मैं सोचता हूँ,
जब,
ये कैमरा,
वही रहता है,
तो फ़िर कैसे,
हर बार,
इक नया रंग,
नया रूप ,
और ,
नया नाम लिए,
तुम्हारी,
इक नयी,
तस्वीर निकलती है॥
औरत, कौन हो तुम , मैं सचमुच नहीं जान पाया....
मेरा अगला पन्ना : ब्लॉगजगत में महिलाओं की धाक ।
रविवार, 29 जून 2008
रे माधो, तू देखना
रे माधो, तू देखना,
इक दिन ,
मैं इस चाँद का,
एक टुकडा तोड़ कर,
तेरे माटी के,
दिए में पिघ्लाउंगा॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
इन तारों को,
बुहार कर एक साथ,
रग्दुन्गा , तेरे आँगन में,
आतिशबाजी , करवाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तू नहीं जायेगा,
पंचायत में हाजिरी देने,
तेरे दालान पर,
संसद का सत्र बुल्वाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तेरे गेह्नु के बने ,
जो खाते हैं, रोटी,
ब्रैड-नॉन, भठूरे,
उन सबसे ,
तुझको मिलवाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तेरी मुनिया को,
इस स्लेट-खड़ी के साथ ,
बड़े कोंवेंट में ,
पढवाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
जो इस जनम,
न हो सका , ये सब,
तो जब तक,
हो न सकेगा, ये सब,
हर बार , इक नया जनम,
लेकर आउंगा मैं॥
माधो , तू देखना एक दिन ऐसा जरूर होगा, क्यों होगा न ?
रे माधो, तू देखना
रे माधो, तू देखना,
इक दिन ,
मैं इस चाँद का,
एक टुकडा तोड़ कर,
तेरे माटी के,
दिए में पिघ्लाउंगा॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
इन तारों को,
बुहार कर एक साथ,
रग्दुन्गा , तेरे आँगन में,
आतिशबाजी , करवाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तू नहीं जायेगा,
पंचायत में हाजिरी देने,
तेरे दालान पर,
संसद का सत्र बुल्वाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तेरे गेह्नु के बने ,
जो खाते हैं, रोटी,
ब्रैड-नॉन, भठूरे,
उन सबसे ,
तुझको मिलवाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
तेरी मुनिया को,
इस स्लेट-खड़ी के साथ ,
बड़े कोंवेंट में ,
पढवाउंगा मैं॥
रे माधो, तू देखना,
जो इस जनम,
न हो सका , ये सब,
तो जब तक,
हो न सकेगा, ये सब,
हर बार , इक नया जनम,
लेकर आउंगा मैं॥
माधो , तू देखना एक दिन ऐसा जरूर होगा, क्यों होगा न ?
शुक्रवार, 20 जून 2008
एक कविता या पता नहीं कुछ और
होगा कई,
शहरों -कस्बों ,
मैदानों-सड़कों,
का मालिक,
फ़िर भी,
चला वो,
सड़क किनारे,
नहीं बीच में,
चलते देखा॥
कहते होंगे,
उसे सभी , वो,
है बड़े,
दिल का मालिक,
पर वो तो,
हाथ मिलाता सबसे,
कभी किसी से,
नहीं गले मिलते देखा॥
मुझको लगता था,
मैं ऐसा हूँ,
दोस्तों से भी,
चिढ जाता हूँ,
पर उसको भी,
अक्सर,
यारों की,
कामयाबी पर,
जलते देखा॥
सूखी ही सही,
रोटी ही सही,
पर माँ , मुझको,
ख़ुद देती है,
उसके बच्चों ,
को तो ,
आया के हाथों,
पलते देखा॥
मुझको लगा की,
कमजोरी ने,
मुझको बूढा बना दिया,
देखा तो,
कुछ,
झुर्रियां ही,
थोड़ी कम थी,
उम्र के उस मोड़ पर,
उसको भी,
ढलते देखा॥
अमा, काहे के अमीर हो यार, ?
शहरों -कस्बों ,
मैदानों-सड़कों,
का मालिक,
फ़िर भी,
चला वो,
सड़क किनारे,
नहीं बीच में,
चलते देखा॥
कहते होंगे,
उसे सभी , वो,
है बड़े,
दिल का मालिक,
पर वो तो,
हाथ मिलाता सबसे,
कभी किसी से,
नहीं गले मिलते देखा॥
मुझको लगता था,
मैं ऐसा हूँ,
दोस्तों से भी,
चिढ जाता हूँ,
पर उसको भी,
अक्सर,
यारों की,
कामयाबी पर,
जलते देखा॥
सूखी ही सही,
रोटी ही सही,
पर माँ , मुझको,
ख़ुद देती है,
उसके बच्चों ,
को तो ,
आया के हाथों,
पलते देखा॥
मुझको लगा की,
कमजोरी ने,
मुझको बूढा बना दिया,
देखा तो,
कुछ,
झुर्रियां ही,
थोड़ी कम थी,
उम्र के उस मोड़ पर,
उसको भी,
ढलते देखा॥
अमा, काहे के अमीर हो यार, ?
गुरुवार, 19 जून 2008
ब्लॉगजगत के एलियन -श्री उड़नतश्तरी जी महाराज पर एक पोस्ट
शुरू-शुरू में जब मैंने अपने चिट्ठों पर लिखना शुरू किया था तो एक अदद टिपण्णी की दरकार रहती थी, इसका ये कतई मतलब नहीं की आजकल दरकार नहीं रहती, मगर उन दनी हम किसी कक्षा में आए नए बच्चे की तरह थे जो कक्षा में मौजूद हरेक सहपाठी से अपनी जान पहचान बढाना चाहता है। ऐसे में इस ब्लॉगजगत के लोग कब कितना टिपियाने आए ये तो याद नहीं मगर धरती, पातळ , आकाश को छोड़कर आसमान के ऊपर से एक अन्तरिक्ष के प्राणी- उड़नतश्तरी जी - हमारे चिट्ठे पर अक्सर अवतरित होने लगे। तब हमारे अल्पबुद्धि मस्तिष्क में दो ही बातें संचारित हुई। पहली ये की- यार, कमाल है हमें टिपियाने जादू के भी, बंधू, एलियन लोग आने लगे, इतने ऊपर लेवल की लेखनी हो गयी, हमारी कमाल है, झा बाबु।
दूसरी ये की यार, कहीं ऐसा तो नहीं की धरती- पातळ में कोई हमारी बात समझ ही नहीं रहा तो बेचारा कोई एलियन उसे अपनी कूट भाषा समझ कर टिपिया रहा हो, अजी लानत है झा जी। खैर हमारे बात पर झाडू मारिये।
जब हमने उस यु , आई, ओ , यानि अन आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त को आईदेंतीफाई किया तो आशा के अनुरूप आलूबुखारे, रसगुल्ले, गुलाबजामुन, की प्रजाती के गुलगुले -थुलथुले से एलियन महाशय निकले- उड़नतश्तरी जी। उनका असली नाम समीर सोनी है ये तो मुझे कुछ ही समय पहले पता चला। वैसे अपने मम्मी पापा से अच्छा तो ख़ुद ही उन्होंने अपना नामकरण किया है।
इनकी पोस्टों, इनकी, लेखन शैली, इनकी अनोखी सोच, अद्भुत विचारों के बारे में क्या कहूं। इन्हें पढ़ कर कोई भी समझ सकता है की ये इंसानी शरीर, रंग रूप मगर दिमागी तौर पर किसी एलियन का काम हो सकता है। चाहे गंभीर बात करें या किसी को जूता मारें ( ध्यान रहे की ये जूता मारने से पहले उसे अच्छी तरह भिगो देते हैं ) , बस हर बात में एक तरह का अन्त्रीक्ष्पना टपकता है।
अब टिप्पणियों की बात। जैसा की मैंने पहले ही बता दिया है की ये वो उड़नतश्तरी है जो बगैर किसी ट्रैफिक जाम ,रेड लाईट, में फंसे हर किसी के चिट्ठे पर लैंड करती है। (मेरे यहाँ तो इनकी पार्किंग का आजीवन पास बना हुआ है )। इनकी इस क्रिया की ऐसी प्रतिक्रया होती है की इनकी एक पोस्ट पर इतनी टिप्पणियाँ आती हैं, जितनी हम साल भर पोस्ट नहीं लिख पाते। खुदा खैर करे यदि गलती से भी किसी दिन मेरी रद्दी की टोकरी में इतनी तिप्प्न्नियाँ आ गयी तो यकीन मानिए खुशी के मरे मेरे चिट्ठे का हार्ट फ़ैल हो जायेगा।
जब भी ब्लॉगजगत पर किसी के योगद्दन की चर्चा होगी तो इस मोस्ट आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त की टिप्पणियों और उनके साथ नए चिट्ठाकारों को आमंतरण और प्रोत्साहन के संदेश के लिए हमेशा ही याद किया जायेगा। मैंने भी ख़ुद इसी से प्रेरित होकर बहुत लोग को धकिया कर यहाँ इकठ्ठा कर लिया है। हाँ मेरी एक हसरत तो हमेशा से रहेगी की कभी मिले तो इस उड़नतश्तरी को छु कर सहला कर गुदगुदा कर महसूस करूंगा की यार इस बन्दे में के अन्दर क्या क्या भरा पडा है।
आदरणीय उड़नतश्तरी जी , यदि कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ़ कर दें, अपना छोटा समझ कर , और मैं आपसे छोटा हूँ ये तो मैं साबित भी कर सकता हूँ।
अजय
9871205767
दूसरी ये की यार, कहीं ऐसा तो नहीं की धरती- पातळ में कोई हमारी बात समझ ही नहीं रहा तो बेचारा कोई एलियन उसे अपनी कूट भाषा समझ कर टिपिया रहा हो, अजी लानत है झा जी। खैर हमारे बात पर झाडू मारिये।
जब हमने उस यु , आई, ओ , यानि अन आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त को आईदेंतीफाई किया तो आशा के अनुरूप आलूबुखारे, रसगुल्ले, गुलाबजामुन, की प्रजाती के गुलगुले -थुलथुले से एलियन महाशय निकले- उड़नतश्तरी जी। उनका असली नाम समीर सोनी है ये तो मुझे कुछ ही समय पहले पता चला। वैसे अपने मम्मी पापा से अच्छा तो ख़ुद ही उन्होंने अपना नामकरण किया है।
इनकी पोस्टों, इनकी, लेखन शैली, इनकी अनोखी सोच, अद्भुत विचारों के बारे में क्या कहूं। इन्हें पढ़ कर कोई भी समझ सकता है की ये इंसानी शरीर, रंग रूप मगर दिमागी तौर पर किसी एलियन का काम हो सकता है। चाहे गंभीर बात करें या किसी को जूता मारें ( ध्यान रहे की ये जूता मारने से पहले उसे अच्छी तरह भिगो देते हैं ) , बस हर बात में एक तरह का अन्त्रीक्ष्पना टपकता है।
अब टिप्पणियों की बात। जैसा की मैंने पहले ही बता दिया है की ये वो उड़नतश्तरी है जो बगैर किसी ट्रैफिक जाम ,रेड लाईट, में फंसे हर किसी के चिट्ठे पर लैंड करती है। (मेरे यहाँ तो इनकी पार्किंग का आजीवन पास बना हुआ है )। इनकी इस क्रिया की ऐसी प्रतिक्रया होती है की इनकी एक पोस्ट पर इतनी टिप्पणियाँ आती हैं, जितनी हम साल भर पोस्ट नहीं लिख पाते। खुदा खैर करे यदि गलती से भी किसी दिन मेरी रद्दी की टोकरी में इतनी तिप्प्न्नियाँ आ गयी तो यकीन मानिए खुशी के मरे मेरे चिट्ठे का हार्ट फ़ैल हो जायेगा।
जब भी ब्लॉगजगत पर किसी के योगद्दन की चर्चा होगी तो इस मोस्ट आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त की टिप्पणियों और उनके साथ नए चिट्ठाकारों को आमंतरण और प्रोत्साहन के संदेश के लिए हमेशा ही याद किया जायेगा। मैंने भी ख़ुद इसी से प्रेरित होकर बहुत लोग को धकिया कर यहाँ इकठ्ठा कर लिया है। हाँ मेरी एक हसरत तो हमेशा से रहेगी की कभी मिले तो इस उड़नतश्तरी को छु कर सहला कर गुदगुदा कर महसूस करूंगा की यार इस बन्दे में के अन्दर क्या क्या भरा पडा है।
आदरणीय उड़नतश्तरी जी , यदि कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ़ कर दें, अपना छोटा समझ कर , और मैं आपसे छोटा हूँ ये तो मैं साबित भी कर सकता हूँ।
अजय
9871205767
ब्लॉगजगत के एलियन -श्री उड़नतश्तरी जी महाराज पर एक पोस्ट
शुरू-शुरू में जब मैंने अपने चिट्ठों पर लिखना शुरू किया था तो एक अदद टिपण्णी की दरकार रहती थी, इसका ये कतई मतलब नहीं की आजकल दरकार नहीं रहती, मगर उन दनी हम किसी कक्षा में आए नए बच्चे की तरह थे जो कक्षा में मौजूद हरेक सहपाठी से अपनी जान पहचान बढाना चाहता है। ऐसे में इस ब्लॉगजगत के लोग कब कितना टिपियाने आए ये तो याद नहीं मगर धरती, पातळ , आकाश को छोड़कर आसमान के ऊपर से एक अन्तरिक्ष के प्राणी- उड़नतश्तरी जी - हमारे चिट्ठे पर अक्सर अवतरित होने लगे। तब हमारे अल्पबुद्धि मस्तिष्क में दो ही बातें संचारित हुई। पहली ये की- यार, कमाल है हमें टिपियाने जादू के भी, बंधू, एलियन लोग आने लगे, इतने ऊपर लेवल की लेखनी हो गयी, हमारी कमाल है, झा बाबु।
दूसरी ये की यार, कहीं ऐसा तो नहीं की धरती- पातळ में कोई हमारी बात समझ ही नहीं रहा तो बेचारा कोई एलियन उसे अपनी कूट भाषा समझ कर टिपिया रहा हो, अजी लानत है झा जी। खैर हमारे बात पर झाडू मारिये।
जब हमने उस यु , आई, ओ , यानि अन आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त को आईदेंतीफाई किया तो आशा के अनुरूप आलूबुखारे, रसगुल्ले, गुलाबजामुन, की प्रजाती के गुलगुले -थुलथुले से एलियन महाशय निकले- उड़नतश्तरी जी। उनका असली नाम समीर सोनी है ये तो मुझे कुछ ही समय पहले पता चला। वैसे अपने मम्मी पापा से अच्छा तो ख़ुद ही उन्होंने अपना नामकरण किया है।
इनकी पोस्टों, इनकी, लेखन शैली, इनकी अनोखी सोच, अद्भुत विचारों के बारे में क्या कहूं। इन्हें पढ़ कर कोई भी समझ सकता है की ये इंसानी शरीर, रंग रूप मगर दिमागी तौर पर किसी एलियन का काम हो सकता है। चाहे गंभीर बात करें या किसी को जूता मारें ( ध्यान रहे की ये जूता मारने से पहले उसे अच्छी तरह भिगो देते हैं ) , बस हर बात में एक तरह का अन्त्रीक्ष्पना टपकता है।
अब टिप्पणियों की बात। जैसा की मैंने पहले ही बता दिया है की ये वो उड़नतश्तरी है जो बगैर किसी ट्रैफिक जाम ,रेड लाईट, में फंसे हर किसी के चिट्ठे पर लैंड करती है। (मेरे यहाँ तो इनकी पार्किंग का आजीवन पास बना हुआ है )। इनकी इस क्रिया की ऐसी प्रतिक्रया होती है की इनकी एक पोस्ट पर इतनी टिप्पणियाँ आती हैं, जितनी हम साल भर पोस्ट नहीं लिख पाते। खुदा खैर करे यदि गलती से भी किसी दिन मेरी रद्दी की टोकरी में इतनी तिप्प्न्नियाँ आ गयी तो यकीन मानिए खुशी के मरे मेरे चिट्ठे का हार्ट फ़ैल हो जायेगा।
जब भी ब्लॉगजगत पर किसी के योगद्दन की चर्चा होगी तो इस मोस्ट आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त की टिप्पणियों और उनके साथ नए चिट्ठाकारों को आमंतरण और प्रोत्साहन के संदेश के लिए हमेशा ही याद किया जायेगा। मैंने भी ख़ुद इसी से प्रेरित होकर बहुत लोग को धकिया कर यहाँ इकठ्ठा कर लिया है। हाँ मेरी एक हसरत तो हमेशा से रहेगी की कभी मिले तो इस उड़नतश्तरी को छु कर सहला कर गुदगुदा कर महसूस करूंगा की यार इस बन्दे में के अन्दर क्या क्या भरा पडा है।
आदरणीय उड़नतश्तरी जी , यदि कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ़ कर दें, अपना छोटा समझ कर , और मैं आपसे छोटा हूँ ये तो मैं साबित भी कर सकता हूँ।
अजय
9871205767
दूसरी ये की यार, कहीं ऐसा तो नहीं की धरती- पातळ में कोई हमारी बात समझ ही नहीं रहा तो बेचारा कोई एलियन उसे अपनी कूट भाषा समझ कर टिपिया रहा हो, अजी लानत है झा जी। खैर हमारे बात पर झाडू मारिये।
जब हमने उस यु , आई, ओ , यानि अन आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त को आईदेंतीफाई किया तो आशा के अनुरूप आलूबुखारे, रसगुल्ले, गुलाबजामुन, की प्रजाती के गुलगुले -थुलथुले से एलियन महाशय निकले- उड़नतश्तरी जी। उनका असली नाम समीर सोनी है ये तो मुझे कुछ ही समय पहले पता चला। वैसे अपने मम्मी पापा से अच्छा तो ख़ुद ही उन्होंने अपना नामकरण किया है।
इनकी पोस्टों, इनकी, लेखन शैली, इनकी अनोखी सोच, अद्भुत विचारों के बारे में क्या कहूं। इन्हें पढ़ कर कोई भी समझ सकता है की ये इंसानी शरीर, रंग रूप मगर दिमागी तौर पर किसी एलियन का काम हो सकता है। चाहे गंभीर बात करें या किसी को जूता मारें ( ध्यान रहे की ये जूता मारने से पहले उसे अच्छी तरह भिगो देते हैं ) , बस हर बात में एक तरह का अन्त्रीक्ष्पना टपकता है।
अब टिप्पणियों की बात। जैसा की मैंने पहले ही बता दिया है की ये वो उड़नतश्तरी है जो बगैर किसी ट्रैफिक जाम ,रेड लाईट, में फंसे हर किसी के चिट्ठे पर लैंड करती है। (मेरे यहाँ तो इनकी पार्किंग का आजीवन पास बना हुआ है )। इनकी इस क्रिया की ऐसी प्रतिक्रया होती है की इनकी एक पोस्ट पर इतनी टिप्पणियाँ आती हैं, जितनी हम साल भर पोस्ट नहीं लिख पाते। खुदा खैर करे यदि गलती से भी किसी दिन मेरी रद्दी की टोकरी में इतनी तिप्प्न्नियाँ आ गयी तो यकीन मानिए खुशी के मरे मेरे चिट्ठे का हार्ट फ़ैल हो जायेगा।
जब भी ब्लॉगजगत पर किसी के योगद्दन की चर्चा होगी तो इस मोस्ट आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त की टिप्पणियों और उनके साथ नए चिट्ठाकारों को आमंतरण और प्रोत्साहन के संदेश के लिए हमेशा ही याद किया जायेगा। मैंने भी ख़ुद इसी से प्रेरित होकर बहुत लोग को धकिया कर यहाँ इकठ्ठा कर लिया है। हाँ मेरी एक हसरत तो हमेशा से रहेगी की कभी मिले तो इस उड़नतश्तरी को छु कर सहला कर गुदगुदा कर महसूस करूंगा की यार इस बन्दे में के अन्दर क्या क्या भरा पडा है।
आदरणीय उड़नतश्तरी जी , यदि कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ़ कर दें, अपना छोटा समझ कर , और मैं आपसे छोटा हूँ ये तो मैं साबित भी कर सकता हूँ।
अजय
9871205767
सोमवार, 16 जून 2008
तुम औरतें, हर बार क्यों,
तुम औरतें,
हर बार, क्यों,
हम पुरुषों को ही,
कटघरे में,
खडा करती हो ?
जो मर्द,
बने फिरते हैं,
उन बेटों को,
बेटियों से ज्यादा,
लाड देकर , ख़ुद तुम्हीं तो ,
बड़ा करती हो॥
वो जो,
किसी कन्या के,
जन्म पर, सबसे ज्यादा,
छाती पीटती है,
और कोसटी है,
बेटी , बहू और बहिन को,
वो तो,
औरत ही होती है न।
वो जो,
शादी के बाद,
ताना देती,
और अक्सर,
आग लगाकर,
जला देती है,
अपनी बाहू और भाभी को,
वो भी,शायद,
औरत ही होती है न।
मैं मानता हूँ,
कि, इस मर्दाने,
समाज ने,
तुम से,
हमेशा ही,
अन्याय किया है।
लेकिन क्या,
तुम्हें नहीं लगता,
जाने -अनजाने,
ये अधिकार ,
भी ख़ुद,
तुमने ही दिया है।
क्या मर्दों के,
कपड़े पहनने से,
या उनकी,
तरह पनपने से,
औरत कोई,
मर्द सा बन जायेगी।
माना , गर ऐसा,
हो भी जाए,
तो फ़िर क्योंकर,
वो भी,
औरत ही कहलायेगी ?
सब सोच की,
लड़ाई है ,
नजरिये का फर्क है,
असंतुलन के ,
इस समीकरण में,
अज्ञानता की पर्त है॥
"नारी कभी,
कमजोर नहीं थी,
कमजोरी है,
उसका औरत्पन,
अपनी शक्ति,
ख़ुद पहचानो,
तौलो ख़ुद,
अपना अंतर्मन...
औरत आज भी कस्तूरी मृग की तरह अपनी शक्ति को ढूँढने के लिए भटक रही है, जबकि वो शक्ति ख़ुद उसके अन्दर मौजूद है.
हर बार, क्यों,
हम पुरुषों को ही,
कटघरे में,
खडा करती हो ?
जो मर्द,
बने फिरते हैं,
उन बेटों को,
बेटियों से ज्यादा,
लाड देकर , ख़ुद तुम्हीं तो ,
बड़ा करती हो॥
वो जो,
किसी कन्या के,
जन्म पर, सबसे ज्यादा,
छाती पीटती है,
और कोसटी है,
बेटी , बहू और बहिन को,
वो तो,
औरत ही होती है न।
वो जो,
शादी के बाद,
ताना देती,
और अक्सर,
आग लगाकर,
जला देती है,
अपनी बाहू और भाभी को,
वो भी,शायद,
औरत ही होती है न।
मैं मानता हूँ,
कि, इस मर्दाने,
समाज ने,
तुम से,
हमेशा ही,
अन्याय किया है।
लेकिन क्या,
तुम्हें नहीं लगता,
जाने -अनजाने,
ये अधिकार ,
भी ख़ुद,
तुमने ही दिया है।
क्या मर्दों के,
कपड़े पहनने से,
या उनकी,
तरह पनपने से,
औरत कोई,
मर्द सा बन जायेगी।
माना , गर ऐसा,
हो भी जाए,
तो फ़िर क्योंकर,
वो भी,
औरत ही कहलायेगी ?
सब सोच की,
लड़ाई है ,
नजरिये का फर्क है,
असंतुलन के ,
इस समीकरण में,
अज्ञानता की पर्त है॥
"नारी कभी,
कमजोर नहीं थी,
कमजोरी है,
उसका औरत्पन,
अपनी शक्ति,
ख़ुद पहचानो,
तौलो ख़ुद,
अपना अंतर्मन...
औरत आज भी कस्तूरी मृग की तरह अपनी शक्ति को ढूँढने के लिए भटक रही है, जबकि वो शक्ति ख़ुद उसके अन्दर मौजूद है.
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