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रविवार, 16 जुलाई 2017

पुरुष तन के भीतर स्त्री मन ....




कल हमारी बहुत सी मित्र दोस्त सहेलियों ने बड़ी ही मार्के की बात कही , वैसे ऐसा तो वे अक्सर करती हैं , कि सालों साल और लगभग पूरी उम्र हमारी माँ , बहिन और पत्नी की भांति वे सब , घरेलू काम , जिसमें सबसे प्रमुख घर के सभी सदस्यों के पौष्टिक और सुस्वाद भोजन तैयार कर सबको खिलाना , सबसे अहम् , को चुपचाप , बिना किसी पारिश्रमिक , मेहनताने और कई बार तो प्रशंसा भी नहीं , के बिना ही , निरंतर करती जाती हैं | उनका कहना कि , पुरुषों को ये काम करना आना तो दूर इन कामों के किये और करने वाली की कद्र भी नहीं होती , सच है , अक्सर ऐसा देखा भी जता है | ये उनकी नैसर्गिक ड्यूटी मान कर अनदेखा किया जाता है | अपना हाल थोड़ा जुदा है |

पढाई लिखाई के कारण , शायद इंटर कालेज के दिनों में ही माँ बाबूजी और घर से दूर रहने के दौरान , विद्यार्थी जीवन में ही खुद के लिए लगभग हर वो काम , जो गृहणियों के जिम्मे होता है , करने की पहले मजबूरी फिर आदत सी हो गयी | शुरुआत , दाल चावल ,खिचड़ी जैसे आसान विकल्पों से हुई और जाने कितने ही बरस , वही उबला उबली चलती रही |

आज से पूरे बाईस बरस पहले जब दिल्ली पहुंचे तो मामला और आगे बढ़ा ,मगर खेल असली तब शुरू हुआ जब रोटी बनाने की बारी आई | हम सब नए रंगरूटों को हमारे सीनियरों ने पूरे एक सप्ताह तक तो एकदम नई दुल्हन की तरह रखा फिर एक दिन अचानक ही बिना बताये सब गायब हो लिए और सुबह से दोपहर होते होते ,पेट में चूहे दौड़ने लगे | किचन में पूरी सफाई से ,पहले ही हमारी खिचडी का सब रसद गायब , सिर्फ आटा | वहां से शुरू हुई हमारी रोटियाँ बनाने की पूरी ट्रेनिंग | लस्सी , लपसी से होते हुए जल्दी ही हम लोई तक पहुँच गए | फिर तो हम रोटियाँ भी ऐसी बनाने लगे कि सबका सरकमफ्रेंस भी भी नाप के देखा जाता तो एक दम सेम टू सेम :) :) :) :)

इसके बाद तो हममें से सब के सब इतने दक्ष हो चुके थे कि , परीक्षाओं के दिनों में गाँव से आने वाले अपने तमाम दोस्तों के लिए हम खेल खेल में सब कुछ बना लेते थे | मुझे याद है कि , दो घंटे तक बिना रुके मैं सत्तर सत्तर रोटियाँ बना लेता था | आज जब दो संतानों का पिता हूँ तो ,किसी भी कुशल गृहणी को न सिर्फ चुनौती बल्कि हर तरह के भोजन , निरामिष भी ,दक्षिण भारतीय भी और गुलाबजामुन , मालपुए जैसे पकवान भी पूरी दक्षता से बना लेता हूँ |

बिटिया बुलबुल की चोटी गूंथना और उसे तैयार करना जितना मुझे पसंद है ,उससे अधिक बिटिया को पापा से तैयार होना | कढ़ाई , सिलाई , इस्त्री ...छोडिये ..


सौ बात की एक बात ..माँ जो कहती थी ...भोला तेरा मन भीतर से स्त्री है , और मुझे लगता है पुरुष तन के भीतर स्त्री मन होना ही सर्वोत्तम है ....बिलकुल अर्धनारीश्वर हो जाने जैसा है .........

12 टिप्‍पणियां:

  1. आज के वक्त में पुरूष को भी सब काम आने चाहिये, आपका उदाहरण अनुकरणिय है, शुभकामनाएं.
    रामराम
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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    1. हाँ सच कहा आपने और शायद तभी ये बहुत बड़ा फर्क भी ख़त्म हो सकेगा | शुक्रिया और आभार आपका ताऊ

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  2. उत्तर
    1. आपका शुक्रिया और आभार सुश्लील जी

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  3. आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की १७५० वीं पोस्ट ... तो पढ़ना न भूलें ...

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "१७५० वीं बुलेटिन - मेरी बकबक बेतरतीब: ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. बुलेटिन टीम का शुक्रिया और आभार |

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  4. बढ़िया लिखे हैं अजय जी।


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  5. आपकी लिखी रचना  "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 19जुलाई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. बहुत खूब....
    जब स्वयं करते हैं तभी उस काम का और करने वाले का महत्व समझ में आता है...

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  7. जाके पैर न फटी बिंबाई सो का जाने पीर पराई। बहुत ख़ूब। प्रेरक लेख।

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  8. जाके पैर न फटी बिंबाई सो का जाने पीर पराई। बहुत ख़ूब। प्रेरक लेख।

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  9. बहुत बढ़िया आदरणीय । पढ़ाई के लिए बाहर रह कर खुद से पकाया हुआ खाना खाने का मजा कुछ और ही था ! "जाने कहाँ गये वो दिन " बस यादें भर रह गयीं हैं ।

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

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