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रविवार, 10 अप्रैल 2011

इस जनांदोलन की शुरूआत ने किसे क्या दिया ?? ............अजय कुमार झा


एक आगाज़ है ये , अंजाम तो अभी बांकी है


पिछले पांच दिनों में जो कुछ देश ने देखा , जो कुछ भारतीय अवाम ने किया , वो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में शायद आजादी के बाद पहली बार ही हुआ था । हालांकि बहुत से मुद्दों पर इससे बडे बडे जनसमूह ने अपनी मांगों को लेकर इससे भी बडे प्रयास किए और जीते भी हैं लेकिन फ़िर भी आजादी के बासठ वर्षों के बाद पिछले पांच दिनों में ही लोकतंत्र की आत्मा को उसकी ताकत को सबने एक स्वर में महसूस किया है । अब चूंकि ये जनांदोलन अपना रंग दिखाने लगा है तो ये बहुत जरूरी है कि इस माहौल को , वातावरण को  बरकरार रखा जाए और आज जनमानस के सामने यही सबसे बडी चुनौती है । अब सबको ये समझ लेना चाहिए कि ये आग जो अन्ना की एक हुंकार पर लोगों के भीतर सुलग उठी है उसे अपने अपने स्तर पर अपने अपने दायरे में , अपने घरों दफ़्तरों , मुहल्लों , गलियों शहरों में उबालते रहना होगा अगर वाकई सब चाहते हैं कि देश बदले देश की तकदीर बदले । जो लोग इस आंदोलन को क्षणिक आवेश मात्र मान रहे हैं उन्हें कुछ बताना जरूरी हो जाता है कि इस शुरूआत ने आखिर इस देश को इस समाज को , इस सरकार को  , और सबको क्या क्या दिया ।
आंदोलन का जयघोष हो चुका है


सबसे पहले बात राजनेताओं की , इस आंदोलन ने उन्हें ये सबक दे दिया है कि अब अवाम किसी भी राजनीतिक दल की मोहताज़ नहीं रहेगी वो अब चोरों में से एक चोर चुनने के लिए ही मजबूर होकर नहीं बैठेगी , वो अपना हीरो अपने बीच में से ही खुद चुन लेगी ..और अगर हीरो न भी मिला तो खुद ही हीरो हो लेगी । अब उसे धर्म , जाति , क्षेत्र आदि के सहारे बंट कर या बांट कर लडने की जरूरत नहीं रह जाएगी , वो आएगी , ऐसे ही किसी मुद्दे को पकडेगी , सरकार को घेरेगी , सत्ता को ललकारेगी और फ़िर जीत कर उसके मुंह पर तमाचा मार के चल देगी । कुछ राजनीतिज्ञ जो इस कोशिश में आंदोलन के दौरान अपनी किस्मत चमकाने की गर्ज़ से आए भी थे वे भी अपना सा मुंह लेकर चलते बने क्योंकि उस वक्त जनता अपनी आंखें खोले पूरी तरह बेशर्म निर्लज्ज , बेखौफ़ और बेलिहाज़ होकर बैठी थी सो वहीं से उलटे पांव खदेड दिया उनको ।
सजग मीडिया , चुस्त और मुस्तैद

इस आंदोलन ने मीडिया को ये बता दिया कि अगर वे सच्चाई का साथ देंगे , अगर वे पत्रकारिता के धर्म को निर्वाह करने का जज़्बा दिखाएंगे . जो कि उन्हें अपना बाज़ार बचाए रखने के लिए भी देना ही होगा क्योंकि आखिर उस बाज़ार के खरीददार जब खुद ही उन समाचारों के , उन खबरों के केंद्र में होंगे तो ही वे खुद पर विश्वास को जीत पाएंगे और जनता के दिल में भी अपने लिए वही जगह बना सकेंगें जिसके लिए उन्हें लोकतंत्र का चौथा खंबा माना कहा जाता रहा है । जीत के जश्न में कुछ खुद को बहुत ही प्रबुद्ध पत्रकार समझने वाले लोग जब जबरन घुस कर वहां अपना मीडियापन दिखाने की कोशिश करने की जुगत में थे तो अवाम ने उनके साथ भी वही सलूक किया जो उन्होंने राजनेताओं के साथ किया था । मीडिया को भी इस बात का एहसास हो गया था कि असली लडाई , असली मुद्दे , असली लोग ही असली खबर हैं बांकी सब तो बस दुकानदारी है और कुछ नहीं । ये अब टीआरपी का रिकॉर्ड रखने वाले खुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि क्रिकेट विश्व कप को जुनून की तरह देखने वाली जनता ने दो दिन बाद से ही आंदोलन की एक एक खबर को सीने से लगाए रखा । मीडिया को ये भी एहसास हुआ होगा कि अगर वो चाहें तो अब भी देश की विचारधारा को बनाने और मोडने वाली शक्ति बन सकते हैं जैसा कि इस बार उन्होंने बन के दिखाया ।

ये है युवा जोश , युवा जुनून ,

अक्सर जब इस तरह के सामाजिक प्रयास किए गए या ऐसी कोई कोशिश की जाती रही है  तो समाज को हमेशा ही ये शिकायत रही है कि देश का युवा इन आंदोलनों से और ऐसे सभी प्रयासों से न सिर्फ़ खुद को अलग रखता आया है बल्कि अपने बीच इसे बेहद उदासीन मानता समझता रहा है । इस जनांदोलन में युवाओं के झुकाव ने , उनके जोश ने , उनके जज़्बे ने पूरे देश की धारणा को न सिर्फ़ गलत साबित किया बल्कि खुद के साथ ही पूरे समाज को दिखा बता और जता भी दिया कि अगर वो शीला मुन्नी जैसे गानों पर मदहोश होके नाच सकता है अगर क्रिकेट विश्वकप के उन्मादी जुनून को सिर माथे लगा सकता है तो फ़िर देश को बदलने के लिए इस तरह की तहरीरों में भी शिरकत कर सकता है । इस पूरे आंदोलन का खाका तैयार करने में , उसके समर्थन में माहौल बनाने में , लोगों को जोडने में और तो और इतनी बडी भीड को नियंत्रित करके रखने तक में युवाओं की जो भूमिका रही है उस पर देश को गर्व होना चाहिए । युवा जान गए हैं कि अगर अपना भविष्य बचाना है , बनाना है तो फ़िर ये भी करना ही होगा ।

सबसे बडा संदेश गया है देश की सरकार को , सत्ता के मद में चूर वातानुकूलित कमरों में बैठ कर सवा अरब की जनसंख्या की आखों में धूल झोंकने वाले उन सवा पांच सौ लोगों को कि ये लोकतंत्र है और इस लोकतंत्र की मालिक अब भी आम अवाम ही है । जनता ही जनार्दन है , ये अलग बात है कि उसने इतने दिनों तक ढील दे रखी थी लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं लगाना चाहिए कि जनता बेवकूफ़ है । सरकार को पहली बार ये एहसास हो गया है कि जो जनता उन्हें इस सत्ता पर बिठा सकती है वो अपने लिए , देश के लिए सही कानून , सही नीतियां , खजाने का हिसाब , और इन जनसेवकों को जनसेवा का मतलब समझा भी सकती है । अभी तो ये लडाई शुरू ही हुई है . वो भी सीमित मांग और सीमित साधनों और एक संतुलित नपे तुले राह को पकड के । कल्पना करिए कि अगर यही जनता मिस्र का रास्ता अख्तियार कर लेती तो कौन बचा सकता था इस सरकार को और उसके नुमाइंदों को ।
ये लोकतंत्र है , इसे भीड समझने की भूल करना खुशफ़हमी पालने जैसा है

इसलिए ये कह भर देना कि ये बस एक क्षणिक आवेश भर था जो समय के साथ भुला दिया जाएगा एक खुशफ़हमी की तरह है । अन्ना हज़ारे ने अल्टीमेटम दे दिया है कि अगर पंद्रह अगस्त तक ये जनलोकपाल विधेयक नहीं पारित हुआ तो फ़िर फ़िर वही जंतर और फ़िर वही मंतर । और अबकि तो शायद जनता पांच दिन का इंतज़ार भी न करे ....


18 टिप्‍पणियां:

  1. हम सबको आशा मिली है सुन्दर भविष्य की।

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  2. आपके इस सुन्दर लेख में की गयी विवेचना काफी तथ्यपरकहै.आपका यह कहना सही है कि
    "अभी तो ये लडाई शुरू ही हुई है . वो भी सीमित मांग और सीमित साधनों और एक संतुलित नपे तुले राह को पकड के"

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  3. इस अभूतपूर्व जीत के लिए बधाई हो आप सब को, साथ ही बधाई के पात्र हैं किरण बेदी जी, अरविन्द कजरिवल जी, स्वामी अग्निवेश जी जिन्होंने इस जीत में निर्णायक भूमिका निभाई
    अभी तो ये अंगड़ाई है!
    आगे और लड़ाई है !

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  4. Sahi kaha aapne.. ye bas aaghaaz h... kewal is jan lokpal bill k pass ho lene ko apni jeet samajh lena galti hogi... abhi to is jazbe ko barkaraar rakhna h.. in short.. picture abhi baaki h dosto :)

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  5. किसी को कुछ मिला या नहीं परंतु मीडिया को एक बड़ा इवेंट और पत्रकारों को भागदौड़ की एक जायज़ वजह जरूर मिल गई और माल तो मिला ही।
    ऐसे आंदोलन और ऐसी कवरेज होती रहनी चाहिए समृद्धि की ओर बढ़ने के लिए ।

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  6. काफी ऊर्जायमान था यह प्रयोग. लेकिन मीडिया का रोल कहीं न कहीं कुछ रहस्यमय रहा. फरवरी में, पिछले साल नवम्बर में हुये बड़े बड़े प्रदर्शनों की कैसी कवरेज दी, सब जानते हैं, इसलिये मीडिया पर जरूर संदेह होता है...

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  7. यह बात महत्वपूर्ण है कि इस आन्दोलन से समाज को,देश को क्या मिला ? किसी को व्यक्तिगत क्या लाभ हुआ,यह परखने वाले तो नेताई-किस्म के ही मानुष हो सकते हैं.

    कोई भी आन्दोलन में हमेशा आहुति माँगता है,और ऐसे विरले ही होंगे जो पूर्णाहुति के साक्षी बनेंगे !

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  8. आशा की नई किरण, जो ईजाद करने में हम देर तो कर सकते हैं, चूकते कभी नहीं.

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  9. हाँ आशा है की ये जन लोकपाल इस देश की सड़ चुकी व्यवस्था को जिन्दा कर उसे आम लोगों के जनकल्याण के लिए काम करने को मजबूर करेगा और इस देश के आम लोगों के चेहरे पे ख़ुशी दिखेगी...

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  10. जीत के लिए बधाई
    par shuaat to karni hi hogi
    shuruaat nahi hogi to jeet kaisi.........

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  11. अगर सभी कोशिश करें, सामूहिक स्तर पर या फिर व्यक्तिगत स्तर पर.... कम से कम अपने अन्दर के भ्रष्टाचारी को समाप्त कर देंगे तो यह क्रांति अंजाम तक ज़रूर पहुंचेगी..

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  12. भैया मैं इस बात से एकदम सहमत हूँ -
    "पिछले पांच दिनों में जो कुछ देश ने देखा , जो कुछ भारतीय अवाम ने किया , वो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में शायद आजादी के बाद पहली बार ही हुआ था ।"

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  13. अभी-अभी समाचार पढ़कर बहुत आघात हुआ और दुःख पहुंचा. शकुन्तला प्रेस ऑफ़ इंडिया प्रकाशन परिवार अजय कुमार झा जी के पिताश्री को श्रद्धाँजलि अर्पित करते हुए परमपिता परमात्मा से दिवंगत की आत्मा को शांति और शोक संतप्त परिजनों को यह आघात सहन करने की शक्ति देने की प्रार्थना करता है.दुःख की इस घडी में हम सब अजय कुमार झा जी के साथ है.

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  14. देश और समाजहित में देशवासियों/पाठकों/ब्लागरों के नाम संदेश:-
    मुझे समझ नहीं आता आखिर क्यों यहाँ ब्लॉग पर एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाना चाहते हैं? पता नहीं कहाँ से इतना वक्त निकाल लेते हैं ऐसे व्यक्ति. एक भी इंसान यह कहीं पर भी या किसी भी धर्म में यह लिखा हुआ दिखा दें कि-हमें आपस में बैर करना चाहिए. फिर क्यों यह धर्मों की लड़ाई में वक्त ख़राब करते हैं. हम में और स्वार्थी राजनीतिकों में क्या फर्क रह जायेगा. धर्मों की लड़ाई लड़ने वालों से सिर्फ एक बात पूछना चाहता हूँ. क्या उन्होंने जितना वक्त यहाँ लड़ाई में खर्च किया है उसका आधा वक्त किसी की निस्वार्थ भावना से मदद करने में खर्च किया है. जैसे-किसी का शिकायती पत्र लिखना, पहचान पत्र का फॉर्म भरना, अंग्रेजी के पत्र का अनुवाद करना आदि . अगर आप में कोई यह कहता है कि-हमारे पास कभी कोई आया ही नहीं. तब आपने आज तक कुछ किया नहीं होगा. इसलिए कोई आता ही नहीं. मेरे पास तो लोगों की लाईन लगी रहती हैं. अगर कोई निस्वार्थ सेवा करना चाहता हैं. तब आप अपना नाम, पता और फ़ोन नं. मुझे ईमेल कर दें और सेवा करने में कौन-सा समय और कितना समय दे सकते हैं लिखकर भेज दें. मैं आपके पास ही के क्षेत्र के लोग मदद प्राप्त करने के लिए भेज देता हूँ. दोस्तों, यह भारत देश हमारा है और साबित कर दो कि-हमने भारत देश की ऐसी धरती पर जन्म लिया है. जहाँ "इंसानियत" से बढ़कर कोई "धर्म" नहीं है और देश की सेवा से बढ़कर कोई बड़ा धर्म नहीं हैं. क्या हम ब्लोगिंग करने के बहाने द्वेष भावना को नहीं बढ़ा रहे हैं? क्यों नहीं आप सभी व्यक्ति अपने किसी ब्लॉगर मित्र की ओर मदद का हाथ बढ़ाते हैं और किसी को आपकी कोई जरूरत (किसी मोड़ पर) तो नहीं है? कहाँ गुम या खोती जा रही हैं हमारी नैतिकता?

    मेरे बारे में एक वेबसाइट को अपनी जन्मतिथि, समय और स्थान भेजने के बाद यह कहना है कि- आप अपने पिछले जन्म में एक थिएटर कलाकार थे. आप कला के लिए जुनून अपने विचारों में स्वतंत्र है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं. यह पता नहीं कितना सच है, मगर अंजाने में हुई किसी प्रकार की गलती के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ. अब देखते हैं मुझे मेरी गलती का कितने व्यक्ति अहसास करते हैं और मुझे "क्षमादान" देते हैं.
    आपका अपना नाचीज़ दोस्त रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"

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  15. ठीक कह रहे हैं,पर देखिए कि हम अंततः अपने मक़सद में क़ामयाब होते हैं कि नहीं।

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  16. शादी की वर्षगांठ पर बधाई

    आपका स्वागत है.
    दुनाली चलने की ख्वाहिश...
    तीखा तड़का कौन किसका नेता?

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

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