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रविवार, 8 मई 2011

ब्लॉगिंग ,ब्लॉगर सूक्त वाक्य







यूं तो आप अभी सिर्फ़ लादेन से जुडी खबरों पर विषयों पर और उसकी दाढी मूंछ न काट कटा पाने पर भी लिख सकते हैं अगले एक महीने तक ..( सिंपल है जी , जब लादेन से जुडी बातें खत्म हो तो उसके बच्चों , पोते पोतियों सब पर भिड जाइए ) लेकिन चूंकि पिछले दिनों हिंदी ब्लॉग जगत के अति संवेदनशील घोषित किए जाए चुके भूभाग पर फ़िर से कुछ ब्लॉग हलचलें देखी गई और ब्लॉगटर ( ये रिक्टर पैमाने का एक गूगलीय वर्जन है ) पे इसकी तीव्रता ..अरे अभी आंकी कहां गई है अभी तो लोग नापिए रहे हैं ..अलग अलग थर्मामीटर से ..तो इसलिए ये हमारा  फ़र्ज़ बनता है ...जब उनका बन सकता है जो इस हलचल से हुए नुकसान की .गहराई .वो......दूर से माप रहे थे तो फ़िर हमारा तो जैसे धर्म कर्म मर्म चर्म सब कुछ बनता था इससे रिलेटेड ( देखिए इसके लिए तो अब खास टराई भी नहीं करना होता ..बस कौमा क्वेश्चन मार्क भी लगा देंगे तो भाई लोग खुद रिलेट कर लेंगे ) कुछ लिखने पढने का । सो पढ तो हमने पोस्ट से लेकर अखबार की कतरन तक सब डाली , लेकिन अपना कर्मबोध और जोर मारने लगा तो सोचा कि ये पोस्ट लिखनी भी निहायत ही जरूरी है ,इसलिए लिख ही डाली ।


तो पहला सूक्त नियम ये है कि आप हिंदी ब्लॉगिंग को समय समय पर गरियाते रहें , उसे कोसते रहें , माखौल उडाते रहें , खिल्ली उडाते रहें , और इस काम में आपका सहयोग भी कुछ साहित्यकार , कुछ पत्रकार , कुछ समाचार आदि भरपूर साथ निभाएंगे , और कमाल कि बात ये है कि इसके लिए ये कतई जरूरी नहीं है कि आपने ब्लॉग लेखन कब शुरू किया , पिछली दस पोस्टें भी पढीं हों या न हों ..आप तो शुरूआत ही एक गरियायमान पोस्ट से कर सकते हैं और उससे तो अपके हिट होने के चांसेज़ उसी तरह से हो जाते हैं जैसे ऋतिक रोशन की कहो न प्यार है से एंट्री सुपर डुपर हिट हुई थी । अरे नहीं नहीं, ये जिस थाली में खाया  उसी में छेद किया वाली फ़ीलींग मन में मत रखिए जी , हम तो कहते हैं कि ब्लॉगिंग में उतरे हैं तो मन ही नहीं रखा करिए , बस ढेला उठाया और दन्न से उछाल दिया , देखा कित्ता आसान है । और इसके लिए आप बहाने भी आराम से ढूंढ सकते हैं , बल्कि ये कहना चाहिए कि ..आपका मन होना चाहिए बखिया उधेडने का , बहाना सब आपको खुद तलाश लेगा ।


दूसरा नियम , अगर आप ब्लॉगिंग को मेंटल टाईप से चाहने लगे हों तो फ़िर आपको कम से कम एक बार ब्लॉग बैठक , ब्लॉगर मीट , ब्लॉगर सम्मेलन जरूर करवाना चाहिए , देखिए इससे क्या होगा कि आपके मन में फ़ौरन ही ब्लॉग  अनुरक्ति और ब्लॉगर विरक्ति के भाव उत्पन्न होंगे । और हां एक बात और चाहे आप ब्लॉगर मीट की पूरी तैयारी योजना आयोग को भी सौंप दें और मेट्रो परियोजना के कर्तधर्ता  श्रीधरन जी खुद भी इसे सफ़ल करने पर तुल जाएं तो मजाल है कि उसकी गारंटी कोई ले , सिर्फ़ एक पोस्ट . एक पोस्ट ...हां आगे आपने बिल्कुल ठीक सोचा ..लेकिन फ़िर भी आपको एक बार तो करना ही चाहिए , । चलिए ठीक है इतना भी कंपलसरी नहीं है , लेकिन आप किसी सम्मेलन में शामिल होकर वहां आराम से दांति चियार चियार के दोस्तों के साथ सब बात मुलाकात ,( उनसे भी जिनकी आपसे मुक्कालात तक हुई हो )करने के बाद घर आकर उसका पोस्टमार्टम करने की अपेक्षा तो रहती ही है ,और इस अपेक्षा पर आपको खरा उतरना ही चाहिए , । यकीन जानिए कि इससे आपको भी फ़ायदा पहुंचने की पूरी गुंजाईश रहती है ।


देखिए जी ब्लॉगजगत का एक बहुत ही बेतुका , बेबुनियादी , बे ..हां मतलब अबे टाईप का चलन हो गया है , कोई कितना भी बडा , महान , ग्रेट स्टेटस वाला ब्लॉगर ब्लॉगिंग करने मैदान में उतरता तो ये नहीं कि उसका स्वागत गाजे बाजे से किया जाए , ये नहीं कि उसके पाव भर की पोस्ट पर क्विंटल भर की टिप्पणियां करे और पोस्टों से ये साबित कर दे कि फ़लां बाबू ने हिंदी में ब्लॉगिंग में खासकर हिंदी में ब्लॉगिंग करने का निर्णय़ लेकर मानो हिंदी ब्लॉगिंग पर उपकार किया है ..अरे कुछ भी नहीं करते हैं भाई लोग जी ..यहां तक कि नीतिश कुमार का ब्लॉग , मनोज वाजपेयी का ब्लॉग भी बे भाव के ही साईड लगा रहता है । माने आप कितना भी बडे ओहदे , साईज़ , शेप वाले हों ब्लॉगिंग के मैदान मे तो भईया आब निरे ब्लॉगर ही माने जाने जाएंगे तो ई भी गांठ बांध ही लीजीए ..
ओह सारे सूक्त वचन अब एक ही बार में पढिएगा क्या ...अरे रुकिए महाराज रुकिए अभी ..आगे की कथा ज़ारी रहेगी ..अरे हां इस ब्लॉग पर आज एक पोस्ट आएगी  कुछ ब्लॉगर्स को अपने ब्लॉग के साथ बातचीत करते हुए सुना गया है देखिएगा किसने क्या कहा सुना ...शाम तक मिलता हूं फ़िर


सोमवार, 2 मई 2011

ब्लॉगिग , ब्लॉगर्स , पुरस्कार आयोजन , राजनीतिज्ञ , मीडियाकर्मी .....और कुछ कही अनकही .




अब तक कल के आयोजन पर इतना कुछ कहा सुना पढा जा चुका है कि कोई गुंजाईश बची नहीं है , लेकिन फ़िर भी एक ब्लॉगर होने के नाते , उस कार्यक्रम मे शिरकत करने के नाते और अब तक उस आयोजन में मुझे दिखी सकारात्मक बातों को ( हां बहुत ही अफ़सोस के साथ लिखना पड रहा है कि हिंदी ब्लॉगिंग में नकारात्मकता को जितनी तेज़ी से लोकप्रियता हासिल हो जाती है उसकी आधी गति से भी सकारात्मकता को प्रोत्साहन नहीं मिल पाता ) इस पोस्ट के जरिए यहां रख सकूं । पिछले दिनों मां के बाद अचानक पिताजी के देहावसान ने इतना आहत किया हुआ था कि मन में कोई उत्साह नहीं रह गया था यही कारण था कि कार्यक्रम से एक दिन पहले तक साथी ब्लॉगर्स द्वारा कार्यक्रम की उपस्थिति को लेकर मैं अपना संशय प्रकट करता रहा , किंतु रविंद्र प्रभात जी और अविनाश वाचस्पति जी द्वारा पिछले वर्ष देखे गए स्वपन .जिसे उन्होंने "परिकल्पना " नाम दिया था उसे साकार करने में कैसे उन्होंने दिन रात एक कर दिया था ये बखूबी समझ रहा था । चूंकि राजधानी दिल्ली में रहते हुए और दिनचर्या का एक बहुत बडा हिस्सा ब्लॉगिंग के नाम कर देने के कारण एक स्वाभाविक सी जिम्मेदारी ये भी लग रही थी कि कम से कम उन ब्लॉग मित्रों से जिंदगी में एक बार मिलने का , उन्हें कलेजे से लगा कर अपने भीतर महसूस करने का एक अवसर निश्चित रूप से गंवाने जैसा होगा वहां नहीं पहुंच पाना । सूचना मिल चुकी थी कि छत्तीसगढ से पूरी मंडली , पटना से ब्लॉगर साथियों का समूह इस कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए कूच कर चुके हैं , इसके अलावा जाने किस किस कोने से कौन कौन पहुंच रहा है ये भी उत्सुकता का विषय था । जहां तक कार्यक्रम की रूपरेखा और उसमें शामिल अतिथियों , आयोजन के दौरान प्रस्तावित कार्यक्रमों आदि की रूपरेखा तैयार करने की बात है तो  वो कार्यक्रम मूल रूप से एक प्रकाशन संस्था हिन्दी साहित्य सदन की पचासवीं सालगिरह के स्वर्णिम समारोह के साथ ही साझा किया जाना तय हुआ था । ऐसी क्यों किया गया , किसलिए किया गया ये सब आयोजनकर्ता ही बेहतर बता सकते हैं लेकिन फ़िर भी आसानी से इसे समझा तो जा ही सकता है कि वातानुकूलित हॉल में, बडी बडी हस्तियों , मीडिया , और साहित्य विभूतियों तथा मुख्यमंत्री स्तर के राजनीतिज्ञ द्वारा किसी ऐसे कार्यक्रम में ब्लॉगरों की न सिर्फ़ सहभागिता , बल्कि उनके सम्मान की व्यवस्था करना करवाना ही इसके पीछे उद्देश्य रहा होगा । सवाल उठाने वाले तो आसानी से कह सकते हैं कि जरूरत ही क्या थी . ब्लॉगरों का कार्यक्रम ब्लॉगर्स के बीच भी तो किया जा सकता था और तब फ़िर बडी आसानी से आयोजकों को निशाने पर लिया जाता कि हुंह क्या यही था वो परिकल्पना महोत्सव । खैर इस विषय पर आगे ..तो यही सोच कर मैंने कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करना जरूरी समझा ।


मुख्य द्वार पर ही मुझे ममता की प्रतिमूर्ति सी संगीता स्वरूप जी अपने पतिदेव के साथ मिल गईं , बाल कटे होने के कारण मैं टोपी पहने था और एक बार फ़िर इस कदर अलग था कि शायद आप इसी बात से यकीन करें कि जिससे भी मिला मुझे बार बार अपना परिचय नाम बताकर देना पडा और मेरी बगल में बैठे पाबला जी भी बहुत समय बाद मुझे पहचान पाए । अंदर पहुंचे तो चार बज चुके थे और स्टेज पर जहां रविंद्र जी , अविनाश भाई तैयारी में लगे थे वहीं गिरीश बिल्लौरे जी और पदम सिंह जी वेबकास्टिंग की तैयारी में लगे थे । 

गिरीश बिल्लौरे वेबकास्ट की तैयारी में

स्टेज पर रविंद्र प्रभात जी के साथ जिन्होंने कमान संभाल रखी थी उनका परिचय बाद में हिंदी साहित्य सदन के सचिव श्री गिरिराज शरण अग्रवाल की सुपुत्री गीतिका गोयल के रूप में बाद में हुआ । छत्तीसगढ के ब्लॉगर मित्र अभी नहीं पहुंचे थे , अपनी आदत के मुताबिक मैं घूम घूम कर चेहरे पहचान कर और अंदाज़े से मिल रहा था , ज़ाकिर अली रज़नीश जी , सलिल जी , प्रमोद तांबट जी , गिरीश बिल्लौरे जी , और जाने कितने ही ब्लॉगर मित्रों से मैं पहली बार मिल रहा था । इनके साथ ही जान पहचान वाले मित्र तो मिल ही रहे थे , हां नाम और पहचान जरूर मुझे सबको बतानी पड रही थी जिसका ज़िक्र मैं कर चुका हूं पहले ही ।



आगे की पंक्ति में सम्मानित अतिथि एवं प्रकाशन परिवार के सदस्य और ब्लॉगर मित्र भी बैठे हुए थे । समय बीत रहा था और मुख्य अतिथि रमेश पोखरयाल निशंक नहीं पहुंच सके थे कारण बताया गया कि मौसम और तेज़ हवाओं के कारण विमान के उतरने में विलंब हो रहा था । तब तक औपचारिक अनौपचारिक रूप से मंच संभाले हुए रविंद्र प्रभात जी ने हिंदी ब्लॉगिंग के कुछ पुराधाओं को अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया । सबसे पहले आमंत्रित किए गए श्री श्रीश शर्मा यानि ई पंडित जिन्होंने बडे ही धैर्यपूर्वक हिंदी ब्लॉगिंग के शुरूआती दिनों को याद करते हुए , अक्षरग्राम , नारद जैसे एग्रीगेटरों की चर्चा की और फ़िर ब्लॉग लिखने वाले विभिन्न प्लेटफ़ार्मों की भी जानकारी दी । इसके बाद श्री ज़ाकिर अली रजनीश जी ने विज्ञान को ब्लॉगिंग से जोडने और तस्लीम तथा साईंस ब्लॉगर्स एसोसिएशन की चर्चा करते हुए अपने सहयोगियों को धन्यवाद दिया । इसके बाद चौराहा ब्लॉग के पत्रकार ब्लॉगर और स्वाभिमान टाईम्स की संपादकीय टीम से जुडे हुए श्री चंडीदत्त शुक्ल जी ने बडी बेबाकी से ब्लॉग लेखन पर अपने विचार व्यक्त किए । इसके उपरांत विधि विशेषज्ञ ब्लॉअर श्री दिनेश राय द्विवेदी जी ने अपने विचार रखते हुए बताया कि ब्लॉग लेखन के लिए अलग से कोई कानून नहीं बने हैं और जो नियम कायदे कानून समाज में बोलने लिखने कहने पढने सुनने के बने हुए हैं वही सब ब्लॉग लेखन पर भी लागू होते हैं ।



श्री श्रीश शर्मा "ई पंडित "


श्री दिनेश राय द्विवेदी


अब धीरे धीरे घोषणा हो रही थी कि निशंक पधार चुके हैं ।




उनके आते ही पहले बारी बारी से उनका और उनके साथ उपस्थित अतिथियों का पुष्प एवं माल्यार्पण से स्वागत सत्कार किया गया । मां  सरस्वती की पूजा अर्चना के साथ ही कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत हो चुकी थी समय हो चुका था छ : बजकर बीस मिनट , कार्यक्रम में पहले हिन्दी साहित्य सदन की अब तक की यात्रा, श्री गिरिराज शरण अग्रवाल उनकी पत्नी डा. मीना अग्रवाल दोनों पुत्रिया एवं अन्य सहयोगियों की अथक यात्रा के बारे में पावर प्वाईंट प्रेजेंटेशन के साथ साथ धन्यवाद देने का कार्यक्रम चलता रहा । इसके बाद बारी आई पुस्तकों के लोकार्पण की । 





अब तक पढी लिखी गई सभी रिपोर्टों में भाई बंधुओं ने सब कुछ लिखा सिवाय इसके कि हिंदी ब्लॉगिंग पर एक भारीभरकम और लगभग बहुत से सक्रिय ब्लॉगर के अनुभव , उनके आलेख , और उनके परिचय को समेटे हुए पुस्तक का लोकार्पण किया गया , इसके साथ ही जैसा कि तय था रविंद्र प्रभात जी द्वारा रचित ताकि बचा रहे लोकतंत्र और आदरणीय रश्मि प्रभा जी द्वारा संपादित त्रैमासिक पत्रिका वटवृक्ष का लोकार्पण किया गया ।



 

अब तक लिखी गई तमाम पोस्टों में मैंने कहीं भी इस बेमिसाल और अपने तरह की अनोखी पत्रिका जिसके सारे आलेख , कविताएं , कहानियां सब कुछ विशुद्ध रूप से ब्लॉग पोस्टें ही हैं । शायद ही किसी ने इस बात पर गौर फ़रमाया और ये सोचने की ज़हमत उठाई हो कि जब ये पत्रिका आम पाठक के हाथों में पहुंचेगी और वे लेखक के नाम के साथ उनके यूआरएल पते को पढेंगे तो उत्सुकता से ब्लॉंगिंग की दुनिया में जरूर झांकेगा और क्या ये कम बडी उपलब्धि है , ब्लॉगिंग का विस्तार हो , ब्लॉगिंग का विस्तार हो ..ये कहा तो खूब जाता है हर बार , लेकिन कैसे हो ? समाचार पत्र अगर ब्लॉग पोस्टों को उठाते हैं तो उस पर आपत्ति जबकि खुद नेट पर ही रोज जाने कितने ब्लॉग पोस्टों को चोरी से इधर उधर किया जा रहा है जो कहीं पकड में ही नहीं आती हैं या बहुत दिनों बाद नज़र में आती हैं , ब्लॉगर समाचार पत्रों को धमकाने तक की बात करते हैं लेकिन इस प्रश्न पर कि उन ब्लॉगों का क्या जो समाचार पत्रों की खबर को ही पोस्ट बना बना कर डाल रहे हैं , पर सबकी चुप्पी अखर जाती है खैर ये अलग पोस्ट का विषय है जिसपर कभी खुलकर और कुछ लिखूंगा ।


इसके बाद ब्लॉगर को पुरस्कार देने का कार्यक्रम शुरू हुआ , यहां ये बात भी कहता चलूं कि लगभग डेढ घंटे तक लगातार खडे रह रह कर जिस तरह से वयोवृद्ध साहित्यकार पंडित रामदरस मिश्र , अशोक चक्रधर , गिरीराज शरण अग्रवाल और मुख्यमंत्री निशंक ने एक एक ब्लॉगर को धैर्यपूर्वक पुरस्कार दिए , उनसे हाथा मिला कर शुभकामनाएं दीं |

निर्मला कपिला जी पुरस्कार लेते हुए 


रश्मि प्रभा जी पुरस्कार लेते हुए 


प्रमोद तांबट जी पुरस्कार लेते हुए 

श्री संजीव तिवारी जी पुरस्कार लेते हुए 
संगीता स्वरूप जी पुरस्कार लेते हुए 

रिजवाना कश्यम "शमा " जी पुरस्कार लेते हुए


 उस जज़्बे का जिक्र करना भी किसी को मुनासिब नहीं लगा , और शायद लगता भी कैसे खासकर उन्हें जो उस हॉल के बाहर खडे होकर कहानियां तलाश रहे थे , कार्यक्रम की कमियां ढूंढ रहे थे और उन साहित्यकारों से मिल रहे थे जो जाने कब से हिन्दी भवन के बाहर बैठे हैं मगर उनकी भी नज़र तभी पडी उनपर । साथे ही मीडिया मित्र मंडली से बाहर बाहर ही चर्चा करके रिपोर्ट लगाने के लिए या फ़िर कार्टून बना कर " असली बात " पहुंचाने में तत्परता से लगे थे । लेकिन अपनी उस रिपोर्ट को लगाते समय वे ये बात भी भूल गए कि रविंद्र प्रभात जी ने कार्यक्रम की शुरूआत मे ही भडास का जिक्र दुनिया के सबसे बडे हिंदी सामूहिक ब्लॉग के रूप में ज़िक्र किया था और पूरे फ़ख्र के साथ किया था , खैर । पुरस्कार वितरण करते करते इतना समय हो गया था कि सब या तो बाहर का रुख करने लगे थे या फ़िर किसी बहाने से टहलने लगे थे । इसके बाद मंच संचालिका ने अतिथियों से एक एक करके आग्रह किया कि वे आकर कुछ कहें । सबने अपने अपने विचार अपने अनुरूप रखे । यहां भी एक अच्छी बात ये देखने कि मिली कि ब्लॉगिंग और ब्लॉगर्स का ज़िक्र सबने किया , जिसका जितना ज्ञान था जिसका जितना परिचय था उसीके अनुरूप सबने इस बात को कहा । इसके उपरांत अल्पाहार के लिए सब फ़िर बाहर निकले और मैं तो निकल ही आया और घर के लिए चल दिया ।


ये तो थी एक ब्लॉगर की आंखों देखी रपट । अब कुछ जरूरी गैरजरूरी बातें । पिछले एक आध आयोजनों को देखते हुए ये अनुभव हो गया है कि अव्वल तो ब्लॉगर बैठक , मीट , सम्मेलन को बुलाए जाने का ख्याल जिनके भी मन में आ रहा हो वे फ़ौरन उसे चूल्हे में झोंक दें अन्यथा आपका श्रम , आपका धन , आपकी निष्ठा और सब कुछ सिर्फ़ एक पोस्ट से ही चौराहे पर लटका दिया जा सकता है और वैसे भी इन आयोजनों से कौन सा नोबेल पुरस्कार दिया जाना होता है । इसके बावजूद भी यदि विचार मन में कुलबुलाए ही तो फ़िर उसे विशुद्ध रूप से सिर्फ़ ब्लॉगर्स और ब्लॉगिंग के इर्द गिर्द ही रहना चाहिए । इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनने में कोई भूल हुई हो या न हुई हो , लेकिन तय कार्यक्रम के अनुसार दूसरा भाग जो कि मीडिया विमर्श पर था उसे स्थगित कर दिया जाना और उससे भी ज्यादा मुख्य अतिथि तक को उपेक्षित सा महसूस हो जाना नि: संदेह ही दुखद और अफ़सोसजनक था जो कि नहीं होना चाहिए था कदापि नहीं । अगर किन्हीं कारणों से ऐसा हो रहा था तो कम से कम मुख्य अतिथि को विश्वास में लिया जाना चाहिए था और उन्हें पूरी स्थिति से अवगत कराना चाहिए था । यहां साथी ब्लॉगर खुशदीप सहगल जी की विवशता और क्षुब्ध होने का कारण समझ में आता है कि जब मुख्य अतिथि उनके ही कहने पर आए थे और उनकी उपेक्षित सी भावना दिख रही हो तो मेजबान के रूप में उन्हें कैसा लगा होगा । इसलिए बेहतर होता कि पहले ही देर हो चुके कार्यक्रम में बदलाव की सूचना और घोषणा जल्दी से जल्दी न सिर्फ़ मंच से बल्कि उन अतिथियों और मुख्य अतिथि को देनी चाहिए थी , वे कार्यक्रम में रुके रहते या चले जाते , आते या नहीं आते ये उनका निर्णय होता । अब बात एक मुख्यमंत्री या कहें कि राजनीतिज्ञ के हाथों पुरस्कृत होने के विरोध की । क्या निशंक अचानक ही बिना बताए वहा टपक पडे थे ? क्या सचमुच ही किसी को नहीं पता था कि वे मुख्य अतिथि होने वाले हैं कार्यक्रम के , यदि पुरस्कारों को उनके हाथों से नहीं लिए जाने के पीछे हजारों तर्क दिए जा सकते हैं तो फ़िर किसी और के हाथों से लिए जाने के विरोध में फ़िर से हज़ारों तर्क दिए जा सकते हैं । खुद अमिताभ बच्चन भी आकर दें तो बडे ही आराम से विरोध ये कह कर किया जा सकता है कि हुंह ये कौन से हिंदी भाषा के ब्लॉगर हैं ?


हिंदी ब्लॉगिंग में कोई भी विवाद दो चार दिनों से ज्यादा नहीं टिकता , और इसे टिकना भी नहीं चाहिए । सबको पता है कि हम यहां सिर्फ़्र पढने लिखने आए हैं । अन्य सभी बातें , लोगों ने तो तरह तरह के कयास भी इस तरह के लगाए हैं कि पुरस्कारों के चयन में धांधलेबाजी हुई है , सेटिंग की गई है और जाने क्या क्या मानो पुरस्कार राशि करोड डेढ करोड हो या फ़िर कि इन पुरस्कारों के विजेताओं को रातोंरात पूरा विश्व पहचानने लगेगा कि सिर्फ़ यही हैं हिदी ब्लॉगिंग के पुरोधा । नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है इसलिए मुगालते में न रहें और ऐसा भी कतई न कहें कि बिना देखे परखे पुरस्कार बांट दिए गए । सबसे जरूरी बात ...किसी को सम्मानित करना कम से कम किसी को अपमानित करने से तो कहीं बेहतर है । चलिए इस बात का यहीं पटाक्षेप करता हूं , वर्ष २०११ की ब्लॉगिंग गाथा को जब भी याद किया जाएगा तो अलग अलग कारणों से ही सही इस समारोह को और इससे जुडी सभी घटनाओं पोस्टों और कही सुनी गई बातों को भी ध्यान में रखा जाएगा । 


साथ चलने वाले

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