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सोमवार, 23 मार्च 2009

२३ मार्च को कुछ ख़ास है क्या ?

पापा, आज २३ मार्च को कुछ ख़ास है क्या ?

हाँ बेटा, तुम्हें नहीं पता , आज शहीद दिवस है। आज ही के दिन तो हमारे आजादी के कुछ दीवाने हँसते हँसते अंग्रेजों के फांसी के फंदे को फूल की माला की तरह गले में लपेट कर झूल गए थे। तुम्हें नहीं पता ये।

लेकिन पापा यदि ये इतना ख़ास है तो फ़िर चारों तरफ़ इसकी बात होनी चाहिए थी न, जब वैलेंताईन डे आता है तो उसके कितने पहले से ही हर तरफ़ उसकी चर्चा और खबरें रहती हैं , तो मैं क्या ये मानू की वैलेंताईन डे इस शहीद दिवस से ज्यादा महत्वपूर्ण है। और उस वैलेंताईन डे को मनाने और विरोध करने वालों की भी कितनी बातें होने लगती हैं, अब तो हम बच्चों के भी पता है उसके बारे में।

अरे बेटा इस शहीद दिवस को जब कोई मनाने को ही तैयार नहीं है तो इस बेचारे दिवस का विरोध करने की बात कहाँ से होगी। अच्छा तुम ये बताओ तुम शहीद तो जानते हो न क्या होता है।

हाँ पापा वे लोग जो अब भी, (आज जब समाज में बहुत कम ही लोग ऐसे हैं तो अपने बारे में सोचने के अलावा भी कुछ सोचते और करते हैं ) अपने बारे में अपने बाल बच्चों और अपने परिवार के बारे में सोच कर सिर्फ़ देश के बारे में सोचते हैं सिर्फ़ सोचते हैं बल्कि अपना तन मन, प्राण सब कुछ देश पर न्योछावर कर देते हैंऔर इस देश के लोग कुछ दिनों बाद उनका नाम तक भूल जाते हैंसरकार उनके नाम पर कभी पेट्रोल पम्प घोटाला तो कभी कोई और घोटाला करती रहती हैउन्हें ही शहीद कहा जाता है

खैर , वो छोडिये पापा आप ये बताइए, की उन शहीदों को फांसी पर क्यूँ टांगा था और किसने टांगा था।
अरे बेटा उस वक्त अंग्रेजों का राज था, हमारे वे बांके लोग जो दीवानों की तरह देश को आजाद करवाने के लिए सर पर कफ़न बाँध कर घूम रहे थे उन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। जब अंगरेजी हुकूमत उनसे बुरी तरह डर गयी तो उन्होंने उन क्रांतिकारियों को पकड़ कर फांसी दे दी.

बेटा आश्चर्य में डूब कर बोला, अच्छा पापा बताओ ये क्या बात हुई भला। मैं सोच रहा हूँ की यदि उस वक्त यही अभी वाली सरकार होती तो क्या उन्हें कोई फांसी दे सकता था , पर हाँ दे भी सकता था यदि उन्हें फांसी से बचाया जा सकता था तो उसकी एक ही सूरत थी की वे भी आतंकवादी होते, तब जरूर ही हमारी सरकार उन्हें कुछ नहीं कहती


नहीं बेटे , यदि वे आज जीवित होते तो ख़ुद ही फांसी के फंदे में झूल गए होते । और इस तरह मैंने और मेरे बेटे ने शहीद दिवस मन लिया.

6 टिप्‍पणियां:

  1. *"यदि वे आज जीवित होते तो ख़ुद ही फांसी के फंदे में झूल गए होते "* - इसीलिए तो देखा जाता है आज कोई शहीद नहीं दिखाई देता केवल शहद की मक्खी की तरह सत्ता में भिनभिनाते दिखाई देते हैं॥

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  2. बहुत ही सच्ची बात.दुनिया भर की जयम्तियां, पुण्यतिथियां हमारे देश में मनाई जातीं हैं, लेकिन शहीदों के नाम पर??

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  3. बेटा आश्चर्य में डूब कर बोला, अच्छा पापा बताओ ये क्या बात हुई भला। मैं सोच रहा हूँ की यदि उस वक्त यही अभी वाली सरकार होती तो क्या उन्हें कोई फांसी दे सकता था , पर हाँ दे भी सकता था यदि उन्हें फांसी से बचाया जा सकता था तो उसकी एक ही सूरत थी की वे भी आतंकवादी होते, तब जरूर ही हमारी सरकार उन्हें कुछ नहीं कहती।


    नहीं बेटे , यदि वे आज जीवित होते तो ख़ुद ही फांसी के फंदे में झूल गए होत...... vidambana...!!

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  4. यदि उन्हें फांसी से बचाया जा सकता था तो उसकी एक ही सूरत थी की वे भी आतंकवादी होते, तब जरूर ही हमारी सरकार उन्हें कुछ नहीं कहती।

    sach kaha aapne....

    shahid paida samaj aur pariwar se hote hain aur hamare yaha to unhe paida hi paisa kamane ke liye kiya jata h... hamare yaha bachche nahi paise kamane ki machine paida ki jati h... ye h hamari bidambana...

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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