बेबाक , बिंदास , बेलौस ,बेसाख्ता सी कुछ बातें ......
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बिखरे आखर
ट्विटर सेंसर को तैयार , गूगल ने किया इनकार ,
उपयोग दुन्नो का अईसा करें , रहे टेंसन में सरकार
मेरे इर्द गिर्द रहकर , तुम जो यूं , अपना ये ...
1 सप्ताह पहले















सादर वन्दे !
आपने बिलकुल सही कहा !
और हम ये सभी जानते हैं की जब हम किसी पर एक उंगली उठाते हैं तो खुद की तीन अंगुलिया अपनी ही तरफ उठती हैं |
इसीलिए मै कहता हूँ कि ..
प्यार करो प्यार बांटो, बदल जाएगी दुनिया ,
इक बार गयी जिंदगी फिर वापस कहाँ आती है|
रत्नेश त्रिपाठी
aarya ने कहा…
5 जून 2010 11:13 अपराह्न
अजय जी, लगभग एक माह तक ब्लाग जगत से तकरीबन दूर रही हूँ और लगता है इसी दौरान बहुत कुछ घटा है। मेरा तो यही अनुभव है कि दुनिया में सभी कुछ है, हम अगर उन सब बातों को ध्यान में रखकर अपना कार्य करेंगे तो कुछ भी नहीं कर पाएंगे और यही तो कुछ लोगों की मंशा होती है। जहाँ भी श्रेष्ठता सोपान चढ़ती है वहीं चुपके से दूसरी मुंडेर से ईर्ष्या भी झांक उठती है। वही दूसरी मुंडेर की ईर्ष्या आपके सोपान को खेंचने का प्रयास करती है और हम उसे समझाने बैठ जाते है। बस वह अपने प्रयास में सफल हो जाती है। उसका कार्य उसे करने दीजिए और आपका काम आप स्वयं करिए। कोई भी ब्लाग पर क्या लिख रहा है उस पर ध्यान देने के बनिस्पत आप क्या लिख रहे हैं बस इसी पर विचार कीजिए। खरपतवार के डर से खेती करना तो बन्द नहीं करते हैं ना। बिना प्रसंग जाने ही लिख दिया है, हो सकता है कुछ गलत भी हो तो उसे बहन की सीख समझ कर ही लें।
ajit gupta ने कहा…
5 जून 2010 11:19 अपराह्न
अजय भाई, बात यहाँ वही हो गयी है कि पहले मुर्गी या अंडा ?
सच है इस बात का कोई मापदंड नहीं है कि कौन सीनियर और कौन जूनियर?
बढ़िया आलेख लिखा आपने|
हम सब को मिल कर हिंदी ब्लॉगिंग के विषय में सोचना चाहिए !
शिवम् मिश्रा ने कहा…
5 जून 2010 11:24 अपराह्न
शिवम् मिश्रा ने कहा…
5 जून 2010 11:36 अपराह्न
झा जी,
लिखा तो सही में आपने अच्छा.....लेकिन फिर उसी बात पर लिखह डाला जिस पर आपकी सिरदर्द बढती है, क्षमा करे मेरे कहने मतलब बस करिए ना अब....बहुत हुआ झूठ-फूस का ब्लाग चमकाने वाला ये नौटंकी......सही मुद्दा उठाइए और ब्लाग के मूल पाचन को बचाइए...मै तो यही करने वाला हु..........तेल लेने जाय ये तथाकथित ब्लागर सम्मलेन......यदि बन भी गया ना की मंच तो याद रखिये दूसरों की रोटी सकेंगे आप लोग.
Rajeev Pathak ने कहा…
5 जून 2010 11:41 अपराह्न
बहुत सही लिखा है .. इन फिजूल के बहस में पडने की कोई आवश्यकता नहीं .. आपके सकारात्मक लेखों की प्रतीक्षा रहेगी !!
संगीता पुरी ने कहा…
5 जून 2010 11:42 अपराह्न
अजय जी.... बहुत सही लिखा है आपने.... एक चटके के साथ .... शानदार सन्देश.....
महफूज़ अली ने कहा…
5 जून 2010 11:51 अपराह्न
प्रिय राजीव पाठक जी ,
बेबाकी से लिखने के लिए शुक्रिया । आपने लिखा कि तेल लेने जाए ब्लोग्गर्स सम्मेलन । ठीक है ......मुझे एक बात बताईये ..क्या इसके लिए कोई न्यौता देने जाता है किसी को ..कोई कार्ड छपवाए जाते हैं या कोई गाडी वैगेरह भिजवाई जाती है ..जो जाना चाहे जाए जो न जाने चाहे न जाए । अब रही बात ब्लोग लेखन की । मैं इस वक्त अपने आठ ब्लोगों पर ;लिखता हूं और ये मेरे नियमित आलेख लेखन , व्यंग्य, कहानी, कविता से इतर लेखन है । आपकी जानकारी केलिए बताता चलूं कि मैं पेशे न तो पत्रकार हूं न ही साहित्यकार , शिक्षा के क्षेत्र से भी नहीं जुडा हूं , एक आम इंसान हूं । अब बात ब्लोग चमकाने की तो ये अब तय हो चुका है कि ब्लोग चमका या न चमका ये तो पता नहीं मैं जरूर चमका (खटका ) हुआ हूं इसका प्रमाण मुझे मिले माईनस के चटकों से हो जाता है , जिसकी अब फ़िक्र भी नहीं होती । और हां रही दूसरों की रोटी सेंकने की बात .......पहले कायदे से अपनी तो सेंक लें ...जिंदगी रही तो दूसरों की फ़िक्र भी कर लेंगे । आप यूं ही मार्गदर्शन करते रहेंगे ये उम्मीद है ।
अजय कुमार झा ने कहा…
5 जून 2010 11:59 अपराह्न
मन खिन्न तो हो ही जाता है अजय भाई सहाब्। अच्छा करते हैं आप स्पष्ट यहां अपने उद्गार प्रकट कर देते हैं और हमे भी लगता है आपकी बातों पर गम्भीरता से विचार करें ।
सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…
6 जून 2010 12:11 पूर्वाह्न
आपने करीने से अपने मन की बात कह दी, समझाईश दे दी हालांकि कोई आवश्यक्ता नहीं थी.
आप अपना सार्थक और सकारात्मक लेखन जारी रखें. बाकी बातें जैसे शुरु होती हैं, वैसे ही खतम भी हो जाती हैं.
अनेक शुभकामनाएँ.
Udan Tashtari ने कहा…
6 जून 2010 3:29 पूर्वाह्न
कुछ तो लोग कहेंगे लोगो का काम है कहना
अच्छी बात नहीं है लहरों के आघात से ढहना
M VERMA ने कहा…
6 जून 2010 4:50 पूर्वाह्न
समीर जी से सहमत...
आप अपना सार्थक और सकारात्मक लेखन जारी रखें. बाकी बातें जैसे शुरु होती हैं, वैसे ही खतम भी हो जाती हैं.
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…
6 जून 2010 5:03 पूर्वाह्न
समीरजी से सहमत ...
वाणी गीत ने कहा…
6 जून 2010 5:44 पूर्वाह्न
आपका कथन सही है!
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
6 जून 2010 6:20 पूर्वाह्न
डॉ अजित गुप्ता और समीर जी ने अच्छी सलाह दी है -आपने कुछ बातें बिलकुल माकूल कही हैं -कुछ लोग टिप्पणियों पर अंकुश न लगाकर अपने मन की बात दूसरे दिलजलों से कहलवाने का मौका देते हैं या खुद भी कुछ टिप्पणियाँ अनाम बन कर करते हैं -मैं भुक्त भोगी रह चुका हूँ -एक सम्प्रति दिल्लीवासी स्वघोषित बुद्धिजीवी ने अपने ब्लॉग पर मेरे विरुद्ध बिगुल फूका और सारे दिल जले टिप्पणियाँ करते रहे और वे मानो उनका इंतज़ार करते रहे ....
मियाँ नीशू ने जो इतनी देर तक गर्दभ गान किया वह किसी भी लिहाज से क्षम्य नहीं है ,अभी बच्चू बहुत कुछ सीखें तब उन्हें कुछ सलीका आएगा !यहाँ तो हर ऐरू गेरू नत्थू खैरू ब्लॉग लिखने आ बैठा जिसे कलम पकड़ने का सलीका भी नहीं आया ..आज कम्प्यूटर का की -बोर्ड खटखटा रहा है ....महाशय ने बिना बात की बात बवाल मचाया -तटस्थ लोगों को भी क्लांत किया -जूनियर ब्लागर्स के नाम से ब्लागजगत में विवेकहीन बटवारा करवाने का कुप्रयास किया ....वे क्षम्य नहीं हैं ..उन्होंने मिथिलेश और महाशक्ति जैसे उर्जावान लोगों को भी उकसाया -बरगलाया ..(मुझे दुखद आश्चर्य भी है कि ये कैसे इतना विचलित हो उठे ...) ....(यह नीशू के लिए आरोप पत्र में शामिल किया जाय )
.लोगों को यह लगता है की यहाँ कई गुट हैं -सच है यह ,लेकिन गुट जो बने हैं वे आपसी समझ ,एक दुसरे के प्रति सम्मान और सामान धर्मा,समान सोच के चलते वजूद में हैं ......ऐसे गुट हमेशा रचनाशीलता और साझे कार्यों के लिए जरूरी हैं !
मैं नीशू के अभियान की कड़े शब्दों में भर्त्सना करता हूँ और दंड स्वरुप प्रस्ताव करता हूँ वे कम से कम तीन महीने ब्लॉग जगत से विरत रह प्रायश्चित करें .....यह कोई और विवाद -उत्प्रेरण या खाप पंचायत सरीखा फैसला नहीं है और न हम पञ्च की हैसियत से बोल रहे हैं -यह मेरी निजी अभिव्यक्ति है ....और मुझे अपनी बात कहने का पूरा हक़ है ! नीशू को अभी बहुत कुछ सीखना है -बड़ों का सम्मान ,कृतज्ञता (आमंत्रण भी लिया ,आदर सत्कार भी और खाना भी खाया और उसी थाली में छेद करने लग गए ),और कम से कम वर्तनी का ठीक ज्ञान ....मीडिया में ऐसे लोगों का क्या भविष्य है भगवान् जाने मगर ब्लॉग जगत में तो पूत के पाँव दिख ही गए ...मैं पूरे प्रकरण से इतना उद्विग्न हूँ की मुझे पी सी से अलेर्जी तक हो गयी ....ब्लॉग तो लिखने की बात ही दूर रही ......
Arvind Mishra ने कहा…
6 जून 2010 7:01 पूर्वाह्न
अजय जी कुछ लोग सिर्फ अपने पर बीतने के बाद ही किसी प्रयास या एकजुटता का महत्व समझते हैं ,इसलिए मेरा भी आपसे आग्रह है आप इन बातों से दूर ब्लॉग लिखते भी रहिये अपने हिसाब से और जो आप लोगों की जमीनी स्तर पर अपने सामर्थ्य के अनुसार सच्ची सेवा कर रहें है वो नेक काम भी जारी रखिये ,नेकी की जरूरत एक न एक दिन सबको परती है ,वक्त का इंतजार कीजिये | फ़िलहाल एम वर्मा जी की बात से पूर्ण रूपेण सहमत हूँ और रहूँगा --कुछ तो लोग कहेंगे लोगो का काम है कहना
अच्छी बात नहीं है लहरों के आघात से ढहना--- वाह वर्मा जी | आपका प्रयास और सोच दोनों ,कुछ लोगों को छोड़ दे तो सबके लिए फायदेमंद है और इसके लिए हम आपके आभारी हैं |
honesty project democracy ने कहा…
6 जून 2010 8:10 पूर्वाह्न
ब्लोगिंग में बिन बात के विवाद पनप रहे हैं । कृपया अपने आप को इनसे प्रभावित न होने दें ।
जब मन कुछ खट्टा हो तो कुछ मीठा खाकर मन को खिन्न होने से बचाएं । जी हाँ , मीठा खाने से मस्तिष्क में कुछ ऐसे रसायन का स्राव होता है जो मन को ख़ुशी की ओर ले जाता है ।
बाकि आपने लिखा अच्छा है ।
डॉ टी एस दराल ने कहा…
6 जून 2010 9:14 पूर्वाह्न
मिश्राजी से सहमत, यद्यपि हम किसी को किसी प्रकार का दंड और/या पारितोषक नहीं दे सकते.
पलक प्रकरण बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था. इसने यह दिखा दिया कि किस तरह लोग ब्लौगरों को लुभाने का माद्दा रखते हैं और वरिष्ठ ज्ञानी ब्लौगर भी लिबर्टी लेने वाली लड़की (?) के आगे नतमस्तक नज़र आते हैं. उस ब्लौग और ब्लौगर के कसीदे पढ़नेवालों और उनके फौलोवर्स बनने वालों की बुद्धि पर तरस आता है.
झा जी आपने ही शायद उसे दिशाहीन ब्लौगर की दिशाहीन कविता कहा था. इतनी निर्भीकता से अपनी बात रखने के लिए आप प्रसंशा के पात्र हैं.
बाकी, हमेशा की तरह एक बिन माँगी सलाह - ब्लौग और ब्लौगरों से जुड़े मुद्दों पर कृपया न लिखें. यह बहुत नकारात्मकता पैदा करता है.
निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…
6 जून 2010 9:20 पूर्वाह्न
अरविंद मिश्र जी ने अपनी टिप्पणी में काफी कुछ कह दिया है... मेरे भी उन जैसे ही विचार हैं ...
इसके अलावा बस इतना ही कहूँगा कि...
'नेकी कर और कुएं में डाल'
राजीव तनेजा ने कहा…
6 जून 2010 9:21 पूर्वाह्न
बहुत बढ़िया तरीके से सटीक बात कही आपने......
अजय जी बहुत ही उम्दा !
AlbelaKhatri.com ने कहा…
6 जून 2010 9:43 पूर्वाह्न
अति सर्वत्र वर्जयेत
सावधान, कार्य प्रगति पर है
बी एस पाबला ने कहा…
6 जून 2010 12:14 अपराह्न
नमस्कार झा जी,
पहले तो बधाई टॉप ट्वेंटी में आने कि ( जागरण जक्शन पर) मैंने आपको वही से पड़ना शुरू किया था, और जब यहाँ लिखना और पड़ना शुरू किया तभी से आपको फोलो कर रही हूँ, मेरे लेख(जागरण जक्शन) पर सबसे से पहले आप ही का कमेन्ट आया था और वो मेरे लिए काफी सपोर्टिंग था ................आपने अपने इस लेख में जिस तरह के अभद्र कमेन्ट कि बात बताई वैसा ही बकवास कमेन्ट मैंने भी कही पदा था और पदने के बाद यही लगा कि इसे हटाया क्यों नहीं गया ...........मैंने तो लिखना सिर्फ अपने शौक के लिए शुरू किया था पर यहाँ तो नज़ारा ही अलग है ..........पूरी तरह से समझ के बाहर...... पता नहीं ये द्वन्द क्यों मचा हुआ है खैर ........ आप और आप जैसे ही अन्य अन्य ब्लोगर मेरे लिए तो हमेशा ही मार्गदर्शक रहेंगे जिसने में इस कला कि ए बी सी सीख सकू .........
soni garg ने कहा…
6 जून 2010 2:02 अपराह्न
अजय जी, आप की बात से सहमत हुं, मै तो इन लोगो को देख कर हेरान हुं? बहुत सी बाते तो मुझे पता ही नही थी... कुछ ब्लांगर मित्रो से बात कर के पता चली.. सच कहुं बिन बात के ही यह सब चिल्ला रहे है...
राज भाटिय़ा ने कहा…
6 जून 2010 2:58 अपराह्न
आपने अपनी बात बहुत स्पष्टता से कही है...बहुत सही लिखा है...परन्तु उन बातों पर अधिक ध्यान तो क्या बिलकुल ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है...जिन ब्लोग्स पर आपके रूचि की बाते हैं उनको ही पढ़िए और जिनको आपकी बातें रुचिकर लगेगीं वो आपको अवश्य पढेंगे....
अजीत गुप्ता जी ने बहुत सही बात कही है...
समीर जी ने नेक सुझाव दिया है...
संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…
6 जून 2010 3:41 अपराह्न
बहुत बढ़िया लेख लिखा है अजय आपने !
जहाँ तक ब्लागर मिलन का सवाल है, ऐसे प्रयत्न करते रहना चाहिए ! मुझे आपके, अविनाश वाचस्पति और तनेजा जी के द्वारा बुलाई मीटिंग में जाने का मौका मिला और उसे बेहद उपयोगी और सार्थक पाया ! अधिकतर मेलजोल और आयोजनों से दूर रहने वाला मैं , भविष्य में भी हर ऐसे सत्संगों में जाना पसंद करूंगा !
जहाँ तक विरोध का सवाल है कुछ लोग सिर्फ विरोध करने के लिए ही विरोध करते हैं उस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए ! कुछ लोगों को यह पता ही नहीं था की मीटिंग कब हो रही है इस लिए नाराज हो सकते हैं ! मुझे याद है कि मैंने खुद आपको फ़ोन करके आने की इच्छा व्यक्त करते हुए आपसे पता लिया था !
चूंकि यह आयोजन करना हर किसी के बस की बात नहीं है अतः उम्मीद करता हूँ कि इस प्रकार के सत्प्रयत्न आप लोग करते रहेंगे !
सतीश सक्सेना ने कहा…
6 जून 2010 9:41 अपराह्न
सलीके से समझाइश दे दी अब
समझ आए तो उत्तम है
गिरीश बिल्लोरे ने कहा…
15 जून 2010 12:38 पूर्वाह्न
भई मान गये, इतने सलीके से बतें रखीं कि दिल गार्डेन गार्डेन हो रिया है ।
बीता हुआ प्रकरण केवल लोगों की निगाह में आने की टुच्ची रणनीति से अलग कुछ और नहीं थी ।
मैंनें लगभग हर ऎसे पोस्ट पर टिप्पणी देकर निर्लिप्त भाव से तमाशा देखा है..
नव छौनों का कल्लोल भी देखा, और इनको अपनी बाली उमरिया में बुढ़वे पलक की ओर लपकते भी देखा ।
पलक का पर्दाफ़ाश करने की कहानी अलग है, वह मुझे ललकार गये थे ।
सहमत हूँ, समीर भाई से, दिनेश जी से और अजित दी से..
लिखने का मन करे, और लिखने से सँतोष मिले, तो अपनी सामर्थ्य का उपयोग करो, बिन्दास लिखो
वरना विश्रामकाल में अन्य बँधुओं को पढ़ कर टीप देने का पुण्य लूटो.. इससे आगे सोचो ही मत !
मैं अपना भेद नहीं खोलना चाहता था, पर ईश्वर की शपथ मैंने आज तक अपने लिखे पर कभी टिप्पणी नहीं गिनी, पसँद-नापसँद.. पेज़रैंक, सक्रियता तो दूर की बात है ।
काश कि मुर्गी कभी ऑमलेट खाते हुये भी देखी जा सकती !
आपके नये साइट का टेम्पलेट देख कर लगता है कि, इसे एक्चुअल ड्राइँग सेट अप की सहायता से बना रहे हैं, जिसके परिणाम मुझे बहुत बेहतर नहीं लगे ।
डा० अमर कुमार ने कहा…
16 जून 2010 7:38 पूर्वाह्न
जब हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास लिखा जायेगा यह सब कुछ बहुत महत्वपूर्ण होगा ।
शरद कोकास ने कहा…
16 जून 2010 9:57 अपराह्न
अजय भाई, आपने जीवन का गूढार्थ हमारे सामने उडेल दिया है। आभार।
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भविष्य बताने वाली घोड़ी।
खेतों में लहराएँगी ब्लॉग की फसलें।
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…
18 जून 2010 5:23 अपराह्न
तो ये बात है आपके पोस्ट ना लिखने की। मगर आप अपना काम करते रहें बहस मे मत पडें यही इसका ईलाज है पर ब्लागिन्ग ना छोडें ।अभार्
निर्मला कपिला ने कहा…
21 जून 2010 6:48 अपराह्न