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शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

तो आ ही गयी, लो पसीना कमीसन की रिपोर्ट , ७२ घंटों का जिक्र हुआ

आखिरकार चुनाव से पहले एक और कमीसन की रिपोर्ट भी आ ही गयी, आप सोच रहे होंगे कमाल है यार, अभी अभी तो पे कमीशन की रिपोर्ट आयी थी, अभी तो लोग उसी की कैलकुलेशन में लगे हुए थे, कोई अपने नए पे को लेकर खुश हो रहा था तो कोई अपने बकाया का हिसाब किताब करने में लगा था, फ़िर सरकार को अचानक क्या सूझी कि , एक और नयी रिपोर्ट आ गयी। लेकिन हुजूर ये कोई मामूली रिपोर्ट नहीं थी सो सरकार चाह कर भी इसे नहीं रोक सकती थी।
दरअसल ये रिपोर्ट लो पसीना कमीसन की थी। क्या कह रहे हो महाराज आप इस कमीशन को भी नहीं जानते, क्या टी वी नहीं देखते। अच्छा अच्छा टी वी तो देखते हैं मगर उन पर आ रहे विज्ञापन को नहीं देखते हैं। मगर ये कैसे सम्भव है। आज कल तो टी वी की जो कार्यप्रणाली और उद्देश्य है उसमें तो कोई भी कुछ भी बिना विज्ञापन देखे कुछ नहीं देख सकता और आप कुछ देखना चाहे या न देखना चाहें मगर विज्ञापन तो देखने ही पड़ेंगे, चाहे डिश टी वी लगवाओ या फिश टी वी या कोई मगरमच्छ टी वी। इसका कोई फर्क नहीं पड़ता है। खैर मैं तो बात कर रहा था लो पसीना कमीशन की। ये कमीशन घर घर जाकर ये चैक करता है कि किसी भी गृहणी को कपड़े धोते समय पसीना तो नहीं आता है , और यदि कोई अबला पसीने में तर पायी जाती थी तो उसकी पति को ये कमीशन वाले तितर बितर कर देते हैं।
यहाँ मुझ कुछ बातों पर आश्चर्य है, इन कमीशन वालों ने कभी मेरे यहाँ तो छापा नहीं मारा । यदि मारा होता तो पता चलता कि किसे पसीना आता है। अजी मुझे तो यकीन है कि चाहे कपड़े धोते वक्त न सही मगर बर्तन धोते समय तो थोडा बहुत जो पसीना आता है मुझे ही आता है । और खाना बनते वक्त की क्या कहें। फ़िर दूसरी बात ये कि आजकल तो सारे कपड़े ये वाशिंग मशीन ही धोती हैं, उन कमबख्तों को क्या खून पसीना आयेगा। इससे भी अहम् बात तो ये कि आज कल कौन सी महिला अपने कपड़े छोड़ कर दोसरों के कपड़े धोती है.इसीलिए कई महिलाओं ने तो कमीशन पर ही ये आरोप लगा दिया कि जब आजकल महिलाएं इतने कम कपड़े पहन रही हैं जो पसीने में ही धुल सकते हैं तो फ़िर उनकी छवि क्यों खराब की जा रही है।

मगर इन सारे वाद विवादों के बीच कमीशन की रिपोर्ट आ ही गयी। जिसमें कहा गया है कि किसी भी गलती को सिर्फ़ बहत्तर घंटे तक बर्दाश्त किया जायेगा। दरअसल उसके पीछे भी एक दमदार तर्क ये था कि इस नए युग में सबसे ज्यादा महत्व बहत्तर घंटों का ही है, क्यों ये तो मुझे भी नहीं पता , लिकिन टी वी पर भी यही दिखाते हैं वो भी चौबीस घंटों में बहत्तर सौ बार। कल तो कुछ बच्चों ने भी अपने शिक्षक से सवाल कर दिया कि सर क्या परिक्षा में भी की गयी कोई गलती अगले बहत्तर घंटों में ठीक की जा सकती है , बेचारे टीचर महोदय मेरी तरह ही उनकी भी समझ में ये बहत्तर घंटे के नए समीकरण पल्ले नहीं पडी. अब देखना ये है कि इस कमीशन की रिपोर्ट से विश्व जगत में के कुछ बदल जाता है।

आपको भी किसी नयी रिपोर्ट के बारे में पता चले तो बताइयेगा जरूर

1 टिप्पणी:

मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

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