प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने पता नहीं किन कारणों से गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया है। इसके साथ ही गंगा के पुनरुद्धार के लिए बहुत सी योजनायें और ढेर सारी राशि भी आवंटित की गयी है। गंगा के उद्धार और सफाई के लिए पहले से किए जा रहे सारे कार्यों , प्रयासों तथा इस फैसले से सिर्फ़ एक बड़ा अन्तर ये पडेगा की गंगा की सारी जिम्मेदारी अब केन्द्र सरकार उठाएगी। लेकिन सवाल ये है की इससे क्या और कितना फर्क पडेगा, क्योंकि अलग अलग ही सही अब तक करोड़ों, जी हाँ लाखों नहीं करोड़ों रुपये, दर्ज़नों योजनायें, और न जाने कितने संकल्प लिए गए । अन्तिम सत्य यही है की गंगा आज भी प्रदूषित है और दुःख की बात ये है की ये क्रम न सिर्फ़ जारी है बल्कि ज्यादा तेज है। और सबसे बड़ी विडंबना तो यही है , की सरकार और प्रशाशन की जिम्मेदारी, उनकी संवेदना की तो जाने दें, एक आम भारतीय को भी आज किसी गंगा , जमुना, कृष्ण, गोदावरी, या मिटटी , पेड़, हवा के प्रदूषण के प्रति जरा सी भी चिंता नहीं है। इसके बारे में सोचना या कुछ करना तो दूर उसे आज ये एहसास तक नहीं है की धीरे धीरे वो जो जहर वातावरण में घोल रहा है वो ख़ुद उसकी आनी वाली नस्लों को ही लील जायेगा। सबसे जरूरी है लोगों की मानसिकता में बदलाव लाना। इसके साथ ही जो भी इसे नुक्साब पहुंचाने में लगे हैं उनके साथ किसी अपराधी की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए। ऐसा हो पायेगा लगता नहीं है।
सिर्फ़ राश्त्रियाकर्ण करने से एडी समस्या का हल हो जाते तो बात ही क्या थी। चाहे राष्ट्र भाषा हिन्दी की बात करें, या राष्ट्रीय खेल हॉकी की, राष्ट्रीय कह भर देने से या घोषणा कर देने से क्या बदल जाता है, ये बात किसी से छुपी नहीं है। और तो आए दिन हमारे राष्ट्रीय झंडे, राष्ट्रीय चिन्ह, राष्ट्रीय गान तक का अपमान होता रहता है, कभी हम ख़ुद करते हैं कभी दूसरे कर देते हैं। इस राष्ट्रीय कारन वाली बात से कहीं फ़िर ऐसा न हो की गंगा नहीं यमुना को, या गोदावरी को क्यों नहीं राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया, वैसे लगता तो नहीं है की ऐसा होना चाहिए , मगर आज कल कुछ भी हो सकता है। यदि इस घोषणा के बाद सरकार सचमुच गंभीर होकर गंगा के उद्धार के लिए प्रयास करे और लोगों को इसके प्रति संवेदनशील किया जाए तो शायद एक दिन हम भी टेम्स, और सीन, या नील नदी की तरह गंगा को अपने पुराने और शुध्ध रूप में पा सकें। गंगा सचमुच ही मैली हो गयी है हमारे पाप धोते धोते .
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बुधवार, 5 नवंबर 2008
मंगलवार, 4 नवंबर 2008
सूर्य उपासना के दिन सूर्यपुत्री उपेक्षित
ऊर्जा के अक्षय श्रोत भास्कर देव यानि सूर्य की उपासना का शायद ये सबसे बड़ा पर्व होता है। इसे मडिया के जमाने की देन कहिएं या कुछ और , ये तो पता नहीं मगर बढ़ती मान्यताओं और विरोध के कारण ही सही छठ आज पटना- बनारस के गंगा तटों और बिहार उत्तर प्रदेश के पोखर तालाब से निकल कर दिल्ली के यमुना तट , मुंबई के जुहू बीच और कई स्वीमिंग पूलों तक पहुँच गयी है। मगर इन सबके बावजूद जो मौलिक रहा और शायद हमेशा रहेगा वो छठ पर्व की पवित्रता, सादगी और शुद्धता ।
जहाँ तक हमारी छठ की यादों की बात है तो कुछ बातें तो जरूर याद हैं, गन्ने की लम्बी छडों के साथ, माथे पर फल प्रसाद की टोकरी लेकर दादी के साथ घाट पर जाना, शारदा सिन्हा की अमृत्भारी अनोखी आवाज और शाम को पतन तो सुबह पटाखों की मौज। मुझे नहीं पता की अब गाओं में भी कितना कुछ बदल गया है, जब लोग ही नहीं रहे तो शायद कुछ तो बदला ही होगा /
इन सबसे अलग जिन बातों पर मेरा ध्यान इस बार यूँ ही चला गया वो शायद आपके जानने लायक भी हों। दिल्ली में छठ पूजन के लिए स्वाभाविक तौर पर यमुना के तटों का इस्तेमाल होता है, कहते हैं की यमुना सूर्य की पुत्री हैं, इस लिहाज़ से तो छठ का रिश्ता यमुना से और गहरा हो जाता है, और अपने तथाकथित वोट बैंक के कारण या श्याद कोई और भी कारण हो, सुना है की जल्दी ही यमुना नदी के तट पर एक सूर्य मन्दिर , खूब विशाल , बनेगा, मगर इससे विपरीत ये जानकर दुःख हुआ की ,यमुना नदी का जल इतना जहरीला हो गया है, खासकर उन इलाकों में जहाँ आबादी रहती है, और पूजा भी करती है, वहां इस बार प्रशाशन को ख़ुद ही घोषणा करनी पडी की कृपया यमुना नदी में दुबकी न लगायें, अन्यथा, कई प्रकार के असाध्य रोग हो सकते हैं, इसका ही प्रभाव ये था की केन्द्रीय शहरी राज्य मंत्री राजकुमार चौहान ने अपने क्षेत्र , पश्चिमी दिल्ली में लगभग पच्चीस करोड़ की लागत से एक कृत्रिम घाट बनवा दिया । सूर्य की उपासना के दिन , सूर्यपुत्री की इस दुर्दशा पर शायद ही कभी कोई गंभीर चिंतन होगा, क्योंकि फ़िर इसकी बात अगले छठ पर ही उठेगी। और माँ गंगा के बारे में क्या कहें, सिर्फ़ इतना की जरूर कोई देव योग की कृपा है , वरना हम इंसानों ने तो कब का उनकी मौत का इंतजाम कर दिया था।
इन त्योहारों पर यदि हम कम से कम कुछ सकारात्मक कार्य, या कोई प्रयोजन, या कोई संकल्प सिद्ध कर पाते तो शायद इन त्योहारों की सार्थकता अधिक हो जाती .
जहाँ तक हमारी छठ की यादों की बात है तो कुछ बातें तो जरूर याद हैं, गन्ने की लम्बी छडों के साथ, माथे पर फल प्रसाद की टोकरी लेकर दादी के साथ घाट पर जाना, शारदा सिन्हा की अमृत्भारी अनोखी आवाज और शाम को पतन तो सुबह पटाखों की मौज। मुझे नहीं पता की अब गाओं में भी कितना कुछ बदल गया है, जब लोग ही नहीं रहे तो शायद कुछ तो बदला ही होगा /
इन सबसे अलग जिन बातों पर मेरा ध्यान इस बार यूँ ही चला गया वो शायद आपके जानने लायक भी हों। दिल्ली में छठ पूजन के लिए स्वाभाविक तौर पर यमुना के तटों का इस्तेमाल होता है, कहते हैं की यमुना सूर्य की पुत्री हैं, इस लिहाज़ से तो छठ का रिश्ता यमुना से और गहरा हो जाता है, और अपने तथाकथित वोट बैंक के कारण या श्याद कोई और भी कारण हो, सुना है की जल्दी ही यमुना नदी के तट पर एक सूर्य मन्दिर , खूब विशाल , बनेगा, मगर इससे विपरीत ये जानकर दुःख हुआ की ,यमुना नदी का जल इतना जहरीला हो गया है, खासकर उन इलाकों में जहाँ आबादी रहती है, और पूजा भी करती है, वहां इस बार प्रशाशन को ख़ुद ही घोषणा करनी पडी की कृपया यमुना नदी में दुबकी न लगायें, अन्यथा, कई प्रकार के असाध्य रोग हो सकते हैं, इसका ही प्रभाव ये था की केन्द्रीय शहरी राज्य मंत्री राजकुमार चौहान ने अपने क्षेत्र , पश्चिमी दिल्ली में लगभग पच्चीस करोड़ की लागत से एक कृत्रिम घाट बनवा दिया । सूर्य की उपासना के दिन , सूर्यपुत्री की इस दुर्दशा पर शायद ही कभी कोई गंभीर चिंतन होगा, क्योंकि फ़िर इसकी बात अगले छठ पर ही उठेगी। और माँ गंगा के बारे में क्या कहें, सिर्फ़ इतना की जरूर कोई देव योग की कृपा है , वरना हम इंसानों ने तो कब का उनकी मौत का इंतजाम कर दिया था।
इन त्योहारों पर यदि हम कम से कम कुछ सकारात्मक कार्य, या कोई प्रयोजन, या कोई संकल्प सिद्ध कर पाते तो शायद इन त्योहारों की सार्थकता अधिक हो जाती .
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