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मंगलवार, 4 नवंबर 2014

पॉलिथीन में मूतते लोग .....................




समय लगभग साढे सात -आठ बजे शाम का वक्त । पिछले कई दिनों से बालों की कटाई का काम किसी न किसी अनचाही बाधा/व्यवधान के कारण स्थगित हो जाता था ।  अब अक्सर ही ऐसा होता है कि ऐसे कामों के लिए मैं और पुत्र एकसाथ ही निकल जाते हैं । मुख्य सडक पर स्थित सैलून के दरवाज़े पर पहुंचते ही भांप जाते हैं कि , रविवार के छूटे और मंगलवार को सैलूनों के बंद होने के कारण , लोग बाग जम कर रंगाई/घिसाई/पुताई करवाने के इरादे से वहां जमे हुए हैं । 

कोने में रखी बैंच पर बिखरे हुए अखबार के अलग अलग पन्नों को लगभग समेटते और उठाते हुए मैं और पुत्र वहीं बैठ जाते हैं । समाचार पत्र का नाम पढ कर हैरानी होती है , हैरानी इसलिए क्योंकि अब तक लगभग अधिकांश सलूनों में तो पंजाब केसरी ही देखते आए थे । यहां इस पंजाब केसरी समाचार पत्र से जुडा एक दिलचस्प किस्सा साझा करने का मन है । उन्नीस वर्ष पहले जब मैं दिल्ली आया था तो , एक दिन शायद वृहस्पतिवार का दिन रहा होगा , दिलशाद गार्डेन से अंतरराज्यीय बस अड्डे की ओर जाने वाली किसी बस के रास्ते में कहीं एक व्यक्ति जोर जोर से चिल्लाता हुआ बस में चढा ," पेपर पेपर , हिंदुस्तान ,दैनिक जागरण , नवभारत ..सैक्सी पेपर पंजाब केसरी .....मैं चौंक उठा था , मगर सिर्फ़ मैं ही चिहुंका था किसी दूसरे ने ध्यान भी नहीं दिया , हां पंजाब केसरी जरूर तीन चार लोगों ने खरीद लिए और फ़िर मुख्य समाचार पत्र को किनारे रख सीधे उसके वीरवारीय परिशिष्ट को खोल कर पूरी शिष्टता के साथ पढने लगे । खैर , इस पोस्ट का मुख्य विषय ये नहीं है । 

कैंची खच खच खच खच चलती जा रही है , मैं आदतन आंख मूंद लेता हूं ।

" क्या हुआ , आं ......क्या , बाथरूम जाना है " आवाज़ के साथ ही मैं आंखें खोलता हूं तो सामने लगे आइने में देखता हूं कि , मेरे बाल काट रहा वो लडका , बैंच पर बैठे एक थुलथुले लडके , जो कसमसा रहा था और माथे पर पसीने की चुहचुहाट भी दिखाई दे रही , की ओर देख कर उससे पूछ रहा था ।

" हां , बहुत तेज़ पेशाब आ रहा है , मुझे जाना है "

" लेकिन , यहां तो है ही नहीं कोई भी बना हुआ , दूर जाना पडेगा , मेरे बाल काटते काटते वो अब रुक चुका है और साथ खडे एक अन्य लडके जो दूसरे ग्राहक को निपटा रहा है उसकी ओर देख रहा है । मैं शीशे में देख रहा हूं कि लडके की कसमसाहट बढ रही है ।

यार ये तो रोज़ का झंझट हो गया है , ले जाकर बिठाकर स्कूटर पे इसको फ़टाफ़ट घर पे .लायलपुर............फ़ारिग करा के ले आ । "

मैं और हैरान हो उठता हूं , यहां से लायलपुर , स्कूटर पे , वो भी ....फ़ारिग होने ।

"असलम , तू ले जा,........ वो आतिफ़ भाई वाला स्कूटर ले जा , गल्ले में चाभी पडी होगी , सुन रिजर्व आन कर दियो , और कहीं टैम मत लगाइयो , धंधे का टैम है , जा जा ले जा इसको " मेरे सर पर कैंची चलाता लडका भुनभुनाते हुए एक सांस में बोल जाता है ।

कोने में कंघा फ़ेर रहा एक दुबला सा लडका , सुनते ही भाग खडा होता है , थुलथुला लडका पहले ही दुकान के बाहर जा चुका था ।


"वो राशिद के, बिजली बत्ती वाले कारीगर लौंडे क्या करते हैं ....... कै रिए थे पता है", अब मेरा पूरा ध्यान दोनों नाए मित्रों की होती इस बातचीत पर चला जाता है  ............साले , पॉलिथिन में करके गांठ मार के धर देते हैं , निकलते बडते फ़ैंकि आते हैं कहीं ............कह के वो अजीब नज़रों से आइने में देखता जहां मेरी नज़र उससे टकराते ही सकपका जाता है ।

"हां दिक्कत तो है ही , किया क्या जाए .....उधर से कसमसाहट भरी आवाज़ आती है ।


खच खच खच ...। मैं कुर्सी से उठकर खडा होता हूं , बजाय ये पूछने के कि , पैसे कितने हुए , बेसाख्ता पूछ बैठता हूं , क्या ये दिक्कत सबके साथ है , कब से है , आप लोग इसकी शिकायत क्यों नहीं करते ........

वो कहता है , बाबूजी साठ रुपए हो गए .....। मैं पैसे देता हूं और पुत्र का हाथ पकड कर सलून के बाहर हो जाता हूं । दिमाग में स्वच्छता अभियान , ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच के विरूद्ध मुहिम ...जाने क्या क्या ,,घूमने लगता है ।

गुनधुन में ही दवाई की दुकान पर पहुंचता हूं । वहां भी वही सवाल ............

हां , मैं भी घर जाता हूं , क्या करूं दवाई का दुकानदार हूं इसलिए ज्यादा देर रोक कर रखने का नुकसान जानता हूं ...............पहले था एक बना हुआ , खुला था , गंदा रहता था ,  आसपास के लोग बोलते थे , लडाई हो जाती थी , इसलिए तुडवा दिया किसी ने .......


स्थान .....जगतपुरी से चंदरनगर जाने वाली सडक , समय लगभग साढे सात से साढे आठ का ,तारीख...आज की तारीख से थोडा सा पहले ......मेरे पास एक नायाब हल है .............अगर प्रयोग सफ़ल रहा तो वो भी बताउंगा , फ़िलहाल काम शुरू हो चुका है ........

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपने एक सही समस्या की ओर इंगित किया है ।स्वच्छता अभियान के अन्तर्गत शौचालय,मूत्रालय एवं कूड़ेदानों की उपलब्धता और उनके रख-रखाव पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया और आभार आपका हेम पांडेय जी

      हटाएं

मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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