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शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

कैमरामैन लुट्टन के साथ चंपू जी ,चिंचपोकली "प्याज तक"




टीवी न्यूज़ एंकर चंपू जी : "ये है दरभंगा का वो सुलभ शौचालय जहां पर बताया जाता है कि एक बार यासिन भटकल ने छी छी किया था , आइए पूछते हैं दरबान जी से कुछ खास इस बारे में

दरबान जी बताइए , क्या आपको लगा था कि उस दिन भटकल ने कुछ खास किया था आपके शौचालय में ?

दरबान जी " हां सर , भटकल ने कुछ तो ऐसा किया था उस दिन कि हमारा पूरा सीवर ही अटकल हो गया था उस दिन के बाद

तो देखा आपने किस तरह से हमने एक्सक्लुसिवली आपको बताया कि भटकल ने सुलभ शौचालय में भी अपना दरभंगा मौडयूल छोडा था ।

कैमरामैन लुट्टन जी के साथ मैं ,चंपू जी , सुलभ शौचालय , दरभंगा ,"प्याज तक "

ब्रेक के बाद फ़िर जारी हैं पत्रकार चंपू जी नई रपट के साथ  
न्यूज़ चैनल के पत्रकार चंपू जी : भटकल के अब्बा लटकल से : क्या आपको लगता है कि आपका बेटा बेगुनाह है ?

टीवी दर्शक : चंपू जी , क्या आपको लगता है कि इससे भी बडा बेवकूफ़ी का सवाल कोई और रिपोर्टर पूछ सकता है , या आपने सबसे बडा पूछ लिया ?

चंपू जी : नहीं नहीं , अभी तो इंडिया टीवी वाला रिपोर्टर का भी पूछना बांकी है :)

स्टूडियो से मैं  झिंगुर चौधरी इसी के साथ आपको बताता चलूं कि आज के लिए यही विषय होगा हमारी "हडबडी बहस"  के लिए , तो देखना न भूलें आपके अपने चैनल ,

कल से लेकर आज तक , एक ही चैनल "प्याज तक "


सोमवार, 26 अगस्त 2013

कुछ भी , कभी भी .........




आज देश की सर्वोच्च विधायी संस्था , संसद में ,मांग उठाई गई कि देश के एक स्वनाम धन्य संत आसाराम बापू पर लगे बलात्कार जैसे संगीन अपराध वो भी उनकी ही एक नाबालिग अनुयायी के साथ , के मामले पर सरकार सिर्फ़ इस वजह से गंभीर नहीं है क्योंकि उनके साथ " धर्म " और उनके अंधानुयायियों का भारी दबाव काम कर रहा है जो शायद पुलिस प्रशासन और सरकार को सीधे सीधे उस कानूनी कार्रवाई को करने से रोक रहा है जो उन्हें करना चाहिए । ये स्थिति अपने आप में ही सारी बातों को स्पष्ट करने के लिए काफ़ी है ।



इसी के समानांतर , महानगर मुंबई में एक फ़ोटो पत्रकार का बलात्कार , जिसके पांच आरोपियों को पुलिस जीतोड कोशिश के बाद देश के अलग अलग कोने से गिरफ़्तार करने में सफ़ल हो जाने की खबरें भी आम लोगों को मिलती हैं । अब आम आदमी के सामने ये प्रश्न खडा हो जाता है कि आखिर धर्म की ढाल क्या इतनी मज़बूत हो गई है आज कि पुलिस और प्रशासन तक इतने पंगु दिखाई दे रहे हैं कि संसद जैसी राष्ट्रीय संस्था को अपने सभी जरूरी काम काज को छोडकर इस मुद्दे की ओर ध्यान खींचना पडा । जो भी हो आज प्राथमिकी दर्ज़ कराए इतना समय तो हो ही गया है कि कम से कम पुलिस उस स्थिति में खुद को ला पाती कि या तो आरोपी को गिरेबां से धर के अदालत की चौखट तक खींच लाती या फ़िर सीधे सीधे ये साबित कर पाती कि आरोप उस हद तक मिथ्या या संदेहास्पद हैं कि अन्य कानूनी विकल्पों का सहारा लिया जाए । इस पूरे मामले में आगे कब क्या होगा कैसे होगा और क्या परिणाम निकलेगा ये तो भविष्य की बात है किंतु इतना तो तय है कि आज कानून और इसके निगेहबान , लाख दलीलों तर्कों से आम आदमी को ये भरोसा नहीं दिला सकते कि कानून सभी के लिए समान है ।





अब बात करते हैं दूसरे घटनाक्रम की , जो इत्तेफ़ाक से धर्म के इर्द गिर्द ही घूमता फ़िरता प्रतीत होता है बेशक उसके आगे पीछे कोई राजनीतिक , या कैसी भी कोई और सोच हो । उत्तर प्रदेश में संतों द्वारा  परंपरागत रूप से की जाने और बरसों से चली आ रही चौरासी कोस परिक्रमा किए जाने की घोषणा की जाती है । इस परिक्रमा से जुडे मिथक और सत्य का सारा सच तो  संत समाज ही बेहतर जान समझ सकता है लेकिन कुल मिलाकर इसे आम अवाम के सामने इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो ये इस समय किया जाने वाला सबसे पहला और आखिरी जरूरी धार्मिक कृत्य था जिसका अभी और सिर्फ़ अभी पूरा होना ही नितांत आवश्यक था ।


उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार जो पहले से ही  मुस्लिक तुष्टिकरण के आरोपों तले किसी तरह से अपना कार्यकाल एक एक दिन आगे बढा रही थी और जिस पर ताज़ा ताज़ा एक अन्य घटना के कारण भी भारी दबाव था अपेक्षित प्रतिक्रिया दिखाते हुए , इस यात्रा को सुरक्षा मुहैय्या कराके फ़ौरन पूरी करा देकर किसी अनावश्यक और अप्रिय स्थिति को टालने के विकल्प के मौजूद होने के बावजूद भी , न सिर्फ़ इस पर सिरे से प्रतिबंध लगाने का मन बना लिया बल्कि इसे करते हुए ऐसा प्रदर्शित किया मानो प्रदेश पर चीन या पाकिस्तान के हमले को विफ़ल करने जैसा काम कर लिया हो । ये आग अभी तो सुलगी है और जब तक सब कुछ ठंडा होगा तब तक ये दावानल क्या कितना खाक करेगा ये वक्त ही बताएगा ।
"यहां एक सवाल जो मन में कौंध उठा अचानक कि क्या अच्छा होता यदि ऐसी कोई परिक्रमा यात्रा , अभी हाल ही में टूट कर बिखर चुके राज्य उत्तराखंड के प्रभावित गांव कस्बों की ओर कूच करके पूरी की जाती । जाने वाले लोग अपने साथ वहां जिंदगी को दोबारा पटरी पर लौटाने के लिए जूझते अपने जैसे ही कुछ इंसानों की मदद के लिए जो भी संभव होता वो ले जाते , श्रम करते , सहायता करते । क्या उससे मिला सुकून इस परिक्रमा से मिले सुकून से कम होता ? क्या किसी राज्य सरकार , किसी केंद्र सरकार , किसी कानून , किसी धर्म में इतनी हिम्मत थी कि मानवीयता /इंसानियत को बचाने बसाने के लिए की जाने वाली इस परिक्रमा को टेढी नज़र से भी देख पाती ?"

साथ चलने वाले

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