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शुक्रवार, 20 मार्च 2009

आईये मिलिए रुना देवी से

यूँ तो मैं पिछले न जाने कितने दिनों से या पोस्ट लिखने के बारे में सोच रहा था पर न जाने किस कारण से ये तय नहीं कर पा रहा था की ये ठीक होगा या नहीं, मगर आज ख़ुद को बिल्कुल नहीं रोक पाया। आज मैं आपको रुना देवी से मिलवाना चाहता हूँ। मुझे ये तो नहीं पता की आप में से कितने लोग रुना देवी को मिल चुके हैं मगर लगता है की शायद गौर से अपने आस पास देखेंगे तो एक न एक रुना देवी आपको भी द्किहायी दे जायेगी।

रुना देवी, रुना देवी बन्ने से पहले सिर्फ़ रुना थी, और रुना क्यों हम तो उसे शुरू से रुनिया कहते थे। जो गाओं में रहे हुए हैं या वाकिफ हैं वो जरूर जानते होंगे की किस तरह वहां मदन , मदनवा, भोला,भोलवा, रुना ,रुनिया, हो जाया करते हैं, खैर नाम में क्या धारा है। तो रुना अपने माता पिता के कुल छः संतानों में से पांचवें नंबर की बेटी थी। उसके बाद उससे छोटी एक और बहन थी। नहीं नहीं ऐसा नहीं था की वे सिर्फ़ बहेने ही बहनें थी उनका तीसरे नंबर पर ही एक भाई भी था, और यहाँ एक बात बताता चलूँ की मुझे आज तक नहीं समझ में आया की आख़िर पुत्र की चाहत वाले पुत्र पाने के बाद भी परिवार और देश पर बोझ क्यूँ बढाते हैं। तो रोते पीटते रुना देवी भी अन्य सभी बेटियों की तरह खटाक से बड़ी हो गयी, अजी बड़ी क्या हो गयी, बस इतनी हुई की उसकी शादी माँ बाप को टेंशन की तरह लगने लगी, जैसे तैसे , महज १६ वर्ष की उम्र में उसकी शादी पड़ोस के गाँव के लड़के के साथ कर दी गयी। रुना अब रुनिया से रुना देवी बन गयी थी। मैंने भी उसकी शादी के बारे में सुना था।

मगर इससे ज्यादा देर तक मेरे दिमाग में वो ख़बर रही थी जो मैंने उसकी शादी के लगभग डेढ़ वर्ष के बाद सूनी थी, पता चला की बंबई में उसके पति का निधन किसी गंदी बीमारी के कारण हो गया था। मुझे अंदाजा लगाते देर नहीं लगी की ड्राईवर को कौन सी गंदी बीमारी लगी होगी। खैर डरते डराते किसी तरह उस तक ये संदेश भिजवाया की अपनी और अपने बच्चे की जांच करवा ले ताकि किसी अनहोनी की आशंका न रहे। खुदा का शुक्र था की सब कुछ ठीक निकला, माँ बेटे दोनों ही सुरक्षति थे। मगर ये क्या, शुक्र को शनि में बदलते देर नहीं लगी। एक दिन उसके पड़ोसी गैर कानूनी तरीके से कोई पेड़ काट रहे थे , पेड़ काटने के बाद वो एक बिजली के खंभे पर गिरा और रुना का तीन वर्ष का बच्चा , दस बच्चों में वो अकेला बच्चा था जो उस खंभे के नीचे आकर दब कर मृत्यु को प्राप्त हुआ । रुना कोमा में चली गयी। पूरे सात महीनो बाद जब होश आया तो पड़ोस के लोगों ने तब तक पूरे गाँव के प्यार और पुलिस के सहयोग से सारा मामला दबा दिया था ।

पिछले ग्राम प्रवास के दौरान मुझे ये सब कुछ पता चला और मैं अब अपने स्तर पर इस मुद्दे को देखने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं ये तो नहीं जानता की मैं रुना देवी को दोबारा रुनिया बना पाउँगा कि नहीं मगर इतना यकीन हैं उसके साथ हुई नाइंसाफी के लिए जरूर लडूंगा। मगर मुझे यकीन हो गया है कि अब भी कुछ नहीं बदला है लेकिन विश्वास है कि एक न एक दिन जरूर बदलेगा.

6 टिप्‍पणियां:

  1. इस देश में सैंकड़ों या हजारों नहीं, लाखों रूनाओं को रुनिया बनाने की जरूरत है। लेकिन सामाजिक जकड़बंदी को तोड़ पाएँ तो? सामूहिक प्रयास करने होंगे, उन्हें आंदोलन का रूप देना होगा। आप आरंभ करें।

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  2. जरुर यह बीड़ा उठायें, हमारी शुभकामनाऐं.

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  3. द्विवेदी जी सही कह रहे हैं ... सामूहिक प्रयास की जरूरत होती है ... वह सबों को करना चाहिए।

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  4. janana chahuga ajay ji ye case kaha ka h???
    anshu aa gaye ankho me padhkar...

    mai jaldi hi agra me human rights par kam karna shuru klar raha hu apki madad chahiye hogi kanuni mamlat ke liye...

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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