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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

इरोम की लडाई ..एक दशक का अनशन









रविवार ,2 अक्तूबर , को जंतर मंतर दिल्ली पर शांति मार्च का आयोजन करते , इरोम की लडाई में साथ आए दोस्त , जिनमें एक मैं भी था , और हमारे मित्र मयंक सक्सेना जी भी , जिनके एक संदेश से मैं यहां पहुंच सका














पिछले दिनों जनलोकपाल बिल को लेकर , जिस तरह से पूरे देश के अवाम के बीच एक उथल पुथल , व्यवस्था और सरकार के विरूद्ध  आक्रोश के साथ साथ पहली बार ऐसा हुआ कि किसी प्रस्तावित कानून के मसौदे और उसके प्रावधानों को लेकर जनता के बीच जम कर बहस चली । और इस बहस की न सिर्फ़ आवाज़ संसद तक पहुंची बल्कि थकहार कर उन्हें भी जनता की भावना को पटल पर रखना पडा । ये पिछले साठ सालों में पहली बार हुआ कि जनता ने खुल कर कहा कि यदि कानून समाज के लिए ही बनाए जाते हैं , आम लोगों के लिए बनाए जाते हैं तो फ़िर उन्हें बनाने का हक भी समाज को ही मिलना चाहिए , कम से कम उतना तो जरूर ही कि पिछले सभी बने हुए कानूनों में जानबूझ कर छोडे गए छिद्रों की गुंजाईश को कम किया जा सके । एक साल में दो दो बार आम जनता को सडक पर उतरने के लिए उद्वेलित करने वाले अन्ना हज़ारे ने जब अनशन का रास्ता अपनाया , और न सिर्फ़ अपनाया बल्कि अनशन की ताकत भी दिखा दी तो स्वाभाविक रूप से देश में पिछले कुछ वर्षों में तेज़ हुई एक बहस को फ़िर से हवा दे दी । ये मुद्दा है , मणिपुर की इरोम शर्मिला के अनशन से जुडा हुआ मुद्दा । यानि  The Armed Forces (Special Powers) Act,1958, (As Amended in 1972),को मणिपुर , पूर्वोत्तर राज्यों , आदि से समाप्त करना क्योंकि ये जीवन के नैसर्गिक अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है ।


यूं तो , इस समस्या से जुड कर अब कई पहलुओं पर लोग बहस कर रहे हैं , मसलन क्या पूर्वोत्तर का अलगाववाद , देश, सरकार , समाज   द्वारा उन क्षेत्रों की , की गई घोर उपेक्षा से ही पनपा है । लेकिन इरोम की लडाई का मुद्दा है भारत सरकार का ये कानून । वर्ष २००० में इसी निरंकुश कानून का सहारा लेकर सुरक्षा जवानों ने एक युवती के सामने दस लोगों को मार डाला ।इरोम शर्मिला ही वो युवती थीं जिन्होंने इस घटना को देखा था और उस दिन से लेकर आज तक इरोम ने इस निरंकुश कानून को मणिपुर पर जबरन थोपे जाने का विरोध करते हुए अनशन के रास्ते को अपना लिया । सशस्त्र सेना (विशेष अधिकार ) कानून १९५८ ,संशोधित १९७२ , एक ऐसा कानून जिसमें साधारण अधिकार से ज्यादा ताकत दी गई सुरक्षा बलों को । असम , मणिपुर, मेघालय , नागालैंड , त्रिपुरा और अरूणाचल प्रदेश व मिज़ोरम यानि पूर्वोत्तर राज्यों में इस कानून को लागू किए इस कानून के अनुसार , किसी भी अशांत क्षेत्र में शांति की स्थापना के लिए , सुरक्षा बल के अधिकारी व सैनिक सिर्फ़ शक के आधार पर किसी को गोली तक मार सकते हैं । किसी के भी घर में घुस कर तलाशी ली जा सकती है और किसी को भी बिना वारंट के गिरफ़्तार किया जा सकता है । अशांत क्षेत्र का निर्धारण भी सुरक्षा बल ही स्थिति को देखते हुए कर सकते हैं । आज़ादी के इतने बरसों बाद भी देश की जो सरकार एक तरफ़ खुलेआम सबका कत्ल करने वाले आतंकियों को न्याय के नाम पर सालों सालों जीवित रखती है वहीं दूसरी तरफ़ पूर्वोत्तर राज्यों के निवासियों के साथ इतना गहरा भेदभाव जैसा कानून थोपे बैठी है कि , आज इन राज्यों में ये मानसिकता पनप चुकी है कि वो उस दिन को प्रदेश का काला दिन मानते हैं जिस दिन इन राज्यों का विलय पूरे देश के साथ कर दिया गया था ।







इस पूरे घटनाक्रम में कुछ बातें जो विशेष तौर पर निकल कर सामने आई हैं वो ये कि क्या इतने सालों बाद भी पूर्वोत्तर राज्यों को , उनके निवासियों को , वहां के समाज , वहां की समस्याओं को मुख्य धारा में लाकर देखा समझा जा सका है । अपनी अलग शारिरिक छवि , रंग रूप की बहुलता के कारण , उत्तर पूर्व से बाहर उनकी पहचान , एक उपहासात्मक मानसिकता से जोड दी गई है । आज सिक्किम की बाढ हो या मणिपुर का कोई हादसा न वो राष्ट्रीय मुद्दा है और न ही वो मुद्दा ही रह पाता है । आज जिन कानूनों के लागू होने के कारण वहां के मूल लोगों की जिंदगी के अधिकार को ही छीन लिया गया है , उस अधिकार को हटाने तो दूर आज सरकार उस कानून पर बहस तक करने को तैयार नहीं है । इस अराजक और निरंकुश कानून को हटाए जाने की मांग को लेकर अनशन पर बैठीं इरोम शर्मिला से कोई सिर्फ़ और सिर्फ़ तभी मिल सकता है जब उसके पास मणिपुर के मुख्यमंत्री का आदेश हो । इतनी सख्ती , इतना डर , इतना अलगाव , क्यों , आखिर क्यों । उस देश में क्यों , जो अपने देश के , समाज के और देश के सम्मान के हत्यारे को भी बरसों तक जाने अनजाने देश का मेहमान बनाए रखती है । अपने देश के नागरिकों , से निपटने के लिए विशेष अधिकार वो भी इतना निरंकुश कि सिर्फ़ शांति स्थापना की प्रक्रिया में शक शुबहे पर भी किसी की भी जान ली जा सकती है , और सबसे बडी अमानवीय बात ये है कि ये कानून है , एक विधिक अधिकार ।


इरोम की लडाई को आज एक दशक बीत चुके हैं , और उसकी ये लडाई तब शुरू हुई थी जब मीडिया , आज के जैसा मीडिया नहीं था ,मीडिया ने बाज़ार का रूप नहीं लिया था , इतनी व्यावसायिकता नहीं आई थी । अब समय बदल गया है , पिछले कुछ सालों में पूरे विश्व में हो रहे परिवर्तनों में जिस तरह से आम जनांदोलनों ने भूमिका निभाई है और जन विचार , या एक दिशा देने में मीडिया ने जो भूमिका निभाई है उसे देखते हुए अब ये अपेक्षा की जा रही है कि यदि देश को भविष्य में अपना अस्तित्व और देशवासियों को खुद को बचाए रखना है तो फ़िर अब आम आदमी की हर मांग , उसकी हर बात को मुख्य धारा  में लाकर पूरे देश के सामने रखना  ही होगा ।ये लडाई शुरू हो चुकी है , और अब लोगों ने इरोम की लडाई को दिल्ली की सडकों पर उतारना शुरू कर दिया है । यदि इसी तरह आम आदमी की हर लडाई में देश का आम आदमी जुड जाए तो यकीनन देश का कल , कुछ अलग होगा ॥







अब ये तय कर लिया है कि , इस मुहिम और आम आदमी की हर मुहिम के साथ कदम से कदम और कंधे से कंधे मिला कर चलेंगे ..अब घिसटना मंजूर नहीं है मुझे ...........

रविवार, 10 अप्रैल 2011

इस जनांदोलन की शुरूआत ने किसे क्या दिया ?? ............अजय कुमार झा


एक आगाज़ है ये , अंजाम तो अभी बांकी है


पिछले पांच दिनों में जो कुछ देश ने देखा , जो कुछ भारतीय अवाम ने किया , वो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में शायद आजादी के बाद पहली बार ही हुआ था । हालांकि बहुत से मुद्दों पर इससे बडे बडे जनसमूह ने अपनी मांगों को लेकर इससे भी बडे प्रयास किए और जीते भी हैं लेकिन फ़िर भी आजादी के बासठ वर्षों के बाद पिछले पांच दिनों में ही लोकतंत्र की आत्मा को उसकी ताकत को सबने एक स्वर में महसूस किया है । अब चूंकि ये जनांदोलन अपना रंग दिखाने लगा है तो ये बहुत जरूरी है कि इस माहौल को , वातावरण को  बरकरार रखा जाए और आज जनमानस के सामने यही सबसे बडी चुनौती है । अब सबको ये समझ लेना चाहिए कि ये आग जो अन्ना की एक हुंकार पर लोगों के भीतर सुलग उठी है उसे अपने अपने स्तर पर अपने अपने दायरे में , अपने घरों दफ़्तरों , मुहल्लों , गलियों शहरों में उबालते रहना होगा अगर वाकई सब चाहते हैं कि देश बदले देश की तकदीर बदले । जो लोग इस आंदोलन को क्षणिक आवेश मात्र मान रहे हैं उन्हें कुछ बताना जरूरी हो जाता है कि इस शुरूआत ने आखिर इस देश को इस समाज को , इस सरकार को  , और सबको क्या क्या दिया ।
आंदोलन का जयघोष हो चुका है


सबसे पहले बात राजनेताओं की , इस आंदोलन ने उन्हें ये सबक दे दिया है कि अब अवाम किसी भी राजनीतिक दल की मोहताज़ नहीं रहेगी वो अब चोरों में से एक चोर चुनने के लिए ही मजबूर होकर नहीं बैठेगी , वो अपना हीरो अपने बीच में से ही खुद चुन लेगी ..और अगर हीरो न भी मिला तो खुद ही हीरो हो लेगी । अब उसे धर्म , जाति , क्षेत्र आदि के सहारे बंट कर या बांट कर लडने की जरूरत नहीं रह जाएगी , वो आएगी , ऐसे ही किसी मुद्दे को पकडेगी , सरकार को घेरेगी , सत्ता को ललकारेगी और फ़िर जीत कर उसके मुंह पर तमाचा मार के चल देगी । कुछ राजनीतिज्ञ जो इस कोशिश में आंदोलन के दौरान अपनी किस्मत चमकाने की गर्ज़ से आए भी थे वे भी अपना सा मुंह लेकर चलते बने क्योंकि उस वक्त जनता अपनी आंखें खोले पूरी तरह बेशर्म निर्लज्ज , बेखौफ़ और बेलिहाज़ होकर बैठी थी सो वहीं से उलटे पांव खदेड दिया उनको ।
सजग मीडिया , चुस्त और मुस्तैद

इस आंदोलन ने मीडिया को ये बता दिया कि अगर वे सच्चाई का साथ देंगे , अगर वे पत्रकारिता के धर्म को निर्वाह करने का जज़्बा दिखाएंगे . जो कि उन्हें अपना बाज़ार बचाए रखने के लिए भी देना ही होगा क्योंकि आखिर उस बाज़ार के खरीददार जब खुद ही उन समाचारों के , उन खबरों के केंद्र में होंगे तो ही वे खुद पर विश्वास को जीत पाएंगे और जनता के दिल में भी अपने लिए वही जगह बना सकेंगें जिसके लिए उन्हें लोकतंत्र का चौथा खंबा माना कहा जाता रहा है । जीत के जश्न में कुछ खुद को बहुत ही प्रबुद्ध पत्रकार समझने वाले लोग जब जबरन घुस कर वहां अपना मीडियापन दिखाने की कोशिश करने की जुगत में थे तो अवाम ने उनके साथ भी वही सलूक किया जो उन्होंने राजनेताओं के साथ किया था । मीडिया को भी इस बात का एहसास हो गया था कि असली लडाई , असली मुद्दे , असली लोग ही असली खबर हैं बांकी सब तो बस दुकानदारी है और कुछ नहीं । ये अब टीआरपी का रिकॉर्ड रखने वाले खुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि क्रिकेट विश्व कप को जुनून की तरह देखने वाली जनता ने दो दिन बाद से ही आंदोलन की एक एक खबर को सीने से लगाए रखा । मीडिया को ये भी एहसास हुआ होगा कि अगर वो चाहें तो अब भी देश की विचारधारा को बनाने और मोडने वाली शक्ति बन सकते हैं जैसा कि इस बार उन्होंने बन के दिखाया ।

ये है युवा जोश , युवा जुनून ,

अक्सर जब इस तरह के सामाजिक प्रयास किए गए या ऐसी कोई कोशिश की जाती रही है  तो समाज को हमेशा ही ये शिकायत रही है कि देश का युवा इन आंदोलनों से और ऐसे सभी प्रयासों से न सिर्फ़ खुद को अलग रखता आया है बल्कि अपने बीच इसे बेहद उदासीन मानता समझता रहा है । इस जनांदोलन में युवाओं के झुकाव ने , उनके जोश ने , उनके जज़्बे ने पूरे देश की धारणा को न सिर्फ़ गलत साबित किया बल्कि खुद के साथ ही पूरे समाज को दिखा बता और जता भी दिया कि अगर वो शीला मुन्नी जैसे गानों पर मदहोश होके नाच सकता है अगर क्रिकेट विश्वकप के उन्मादी जुनून को सिर माथे लगा सकता है तो फ़िर देश को बदलने के लिए इस तरह की तहरीरों में भी शिरकत कर सकता है । इस पूरे आंदोलन का खाका तैयार करने में , उसके समर्थन में माहौल बनाने में , लोगों को जोडने में और तो और इतनी बडी भीड को नियंत्रित करके रखने तक में युवाओं की जो भूमिका रही है उस पर देश को गर्व होना चाहिए । युवा जान गए हैं कि अगर अपना भविष्य बचाना है , बनाना है तो फ़िर ये भी करना ही होगा ।

सबसे बडा संदेश गया है देश की सरकार को , सत्ता के मद में चूर वातानुकूलित कमरों में बैठ कर सवा अरब की जनसंख्या की आखों में धूल झोंकने वाले उन सवा पांच सौ लोगों को कि ये लोकतंत्र है और इस लोकतंत्र की मालिक अब भी आम अवाम ही है । जनता ही जनार्दन है , ये अलग बात है कि उसने इतने दिनों तक ढील दे रखी थी लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं लगाना चाहिए कि जनता बेवकूफ़ है । सरकार को पहली बार ये एहसास हो गया है कि जो जनता उन्हें इस सत्ता पर बिठा सकती है वो अपने लिए , देश के लिए सही कानून , सही नीतियां , खजाने का हिसाब , और इन जनसेवकों को जनसेवा का मतलब समझा भी सकती है । अभी तो ये लडाई शुरू ही हुई है . वो भी सीमित मांग और सीमित साधनों और एक संतुलित नपे तुले राह को पकड के । कल्पना करिए कि अगर यही जनता मिस्र का रास्ता अख्तियार कर लेती तो कौन बचा सकता था इस सरकार को और उसके नुमाइंदों को ।
ये लोकतंत्र है , इसे भीड समझने की भूल करना खुशफ़हमी पालने जैसा है

इसलिए ये कह भर देना कि ये बस एक क्षणिक आवेश भर था जो समय के साथ भुला दिया जाएगा एक खुशफ़हमी की तरह है । अन्ना हज़ारे ने अल्टीमेटम दे दिया है कि अगर पंद्रह अगस्त तक ये जनलोकपाल विधेयक नहीं पारित हुआ तो फ़िर फ़िर वही जंतर और फ़िर वही मंतर । और अबकि तो शायद जनता पांच दिन का इंतज़ार भी न करे ....


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