तो एक बार फिर से हिन्दी भाषियों को अपनी खानाबदोशी की कीमत चुकानी पड़ रही है। हिन्दी भाषी क्या , सीधा-सीधा, कहो न बिहारी और यू पी वालों को। देश के सबसे बड़ी जनसंख्या वाले इन दो राज्यों के हम जैसे लोग सच्मुघ आज के खानाबदोश ही तो है। कभी पढाई, कभी रोजगार, तो कभी व्यवसाय के लिए मजबूर होकर दिल्ली, बम्बई ,कलकत्ता जैसे महानगरों का रुख कर लेते हैं। वहाँ अपना खून पसीना , अपना श्रम, अपना समय, अपनी सोच लगाकर उस स्थान विशेष के लिए करते रहने के साथ=साथ अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत रहते हैं। इन महानगरों में अपनी सरलता, सच्चाई, निरक्षरता, के लिए कदम-कदम पर अपमानित होते रहने की नियति के साथ=साथ कभी असम, कभी बंगाल, कभी विदर्भ तो कभी महाराष्ट्र में अचानक ही शरणार्थियों से भी बदतर स्थिति में पहुंच जाते हैं॥
राज ठाकरे के बाद दिल्ली के तेजेंद्र खन्ना ने अपने हिस्से का जहर उगल दिया। भैया कलकत्ता मद्रास वालों आप लोग भी अपना विचार दे ही दो ताकि पता तो चले कि हमारी औकात क्या है। खूब मारो-पीतो, नोचो-, तोड़ो-फोडो, । मगर यार मेरी सकझ में एक बात नहीं आती, रिक्शे वाले, पान वाले, सब्जी वाले, को पीटने से क्या होगा। यार बडे मंत्रियों , अधिकारियों , उद्योगोपतियों, कर्मचारियों को पीट-पात कर भगाओ तो हिम्मत की बात है। मीडिया , सरकार, दफ्तर, बैंक, हस्पताल, कौन सी ऐसी जगह हैं जहाँ ये सो कॉल्ड हिन्दी भाषी नहीं हैं । हालांकि यहाँ राजधानी में भी बिहारी और कहते हैं न कि भैया लोगों के साथ जो व्यवहार होता है वो किसी न किसी दिन भारी पड़ने वाला है मगर गनीमत है कि हिन्दी भाषी होने की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती है । मुझे कोई ये बात कह कर तो देखे , मगर शायद इसके लिए तुलसी दास ने बहुत पहले ही कह दिया था कि समर्थ को नहीं दोष गोसाईं ॥
इस विवाद का चाहे जो भी अंत हो , चाहे जितना भी खराब परिणाम हो मगर इतना तो पता चल ही चुका है कि आने वाले समय में ये नेता लोग इस देश को कभी भाषा, कभी धर्म, कभी जाति, कभी बिना किसी आधार के ही अंग्रेजों की तरह टुकड़े टुकड़े बाँट कर खुद तमाशा देखेंगे। हम पहले भी गधे थे आज भी गधे हैं, और हमेशा ऐसे ही गधे रहेंगे॥
तो भैया हिन्दी बोलने, पढ़ने, लिखने ,समझने, वालों अब भुगतो सालों.
शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2008
हिन्दी भाषी हो , भुगतो सालों
तो एक बार फिर से हिन्दी भाषियों को अपनी खानाबदोशी की कीमत चुकानी पड़ रही है। हिन्दी भाषी क्या , सीधा-सीधा, कहो न बिहारी और यू पी वालों को। देश के सबसे बड़ी जनसंख्या वाले इन दो राज्यों के हम जैसे लोग सच्मुघ आज के खानाबदोश ही तो है। कभी पढाई, कभी रोजगार, तो कभी व्यवसाय के लिए मजबूर होकर दिल्ली, बम्बई ,कलकत्ता जैसे महानगरों का रुख कर लेते हैं। वहाँ अपना खून पसीना , अपना श्रम, अपना समय, अपनी सोच लगाकर उस स्थान विशेष के लिए करते रहने के साथ=साथ अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत रहते हैं। इन महानगरों में अपनी सरलता, सच्चाई, निरक्षरता, के लिए कदम-कदम पर अपमानित होते रहने की नियति के साथ=साथ कभी असम, कभी बंगाल, कभी विदर्भ तो कभी महाराष्ट्र में अचानक ही शरणार्थियों से भी बदतर स्थिति में पहुंच जाते हैं॥
राज ठाकरे के बाद दिल्ली के तेजेंद्र खन्ना ने अपने हिस्से का जहर उगल दिया। भैया कलकत्ता मद्रास वालों आप लोग भी अपना विचार दे ही दो ताकि पता तो चले कि हमारी औकात क्या है। खूब मारो-पीतो, नोचो-, तोड़ो-फोडो, । मगर यार मेरी सकझ में एक बात नहीं आती, रिक्शे वाले, पान वाले, सब्जी वाले, को पीटने से क्या होगा। यार बडे मंत्रियों , अधिकारियों , उद्योगोपतियों, कर्मचारियों को पीट-पात कर भगाओ तो हिम्मत की बात है। मीडिया , सरकार, दफ्तर, बैंक, हस्पताल, कौन सी ऐसी जगह हैं जहाँ ये सो कॉल्ड हिन्दी भाषी नहीं हैं । हालांकि यहाँ राजधानी में भी बिहारी और कहते हैं न कि भैया लोगों के साथ जो व्यवहार होता है वो किसी न किसी दिन भारी पड़ने वाला है मगर गनीमत है कि हिन्दी भाषी होने की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती है । मुझे कोई ये बात कह कर तो देखे , मगर शायद इसके लिए तुलसी दास ने बहुत पहले ही कह दिया था कि समर्थ को नहीं दोष गोसाईं ॥
इस विवाद का चाहे जो भी अंत हो , चाहे जितना भी खराब परिणाम हो मगर इतना तो पता चल ही चुका है कि आने वाले समय में ये नेता लोग इस देश को कभी भाषा, कभी धर्म, कभी जाति, कभी बिना किसी आधार के ही अंग्रेजों की तरह टुकड़े टुकड़े बाँट कर खुद तमाशा देखेंगे। हम पहले भी गधे थे आज भी गधे हैं, और हमेशा ऐसे ही गधे रहेंगे॥
तो भैया हिन्दी बोलने, पढ़ने, लिखने ,समझने, वालों अब भुगतो सालों.
राज ठाकरे के बाद दिल्ली के तेजेंद्र खन्ना ने अपने हिस्से का जहर उगल दिया। भैया कलकत्ता मद्रास वालों आप लोग भी अपना विचार दे ही दो ताकि पता तो चले कि हमारी औकात क्या है। खूब मारो-पीतो, नोचो-, तोड़ो-फोडो, । मगर यार मेरी सकझ में एक बात नहीं आती, रिक्शे वाले, पान वाले, सब्जी वाले, को पीटने से क्या होगा। यार बडे मंत्रियों , अधिकारियों , उद्योगोपतियों, कर्मचारियों को पीट-पात कर भगाओ तो हिम्मत की बात है। मीडिया , सरकार, दफ्तर, बैंक, हस्पताल, कौन सी ऐसी जगह हैं जहाँ ये सो कॉल्ड हिन्दी भाषी नहीं हैं । हालांकि यहाँ राजधानी में भी बिहारी और कहते हैं न कि भैया लोगों के साथ जो व्यवहार होता है वो किसी न किसी दिन भारी पड़ने वाला है मगर गनीमत है कि हिन्दी भाषी होने की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती है । मुझे कोई ये बात कह कर तो देखे , मगर शायद इसके लिए तुलसी दास ने बहुत पहले ही कह दिया था कि समर्थ को नहीं दोष गोसाईं ॥
इस विवाद का चाहे जो भी अंत हो , चाहे जितना भी खराब परिणाम हो मगर इतना तो पता चल ही चुका है कि आने वाले समय में ये नेता लोग इस देश को कभी भाषा, कभी धर्म, कभी जाति, कभी बिना किसी आधार के ही अंग्रेजों की तरह टुकड़े टुकड़े बाँट कर खुद तमाशा देखेंगे। हम पहले भी गधे थे आज भी गधे हैं, और हमेशा ऐसे ही गधे रहेंगे॥
तो भैया हिन्दी बोलने, पढ़ने, लिखने ,समझने, वालों अब भुगतो सालों.
गुरुवार, 7 फ़रवरी 2008
दर्द संभालता हूँ मैं ( एक कविता )
हर पल,
इक नया ,
वक़्त ,
तलाशता हूँ मैं॥
जो मुझ संग,
हँसे रोये,
वो बुत,
तराश्ता हूँ मैं॥
मेरी फितरत ,
ही ऐसी है कि,
रोज़ नए दर्द,
संभालता हूँ मैं॥
परवरिश हुई है,
कुछ इस तरह से कि,
कभी जख्म मुझे, कभी,
जख्मों को पालता हूँ मैं॥
सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥
वो कहते हैं कि,
धधकती हैं मेरी आखें,
क्या करूं कि सीने में,
इक आग उबालता हूँ मैं॥
क्या करूं , ऐसा ही हूँ मैं....
इक नया ,
वक़्त ,
तलाशता हूँ मैं॥
जो मुझ संग,
हँसे रोये,
वो बुत,
तराश्ता हूँ मैं॥
मेरी फितरत ,
ही ऐसी है कि,
रोज़ नए दर्द,
संभालता हूँ मैं॥
परवरिश हुई है,
कुछ इस तरह से कि,
कभी जख्म मुझे, कभी,
जख्मों को पालता हूँ मैं॥
सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥
वो कहते हैं कि,
धधकती हैं मेरी आखें,
क्या करूं कि सीने में,
इक आग उबालता हूँ मैं॥
क्या करूं , ऐसा ही हूँ मैं....
दर्द संभालता हूँ मैं ( एक कविता )
हर पल,
इक नया ,
वक़्त ,
तलाशता हूँ मैं॥
जो मुझ संग,
हँसे रोये,
वो बुत,
तराश्ता हूँ मैं॥
मेरी फितरत ,
ही ऐसी है कि,
रोज़ नए दर्द,
संभालता हूँ मैं॥
परवरिश हुई है,
कुछ इस तरह से कि,
कभी जख्म मुझे, कभी,
जख्मों को पालता हूँ मैं॥
सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥
वो कहते हैं कि,
धधकती हैं मेरी आखें,
क्या करूं कि सीने में,
इक आग उबालता हूँ मैं॥
क्या करूं , ऐसा ही हूँ मैं....
इक नया ,
वक़्त ,
तलाशता हूँ मैं॥
जो मुझ संग,
हँसे रोये,
वो बुत,
तराश्ता हूँ मैं॥
मेरी फितरत ,
ही ऐसी है कि,
रोज़ नए दर्द,
संभालता हूँ मैं॥
परवरिश हुई है,
कुछ इस तरह से कि,
कभी जख्म मुझे, कभी,
जख्मों को पालता हूँ मैं॥
सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥
वो कहते हैं कि,
धधकती हैं मेरी आखें,
क्या करूं कि सीने में,
इक आग उबालता हूँ मैं॥
क्या करूं , ऐसा ही हूँ मैं....
बुधवार, 6 फ़रवरी 2008
पापिन ( एक लघु कथा )
राज प्रताप आज फिर पी कर आया था। पिछले कई दिनों से , जब से सुषमा , उसकी पत्नी , उसे छोड़ कर अपने भाई के यहाँ रहने चली गयी थी , तभी से वह रोज़ देर रात को खूब पीकर लुढ़कते , गिरते पड़ते घर पहुंचता था।
दरवाज़े पर जोर की धडाम की आवाज़ सुनाई देते ही कमली समझ गयी थी कि आज फिर बाबूजी पीकर आये हैं। कमली तो उसी दिन काम छोड़ कर चली गयी होती जिस दिन बीबीजी घर छोड़ कर चली गयी थी। उसे बीबीजी ने ही काम पर रखा था। मगर उसके लिए मुश्किल ये हो रही थी कि जाते समय उससे बीबीजी मिल नहीं पायी थी। और बिना बताये काम छोड़ कर जाने को उसका मन नहीं मान रहा था।
" क्या बात है इतनी देर लगती है तुझे दरवाजा खोलने में , तुम सारी औरतें एक जैसी ही होती हो । " घर में घुसते ही राज भड़क कर बोला। आज कमली को बाबूजी के तेवर कुछ ठीक नहीं लग रहे थे। उसने डरते डरते खा " बाबूजी कहे अपना जीबन खराब करत हो जाये के बीबीजी के मन लयो और घर लाये आओ।
" अबे चुप, तू मुझे समझा रही है जाती है तो जाने दे , मुझे और भी मिल जायेंगी। और क्यों तू क्या खराब है "
कहते कहते राज ने कमली का हाथ पकड़ लिया।
नहीं नहीं बाबूजी ई का करत हो, हमका छोड़ दो , कहे अपना इमान खराब करत हो , हमका जाये दो " कमली गिदगिदाने लगी। मगर राज के सिर पर तो शराब का भूत सवार था, " अरे जा जा मुझे क्या तेरे बारे मैं मालोम नहीं है , क्यों घबराती है मैं तुझे मालामाल कर दूंगा ॥
कमली अपने आपको छुडाने का भरसक प्रयास कर रही थी। मगर जब उससे bardaasht नहीं हुआ तो वह जोर से चीख पडी। " हमका छोड़ दो बाबू हमका अपना आदमी से ऊ गंदा वाला बीमारी हुई गयी है। हमसे दूर हुए जाओ।"
तभी जोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज़ आये और कमली दौड़ कर दरवाजा खोले गयी। सामने बीबीजी खडी थी। उसकी जान में जान आयी।
राज के सर से सारा नशा उतर गया था। वो जोर से चीख कर बोला " अच्छा हुआ सुषमा तुम अ गयी इसे अभी बाहर निकालो ये गंदी औरत है इसे एड्स है , तुम्हारी गैर्हाज्री में ये मुझे बर्बाद करने पर तुली हुई थी। इस पापिन को बाहर निकालो ॥
मगर वो पापं बिना कुछ बोले घर से बाहर निकल गयी। हमेशा हमेशा के लिए..
दरवाज़े पर जोर की धडाम की आवाज़ सुनाई देते ही कमली समझ गयी थी कि आज फिर बाबूजी पीकर आये हैं। कमली तो उसी दिन काम छोड़ कर चली गयी होती जिस दिन बीबीजी घर छोड़ कर चली गयी थी। उसे बीबीजी ने ही काम पर रखा था। मगर उसके लिए मुश्किल ये हो रही थी कि जाते समय उससे बीबीजी मिल नहीं पायी थी। और बिना बताये काम छोड़ कर जाने को उसका मन नहीं मान रहा था।
" क्या बात है इतनी देर लगती है तुझे दरवाजा खोलने में , तुम सारी औरतें एक जैसी ही होती हो । " घर में घुसते ही राज भड़क कर बोला। आज कमली को बाबूजी के तेवर कुछ ठीक नहीं लग रहे थे। उसने डरते डरते खा " बाबूजी कहे अपना जीबन खराब करत हो जाये के बीबीजी के मन लयो और घर लाये आओ।
" अबे चुप, तू मुझे समझा रही है जाती है तो जाने दे , मुझे और भी मिल जायेंगी। और क्यों तू क्या खराब है "
कहते कहते राज ने कमली का हाथ पकड़ लिया।
नहीं नहीं बाबूजी ई का करत हो, हमका छोड़ दो , कहे अपना इमान खराब करत हो , हमका जाये दो " कमली गिदगिदाने लगी। मगर राज के सिर पर तो शराब का भूत सवार था, " अरे जा जा मुझे क्या तेरे बारे मैं मालोम नहीं है , क्यों घबराती है मैं तुझे मालामाल कर दूंगा ॥
कमली अपने आपको छुडाने का भरसक प्रयास कर रही थी। मगर जब उससे bardaasht नहीं हुआ तो वह जोर से चीख पडी। " हमका छोड़ दो बाबू हमका अपना आदमी से ऊ गंदा वाला बीमारी हुई गयी है। हमसे दूर हुए जाओ।"
तभी जोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज़ आये और कमली दौड़ कर दरवाजा खोले गयी। सामने बीबीजी खडी थी। उसकी जान में जान आयी।
राज के सर से सारा नशा उतर गया था। वो जोर से चीख कर बोला " अच्छा हुआ सुषमा तुम अ गयी इसे अभी बाहर निकालो ये गंदी औरत है इसे एड्स है , तुम्हारी गैर्हाज्री में ये मुझे बर्बाद करने पर तुली हुई थी। इस पापिन को बाहर निकालो ॥
मगर वो पापं बिना कुछ बोले घर से बाहर निकल गयी। हमेशा हमेशा के लिए..
वो लड़कपन के दिन (एक कविता )
काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥
खुदा कसम,
उस बचपने और,
उस मासूमियत से,
यहाँ फिर कभी मैं,
न लॉट के आता॥
वो कागज़ की नाव,
वो कागज़ की प्लेन,
और कागज़ की पतंग,
हर बच्चा, हर रोज़,
कागज़ की कोई दुनिया बनाता॥
कभी पतंगों की लूट,
कभी झगडे झूठ मूठ,
वो छोटी सी साइकल,
उसकी घंटी की टन टन , अब,
कार में कहाँ वो आनंद है आता॥
वो होली-दिवाली का,
महीनों पहले से इंतज़ार,
कहाँ भूल पाया हूँ,
वो बचपन का प्यार, काश कि,
खुदा फिर उससे मिलाता॥
कभी बाबूजी की दांत, कभी माँ का लाड,
कभी काच्चे अमरुद, कभी बेरी का झाड़,
बीता जो लड़कपन तो ,
बना ये जीवन पहाड़, काश कि,
ये पहाड़ मैं कभी चढ़ न पाता॥
काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में, फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥????
क्या आपको भी वो दिन सताते हैं , या कि कुछ याद दिलाते हैं??
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥
खुदा कसम,
उस बचपने और,
उस मासूमियत से,
यहाँ फिर कभी मैं,
न लॉट के आता॥
वो कागज़ की नाव,
वो कागज़ की प्लेन,
और कागज़ की पतंग,
हर बच्चा, हर रोज़,
कागज़ की कोई दुनिया बनाता॥
कभी पतंगों की लूट,
कभी झगडे झूठ मूठ,
वो छोटी सी साइकल,
उसकी घंटी की टन टन , अब,
कार में कहाँ वो आनंद है आता॥
वो होली-दिवाली का,
महीनों पहले से इंतज़ार,
कहाँ भूल पाया हूँ,
वो बचपन का प्यार, काश कि,
खुदा फिर उससे मिलाता॥
कभी बाबूजी की दांत, कभी माँ का लाड,
कभी काच्चे अमरुद, कभी बेरी का झाड़,
बीता जो लड़कपन तो ,
बना ये जीवन पहाड़, काश कि,
ये पहाड़ मैं कभी चढ़ न पाता॥
काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में, फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥????
क्या आपको भी वो दिन सताते हैं , या कि कुछ याद दिलाते हैं??
वो लड़कपन के दिन (एक कविता )
काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥
खुदा कसम,
उस बचपने और,
उस मासूमियत से,
यहाँ फिर कभी मैं,
न लॉट के आता॥
वो कागज़ की नाव,
वो कागज़ की प्लेन,
और कागज़ की पतंग,
हर बच्चा, हर रोज़,
कागज़ की कोई दुनिया बनाता॥
कभी पतंगों की लूट,
कभी झगडे झूठ मूठ,
वो छोटी सी साइकल,
उसकी घंटी की टन टन , अब,
कार में कहाँ वो आनंद है आता॥
वो होली-दिवाली का,
महीनों पहले से इंतज़ार,
कहाँ भूल पाया हूँ,
वो बचपन का प्यार, काश कि,
खुदा फिर उससे मिलाता॥
कभी बाबूजी की दांत, कभी माँ का लाड,
कभी काच्चे अमरुद, कभी बेरी का झाड़,
बीता जो लड़कपन तो ,
बना ये जीवन पहाड़, काश कि,
ये पहाड़ मैं कभी चढ़ न पाता॥
काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में, फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥????
क्या आपको भी वो दिन सताते हैं , या कि कुछ याद दिलाते हैं??
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥
खुदा कसम,
उस बचपने और,
उस मासूमियत से,
यहाँ फिर कभी मैं,
न लॉट के आता॥
वो कागज़ की नाव,
वो कागज़ की प्लेन,
और कागज़ की पतंग,
हर बच्चा, हर रोज़,
कागज़ की कोई दुनिया बनाता॥
कभी पतंगों की लूट,
कभी झगडे झूठ मूठ,
वो छोटी सी साइकल,
उसकी घंटी की टन टन , अब,
कार में कहाँ वो आनंद है आता॥
वो होली-दिवाली का,
महीनों पहले से इंतज़ार,
कहाँ भूल पाया हूँ,
वो बचपन का प्यार, काश कि,
खुदा फिर उससे मिलाता॥
कभी बाबूजी की दांत, कभी माँ का लाड,
कभी काच्चे अमरुद, कभी बेरी का झाड़,
बीता जो लड़कपन तो ,
बना ये जीवन पहाड़, काश कि,
ये पहाड़ मैं कभी चढ़ न पाता॥
काश कि ,
कभी उन,
लड़कपन के,
दिनों में, फिर से,
जो लॉट मैं पाता॥????
क्या आपको भी वो दिन सताते हैं , या कि कुछ याद दिलाते हैं??
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