीडिया को भी इस बात का एहसास हो गया था कि असली लडाई , असली मुद्दे , असली लोग ही असली खबर हैं बांकी सब तो बस दुकानदारी है और कुछ नहीं । ये अब टीआरपी का रिकॉर्ड रखने वाले खुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि क्रिकेट विश्व कप को जुनून की तरह देखने वाली जनता ने दो दिन बाद से ही आंदोलन की एक एक खबर को सीने से लगाए रखा । मीडिया को ये भी एहसास हुआ होगा कि अगर वो चाहें तो अब भी देश की विचारधारा को बनाने और मोडने वाली शक्ति बन सकते हैं जैसा कि इस बार उन्होंने बन के दिखाया ।

ये है युवा जोश , युवा जुनून ,

अक्सर जब इस तरह के सामाजिक प्रयास किए गए या ऐसी कोई कोशिश की जाती रही है  तो समाज को हमेशा ही ये शिकायत रही है कि देश का युवा इन आंदोलनों से और ऐसे सभी प्रयासों से न सिर्फ़ खुद को अलग रखता आया है बल्कि अपने बीच इसे बेहद उदासीन मानता समझता रहा है । इस जनांदोलन में युवाओं के झुकाव ने , उनके जोश ने , उनके जज़्बे ने पूरे देश की धारणा को न सिर्फ़ गलत साबित किया बल्कि खुद के साथ ही पूरे समाज को दिखा बता और जता भी दिया कि अगर वो शीला मुन्नी जैसे गानों पर मदहोश होके नाच सकता है अगर क्रिकेट विश्वकप के उन्मादी जुनून को सिर माथे लगा सकता है तो फ़िर देश को बदलने के लिए इस तरह की तहरीरों में भी शिरकत कर सकता है । इस पूरे आंदोलन का खाका तैयार करने में , उसके समर्थन में माहौल बनाने में , लोगों को जोडने में और तो और इतनी बडी भीड को नियंत्रित करके रखने तक में युवाओं की जो भूमिका रही है उस पर देश को गर्व होना चाहिए । युवा जान गए हैं कि अगर अपना भविष्य बचाना है , बनाना है तो फ़िर ये भी करना ही होगा ।

सबसे बडा संदेश गया है देश की सरकार को , सत्ता के मद में चूर वातानुकूलित कमरों में बैठ कर सवा अरब की जनसंख्या की आखों में धूल झोंकने वाले उन सवा पांच सौ लोगों को कि ये लोकतंत्र है और इस लोकतंत्र की मालिक अब भी आम अवाम ही है । जनता ही जनार्दन है , ये अलग बात है कि उसने इतने दिनों तक ढील दे रखी थी लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं लगाना चाहिए कि जनता बेवकूफ़ है । सरकार को पहली बार ये एहसास हो गया है कि जो जनता उन्हें इस सत्ता पर बिठा सकती है वो अपने लिए , देश के लिए सही कानून , सही नीतियां , खजाने का हिसाब , और इन जनसेवकों को जनसेवा का मतलब समझा भी सकती है । अभी तो ये लडाई शुरू ही हुई है . वो भी सीमित मांग और सीमित साधनों और एक संतुलित नपे तुले राह को पकड के । कल्पना करिए कि अगर यही जनता मिस्र का रास्ता अख्तियार कर लेती तो कौन बचा सकता था इस सरकार को और उसके नुमाइंदों को ।
ये लोकतंत्र है , इसे भीड समझने की भूल करना खुशफ़हमी पालने जैसा है

इसलिए ये कह भर देना कि ये बस एक क्षणिक आवेश भर था जो समय के साथ भुला दिया जाएगा एक खुशफ़हमी की तरह है । अन्ना हज़ारे ने अल्टीमेटम दे दिया है कि अगर पंद्रह अगस्त तक ये जनलोकपाल विधेयक नहीं पारित हुआ तो फ़िर फ़िर वही जंतर और फ़िर वही मंतर । और अबकि तो शायद जनता पांच दिन का इंतज़ार भी न करे ....


गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

अन्ना ने लगा दी आग ...और जनता गई अब जाग ...अभी नहीं तो कभी नहीं ..जंतर मंतर पर आज का दिन



अन्ना हज़ारे ......आज एक ऐसा नाम  जिसके साथ  पूरे देश का आम आदमी अपना साथ जोडने के लिए उद्धत है ..किस पार्टी का , किस धर्म का , किस क्षेत्र का ..इंसान है ये ..ये इंसान भी है या नहीं ...सवा अरब की जनसंख्या को सीधे सीधे धोखा दे कर पूरे देश को सरेआम बेशर्मी से लूटने वाले वो सवा पांच सौ लोग ..जो दिल्ली में बनाए गए एक गोल से घर में बैठ कर बेइमानी और चोरी से पूरे देश को खा रहे हैं ..उनको सिर्फ़ एक अल्टीमेटम भर दे दिया है ..वो भी खुद ही अनशन पर बैठ कर और वे बुरी तरह बौखलाए से फ़िर रहे हैं । आज जंतर मंतर पर खडा हर एक व्यक्ति ..यही सोच और कह रहा था कि अब बस बहुत हुआ ...अब तो कुछ न कुछ ऐसा किया ही जाना चाहिए कि ..इन तमाम जनप्रतिनिधि कहलाने वालों को उनकी असली जगह दिखा देनी चाहिए ।


स्वामी अग्निवेश और अरविंद केजरीवाल जी

अन्ना की आवाज़ , बनी देश की आवाज़

अरविंद केजरीवाल और अन्ना हज़ारे जी

अन्ना ने कहा कि , ब्रिटिश सरकार ने औफ़िशियल सीक्रेट एक्ट की आड में डेढ सौ बरसों तक देश को लूट के खा लिया और अब वर्तमान सरकार भी यही कर रही है तो फ़िर क्या फ़र्क है उनमें और इस सरकार में । अन्ना ने कहा कि जनता ने जब आजादी पाई थी तो चूंकि देश के सभी लोग एक साथ देश चलाने के लिए योजना नहीं बना सकते , देश के विकास के लिए एक साथ नियम नहीं बना सकते इसलिए उन्होंने कुछ लोगों को देश की बागडोर थमा दी और साथ ही देश की तिजोरी भी ताकि वे चुने हुए लोग देश की सेवा कर सकें । लेकिन उन्हीं लोगों ने देश के खजाने को लूटना शुरू कर दिया वे भूल गए कि वे जनता के सेवक हैं और उन्हें सेवा करने के लिए भेजा गया है । अगर सेवा ठीक से नहीं की तो उन्हें बाहर बिठा देना चाहिए । उन्हें जेल के भीतर ठूंस देना चाहिए और सज़ा देनी चाहिए हो सके तो फ़ांसी दे देनी चाहिए । आप सोचेंगे कि मैं ,अन्ना हज़ारे अहिंसा का सेवक होकर भी ऐसी बात कर रहा हूं लेकिन मैं आपको और उनको भी बता दूं कि अब गांधी जी के साथ साथ शिवाजी बनने का समय आ गया है । देश के गद्दारों को अब सिरे से निकाल के बाहर फ़ेंकना होगा । जनता को ये पूरा हक है कि वो अपने पैसों का हिसाब मांगे और जब वो मांगती है तो आप कहते हैं कि बाहर के हैं ..वे मालिक हैं आपके और आप सेवक हैं । अन्ना ने आम लोगों को बता दिया है कि उनकी ताकत इन मुट्ठी भर नेताओं की ताकत से कहीं ज्यादा है ।


एक सवाल आया कि सरकार तो कह रही है कि मांग मान ली गई है अन्ना का जवाब था कि सरकार ठीक वैसा ही आचरण कर रही है जैसे कोई कह रहा हो कि मैं पति्व्रता स्त्री तो हूं लेकिन माथे पर  टीका नहीं लगाना चाहती । अरविंद केजरीवाल जी ने कहा कि सरकार नोटिफ़िकेशन ज़ारी करे तो ही ये आंदोलन  खत्म होगा उससे कम कुछ भी नहीं ..किसी मानसून सत्र का इंतज़ार नहीं और कोई बात नहीं ।
सूचना के अधिकार के लिए लड के जीत हासिल करने वाले अरविंद केजरीवाल जी


स्वामी अग्निवेश ने कहा कि जंतर मंतर तो उनके लिए घर जैसा है ।


मीडिया के लगभग अडतालीस ओवी वैन और जाने कितने ही पत्रकारों की टीम जैसे पत्ता पत्ता बूटा बूटा समेट लेने को तत्पर , मगर वही समस्या कि किसे कवर करें किसे नहीं कैसे कवर करें कैसे नहीं , दो पल के लिए वहां पहुंचे फ़िल्म डायरेक्टर मधुर भंडारकर के पीछे मीडिया के हुजूम ने उमड के ये जता और बता दिया कि खबर के लिए ही मारामारी है , । इन सबसे अलग मैं मिला बहुत से अलग अलग लोगों से । डॉक्टरों से , विद्यार्थियों से ..देखिए

दिल्ली के सीमांत इलाके से आए कृष्ण कुमार जी 



 क्यों आए हैं यहां : क्या करें सर , अब रहा नहीं जाता , लगता है कि बस बहुत हो गया अब तो खत्म होना ही चाहिए ये सब


कमल कुमार जी 


आपको क्या लगता है कि , समस्या खत्म हो जाएगी इससे ?
सर न भी हो तो भी , अब जनता जाग तो गई ही है इसलिए कुछ न कुछ तो होकर ही रहेगा , (बहुत ही सकारात्मक और जोश में कहा )

शायद नाम  विनय कुमर , पत्रकारिता के छात्र

 जनता अपने आप सडकों पर आई है बिना किसी बात की परवाह किए , पत्रकारिता के अनुभव के लिए भी

डॉ अमित तिवारी 
 कुछ दिनों बाद पीजी की परीक्षा थी , घर पर अकेला था सोचा चल कर यहीं पर इस आंदोलन में सहभागिता की जाए ..अब वापस जाने का मन ही नहीं कर रहा है

कृष्णा जी , दिल्ली से ही ,

इनमें सबसे बाएं से बैठे हुए बागी चाचा प्रसिद्ध कवि और ब्लॉगर राजीव तनेजा जी के पडोसी , मुझे शायद देख न पाए मगर मैंने देख भी लिया और पहचान भी लिया

डॉ एसोसिएशन की सहभागिता ...
 हां हमें पूरा विश्वास है कि इस बार कुछ न कुछ होकर रहेगा , जनता यूं ही सडकों पर नहीं आ गई है ...लगभग पच्चीस से तीस डॉक्टर्स का समूह
और ये हमारे देश के अवकाश प्राप्त सैनिक , अलग खडे बहस में लगे हुए आंदोलन के स्वरूप पर चर्चा करते हुए

ये दिल्ली के किसी वैली स्कूल के बच्चे , 


क्यों आए हैं आप लोग ..सर के साथ आए हैं ..करप्शन के खिलाफ़ अन्ना हज़ारे का साथ देने के लिए

दो दोस्त , जिनका नाम भूल गया 

 किसने कहा था यहां आने के लिए

किसी ने भी नहीं खुद आए हैं क्योंकि यदि अभी नहीं तो कभी नहीं , सर अब तो आर या पार होना चाहिए

अन्ना के एक आवाज पर उठ गए हजारों मुट्ठियां

वही जोश , वही जुनून

गांधी को चित्रिति करते एक कलाकार (नीचे )

अपनी कूची से काम में तल्लीन

ये एक और बैनर एक और मुहिम


भूतपूर्व सैनिकों का सहयोग

और जाबांज सिपाही बेशक फ़ौज से रिटायर लेकिन फ़र्ज से नहीं
 सर आप लोगों को क्या लगता है सरकार झुक जाएगी
नहीं  झुकी तो टूट जाएगी ..अब जनता खुद तय करेगी सरकार की तकदीर
मुस्तैद कैमराकर्मी , बदस्तूर खबरें पहुंचाते हुए


बहस यहां भी जारी है

आकाश सौरभ हाथों मे तिरंगा लिए हुए

सुरेंद्र मोहन पाठक

जोश और जज़्बा , अब कम नहीं होगा

राकेश अग्रवाल

बहुत ही तीखी बहस चल रही है यहां कि पूरी सरकार ,. हरेक मंत्री चोर है




इंडिया अगेंस्ट करप्शन  अभियान के कार्यकर्ता


आप लोग इस नंबर ( 02261550789) पर मिस्ड कॉल करने के लिए क्यों कह रहे हैं ?

इस नंबर पर मिस्ड कॉल करने से आप सीधे सीधे हमसे जुड जाएंगे और आपको पल पल की खबर पहुंचती रहेगी ..

तो ये थी आज की कच्ची पक्की सी रि्पोर्ट ...शायद कल भी मैं वहां पहुंचुंगा और जब तक अनशन जारी रहेगा पहुंचता रहूंगा कुछ और अपनों से मिलने के लिए ...आप मिस्ड कॉल करिए ..और जुड जाईये इस आंदोलन से ...मैं आपको अपने भीतर लिए जा रहा हूं ..कुछ कहना हो तो बताइएगा .जरूर ।


जय भारत ।
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