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शनिवार, 17 सितंबर 2016

रस्साकशी की सरकार




... डर था वही हुआ जैसे ही लोगों ने चिल्लाना शुरु किया और उनकी चिल्लाहट से प्रेरित होकर मीडिया ने उससे ज्यादा आवाज में चीत्कार राग में रिरियाना शुरू किया कि राजधानी दिल्ली के वह तथाकथित कर्ता धर्ता ऐसे विकट समय में जाने प्रदेश से बाहर क्या कर रहे हैं चीख पुकार मचाई गए एलजी साहब सीएम् साहब मंत्री जी अधिकारी जी हर कोइ , किसी ने किसी वजह से राज्य से बाहर है |

भाई बहुत अच्छे है ,यह समझना आम आदमी के बूते के बाहर की बात है कि ऐसे समय में जबकि एक तरफ तो देशभर में स्वच्छता अभियान का ढिंढोरा पीटा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ राज्य व केंद्र सरकार के आपसी रिश्तों में कड़वाहट का खामियाजा हम लोगों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ रहा है , तो फिर ऐसे में बाहर जाकर अवलोकन विलोकन प्रशिक्षण का कार्यक्रम आगे के लिए क्यों नहीं टाला जा सकता था और वहीं दूसरी तरफ खुद छुट्टियां बिता कर लौटे गवर्नर साहब मानो आते ही रातों रात सुर्खियाँ बटोरने के लिए रात को फैक्स कर बैठे मानो दिल्ली पे हरियाणा ने चढ़ाई कर दी हो ...अच्छा है , देश में सत्तर सालों से राजीनति सेवा से दूकान और फिर दूकान से धंधा बन कर रह गयी है उसकी वजह यही सब है |

  यह तो होना ही था गवर्नर साहब को जबरन दिल्ली बुलाया गया तो ,साहब ने आते ही फोन फैक्स चिट्ठी मनीष सिसोदिया जो कि इन दिनों शिक्षा में सुधार को लेकर के अपने संजीदा प्रयासों को और अधिक समझने व सीखने के लिए फिलहाल विदेश यात्रा पर हैं उन्हें फैक्स भेजकर तुरंत  दिल्ली में उपस्थित होने के लिए कुछ इस तरह के अंदाज में नोटिस भेजा जैसे क्लास का क्लास टीचर मॉनिटर को क्लास से बाहर गया जानकार  भेजता है ,क्योंकि यह दौर फेसबुक ट्विटर प्लस आदि का है इसलिए वहां की पुकार ज्यादा मच जाती है स्वाभाविक भी है ||


अफसोस होता है उस रस्साकशी को देख कर और ऐसा नहीं है कि इसके लिए आप सिर्फ किसी एक निकाय किसी एक संस्था किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं हां यह विडंबना है की एक तरफ पिछले 2 वर्षों से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में स्वच्छता अभियान को एक मिशन के रूप में देखने मानने व समझने का यत्न  किया और बहुत सारे प्रयास किए  जाते रहे हैं लेकिन उन सब का क्या फायदा यदि राजधानी दिल्ली जैसे महानगरों में भी मलेरिया चिकनगुनिया जैसी बीमारियां महामारी का रुप लेकर प्रशासन व् आम लोगों को पूरी तरह से पस्त कर देती है ||



 शीत ऋतु के प्रारंभ तक यहां यह कहा जाए कि ठंड शुरू होने तक इस तरह कि बरसाती बीमारियों का प्रकोप और अधिक रहने की संभावना सिर्फ इस वर्ष बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार बहती चली आई है सरकार इन मौसम से पहले बड़े-बड़े दावे कर ले अपनी तैयारियों का खुलासा करें मगर जमीनी हकीकत तो यही है कि जब जब ऐसी कोई स्थिति विकराल रूप होकर के आपदा का रूप बन जाती है सरकार के पास संसाधन व्यक्ति वह योजनाओं का इस कदर अभाव रहता है कि वह या तो एक दूसरे पर दोषारोपण का कार्य शुरु कर देते हैं सारी स्थिति जाने के बाद जांच वह मुआवजा देकर अपने कार्य की इति श्री कर देते हैं देखना यह है कि राज्य सरकार व केंद्र सरकार या कहा जाए कि नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल के बीच की रस्साकशी पर दिल्ली की आम जनता कब तक कर्तव्य करती रहेगी....


6 टिप्‍पणियां:

  1. आप को दोबारा पूरी रौ मे आते देख बहुत अच्छा लगा रहा है ... जमाये रहिए |

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "विवादित पर जानदार चित्रकार - मक़बूल फ़िदा हुसैन“ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया और आभार शिवम् भाई पोस्ट को स्थान देने के लिए | हाँ सच कहा आपने बहुत दिनों तक उदासीन रहे लिए अब नहीं

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  2. उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया और आभार सुशील जी

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  3. पता नहीं काहे की रस्साकशी है!अधिकार और कर्तव्य जान लें, न समझ में आये तो मिलबैठ कर निर्णय ले लें. जनता क्यों पिस रही है जन प्रतिनिधियों की चक्की में!

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    1. यही तो सबसे बड़ा रोना है देवेन्द्र जी अधिकार की लड़ाई में कर्तव्य बेचारा पिटा पिटाया सा बैठा है मुंह सिये हुए

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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