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शुक्रवार, 14 मार्च 2008

एक कविता

दुश्वारियाँ अब,
तोड़ती नहीं,
अब तो,
दर्द से भी,
हम बेचैन नहीं होते॥

अक्सर ही,
फकाकशी ,
गले मिलती है, मुझसे,
साथ खड़े,
कभी मेरे,
सुख-चैन नहीं होते॥

पत्थर के,
इस जंगल में,
क्या बन चुका हूँ,
मैं भी पाषाण,
स्तब्ध मस्तिष्क,
मूक-बधिर मन,
गीले अब कभी,
ये नैन नहीं होते॥

क्या आपके साथ भी ऐसा होता है.....

5 टिप्‍पणियां:

  1. जरुर होता है, पर लोग बताते नहीं। इस लिए पास आते नहीं।

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  2. बहुत ही बढिया रचना है।...सही कहा ऐसा होता है...कभी-कभी।

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  3. बहुत बढ़िया लिखा है - घटती संवेदना को संक्षेप में - बहुत अच्छा लगा - ऐसे ही लिखिए - साभार - मनीष [ पुनश्च - "फ़ाकाकशी" की जगह "फकाकशी" छप गया है ]

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  4. गीले कभी ये नैन नहीं होते? हद है, भैया झाजी, काहे नहीं होते?

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  5. baap re baap hamein nahin pataa tha ki itte bade bade log ee sab padh lenge , hum to behosh hain bhai. joshim jee shukriya main dhyaan rakhungaa.

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

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