रविवार, 9 मार्च 2008

कलम उनकी कातिल है.

कलम उनकी,
कातिल है ,
हम रोज मरते हैं॥

कुछ कही,
और अनकही,
हम रोज पढ़ते हैं॥

कभी दोस्त,
कभी दुश्मन बनके,
हम रोज मिलते हैं॥

कभी दिखने को,
कभी बिकने को,
हम रोज सजते हैं॥

एक जगह पर,
रुक कर भी,
हम रोज चलते हैं॥

मैल बनी चमड़ी , उतरती नहीं,
वैसे तो ख़ुद को ,
हम रोज मलते हैं।

कभी अपनों से,
कभी अपने आप से,
हम रोज जलते हैं॥

नींद ख़राब है, कि सोच हमारी,
अब तो सपनो में,
हम रोज़ डरते हैं.

कलम उनकी कातिल है.

कलम उनकी,
कातिल है ,
हम रोज मरते हैं॥

कुछ कही,
और अनकही,
हम रोज पढ़ते हैं॥

कभी दोस्त,
कभी दुश्मन बनके,
हम रोज मिलते हैं॥

कभी दिखने को,
कभी बिकने को,
हम रोज सजते हैं॥

एक जगह पर,
रुक कर भी,
हम रोज चलते हैं॥

मैल बनी चमड़ी , उतरती नहीं,
वैसे तो ख़ुद को ,
हम रोज मलते हैं।

कभी अपनों से,
कभी अपने आप से,
हम रोज जलते हैं॥

नींद ख़राब है, कि सोच हमारी,
अब तो सपनो में,
हम रोज़ डरते हैं.

शनिवार, 8 मार्च 2008

आओ , खेलें, महिला दिवस-महिला दिवस.

सच कहते हैं भाई की दुनिया गोल है । अजी मेरे विचार से सिर्फ़ दुनिया नहीं बल्कि सब कुछ गो है तभी टू शायद हम घूम फ़िर कर वहीं पहुँच जाते हैं। अभी तो साल ठीक से शुरू भी नहीं हुआ , बसंत खिला नहीं, गुलाल उड़ा नहीं, मगर खेल सारे शुरू हो गए हैं। अभी क्रिकेट का खेल ख़त्म हुआ और सब महिला दिवस-महिला दिवस , खेलने लगे। नहीं जी ये हमारे खो-खो और गुल्ली-डंडे जैसा छोटा मोटा खेल नहीं है , ये तो अंतर्राष्ट्रीय लेवल का खेल है। जी हां ये अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है।

हां, हाँ, हमें पता है आप कहेंगे की जब इस देश की पहली महिला आई पी एस के साथ अन्याय होते रहने के बावजूद पूद्रे देश के मौन रहने के कारण उसे अपना पड़ छोड़ना पडा, जब अत्याचार से तंग होकर एक महिला निर्वस्त्र होकर सड़कों पर दौड़ती है, जब ये देश कन्या भ्रूण हत्या और दहेज़ हत्या के नित नए रेकोर्ड बना रहा है, पूरे नारी समाज को एक उत्पाद की तरह पेश किया जा रहा है , और ये सब टैब हो रहा है जब, राजनीती, समाज ,खेल,रंगमंच, सुरक्षा, मनोरंजन, किसी भी क्षेत्र में महिला किसी और से पीछे नहीं है तो, फ़िर इस महिला दिवस का औचित्य क्या और अर्थ क्या ??

शहर से बाहर निकलिए, गाँव-कस्बों में जाकर देखिये औरत समाज की हकीकत , उनका हसला , हिम्मत और हालत जब तक वो आगे नहीं बढ़ेंगी, आगे नहीं आयेंगी। तक तक लाख खेलिए आप महिला दिवस -महिला दिवस बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आने वाला।
ये हो सकता है हमारी महिला लेख्किकाओं को मेरा ये नज़रिया ज्यादा ही नकारात्मक लगे तो उनसे में अग्रिम क्षमा चाहूँगा, मगर मुझे लगता है की अभी भी बहुत कुछ करना है और जो हो रहा है उसकी भी दिशा ठीक करने की जरूरत है..

आओ , खेलें, महिला दिवस-महिला दिवस.

सच कहते हैं भाई की दुनिया गोल है । अजी मेरे विचार से सिर्फ़ दुनिया नहीं बल्कि सब कुछ गो है तभी टू शायद हम घूम फ़िर कर वहीं पहुँच जाते हैं। अभी तो साल ठीक से शुरू भी नहीं हुआ , बसंत खिला नहीं, गुलाल उड़ा नहीं, मगर खेल सारे शुरू हो गए हैं। अभी क्रिकेट का खेल ख़त्म हुआ और सब महिला दिवस-महिला दिवस , खेलने लगे। नहीं जी ये हमारे खो-खो और गुल्ली-डंडे जैसा छोटा मोटा खेल नहीं है , ये तो अंतर्राष्ट्रीय लेवल का खेल है। जी हां ये अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है।

हां, हाँ, हमें पता है आप कहेंगे की जब इस देश की पहली महिला आई पी एस के साथ अन्याय होते रहने के बावजूद पूद्रे देश के मौन रहने के कारण उसे अपना पड़ छोड़ना पडा, जब अत्याचार से तंग होकर एक महिला निर्वस्त्र होकर सड़कों पर दौड़ती है, जब ये देश कन्या भ्रूण हत्या और दहेज़ हत्या के नित नए रेकोर्ड बना रहा है, पूरे नारी समाज को एक उत्पाद की तरह पेश किया जा रहा है , और ये सब टैब हो रहा है जब, राजनीती, समाज ,खेल,रंगमंच, सुरक्षा, मनोरंजन, किसी भी क्षेत्र में महिला किसी और से पीछे नहीं है तो, फ़िर इस महिला दिवस का औचित्य क्या और अर्थ क्या ??

शहर से बाहर निकलिए, गाँव-कस्बों में जाकर देखिये औरत समाज की हकीकत , उनका हसला , हिम्मत और हालत जब तक वो आगे नहीं बढ़ेंगी, आगे नहीं आयेंगी। तक तक लाख खेलिए आप महिला दिवस -महिला दिवस बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आने वाला।
ये हो सकता है हमारी महिला लेख्किकाओं को मेरा ये नज़रिया ज्यादा ही नकारात्मक लगे तो उनसे में अग्रिम क्षमा चाहूँगा, मगर मुझे लगता है की अभी भी बहुत कुछ करना है और जो हो रहा है उसकी भी दिशा ठीक करने की जरूरत है..

शुक्रवार, 7 मार्च 2008

ब्लॉगजगत और मीडिया

कुछ भी लिखने से पहले स्पष्ट कर दूँ कि, यहाँ इस पोस्ट को लिखने के पीछे मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है कि मैं मीडिया और ब्लॉगजगत को आमने-सामने कर रहा हूँ या कि कोई तुलना करने बैठा हूँ। मैं पिछले काफी समय से किसी न किसी रूप में या कहूं कि कई रूपों में जुदा हुआ हूँ और पिछले कुछ समय से यहाँ इस ब्लॉगजगत पर भी इतना समय टू बिता हे चुका हूँ कि दोनों अनुभव को साथ साथ देख सकूं। यकायक दिमाग में ख्याल आया कि देखें दोनों के बारे में यदि एक साथ सोचा जाए तो क्या कुछ बाहर निकलता है।

प्रसार - प्रसार के मामले में ब्लॉगजगत अभी मीडिया के किसी भी माध्यम से कोसों पीछे है , वहाँ पाठकों, श्रोताओं, या दर्शकों की संख्या ब्लॉगजगत से बहुत ज्यादा है। ये बात शत प्रतिशत ठीक है। मगर, हाँ मगर, एक बात तो ऐसी है जिस पर ब्लॉगजगत इतरा सकता है, वो ये कि सुदूर कसबे में बैठ कर अपने मन की लिखने वाले पाठक को अगले ही पल विश्व के बहुत से कोनो में पढा जाने लगता है।

सामग्री - दोनों में काफी फर्क है। ब्लॉगजगत पर तो श्रव्य, दृश्य, पाठ्य, और न नान कौन -कौन सी, कैसी-कैसी सामग्री एक साथ उपलब्ध है वो भी चिरकाल तक, सुंदर आकर्षक रूप में। मीडिया की सामग्री कुछ वर्गों को छोड़कर स्तरहीन हो गयी है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया की तो बात करने भी औचित्याहीन है।

महिलाओं की सक्रियता - ब्लॉगजगत पर थोड़ी देर तक रहने के बाद ही किसी को भी ये एहसास हो जाता है कि महिलाएं कितनी संजीदगी से ब्लॉगजगत पर अपनी सक्रियता से ब्लॉगजगत की सार्थकता को बढ़ा रही हैं। और अब तो इसकी चर्चा भी होने लगी है। दूसरी तरफ मीडिया के किसी भी माध्यम में महिलाओं का उतना ही शोषण किया जा रहा है जितना किसी भी अन्य संस्थान या व्यवसाय या क्षेत्र में, ये हो सकता है कि ऐसा सबके साथ न हो पर अधिकांश के साथ तो हो ही रहा है।

भविष्य - एक यही वो जगह है जहाँ आकर मुझे लगा कि दोनों ही लगभग एक जगह पर हैं, मीडिया का इतना प्रसार होने के बावजूद आज भी इसका फैलाव जारी है और जहाँ तक ब्लॉगजगत की बात है तो उसकी तो अभी शुरूआत है और अग आगे देखिये कि कितना धमाल मचने वाला है।

यानि कुल मिला कर देखूं तो यही लगता है कि देर सवेर हिन्दी ब्लॉगजगत अपनी धमक का एहसास कराने वाला है हालांकि अभी दिल्ली दूर नहीं बल्कि बहुत दूर है.

ब्लॉगजगत और मीडिया

कुछ भी लिखने से पहले स्पष्ट कर दूँ कि, यहाँ इस पोस्ट को लिखने के पीछे मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है कि मैं मीडिया और ब्लॉगजगत को आमने-सामने कर रहा हूँ या कि कोई तुलना करने बैठा हूँ। मैं पिछले काफी समय से किसी न किसी रूप में या कहूं कि कई रूपों में जुदा हुआ हूँ और पिछले कुछ समय से यहाँ इस ब्लॉगजगत पर भी इतना समय टू बिता हे चुका हूँ कि दोनों अनुभव को साथ साथ देख सकूं। यकायक दिमाग में ख्याल आया कि देखें दोनों के बारे में यदि एक साथ सोचा जाए तो क्या कुछ बाहर निकलता है।

प्रसार - प्रसार के मामले में ब्लॉगजगत अभी मीडिया के किसी भी माध्यम से कोसों पीछे है , वहाँ पाठकों, श्रोताओं, या दर्शकों की संख्या ब्लॉगजगत से बहुत ज्यादा है। ये बात शत प्रतिशत ठीक है। मगर, हाँ मगर, एक बात तो ऐसी है जिस पर ब्लॉगजगत इतरा सकता है, वो ये कि सुदूर कसबे में बैठ कर अपने मन की लिखने वाले पाठक को अगले ही पल विश्व के बहुत से कोनो में पढा जाने लगता है।

सामग्री - दोनों में काफी फर्क है। ब्लॉगजगत पर तो श्रव्य, दृश्य, पाठ्य, और न नान कौन -कौन सी, कैसी-कैसी सामग्री एक साथ उपलब्ध है वो भी चिरकाल तक, सुंदर आकर्षक रूप में। मीडिया की सामग्री कुछ वर्गों को छोड़कर स्तरहीन हो गयी है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया की तो बात करने भी औचित्याहीन है।

महिलाओं की सक्रियता - ब्लॉगजगत पर थोड़ी देर तक रहने के बाद ही किसी को भी ये एहसास हो जाता है कि महिलाएं कितनी संजीदगी से ब्लॉगजगत पर अपनी सक्रियता से ब्लॉगजगत की सार्थकता को बढ़ा रही हैं। और अब तो इसकी चर्चा भी होने लगी है। दूसरी तरफ मीडिया के किसी भी माध्यम में महिलाओं का उतना ही शोषण किया जा रहा है जितना किसी भी अन्य संस्थान या व्यवसाय या क्षेत्र में, ये हो सकता है कि ऐसा सबके साथ न हो पर अधिकांश के साथ तो हो ही रहा है।

भविष्य - एक यही वो जगह है जहाँ आकर मुझे लगा कि दोनों ही लगभग एक जगह पर हैं, मीडिया का इतना प्रसार होने के बावजूद आज भी इसका फैलाव जारी है और जहाँ तक ब्लॉगजगत की बात है तो उसकी तो अभी शुरूआत है और अग आगे देखिये कि कितना धमाल मचने वाला है।

यानि कुल मिला कर देखूं तो यही लगता है कि देर सवेर हिन्दी ब्लॉगजगत अपनी धमक का एहसास कराने वाला है हालांकि अभी दिल्ली दूर नहीं बल्कि बहुत दूर है.

गुरुवार, 6 मार्च 2008

माँ

माँ , तेरी गोद मुझे,
मेरे अनमोल,
होने का,
एहसास कराती है॥

माँ, तेरी हिम्मत,
मुझको,
जग जीतने का,
विश्वास दिलाती है॥

माँ, तेरी सीख,
मुझे ,
आदमी से,
इंसान बनाती है॥

माँ, तेरी डाँट,
मुझे, नित नयी,
राह दिखाती है॥

माँ, तेरी सूरत,
मुझे मेरी,
पहचान बताती है॥

माँ, तेरी पूजा,
मेरा, हर,
पाप मिटाती है॥

माँ तेरी लोरी,
अब भी, मीठी ,
नींद सुलाती है॥

माँ , तेरी याद,
मुझे,
बहुत रुलाती है॥

माँ , माँ है और कोई उस जैसा नहीं होता , है न .
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