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रविवार, 10 अगस्त 2008

सभी ब्लोग्गेर्स से मुझे अपनी जान का ख़तरा है

सभी ब्लोग्गेर्स से मुझे अपनी जान का ख़तरा है .

बिल्कुल ठीक , मित्र ढूंढा मल भी ऐसे ही चौंक पड़े जैसे आप चौंक रहे हैं, मगर भाई इसमें चौकने वाली कोई बात नहीं है, ये तो यार बेहद संवेदनशील और गंभी बात है, मैंने उन्हें बताया। और सिर्फ़ ब्लोग्गेर्स ही क्यों मुझे तो अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, रितिक रोशन आदि से भी अपनी जान का ख़तरा है। मैंने उन्हें असलीयत बताई।

उन्होने कहा की क्या बकवास कर रहे हो यार, कौन सा ब्लॉगर ऐसा है जिससे तुम्हें अपनी जान का ख़तरा है। लोग अभी ठीक ठीक तो तुम्हें पढ़ते नहीं हैं, हमेशा ही उलटा उलटा सोचते और लिखते हो, कमेन्ट भी कभी कभार कोई दया कर के लिख देता है और आज तक एक बन्दर छाप दंतमंजन तक का विज्ञापन तो दिखाई नहीं दिया तुम्हारे ब्लॉग पर तो फ़िर कोई किस कारण से तुम्हारा दुश्मन बन सकता है । और रही बात फिलिमी सितारों की तो भाई ये बात मेरी समझ में नहीं आयी की वो क्यों तुम्हारी जान के पीछे पड़ेंगे जबकि उनसे तुम्हारा दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है और एक्टिंग से भी नहीं।

मैं भड़क गया, ये तो तो कोई बात नहीं हुई, जब मायावती को भी अपनी जान का ख़तरा हो सकता है, उन्हें भी कोई जान से मारने की धमकी दे सकता है, और सबसे बड़ी बात की उनकी इस बात पर सबको विश्वास हो रहा है, कोई भलामानस इस पर संदेह नहीं कर रहा तो आप क्यों खामख्वाह मुझे पर शक कर रहे हैं।
यार सच तो ये है की मैं एक आम आदमी हूँ और आपको पता नहीं यहाँ तो एक आम आदमी को सड़क पर चलते बस और ट्रक से भी अपनी जान का ख़तरा होता है ...................

ब्लॉगजगत का एकमात्र टी वी चैनल , ममता टी वी

जब शुरू शुरू में मैं यहाँ ब्लॉगजगत पर आया तो सरे अनुभव बिल्कुल नए हो रहे थे और जाहिर सी बात है की बिल्कुल रोमांचकारी और अनोखे से। उसी दौरान मुझे एक नया ब्लॉग दिख्याई दिया, ममता टी वी। मैंने सोचा की अच्छा तो टी वी वालों ने यहाँ भी एक नए नाम के साथ अपनी टांग घुसेड राखी है, और फ़िर तेलेवीजन पर क्या कम ममता लुटाई जा रही है जो यहाँ भी जरूरत पड़ गयी। मगर फ़िर पता चला की नहीं जी ये तो अपनी एक चिट्ठाकारा ममता जी। इनका भी क्या कहना, कभी झारखंड, कभी गोअया, तो कभी कोई और कोना, कोई नया अनुभव , कोई नया विषय , नयी सोच पर कभी छोटी छोटी तो कभी बड़ी बड़ी पोस्टें लिखनें में माहिर। सबसे बड़ी खासियत की बेहद ही नियमित लेखक और टिप्प्न्नी करने वाली भी। सोचता हूँ की इस ब्लॉगजगत पर इनकी ममता की बौछार की हमेशा ही जरूरत बनी रहेगी ..................

बचत

लीना और टीना शोपिंग मॉल में खरीददारी कर रही थी। पर्स का दाम सुनकर लीना ने टीना से कान में चुपके से कहा , टीना , यार ये तो खुलाम्खुला लूट रहे हैं इस पर्स का बाहर किसी भी दूकान में इससे आधा ही होगा, रहने दे चल निकल यहाँ से।
टीना ने उसे फुसफुसा कर समझाया , क्या बोल रही है तू, पागल अब जो है ले ले , ऐसी जगह पर कोई मोल भाव करता है क्या कितनी शर्म आयेगी।
मॉल से बाहर निकलते ही दोनों सहेलियां एक रिक्शा करने लगी,
बड़े चौक का कितना लोगे भाई,
जी में साहब दस रुपैये लगेंगे।
अरे जाओ जाओ वहां के तो आठ ही लगते हैं, हम तो रोज़ जाते हैं।
जी बीबीजी, मगर ये भी तो देखिये की कितनी तेज धुप है।
चलो चलो आठ में चलना है तो बताओ।
ठीक है बीबीजी, चलिए।
"देखा ये रिक्शे वाले बदमाश होते हैं, बच्चा लिए न दो रुपैये, लीना से तीन ने कहा.

चिचिंग चांग, चमचम, चों चों, यानि ओलम्पिक उदघाटन में मज़ा नहीं आया .

यार पिछले कितने समय से ओलम्पिक उदघाटन का इंतज़ार कर रहे थे। पहले तो सोचा था कि किसी खेल वेळ में नाम लिखवाकर पहुँच जायेंगे मगर पता चला कि गुल्ली डंडा , पतंगबाजी, कंचे, ताश, डंडे से टायर चलने आदि , जिन जिन खेलों में हमने महारथ हासिल की थी उन्हें तो हमारे अलावा कोई देश जानता ही नहीं। बताइये होता तो सारे गोल्ड, सिल्वर आयरन ,स्टील मैडल अपने ही होते न । खैर, जब पक्का हो गया कि नहीं जा पायेंगे तो मन बना लिए घर पर ही उदघाटन समारोह का मजा लेंगे। मगर धत तेरे की।

आप ही बताइये चीन के नाम पर अपने लोगों के दिमाग में क्या आता है - चौमींत, चाऊ चाऊ, और ढेर सारा चाईनीज़ नकली समान। पूरे समारोह के दौरान आँखें फाड़ फाड़ कर चाउमीन देखने के लिए बेताब रहे और बाद में तो हमें यकीन सा होने लगा कि इस चौमें से चीन का कोई लेना देना नहीं है, होता तो क्या ओलम्पिक में न दिखता। मगर हां नकली समान वाली बात तो बिल्कुल ठीक लग रही थी। यार, वहाँ नकली बुश, नकली मुशर्रफ नकली सोनिया और पता नहीं कितने सारे नकली नेता बिठा रखे थे।

सुनने में तो आया है कि बहुत सारे नकली मैडल भी तैयार हुए हैं ताकि हमारे देश तथा उनके जैसे और खिलाडिओं को निराश न होना पड़े। हां, भाई एक बात और जनसंख्या के हिसाब से चीन से हम सिर्फ़ एक नंबर पीछे हैं और ओलम्पिक में हमारा कोई नंबर ही नहीं है। हालाँकि चीन ने भारत पर साजिश रचने का आरोप लगाया है कि भारत ने मात्र ५६ लोगों को ओलम्पिक में भेजा है ताकि बांकी लोग यहीं रहकर जल्दी से जल्दी चीन की सबसे ज्यादा जनसंख्या का रेकोर्ड तोड़ दें।

कुल मिलाकर उदघाटन में मजा नहीं आया................................

चिचिंग चांग, चमचम, चों चों, यानि ओलम्पिक उदघाटन में मज़ा नहीं आया .

यार पिछले कितने समय से ओलम्पिक उदघाटन का इंतज़ार कर रहे थे। पहले तो सोचा था कि किसी खेल वेळ में नाम लिखवाकर पहुँच जायेंगे मगर पता चला कि गुल्ली डंडा , पतंगबाजी, कंचे, ताश, डंडे से टायर चलने आदि , जिन जिन खेलों में हमने महारथ हासिल की थी उन्हें तो हमारे अलावा कोई देश जानता ही नहीं। बताइये होता तो सारे गोल्ड, सिल्वर आयरन ,स्टील मैडल अपने ही होते न । खैर, जब पक्का हो गया कि नहीं जा पायेंगे तो मन बना लिए घर पर ही उदघाटन समारोह का मजा लेंगे। मगर धत तेरे की।

आप ही बताइये चीन के नाम पर अपने लोगों के दिमाग में क्या आता है - चौमींत, चाऊ चाऊ, और ढेर सारा चाईनीज़ नकली समान। पूरे समारोह के दौरान आँखें फाड़ फाड़ कर चाउमीन देखने के लिए बेताब रहे और बाद में तो हमें यकीन सा होने लगा कि इस चौमें से चीन का कोई लेना देना नहीं है, होता तो क्या ओलम्पिक में न दिखता। मगर हां नकली समान वाली बात तो बिल्कुल ठीक लग रही थी। यार, वहाँ नकली बुश, नकली मुशर्रफ नकली सोनिया और पता नहीं कितने सारे नकली नेता बिठा रखे थे।

सुनने में तो आया है कि बहुत सारे नकली मैडल भी तैयार हुए हैं ताकि हमारे देश तथा उनके जैसे और खिलाडिओं को निराश न होना पड़े। हां, भाई एक बात और जनसंख्या के हिसाब से चीन से हम सिर्फ़ एक नंबर पीछे हैं और ओलम्पिक में हमारा कोई नंबर ही नहीं है। हालाँकि चीन ने भारत पर साजिश रचने का आरोप लगाया है कि भारत ने मात्र ५६ लोगों को ओलम्पिक में भेजा है ताकि बांकी लोग यहीं रहकर जल्दी से जल्दी चीन की सबसे ज्यादा जनसंख्या का रेकोर्ड तोड़ दें।

कुल मिलाकर उदघाटन में मजा नहीं आया................................

शनिवार, 9 अगस्त 2008

यार इस तरह तो अपना ब्लॉगजगत फिसड्डी ही रहेगा

जब से कमबख्त इस ब्लॉग्गिंग का असाध्य रोग लगा है , तन मन और धन ( यार रोज़ पन्द्रह रुपये कैफे वाले को देने पड़ते हैं ) यानि कुल मिला कर अपने अन्दर जो भी आदमी और शैतान, आत्मा और परात्मा है सब इस ब्लॉग्गिंग में ही लीन और विलीन हैं । जब देखो इसी ब्लॉग्गिंग के बारे में चिंतन मनन , विचार कुविचार, और शोध चलता रहता है। और ऐसा नहीं है की इसमें सिर्फ़ मैं ही लगा हुआ हूँ , मेरी तरह ख़ुद को एक टाप क्लास धाँसू चिट्ठाकार समझने वाले और भी चित्कुत्ये यही सोचते हैं। तो अचानक ही हमारे जैसे तमाम चिट्ठाकारों का एक अखिल इंतर्नैतीय सम्मलेन हुआ और उसपर ब्लॉग्गिंग के भूत ( अरे यार भूत से मेरा मतलब अपने उड़नतश्तरी, या रवीश जी, या प्रमोद जी किसी भी सदात्मा से नहीं है, आप लोग तो अर्थ का अनर्थ कर के समझते हैं ) , भविष्य की घनघोर विवेचना हुई। हाँ वर्तमान के बारे में कोई बात नहीं हुई , क्योंकि बात करते करते ही वर्तमान भूत बन जाता है और जो करने वाली बात होती है वह पहले से ही भविष्य बनी होती है। खैर गोली मारिये इस समय के चक्कर को । सबने एक मत से माना की इस तरह तो हम ब्लॉग्गिंग को कोई नया मुकाम नहीं दे पायेंगे, जिसके कई कारण बताये गए ।

यहाँ पर सब अच्छे लोग ही एक साथ जमा हो गए हैं । इतिहास गवाह रहा है की बिना किस लड़ाई झगडे, विरोध, आपसी खीचतान के कोई भी चर्चा और रेटिंग नहीं मिलती, अपने टैलेंट शो को ही देख लो जितना ज्यादा, गली गलौज , थूका फजीहत होती है शो उतना ही हित हो जाता है। यहाँ पर कभी कभार कोशिश होती भी है तो बेह्कारे भडास वाले ही करते हैं, ऐसे कैसे चलेगा.....

इतना ही नहीं , लोग न सिर्फ़ अच्छा लिख , पढ़ , देख, सुन , दिखा, सुना , रहे हैं, बल्कि प्रतिक्रया भी लिखते हैं तो उसमें भी कोई आलोचना नहीं कोई टांग खिचाई नहीं, सबको प्रोत्साहित किया जा रहा है , यार इस तरह तो सब के सब शान्ति पूर्वक सिर्फ़ लिखते ही रहेंगे, और किसी में भी आगे बढ़ने की नयी बुलंदियों की चाहत नहीं पैदा होगी। हालांकि मुझ पर एक और दोष लगा की आप जैसे ब्लॉगर तो अपनी आलोचना का जवाब भी पूरी विनम्रता से दे देते हैं, जिन्होंने आपसे ये कहा की आप लिख तो बकवास रहे हैं मगर हम पढ़ रहे हैं, उन्हें आपने क्यों कहा की शुक्र है की आप हमारा बकवास पढ़ तो रहे हैं वरना आजकल तो कोई प्रेमचंद को नहीं पढ़ रहा , टाईम नहीं है न जी।

एक अन्य कारण बताया गया की आप लोगों की सोच बिल्कुल सिमित हो गयी है, जो जैसा होता उसे वैसा ही देखते और दिहाते हैं, कोई गंदी और ग़लत बात नहीं करते, यानि कुल मिलाकर कोई अनोखा एंगल कोई एक्सक्लूसिव दृष्टिकोण है ही नहीं आप लोगों में, पिछले दिनों भाई समीर जी ने अपनी एक पोस्ट में विदेशी लेखकों और चित्रकारों वाला एंगल दिया भी था तो पूरी विनम्रता से,

तो ऐसे कब तक चलता रहेगा, क्या आप लोग नहीं चाहते की सारा मीडिया, टी वी , रेडियो , सब जगह हमारी चर्चा शुरू हो जाए । क्या कहा , नहीं चाहते, इस तरह तो बिल्कुल नहीं, तो फ़िर बने रहिये सिर्फ़ ब्लॉगर, हे भगवान् कितना समझाया आप लोगों को मगर आप लोग तो तरक्की चाहते ही नहीं हैं.

शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

सिंग इज किंग, और देश इज इंडिया , सोनिया इज मदर इंडिया

सिंग इज किंग , देश इज इंडिया , और सोनिया इज मदर इंडिया
चलिए आज पता चला की सिंग ही किंग होता है , वरना हम तो समझ रहे थे की सिंह यानि शेर ही राजा होता है, मगर जंगल का ना, शायद यहाँ पर बात जंगल की नहीं हो रही है तो फ़िर सिंग इज किंग कहाँ के भैया .....
अरे नहीं समझे जब सिंग इज किंग हो तो देश इज इंडिया ही तो हो सकता है , और सोनिया इस मदर इंडिया यानि घूम फ़िर कर अपने देश की राजनीती की बात हो रही थी । मगर यार यहाँ अपना सिंग यानि मनमोहन सिंग काहे का किंग है भाई , सच कहें तो न तो मनमोहन , मन मोहन लगते हैं न ही सिंग लगते हैं और किंग तो बिल्कुल ही नहीं लगते। बेचारे वित्त मंत्री के रूप में जो भी हिसाब किताब जानते थे वो सब प्रधान मंत्री बनते ही भूल गए । और अब तो राजनीती शाह्स्त्र के विद्यार्थियों को बताया और पढाया जा रहा है की भारत में सिर्फ़ राष्ट्रपति ही नहीं कभी कभी प्रधानमंत्री भी रबर स्टाम्प होता है। सब ऐसा सिंग ही देश का किंग हो तो इस देश का भगवान् ही मालिक है ।

इस देश को भगवान् भी नहीं बचा सकता
भगवान् के नाम पर याद आया, अभी हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने किसी मुक़दमे की सुनवायी के दौरान कहा की इस देश को तो भगवान् भी नहीं बचा सकता, मैं बिल्कुल गाशन चिंतन मनन में पड़ गया । यार ये क्या इस देश को भगवान् भी नहीं बचा सकता क्यों भाई , पिछले एक महीने से तो भगवान् और भक्तों के नाम पर इस देस्क्स्ह में जो चल रहा है , उसके रिटर्न में भगवान् इतना तो कर ही सकते हैं, कहीं पर हम भगवान् के लिए जमीन लेने के लिए मर किआर कर रहे हैं तो कही पर जहाँ उन्हें जमीन मिली हुई है वहाँ उनके दर्शन के खातिर ऐसी भगदड़ मचाई की त्राहि त्राहि मच गयी, और भगवान् हैं की हमें नहीं बचायेंगे। मैंने भी ठान लिया सो भगवान् से दीरेक्ट ही पूछ लिया, क्यों भगवान् क्या सर्वोच्च न्यायालय ठीक फरमा रही है। मुझे आश्चर्य में डालते हुए उन्होंने कहा बिल्कुल ठीक यार तुम लोगों में बचने बचाने के लिए धरा क्या है, वैसे भी तुम लोग तो मेरे पक्के क्लाईंट हो ही, जब देखो मेरे नाम पर ही दुकानदारी चालते हो, मैं तो बचाने के लिए अमेरिका, सिंगापुर, इंग्लॅण्ड, जापान आदि नए क्लाईंट ढूंढ रहा हूँ। इसका मतलब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ठीक कह रही थी।

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

चलिए सर्वोच्च न्यायालय की बात चली है तो एक और बात का जिक्र हो जाए। बहुत पहले ही हमारे बुजुर्ग कह गए थे की पर उपदेश कुशल बहुतेरे, यानि दूसरों को शिक्षा देना बहुत आसान है और ख़ुद उन पर अमल करना बड़ी टेढी खीर। दरअसल आजकल न्यायाधीशों की भ्रष्टाचार में लिप्तता को लेकर आकाल एक गर्मागर्म मुद्दा ख़ुद अदालत के पास विचाराधीन है, और बहस के दौरान जब कुछ वकीलों ने उन्हें आईना दिखला दिया तो वे अपनी तिलमिलाती सूरत देख कर बिल्कुल ही बौखला गए। क्यों भाई जब आप ख़ुद को इस देश की सबसे विश्वशनीय संस्था कहते और साबित करते हैं तो फ़िर वहां किस तरह की झिझक आऔर पक्षपात क्यों। फिलहाल तो मामला बिल्कुल गर्म है देखिये आगे आगे होता है क्या................

मेरा अगला पन्ना :- यार इस तरह तो ब्लॉगजगत फिस्सद्दी ही रहेगा

गुरुवार, 7 अगस्त 2008

अरे आप लोगन को कुछ खबर है कि नहीं ?

जानते हैं, जबसे ई ब्लोगीयाने का नशा लग गया है तभी से जैसे खबर सबको सूंघने का आदत सा लग गया है महाराज। मित्र बंधू सब कहने लगे हैं का सर ई आदमी का जनम लेकर एक दम से आप तो कुत्तापन पर उतर आए हैं, जब देखो तो एगो नयी खबर एगो नया एंगल ढूंढते रहते हैं। का इरादा कहीं आप सबसे तेज़ से भी ज्यादा तेज़ बन्ने के चक्कर में तो नहीं हैं। हम कहे कि नहीं भैया , का करें यार ई अपना ब्लॉगजगत पर कौनो चिट्ठाकार एस्कीलुसिव काम करिए नहीं रहा है हमको छोड़कर .ऊ बहुत चकित हुए , देखिये आप खुदे देख लीजिये, ई घटना सबको कौनो बछा ई एंगल से देख रहा है.....

बहुत परेशानी में हैं बाबा लोग :-
लगता है कि पिछले दिनों जो सूर्य ग्रहण लगा और चंद्र ग्रहण लगने वाला है उसका सबसे ज्यादा असर बेचारे उन्ही बाबा लोगन पर पड़ गया जाऊँ लोग सबको ई का फल प्रतिफल बता रहे थे। देखिये न सबसे पहिले अपने बाबा आसा राम जी । ना जाने कौन जीव आत्मा के प्रकोप से पहिले उनके आश्रम में लगातार एक के बाद एक मौतें वो भी मासूम बच्चों की, होती रही, लोगों की नाराजगी झेलनी पडी, उसके बाद जब वो मामला शांत हुआ तो एक नया संपत्ति विवाद शुरू हो गया है, देखें चंद्रग्रहण की बाद का का होता है। दुसरे बाबा हैं अपने बाबा अमरनाथ जी, अरे हाँ वही बर्फानी बाबा जम्मू वाले, काल्हे मिले अत एक टाप रहे थे , हम कहे का बाबा ई का हाल बना लिए हैं। कहने लगे यार तुम लोग हमको भी नहीं छोड जब से चुपचाप हम बर्फ जमा कर कर के अपना बोड़ी बनाते थे ठीक थे, ई ससुर मीडिया वाला सब जब से घुसा है सब सत्यानाश कर के रख दिया है भाई। कभी सब हाथ लगा लगा कर deepfrost कर देता है तो
कभी हमारे नाम पर प्लाट की मारामारी करके सब आग लगा रहा है तो हम तापेंगे कि नहीं। हम कहे ता का फैसला किए हैं। बाबा निराश हो के कहे कि भैया अब ता कुछ दिन शांती चाहते हैं सो जा रहे हैं लादेन के पास किसी गुफा में रहेंगे।

लीजिये एक रेकोर्ड तो हमारा बन ही रहा है :-
ओलम्पिक को लेकर पहले से ही अपने देश पर छीताकंशी का दौर शुरू हो चुका है सब कह रहे हैं ई बार भी आप लोग चीन से खाली चाउमीन खाकर चले आओगे, खाली उद्घाटन समारोह और समापन समारोह में ही झंडा उत्ता कर चलते दिखाई दोगे कोई रेकोर्ड नहीं बन्ने वाला। हमने कहा अबे जा रेकोर्ड बनाए के लिए हम पूरी दुनिया की तरह चार साल इंतज़ार नहीं करते। देखो हम रोज़ नए रेकोर्ड बना रहे हैं। अमा अब भी नहीं समझे, मंहगाई का यार, रोज़ ही तो खबर आती है आज मंहगाई ने फ़िर एक नया रेकोर्ड बनाया..........

मौसम का मज़ा :-
कल जैसे ही बारिश की बूँदें पड़ने लगी तो मुझे पहले ही पता था कि मित्र तल्ली सिंग का फोन आ जायेगा और यकीन मानिए बूँदें के बौछार बन्ने से पहले ही फोन आ भी गया। मैं पीता वीता नहीं हूँ मगर यार दोसोतों की महफिल में बैठ कर उनकी बातों और वहां पड़े चखने का मज़ा जरूर लेता हूँ इसलिए चला जाता हूँ। धर्मपत्नी जी भी मेरी ये आदत जानती हैं इसलिए अनुमती मिलने में देर नहीं लगती। सो अपन चल दिए। वहां जब महफिल सजी तो पकोडों के बीच सबसे पहले तो मौसम का धन्यवाद दिया गया। सबने तर गले से वर्षा रानी को ही असली साकी ठहराते हुए उसकी तारीफों के पुल बाँध दिए। अन्तिम बारी मेरी आने वाली थी क्योंकि मैं होश में जो था, मैं कुछ बोलता इससे पहले फोन आ गया
"बेटा पिछले चार दिनों से घनघोर बारिश ने सब कुछ डूबा दिया है घर की कच्चे दिवार बस गिरने वाली है हो सके तो आ जा "
मैं बारिश पर कुछ बोल नहीं पाया .

रविवार, 3 अगस्त 2008

दोस्ती जहाज दिवस यानि फ्रैंड शिप डे

एक तो हमारे जैसे भैया लोगों की सबसे बड़ी मुसीबत यही है की चाहे दिल्ली हो या अमरीका , हम लोगों से अपना ई भैयापन नहीं छूट पाता है, अरे महाराज कोशिशे नहीं न करते हैं, और काम धाम के साथ दिमाग भी एक दम पकिया जाता है भैया टाईप। आज सुबह सुबह ही एक परिचित जी का फोन आ गया , जो थे तो हम लोगन में से ही एक मुदा दिल्ली में आकर एकदम से ग्लोब्लाईज हो हो गए, कहने लगे और झाजी आज तो फ्रैंडशिप डे है, क्या ख़ास प्रोग्राम है भी, वैसे तो आप लोग अभी तक पता नहीं काहे गांधीजी के देश में ही रहना चाहते हैं, अरे भाई अब ई देश सोनिया जी टाईप हो गया है, एकदम इतालियन, समझे। हम कहे , नहीं समझे, का फ्रैंड शिप डे, दोस्ती जहाह दिवस, का मतलब।
अरे यार तुम हिन्दी इंग्लिश की बीच फंसे लोगों की हमेशा ही यही प्रॉब्लम रहती है जब देखो लगते हो त्रान्स्लैसन करने, भाई आ फ्रैंडशिप डे है, यानी दोस्तों का दिन , दोस्तों के बीच दोस्ताना बिताने का दिन। तुम बताओ है कोई दोस्त वोस्त की बस यूँ ही ,

हमने थोडा डरते डरते कहा यार दोस्त तो बहुत सारे थे , मगर आज कोई ऐसा नहीं जिसे मैं दोस्त कह सकूँ, सब के सब स्वार्थी हैं , जबसे मैंने इस बेचारगी के दौर में उनसे उधार मांगना शुरू किया है वे तो सब के सब निकल लिए , कुछ तो उधार वापस न कर पाने के कारण मेरे दुश्मन हो गए हैं, यार दोस्ती क्या आर्थिक आधार पर टूट और जुड़ सकती है। और रही मेरी पत्नी तो किसी ने सच ही कहा था की प्रेम तब तक ठीक रहता है जब तक आप उसी से प्रेम विवाह न कर लें। मगर मैंने कौन सा कोई अच्छी बात अब तक किसी की मानी थी जो ये माता, नतीजा सामने है प्रेम विवाह के बाद ना तो प्रेम रहा न रही प्रेमिका, बस जो है वो तो बिल्कुल वैसी है जैसे भारत और पाकिस्तान। और हम भी बिल्कुल हर सार्वजनिक स्थान पर भारत पाक की तरह अपने मजबूत रिश्तों की दुहाई देते रहते हैं। हमारी तो मज्बोरी ये है की भडास निकालने के लिए कारगिल वार भी नहीं कर सकते। अपना तो ये फ्रैंडशिप डे बेकार ही समझो।
उन्होंने समझाया, अरे नहीं यार , आजकल दिल्ली बम्बई जैसे शहरों में ये कौन सी कोई समस्या, लो मैं अभी नंबर देता हूँ फोन करो और और दोस्ती कर लो बस मेंबर बनना पडेगा, थोड़े से पैसे देकर ragistraisan करा लो।

हमने कहा की ठीक है, आनन् फानन में सारे काम करके हमने पूरी तैयारी कर ली अपना फ्रैंडशिप डे मनाने की।
मेंबर बनने के बाद हमें एक और नम्बर दिया गया और कहा गया की लो जी मिल गया आपको एक सुंदर सस्ता तिकौऊ दोस्त, हम थोडा चकराए तो सही मगर हिम्मत नहीं हारी।

फोन मिलाया तो दूसरी तरह से किसी महिला या युवती की आवाज आयी, और फ़िर होने लगी दोस्टी की बातें , मैंने जिज्ञासा में पूछा की मोहतरमा अपने ये दोस्ती क्या अगले फ्रिईन्द्शिप तक चलेगी या उसके लिए मुझे ये मेम्बरशिप रेनेवाल काराना पडेगा, जवाब मिला अजी आप चिंता क्यों करते हैं , अगले फ्रैंडशिप डे से पहले तो मैं आपको फाठेर्स डे और ख़ुद को मोठेर्स डे मनाने का मौका दे दूंगी , आप तो बस देखते जाइए।
मुझे तो एक ही पल में वो पाकिस्तान यानि मेरी पत्नी से अधिक खतरनाक , अमरीका नज़र आने लगी। तौबा तौबा माफ़ करो मुझे नहीं चढ़ना इस दोस्ती के जहाज में अपने तो घर की नाव ही ठीक है पार उतरने के लिए .

शनिवार, 2 अगस्त 2008

कुछ भी कभी भी

पिछले कुछ दिनों से मन अशांत और बोझिल है और जाहिर है की ऐसे में क्या पढ़ , क्या देख , क्या लिख रहा हूँ ख़ुद भी असमंजस में हूँ की उसे क्या नाम दूँ, सो सोचा की यही कह दूँ की जब यही नाम मेरे चिट्ठे का भी है तो यही नाम इस पोस्ट का भी सही।

परमाणु समझौता और सब्जी वाला
पिछले एक साल से भारत अमरीका परमाणु समझौता एक ऐसा मुद्दा बन गया है की राजनितिक और सामाजिक क्या आर्थिक गलियारा भी इसी के इर्दगिर्द घूम रहा है। और सच कहूं तो एक आम आदमी होने के नाते मेरे तो ये बिल्कुल पल्ले नहीं पड़ रहा की इसके सफल या विफल होने से मेरी दिनचर्या, मेरे जीवन स्टार में क्या ख़ास फर्क पड़ने वाला है, कम्भाक्त संसद तक में महा ड्रामा तक हो गया इसी मुद्दे पर। खैर, ये सब निबटा तो थोड़ी सी राहत मिली। कल जब सब्जी खरीदने गया (सब्जी से मेरा मतलब सिर्फ़ आलू, प्याज , और टमाटर ही है, बाँकी सारी चीज़ें तो बस अब मैं ख़ुद और बच्चों को भी सिर्फ़ टी वी में या किताबों में ही दिखाता हूँ ) तो जैसे ही ये पता चला की ये तरकारी जगत की ये तीनो महादेवियाँ भी शिखर पर पहुँच गयी हैं, तो मारे हैरत के मेरी हालत पतली हो गयी। सब्जी वाला मुझे गश खाता देख तपाक से बोला, " कमाल है बाबूजी सुना है की किसी परमाणु उद्योग में आप लोग अमरीका के पार्टनर बन गए हो, कहिये तो इतना बड़ा पार्टनर और एक आलू प्याज के दाम से घबरा गए। आप देखना एक दिन तो हम आपसे डालर में पैसे लेंगे " मैं समझ गया की ये सब्जी वाला परमाणु मुद्दे को बिल्कुल ठीक ठीक समझा है।

मैं अब भी चिट्ठी लिखता हूँ, और आप ....
कल जब पोस्ट ओफ्फिस में मैंने पचास पोस्टकार्ड मांगे तो , देने वाला क्लर्क मुझे इस तरह देख रहा था जैसे की मैं कोई अजूबा हूँ। दरअसल मैं नियमित रूप से अपने ओफ्फिस में बने डाक घर से ही पोस्ट कार्ड , अंतर्देशी, और लिफाफे वैगेरह खरीदता हूँ, मगर कल अचानक किसी दूसरे पोस्ट ओफ्फिस में चला गया। क्लर्क बाबू ने दोबारा पूछ कर तस्दीक़ की,तो मेरे मुंह से वही पचास पोस्टकार्ड सुन कर ख़ुद को पूछने से नहीं रोक पाये की मैं उनका क्या करने वाला। जब मैंने बतायी की मैं इनमें चिट्ठी लिखने वाला हूँ तो उन्हें आश्चर्य हुआ, क्या कहा आपको भी हैरत हो रही है। मगर ये सच है, दरअसल मैं पिछले सत्रह वर्षों से बीबीसी , रेडियो जापान, वोइसे ऑफ़ अमेरिका, जर्मनी, आदि की हिन्दी प्रसारण सेवा सुनता आ रहा हूँ और उन्हें नियमित रूप से लिखता भी रहा हूँ, अब भी नियमित रूप से कम से कम पाँच छ पोस्ट कार्ड तो रोज़ लिख डालता हूँ। इसके अलावा मेरे दोस्तों की संख्या, जिनमें से बहुतों को कभी मैंने देखा तक नहीं , भी बहुत सारी जिन्हें में पत्र लिखता रहता हूँ। मुझे लगता है की पत्रों में जो आत्मीयता, जो खुशबू होती है वो भेजने और पाने वाले की आत्मा तक को आपस में जोड़ कर रख देती है।

चिटठा जगत पर अनियमित होने की मजबूरी
पिछले जितने भी दिनों से चिट्ठाकारी कर रहा हूँ ,लाख कोशिशों के बावजूद भी एक नियमित लेखक के रूप में नहीं जम पा रहा हूँ। अप्रत्यक्ष रूप से इसके कई कारण हैं, मसलन मेरा अन्य पत्र पत्रिकाओं के लिए लेखन कार्य, घर में बच्चों और परिवार को समय देना, तथा सामाजिक दायित्वों का पालन। मगर मुझे लगता है की ये सब होने के बावजूद भी मैं आसानी से नियमित हो सकता हूँ यदि अपना ख़ुद का कम्पूटर ले लूँ। हालांकि मेरी कोशिश जारी है मगर किसी ना किसी वजह से अभी तक तो सफल नहीं हो पाया हूँ, मगर यकीन हैं की जल्दी ही शायद इसी वर्ष मेरी ये उत्कट इच्छा पूरी हो जाए, तब तक तो शायद स्थिति ऐसी ही चलती रहेगी.

साथ चलने वाले

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