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गुरुवार, 30 अगस्त 2012

हिंदी ब्लॉगिंग की असहज़ कुप्रवृत्तियां





पोस्ट लिखने से पहले एक क्लेमर लगा दूं , (जी हां मुझे किसी डिस्क्लेमर की कोई जरूरत नहीं क्योंकि पिछले कुछ समय में इतने सारे ब्लॉगरीय अनुभवों से इतना तो जान ही चुका हूं कि अपने ब्लॉग के सब दादा हैं , कई तो परदादा भी हैं , हम भी देर सवेर हो ही जाएंगे , हां ध्यान रहे कि पोता कोई नहीं है ) तो क्लेमर ये कि इस पोस्ट का हर उस किसी से कुछ न कुछ लेना देना है , जिसे जो लेना हो ले ले जिसे जो देना हो दे दे ) ।
पिछले अनुभवों में एक सबसे बडा अनुभव ये रहा कि हिंदी ब्लॉगिंग में सकारात्मकता का मोल अगर दो पैसा है तो नकारात्मकता का शेयर बाज़ार अरबों खरबों का है ,सम्मान का भाव टके का है तो अपमान की कीमत अनमोल है , फ़िर क्या तेरी क्या मेरी । और हां एक कमाल की बात ये कि , ये आपके चाहने न चाहने , होने न होने से नहीं होता ये होना है तो होता ही है ।


संदर्भ की जरूरत इसलिए नहीं क्योंकि हमेशा की तरह हिंदी ब्लॉगिंग में सबसे ज्यादा प्रवाहमान पोस्टें और गतिवान माहौल कभी होता है तो वो तभी होता है जब कोई ताज़ा ताज़ा ब्लॉगर सम्मेलन , मिलन , बैठकी हुई हो । आखिर हो भी क्यों न , यही तो वो समय होता है जब तमाम तरह के दंड पेले जा सकते हैं या पेले जाते हैं सो पिछले साल के अभूतपूर्व छीछालेदारी के बावजूद जब इस बार भी हमारे बीच के कुछ ब्लॉगर साथियों ने फ़िर से हिंदी ब्लॉगरों में से कुछ को सम्मानित करने की योजना बनाई तो तभी लग गया था कि ओह , बिग ब्लॉग सीज़न टू , कौन बनेगा ब्लॉगपति सीज़न टू भी कम हंगामेदार नहीं रहने वाला है । अब चूंकि इसकी धमक चमक तभी सुनाई देने लगी जब इसकी पहली रूपरेखा के रूप में एक पोस्ट सामने आई । जल्दी ही ये रूपरेखा और उसके बाद निकला नतीज़ा कुछ कुछ इस तरह का हो गया , कि कम से कम मुझे वो स्टार परिवार अवार्ड या फ़िर कलर्स परिवार अवार्ड सरीखा ही लगने लगा था । मगर चूंकि मामला सम्मान का था , प्रोत्साहन का था वो भी हिंदी ब्लॉगिंग , हिंदी ब्लॉगर्स का था तो हाथ तालियों के लिए अपने आप उठ गए । वैसे भी मेरा मानना हमेशा से यही रहा है कि जब हम खुद अपनी इज़्ज़त नहीं कर सकते , एक दूसरे का सम्मान नहीं कर सकते तो फ़िर काहे के लिए इतना उबाल मारते हैं जब सरेआम कोई मंच से कह जाता है कि अधिकांश हिंदी ब्लॉगर लंपट हैं , वो भी तब जब हम खुद लंपटई दिखाने का कोई मौका नहीं चूकते तो वे कैसे चूकें जो जाने कबसे इसी ताक में बैठे रहते हैं कि कोई मौका मिले और जम के लताडा जाए इन ब्लॉगरों को , हुंह्ह कभी अपने को साहित्यकार समझने लगते हैं तो कभी पत्रकार , और संपादक तो खैर हईये हैं सबके सब ।


किसी के आतिथ्य की जिम्मेदारी निभाना सिर्फ़ वही समझ सकता है जो निभाता है ,वर्ना घर पर आने की खबर भर सुनकर कईयों को बांग्लादेश तक का वीज़ा बनवा कर जरूरी काम से निकलते देखा जा सकता है , ऐसे में ब्लॉगर जमात , वो भी हिंदी ब्लॉगर जमात का जमावडा लगाकर उनका आ बैल मुझे मार वाली हिम्मत कर जाना कोई कम पगलेटपन वाला बात नहीं है ,लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग करने जैसा पागलपन कर रहे हैं तो फ़िर ये पगलेटपना और ज्यादा हो जाए तो इसमें चौंकना कैसा । लेकिन ये उदवेग इतने भर से ही नहीं रुका सा लगा और सम्मान कार्यक्रम होने तक वो लगभग सम्मान क्रियाकर्म हो चला । इस क्रियाकर्म की समाप्ति पर पता चला कि न सिर्फ़ निर्धारित वर्गीकरण ,बल्कि सम्मानित होने वाले तक बदल गए । कुछ नाम इतने अप्रत्याशित थे कि वे सहज़ प्रवृत्तियों से सीधे ही असहज़ता की ओर ले चले सबको । मुझे खुद "वर्ष २०११ का ब्लॉग खबरी " के रूप में नामांकित और सम्मानित किया गया लेकिन साथ में जोडा गया ब्लॉग "झा जी कहिन "जिसपर मेरी जानकारी के मुताबिक पिछले एक वर्ष में ऐसी कोई पोस्ट या चर्चा मैंने नहीं लगाई है जिसे एक ब्लॉग खबरी के रूप में लगा सकूं । किंतु इसके बावजूद भी मैंने हर्ष पूर्वक उस सम्मान को स्वीकार किया क्योंकि जब तालीम और तहज़ीब ने यही सिखाया है अब तक कि यदि कोई इज़्ज़त दे आपको तो सिर झुका के उसे स्वीकार करना ही मानव धर्म है ।


हां एक ब्लॉगर के रूप में एक ब्लॉग खबरी के रूप में बहुत सारे नामों पर, जिनका ईशारा बहुत सी पोस्टों में किया जा चुका है और अब भी किया ही जा रहा है , जरूर ही आश्चर्य और क्षुब्धता भी हुई , लेकिन मुझे हुई तो हुई । आयोजकों के लिए उन्हें सम्मानित करने (ध्यान रहे कि अपमानित करने के लिए यहां हिंदी ब्लॉग जगत में वज़हें तलाशनी नहीं पडतीं ) के लिए जरूर वाज़िब वजहें रहीं होंगी और सबसे अहम बात ये कि आखिर वे साथी ब्लॉगर्स हैं तो हमारे आपके बीच के ही तो फ़िर उनके सम्मानित हो जाने से कुढ के मर जाने लायक भावना नहीं पैदा हो सकी और माफ़ करिएगा हो भी नहीं पाएगी । मेरे लिए पिछले कुछ घंटों में इस संदर्भ में आई पोस्टों में सिर्फ़ वो पोस्टें सहेजनीय और स्मरणीय रहेंगी जिनमें हमारे साथी ब्लॉगर्स के मुस्कुराते चेहरे , एक दूसरे से बतियाते भाव वाली फ़ोटुएं देखने को मिलीं । शेष , इस पोस्ट सहित तमाम पोस्टें तो हमेशा की तरह गर्त में ही जाती रही हैं और जाएंगी । पुरस्कार समारोह के अतिरिक्त वहां निर्धारित विभिन्न परिचर्चाओं के बारे में कहीं कुछ विशेष न लिखे पढे जाने के कारण और भी निराशा हाथ लगी और ये और भी तब बढ गई जब एक बार फ़िर से एक सत्र को रद्द करने की पिछली भूल को दोहराए जाने का समाचार मिला , खैर ये भी ठीकरा आयोजकों के जिम्मे फ़ूटता है सो फ़ूटा ।


इस कार्यक्रम की समाप्ति के आई पोस्टों में जब इस कार्यक्रम की चर्चा , खबर आने लगी तो उसके समांनांतर वो पोस्टें भी आईं जो बेशक कही तो सहज प्रवृत्तियों के रूप में थीं लेकिन सिर्फ़ चौबीस घंटों के अंदर टिप्पणियों का माल मसाला लगा के उसे इतना असहज़ कर दिया गया मानो इस वर्ष  हिंदी ब्लॉगिंग की सबसे बडी दुर्घटना यही घटी कि हमारे ही कुछ साथियों ने हमारे ही कुछ साथियों का सम्मान कर दिया । सो इसके एवज़ में न सिर्फ़ सम्मानित करने वालों , सम्मानित होने वालों को नामी बेनामी सुनामी बनके बनके हमारे ही कुछ साथी दो टके का कहते दिखे तो कुछ साथी पूरी प्रश्नावली दाग बैठे । देखने पढने वाली बात ये कि कुछ साथी जो पिछले दिनों ब्लॉग आपात काल में नज़रबंद थे अचानक ही ऐसी पोस्टों पर नूमदार होकर अपने ब्लॉगरीय अनुभव को साहित्यिक छटा से लपेट कर यूं पिल पडे मानो कंधों पर बोफ़ोर्स लिए बस इसी एक वज़ह से रुके हुए थे । और ऐसा नहीं है कि वे खुद कभी ऐसे किसी आयोजन , किसी सम्मेलन , किसी सहभागिता के हिस्सेदार नहीं बने या आगे नहीं बनेंगे , हां ये जरूर है कि तब इस रवैये में ठीक वैसा ही फ़र्क आ जाता है जैसा किसी की सोच और शैला में तब आता है जब बेटी के विवाह के समय दहेज़ को भर भर के कोसता व्यक्ति अपने बेटे की शादी के समय पूरी सूची लेकर खडा हो जाता है । सोचता हूं यदि यही सब वज़हें हिंदी ब्लॉगिंग को रफ़्तार देती हैं , उन्हें (दुर)गति प्रदान करती हैं तो चलिए यही सही । जो भी हो , ये सब भी आनी जानी है । तो आइए इस लंपटगिरी को इसी तरह प्रवाह देते रहें और एक दूसरे को यूं ही सम्मानित अपमानित करते और होते रहें ।



शनिवार, 4 अगस्त 2012

लडाई खत्म नहीं , लडाई अब शुरू हुई है






अन्ना हज़ारे और उनके सहयोगियों , जिन्हें सिविल सोसायटी के सदस्य के रूप में देश ने पहचाना था , ने कल अचानक ही घोषणा कर दी और एक प्रश्न पूरे देश के सामने उछाल दिया कि क्या अन्ना और उनके सहयोगियों को अब एक राजनीतिक विकल्प देने के लिए खुद राजनीति में उतरना होगा और साथ ही अनशन की समाप्ति की घोषणा भी कर दी । बेशक राजनीतिक सामाजिक गलियारों में इस तरह के और इससे जुडी कई संभावनाओं के कयास लगाए जाते रहे हों किंतु जंतर मंतर पर खडे और इस सारे जनांदोलन पर अपने मन मस्तिषक का एक कोना लगाए आम आदमी के लिए ये सब अचानक सा हुआ ही रहा । इस निर्णय की जो प्रतिक्रिया देखने पढने सुनने को मिली उसने कहीं से भी आश्चर्यचकित नहीं किया । राजनीतिक दल अपने अपने चरित्र के हिसाब से उपहास उडा रहे हैं , लांछन लगा रहे हैं , और खुद अपनी पीठ थपथपा रहे हैं । कुछ मौका उन्हें भी मिल गया है जो शुरू से ही इसे किसी न किसी करवट बिठाने पर आमादा थे ।

एक आम आदमी की नज़र से इस जनांदोलन का आकलन विश्लेषण किया जाना जरूरी है और इसके लिए सबसे पहले एक आम आदमी होना जरूरी है । आम आदमी जो पिछले साठ बरसों से जाने कितने ही जननायकों , कितने ही जनांदोलनों और कितने ही राजनीतिक दलों के तमाम वादों ,नारों के बहकावे भुलावे में आकर हर बार किसी न किसी को अपनी किस्मत का फ़ैसला करने का हक देता रहा ,और हर बार पिछली बार से ज्यादा और अधिक ठगा जाता रहा , उसे जब कोई गैर राजनीतिक व्यक्ति , कोई गैर राजनीतिक समूह ऐसा मिला जिसने उसे रातों रात गरीबी से ,भुखमरी से , कुपोषण से और इन जैसे तमाम कोढ खाजों से छुटकारा दिलाने का वादा  न करते हुए मुद्दों की लडाई के लिए प्रेरित किया तो वे उनके पीछे हो लिए । आम आदमी को आज भी किसी टीम टाम और किसी देव परदेव से अधिक उन मुद्दों की फ़िक्र रही है जिनका उठाया जाना और जिनके लिए लडा जाना जरूरी है । ये एक सुखद संयोग रहा कि , वो चाहे बाबा रामदेव हों या अन्ना हज़ारे से जुडे हुए सिविल सोसायटी के दल के लोग कम से कम किसी भी तुलना में वे उन जन प्रतिनिधियों से , जो कि हर बार आम लागों को किसी न किसी बहाने से खुद को सत्ता सौपे जाने और फ़िर पूरे देश को दीमक की तरह चाटे जाने के लिए मजबूर कर देते रहे , उनसे पहली ही नज़र में बेहतर तो लगे ही , ऐसे में यदि जनता ने उन्हें अपने लिए आवाज़ उठाने वाला , सियासत से आंखें मिला कर डंके की चोट पर उन्हें भ्रष्ट , अमर्यादित , चरित्रहीन कहने का साहस/दु:साहस करने वाला माना तो कुछ भी अनुचित नहीं था ।

विश्व में आर्थिक मंदी ने आम लोगों की लगभग एक सी स्थिति कर दी थी और अरब देशों सहित जाने कितने ही मुल्कों में आम और मध्यम वर्गीय लोगों ने सियासत और सत्ता के साथ पूंजीपतियों के गठजोड का पुरजोर विरोध किया । निरंकुश सरकारों के प्रति न सिर्फ़ अपना गुस्सा दिखाया बल्कि आम अवाम की ताकत को महसूस कराते हुए  कई स्थानों पर उसे पूरी तरह उखाड फ़ेंका । भारत में भी संचार एवं सूचना तंत्र के प्रसार ने एक क्रांति ला दी वो थी विचारों के प्रवाह और प्रसार की क्रांति । मोबाइल , कंप्यूटर , इंटरनेट तक लोगों की पहुंच ने उनका आपस में न सिर्फ़ संपर्क सूत्र जोड दिया बल्कि लोगों को किसी मुद्दे और समस्या पर बहस करने विमर्श करने और तर्क वितर्क करने का मौका दे दिया । इतना ही नहीं इन सभी मत अभिमतों का सारी सूचना प्रसार तंत्र और मीडिया के माध्यम से न सिर्फ़ सरकार बल्कि समाज तक भी पहुंचने लगी जिसने इसे और विस्तार दे दिया । वैश्विक समाज से लोगों के जुडाव होने का एक लाभ ये हुआ कि पश्चिमी और विकसित देशों में चल रहे प्रशासनिक कायदे कानूनों की जानकारी , व्यवस्था को सुचारू करने चलाने के लिए अपनाए जाए रहे उपायों और अधिकारों की समझ भारत में भी लोगों को होने लगी । ऐसे ही समय में देश का बुद्धिजीवी वर्ग सक्रिय होकर , सीधे सीधे उन कानूनों की मांग उठा बैठा । पहली और बडी सफ़लता उसे सूचना के अधिकार की लडाई जीत कर मिल भी गई ।



पिछले कुछ ही समय में सूचना के अधिकार का उपयोग करके लोगों ने सरकार और सियासत के हलक में हाथ डाल कर उससे वो वो सूचनाएं और जानकारियां हासिल कर लीं जो सरकार और सत्ता में बैठे हुए लोग कभी भी अन्य किसी भी तरह से कम से कम आम लोगों तो कतई नहीं पहुंचने देते । आज ये स्थिति हो गई है कि सरकार को सूचना का अधिकार , उस भस्मासुरी वरदान की तरह महसूस हो रहा है जो अब खुद सरकार के गले की फ़ांस बन गया है । हालात का अंदाज़ा सिर्फ़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ समय में ही सूचना के अधिकार के कारण जाने कितने ही लोगों की हत्या हो चुकी है और सरकार अब तक नौ बार इसमें संशोधन और बदलाव की कोशिश कर चुकी है । अब भी रोज़ाना हज़ारों अर्ज़ियां रोज़ नए खुलासे कर रही हैं ,और यदि सरकार को लेश मात्र भी इसकी ताकत का अंदाज़ा पहले हो जाता तो नि:संदेह सरकार इस कानून को कम से कम इस शक्ल में तो कतई पास होने नहीं देती । इस सफ़लता ने प्रशासन और व्यवस्था से जुडे भिडे और उसके भीतर पैठ कर सब कुछ देख परख चुके कुछ संवेदनशील लोगों को ये मौका दिया कि वे एक जगह संगठित होकर उन मुद्दों और समस्याओं के पीछे जनता को कर सकें जिसके लिए आज तक भारतीय अवाम ने कभी भी आवाज़ नहीं उठाई थी ।

सिविल सोसायटी के नाम पर संगठित उस समूह ने पूरे सुनियोजित तरीके से और सारी लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप पहले सरकार द्वारा प्रस्तावित एक भ्रष्टाचार विरोधी कानून के मसौदे को न सिर्फ़ पढा बल्कि पूरे तर्कों और कारणों से उसमें व्याप्त कमियों को बताते हुए उससे बेहतर कानून का मसौदा सरकार के सामने रख दिया । इतना ही नहीं उस संगठन ने ये सारी प्रक्रिया खुलेआम जनता के सामने रख बांट दी और सरकार के मंशे की कलई खोल कर रख दी । जनता जो पहले ही सरकारी नीतियों और राजनैतिक भ्रष्टाचार के कारण बढी महंगाई की वजह से भुखमरी के कगार पर पहुंची हुई थी उसने फ़ौरन बात को समझा और बिना किसी शक शुबहे , बिना कोई कारण परिणाम जाने और उसकी परवाह किए इस संगठन का साथ देने लगी । इस संगठन के अगुआओं में बहुत सारे व्यक्तियों में से कुछ चेहरे ऐसे थे जिन्हें अवाम उनकी ईमानदार छवि के कारण सम्मान देती आई थी और इस बात ने इस संगठन की लडाई को हवा दी । रही सही कसर इस संगठन के लडाई के उस तरीके ने पूरी कर दी जिसका नाम ले लेकर देश की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी अब तक अपनी दुकान चलाती आई थी यानि गांधीवादी आमरण अनशन का रास्ता । मौजूदा समय में जहां किसान और मजदूर आंदोलन तक हिंसक रूख अपनाए हुए थे इस संगठन ने आमरण अनशन का गांधीवादी हथियार आजमाया । तरकीब काम कर गई और बरसों बाद ऐसा लगा मानो आम जनता सडक पर उतर कर सत्ता और सरकार को अपनी बात कहने को उद्धत हुई । मीडिया का दखल और इस आंदोलन की मिनट दर मिनट कवरेज ने इसे पूरे देश में फ़ैलाने में कोई कसर नहीं बाकी रखी ।


सबसे पहले जब मुट्ठी भर लोग जंतर मंतर पर जनलोकपाल बिल को संसद पटल पर रखे जाने की मांग को लेकर बैठे तब किसी को ये अंदाज़ा भी नहीं था कि ये अवाम द्वारा अपनाई और लडी जानी वाली कुछ बडी लडाइयों में से एक बन जाएगी , लेकिन ऐसा हुआ । इस बीच बाबा रामदेव ने विदेशों में भारतीयों द्वारा जमा किए कराए गए काले धन को देश में वापस लाए जाने की मांग को लेकर अपनी मुहिम छेड दी , जिसे भी लोगों ने हाथों हाथ लिया । एक आंदोलन से दूसरा आंदोलन अलग होकर भी जुड गया । सरकार जो पहले से ही इस तरह आम आदमी द्वारा सडक पर किसी कानून के बनने बनाए जाने के मुद्दे की लडाई को अपने दशकों से स्वप्रदत्त अधिकार में हनन मान कर उबाल खाए बैठी थी उसने पूरी राजनीतिक बिसात बिछा दी । पहले ना नुकुर करते हुए उन्हें वार्ता के लिए बुलाया गया और इस बहाने टूटा पहला अनशन और सडकों पर उतरा हुज़ूम घर लौटा कि चलो लडाई शुरू तो हुई ,इस आस और धोखे में कि शायद सरकार को जनमानस की भावना का ख्याल आ गया और उनकी ताकत और आक्रोश का अंदाज़ा हो गया है ।


लडाई की अगली किस्त तब शुरू हुई जब संसद सत्र के दौरान सिविल सोसायटी की टीम ने जनलोकपाल बिल के मसौदे को संसद पटल पर रखने की पुरज़ोर मांग की । न सिर्फ़ इस संगठन को बल्कि अवाम को भी ये स्पष्ट होना बहुत जरूरी था कि असल में सत्ता के पक्ष विपक्ष में बैठे और राजनीति कर रहे तमाम धुरों में कौन कौन इस कानून के साथ खडे हैं और कौन विरोध में खडे हैं । ये बात स्पष्ट भी हुई जब संसद सत्र के दौरान इस प्रस्तावित विधेयक पर बोलते हुए लगभग हर दल और हर नेता ने अपने मन की बात कही जो शासक द्वारा गुलाम से उसे उसकी हद में रहने की हिदायत और चेतावनी देने जैसा कुछ था । यहां चूक ये हुई कि जिस सरकार और राजनीति की मंशा पहले ही स्पष्ट हो चुकी थी उसको दूसरा मौका दिया जाना गलत था कम से कम तब तो जरूर ही जब अवाम की प्रतिक्रिया समग्र और मुखर थी । आखिर क्यों नहीं सत्र को आगे बढाया जा सकता था , क्यों नहीं उस बहस को चलने दिया जा सकता था । दबाव को और बढने देना चाहिए था इतना कि आर पार का निर्णय हो सकता । लेकिन बहुत सारी बातें स्पष्ट होते हुए भी बहुत कुछ अस्पष्ट ही रहा ।


अब बात हालिया जनांदोलन और अनशन की , इस अनशन और आंदोलन का उद्देश्य था दागी केंद्रीय मंत्रियों पर जांच की मांग , जिसके लिए कतई भी इतने दिनों तक भूखे रहकर अपनी बात कहने रखने की जरूरत नहीं थी । मौजूदा हालातों में ये सर्वविदित है कि सिर्फ़ जांच के दायरे में लाए जाने और उन पर मुकदमा चलाए जाने से सरकार , व्यवस्था और राजनीति के चरित्र पर लेशमात्र भी फ़र्क नहीं पडने वाला था । इन चौदह के बाद अगले अट्ठाईस भी उसी रास्ते पर चलने वाले मिलने वाले थे और हैं देश को । सरकार और सत्ता जो दो बार सडक पर उतरे जनसमूह को बरगलाने और घर वापस भेजने में सफ़ल हो चुकी थी उसे बहुत अच्छी तरह पता था कि दो वक्त की रोजी रोटी के लिए लडता आम आदमी बार बार इस लडाई में अपना सर्वस्व दांव पर लगाने नहीं आ सकेगा । तिस पर भूल ये हुई कि टाइमिंग की गलती ने सारी स्थिति को उलट कर रख दिया । यदि राजनैतिक विकल्प का रास्ता चुना जाना ही तय था तो फ़िर ये अभी हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव से पहले ही क्यों नहीं चुना गया या फ़िर कि सिर्फ़ एक पत्र के आने भर ने कैसे इस निर्णय तक पहुंचा दिया अचानक । सबसे बडी कमी ये रही कि जिस तरह का नियोजन और प्रतिबद्धता और उससे अधिक पारदर्शिता अब तक लोगों को दिख रही थी , उन्हें महसूस हो रही थी सब कुछ झटके से होने के कारण उन्हें हटात ये समझ ही नहीं आया ।


अब बात जहां तक राजनैतिक विकल्प देने की है तो अन्ना के सहयोगी पहले ही इस बारे में बहुत कुछ स्पष्ट कह कर चुके हैं लेकिन फ़िर भी अब ये लडाई न तो जनलोकपाल बिल तक सीमित रही है न ही सरकार बदलने तक । अब एक नई दिशा देने की बात की जा रही है तो ये लडाई नि:संदेह बहुत लंबी और निर्णायक होगी । देखना ये है कि क्या सच में ही साठ सालों तक उपेक्षा का शिकार आम आदमी दिए जाने वाले राजनैतिक विकल्प में और जो देने जा रहे हैं उनमें अपना विश्वास जत पाएगा । रही सरकार और सियासत की बात तो उसके लिए ये किसी भी नज़रिए से लाभदायक नहीं होगा । अवाम ने अपना विकल्प चुना तो भी सत्ताच्युत होकर शक्तिहीन होने के लिए उन्हें तैयार रहना होगा और यदि ऐसा नहीं हो पाया तो फ़िर ये असंतोष किस करवट ले जाएगा देश को ये भी देखना होगा । दोनों ही सूरतों में आम आदमी के लिए निराश होने , थक कर बैठ जाने और चुप हो जाने का कोई अवसर नहीं है । उसे नए मुद्दे , नई लडाई , नई सोसायटी खडी करनी होंगी और तब तक इस लडाई को जारी रखना होगा जब तक स्थिति वास्तव में सुधार की ओर न बढे और इसके लिए पहले उसे खुद को भी दुरूस्त , ईमानदार करना होगा ।

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

दीदी , राखियां और रक्षा बंधन ..कुछ यादें




मुझे ज्ञात नहीं है कि विश्व के किसी अन्य देश में , भाई बहन के प्रेम , स्नेह और विश्वास का प्रतीक ऐसा कोई पर्व त्यौहार या परंपरा है जैसा कि भारत में रक्षाबंधन का त्यौहार है । यूं तो कहा जाता है कि इस त्यौहार के पीछे असली कहानी रानी पद्मावती द्वारा अपनी सहायता के लिए मुगल नरेश को चिट्ठी लिखना जैसी कोई घटना थी ,मगर उससे इतर ये बहुत ही सुखद लगता है कि आजकल पश्चिम से आयातित होने वाले तमाम उल जलूल डे नुमा जबरिया बनाए जा रहे त्यौहारों से अलग एक बिल्कुल साधारण , बिना लकदक , तामझाम और फ़ूं फ़ां के मनाया जाने वाला ये पर्व , सिर्फ़ भाई बहन के बीच के अटूट स्नेह , प्रेम और विश्वास का प्रतीक है जो पूरे देश में बडे ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है । पूरे देश भर में बहनें अपने भाइयों की कलाइयों को भांति भांति के सुंधर धागों और राखियों से सजाती हैं और ये उम्मीद करती हैं कि ये डोर उनके बीच के प्रेम स्नेह को बनाए रखेगी । 


मेरी दीदी को गए अब बाइस बरस से ऊपर हो चुके हैं लेकिन अब भी याद है कि दीदी किस तरह महीना पहले से ही तैयारियां शुरू कर देती थीं । पहले यूं आज की तरह कहां बाज़ार राखियों से पटे होते थे , मुझे तो वो स्पंज की फ़ूली हुई बडी बडी राखियां ही याद हैं , बाद के वर्षों में दीदी बाज़ार से रेशम के धागे , मोती , छोटी छोटी टिकलियां और जाने क्या क्या लाती थीं और फ़िर उनसे गज़ब की राखियां बनाती थीं । फ़िर शुरू होता था राखियों को भेजने का दौर । अब तो पोस्ट आफ़िस में भी कहां दिखते हैं रखियों से भरे हुए , फ़ूले हुए लिफ़ाफ़े और दूसरी तरफ़ उनके पहुंचने का इंतज़ार । चचेरे , ममेरे , मौसेरे , फ़ुफ़ेरे और जितने भी रे भाई हैं , सबके नाम पते पहले से ही लिख कर रख लेना लिफ़ाफ़ों पर ताकि कोई छूटे न और फ़िर जो जितनी दूर उसे उतना पहले ही भेजने की तैयारी । और सबसे आखिर में हम दोनों भाइयों की राखी । आज तक न दीदी की यादें धुंधली हुई हैं न ही उन राखियों की ।


बरसों पुरानी एक फ़ोटो , बाएं से अनुज संजय , दीदी और फ़िर आखिर में मैं

रक्षा बंधन के दिन सुबह ही उठ कर , अमूमन तौर पर , छुट्टी का दिन होने के कारण स्कूली दिनों की अपेक्षा थोडी ज्यादा देर से उठने की गुंजाइश ज्यादा होती थी , लेकिन रक्षा बंधन के दिन सुबह सुबह उठ कर नहा धो कर एकदम बीबा पुत्तर जैसे तैयार हो कर चकाचक हो जाने की जल्दी हुआ करती थी । मां थाल में टीका रोली और राखी के साथ मिठाई सब सज़ा कर तैयार रखती थीं । फ़िर दीदी राखी बांधती थीं पहले अपनी बनाई राखी और फ़िर एक एक करके लिफ़ाफ़ों में आई हुई राखियां । कलाई से कोहनी तक सब फ़ुलल्लम फ़ुल और हम भी पूरे शान से शाम तक उसे बांधे बांधे फ़िरते रहते थे । एक दूसरे को दिखाते और देखते हुए । मां घर में कोई पकवान , कोई खास व्यंजन की तैयारी में और हम बच्चे पूरे मुहल्ले मैदान में धमाचौकडी ।

एक और खास बात हुआ करती थी वो थी स्कूल में एक दिन पहले राखी का त्यौहार मनाया जाना । ये तो नहीं पता कि इन दिनों इस परंपरा को कैसे निभाया जाता है किंतु उन दिनों इसे बडी शिद्दत के साथ मनाया जाता था । स्कूल में साथ पढने वाली सहपाठिनें घर से बनाई हुई राखियां ला कर हमारी कलाई पर बांधती थीं और हम उन्हें टॉफ़ी चॉकलेट दिया करते थे । क्लास में चहेते बच्चों के हाथों में भी खूब सारी राखियां बंधी होती थीं और शिक्षकों को भी बांधा जाता था । गांव पहुंचे तो, हर आंगन में सुनाई देने लगा ,

"ॐ येन बद्धो बलि राजा , दानवेन्द्रो महाबलः !
तेन त्वां प्रति बध्नामि , रक्षे मा चल मा चल:  ॥"

अब तो सब कुछ सिर्फ़ यादें रह गई हैं और सब कुछ सिमट कर आ गया है यहां
बुलबुल गोलू भईया को राखी बांधती हुई



साथ चलने वाले

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