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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

तन्हाइयां बोलती हैं

अभी मन और मष्तिष्क ने रफ़्तार नहीं पकडी है, सो फ़िर कुछ हल्का फुल्का :-

दीवारों-दर से उतर के परछइयां बोलती हैं,
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयां बोलती हैं

परदेश के रास्तों, रुकते कहाँ मुसाफिर,
हर पेड़ कहता है किस्सा, कुस्स्वाईयाँ बोलती हैं

मौसम कहाँ मानता है तहजीब की बंदिशों को,
जिस्म से बाहर निकल के अंगडाइयां बोलती हैं

सुनने की मोहलत मिले तो आवाज हैं पत्थरों में,
गुजरी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं

कहीं बहुत पहले पढा था, अफ़सोस की लेखक का नाम याद नहीं, मगर उन्हें पूरी श्रद्धा के साथ नमन.

4 टिप्‍पणियां:

  1. मौसम कहाँ मानता है तहजीब की बंदिशों को,
    जिस्म से बाहर निकल के अंगडाइयां बोलती हैं॥
    बेहतरीन....वाह.....काश शायर का नाम पता चल पाता....
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी रचना है। काश लेखक का नाम पता होता।

    उत्तर देंहटाएं
  3. aap teeno kaa bahut bahut dhanyavaad, koshish karungaa ki lekhak kaa naam bhee mil jaaye, padhne aur saraahne ke liye shukriya.

    उत्तर देंहटाएं

मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

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