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गुरुवार, 28 जून 2012

खुद अपने आप से आगे निकलिए ......





शायद नौकरी लगे हुए तीन साल हो गए थे तो ये उस वक्त की बात हुई यानि 2000-2001 या उसके आसपास की बात  थी । स्टेशन कौन सा था ये याद नहीं , मगर बक्सर था शायद , पानी भरने के लिए मैं भी स्टेशन पर लगे नल की लाईन में खडा था और एक नज़र इस बात पर थी कि गाडी कहीं खिसकना न शुरू कर दे ( ये आजकल की बिसलरी नस्ल शायद ही समझ सके कि उस समय स्टेशन पर रुक कर और उतने ही समय में , खाना और पानी या जरूरत की किसी भी चीज़ को लेकर आना जाना कितनी महत्वपूर्ण कला हुआ करती थी इस बात का अंदाज़ा इसी बात से ही लगाया जा सकता है कि वो काम सफ़र कर रहे परिवार के सबसे चुस्त और समझदार और फ़ुर्तीले तो जरूर ही , को दिया जाता था ) , तो वो स्वाभाविक सा काम हम तब कर रहे थे जब गांव से अकेले दिल्ली वापसी पर थे ।

पीछे से किसी ने कंधे पर थपका , " अबे झा तू ही है न "

मैं पलटा , अबे रंजन तू , मेरी ग्यारहवीं कक्षा का दोस्त था  रंजन । इत्तेफ़ाक ये कि वो भी अपनी ड्यूटी पर गुजरात जाने के रास्ते में थी चूंकि छोटा भाई दिल्ली में था इसलिए उसी ट्रेन से वो भी दिल्ली की ओर ही अग्रसर था । हमने पानी भरा और वापस चल दिए । उतनी देर हममें से कोई कुछ नहीं बोला । शायम हम दोनों , समय के उस अंतराल में एक दूसरे के चेहरे , हावभाव , चाल के बदलाव को भांप रहे थे । मैंने साथी दोस्तों को पानी की बोतल थमाई , दोस्त से परिचय कराया और फ़िर चल पडे दोस्त की सीट की तरफ़ ।

अकेले है या ..मैंने पूछा सबसे पहले

नहीं यार तेरी भाभी और भतीजी भी हैं साथ में ।

जियोह्ह तो तूने शादी कर ली , अबे उसका क्या हाल है जॉगिंग करे चलबू का ,

दोस्त उछल पडा , अबे धीरे बोल तेरी भाभी है साथ में पिटवाएगा क्या , वो कहानी तो तभी खत्म हो गई थी ।

हा हा हा हा मेरा ठहाका गूंज उठा था । सीट पर पहुंचे तो भाभी जी ,(जिसके लिए पट्ठे ने बाद में बताया कि ये भी सहपाठिन ही रही हैं हमारी लेकिन उस स्कूल में जहां ये बारहवीं में निकल लिए थे ) जो आज स्थानीय कालेज में लेक़्चरार हैं और प्यारी सी भतीजी से मुलाकात हुई । बहुत देर तक फ़िर हम अकेले में बैठ कर बतियाने बैठ गए । भाभी भतीजी खिडकी की सीट पर बैठ कर टिकट का असली महत्व वसूल रही थीं

और तू सुना , कहां क्या कर रहा है , शादी की या नहीं ,

अबे रुक यार , मैं दिल्ली में हूं , सरकारी नौकरी में , और फ़िर पूरी विस्तृत बात अपने कार्यालय और काम के बाबत । उसे बहुत हैरानी हुई । मैं समझ रहा था कि उसे और उस समय के मेरे सभी दोस्तों को ये जानकर बहुत हैरानी होती है कि मेरे जैसा थर्ड डिविजन पास लडका , कोई प्रतियोगिता पास करके नौकरी में कैसे आ गया , मतलब इत्ती बुद्धि वृद्धि ..ये कृपा कैसे किसकी हो गई ।

मैं खुद भी आंकता हूं खुद को तो यही पाता हूं कि दसवीं तक पढाई के बारे में मैं इतना ही होशियार था कि गली में सबके द्वारा पूछने पर , कि परीक्षाएं कैसी चल रही  हैं , मुझे लगा कि नहीं ये उन वार्षिक परीक्षाओं से ज्यादा जरूरी तो हैं ही । इन स्थितियों में यदि प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए सोच रहा था तो ...। मुझे अब लगता है कि मैंने खूब मेहनत की उस दौरान और उससे भी ज्यादा आश्वस्त था इस बात को लेकर कि आज नहीं तो कल आखिरी सफ़लता मिलेगी ही ॥


परीक्षाओं के उस दौर पर ,और ऐसी हर परीक्षा को यदि उकेर दिया जाए शब्दों में तो निश्चित रूप से दिलचस्प जरूर लगेगी आपको । खूब अवसर हुआ करते थे उन दिनों , और सभी क्षेत्रों में ,हम सभी दोस्तों ने ये ठान ही लिया था कि अब आर या पार । हमारे एक बहुत की कुशाग्र मित्र जो उन दिनों हमारे साथ ही प्रतियोगिता परीक्षाओं के समर में दौड रहे थे ने रिकार्ड 14 बार बैंक पी ओ कैडर की लिखित परीक्षा पास की मगर साक्षात्कार में कभी पास न हो सकने के बावजूद पंद्रहवीं बार बैंक पी ओ बन कर ही माने । उसी समय जाना था कि पढाई , लक्ष्य , उससे पाने की जिद और पाने के लिए अथक परिश्रम और प्रतिबद्धता क्या होती है ।

वैसे भी मेरा यही फ़लसफ़ा है कि जहां भी जो भी दे रहे हो , अपनी ओर से कोशिश होनी चाहिए कि अपना सौ प्रतिशत दें । बाद में ये अफ़सोस नहीं होना चाहिए कि  , काश ये और ज्यादा करके देखा होता । मैं क्रिकेट , बैडमिंटन , वॉलीबॉल , फ़ुटबॉल अच्छा खेलता था मगर स्कूल की टीम में आज तक सिर्फ़ खिलाडियों को पानी ही देता रहने वाला डेडिकेटेड प्लेयर रहा । हां कालोनी और उसके बाद ग्राम्य जीवन में जरूर खेलता और अच्छा खेलता रहा । राजनीति भी अछूती नहीं रही ,मगर शायद अनुभव इतने तल्ख मिल गए कि फ़िर तो एक बू सी हमेशा ही आती रही उधर से । काम , पढाई लिखाई , घुमाई किसी भी बात में मुझे अपनी पूरी उर्जा झोंकने में आनंद आता है ।


मुझे लगता है ये इस तरह की कोशिश है जिसमें आप खुद से आगे निकलने की कोशिश में रहते हैं , हर पल हर समय आपी सोच और क्रियाकलाप उसी दिशा में आगे बढती हैं । और आगे निकलने का मतलब मेरा सिर्फ़ विकास के रास्ते पर होना नहीं है , आगे मतलब अपने वजूद से अपने होने के एहसास की तरफ़ आगे । जिंदगी अपना चक्र पूरा करती ही है , आज तक किसी के रोके टोके नहीं रुकी है इसलिए तब तक हमें चलायमान रहना ही होगा , चलते रहना होगा निरंतर ..कभी अपने साथ ..कभी खुद अपने आप से आगे .....

मंगलवार, 26 जून 2012

हाय किताबों से इश्क कर बैठा ...........


"आप इस उम्र में भी इतना क्यों पढते हैं ? " ,

मैंने चौंक के सर उठा कर देखा तो एक सहकर्मी महिला मित्र मेरे हाथों में अटकी उस मोटी सी किताब को देखते हुए , मुझसे प्रश्न कर रही थीं । मेरे होठों पर एक मुस्कुराहट तैर गई , वही जो अक्सर ऐसे सवाल ( जो मुझे न सिर्फ़ दफ़्तर , घर ,बल्कि कई बार मेहमानों के यहां भी ) को सुनने के बाद तैर जाया करती थी । और घर पर तो ताने के रूप में मिलता है ये ,सो कई बार झुंझलाहट भी हो जाती है । क्या करूं , मुझे आदत है , मुझे इसके अलावा और कुछ नहीं आता , मुझे लिखना पढना पसंद है , जैसे जाने कितने ही रटे रटाए जुमले दोहराता हूं ।


वो मुट्टली किताब जो इन दिनों मेरे हत्थे चढी हुई है




"अगला प्रश्न होता है ,अच्छा कितना पढ लेते हैं आप , मतलब कितने घंटे लगभग ?" 

" जी मैंने कभी हिसाब नहीं रखा , लेकिन शायद छ; सात या आठ घंटे तो पढ ही लेता हूं , लेकिन सिर्फ़ किताबें नहीं , समाचार पत्र , पत्रिकाएं , और नेट पर भी पढता हूं बहुत कुछ " मैंने उन्हें थोडा सा उकताते हुए जवाब दिया ।

" हमारे तो बच्चे भी इतना नहीं पढते आजकल , कंपीटीशन इतना टफ़्फ़ होता जा रहा है , कहती हूं फ़िर भी नहीं पढते , क्या करें जब हमें ही पढता नहीं देखते । वो तो फ़िर भी समाचार पत्र पढ लेते हैं सुबह मैं तो वो भी नहीं देख पाती ..........और फ़िर जाने क्या क्या ??

उनके साथ मैं हूं हां करता रहा और उनके जाने के बाद बहुत समय तक मन में बहुत सी बातें उमड घुमड करती रहीं । क्या सच में ही मैं किताबी कीडा टाईप का हो चला हूं । मुझे लगा कि नहीं , बिल्कुल नहीं । अभी तो जाने कितना कुछ बांकी बचा है पढने को , समय ही कहां मिलता है । रोज़ की सरकारी नौकरी , वो भी अदालत जैसी जगह पर जहां सुबह से शाम तक , चेहरों , , न्यायिक प्रक्रियाओं , मुकदमों और फ़ैसलों को ही पढते फ़ुर्सत नहीं मिलती तो उसमें अपनी पसंद की किताबों की पढने की बात ही कहां । लेकिन पसंद की किताबें , मुझे तो सब कुछ पढना अच्छा लगता है । कानून की किताबों से लेकर काद्मबनी  तक , और समाचार पत्रों से लेकर विभिन्न वेबसाइट्स , ब्लॉगपोस्ट्स और दोस्तों के फ़ेसबुक अपडेट्स तक । अपनी पसंद की रेंज़ बहुत बडी है या कहा जाए कि कोई रेंज़ ही नहीं है । अजी छोडिए , बेकार की बात है ,इतना ही पढाकू होता तो दसवीं में थर्ड डिवीज़न न आई होती , और सच कहूं तो अब तक विश्वास नहीं होता कि बांकी सब तो ठीक था लेकिन गणित के पेपर में पास कैसे हो गया आखिर ?


जी हां , शुक्र मनाता हूं कि न तो वो जमाना आज की तरह का बच्चों के लिए मेट्रिक परीक्षाओं के समय और शायद उससे पहले भी कर्फ़्यूनुमा हुआ करता था और न ही कम नंबर आने पर उनका कोर्ट मार्शल हुआ करता था अलबत्ता तैंतीस प्रतिशत के लिए अभिभावक आश्वस्त हुआ करते थे सो हम भी फ़ैले पडे रहते थे कि अगर कुर्सी टेबल पास तो हम भी पास । शायद वो मैट्रिक के इम्तहान ही थे जिनके परिणाम ने बदल कर रख दिया । लगा कि नहीं , पढने का अपना ही आनंद है । न सिर्फ़ अकादमिक पढाई में बल्कि फ़िर प्रतियोगिता परीक्षाओं के दौर में और उसके बाद साहित्यिक रुचि जगने के बाद तो जैसे किताबों से इश्क सा हो गया । और किताबों से ही क्यों कहूं , पढने से मोहब्बत हो गई ये कहना चाहिए । हालांकि शुरू में तो पढाई इस वज़ह से शुरू हुई कि , अबे धत जब राकेश  , राजीव  , विजय  , सबको पढने में इतना मज़ा आता है तो कुछ तो आनंद होगा ही पढने में ।


एक वाकया याद आ रहा है बहुत पहले का । मेरी दीदी पढाई लिखाई में बहुत ज्यादा प्रखर और मेधावी  थीं और मैं उतना ही भयंकर भुसकोल इसलिए अक्सर मन में ये अरमान रहते थे कि जैसे मां बाबूजी दीदी को कहते थे , " क्या पूरे दिन किताब हाथ में लिए पढती रहती है , थोडी देर के लिए इसे छोड दे " , हाय कि वो कौन सा दिन होगा जब हमारे लिए भी मां बाबूजी यही कहेंगे । और सच में ही कहने लगे वे जब मैंने प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी शुरू की । अब तेज़ तर्रार तो थे नहीं , सो दे धमाधम , दे दनादन परीक्षा पे परीक्षा , मजाल है जो एक भी छोडी हो और मजाल है कि एक भी पास कर पाए हों । तब अंदाज़ा ही नहीं था शायद , न परीक्षाओं को पास करने के स्तर का और न ही अपनी काबलियत का । फ़िर वो दौर भी आया कि जहां जहां प्रयास किया सफ़लता मिली । और शायद इसी दौर ने पढाई में वो कशिश पैदा कर दी कि हम किताबों से , शब्दों से ही इश्क कर बैठे । अब तो बिना पढे रहा ही नहीं जाता । आदत इतनी खराब कि , सहकर्मियों को ( उनके बच्चों के लिए ) न सिर्फ़ नए आवेदनों के बारे में ही नहीं बताता रहता हूं बल्कि उन प्रतियोगिताओं के लिए मिलने वाली पत्रिकाओं , सामग्रियों के बारे में लगभग जबरन भी बता दिया करता हूं । क्या पता अगला चाहे परेशान ही हो जाता हो ।


हां साहित्य से लगाव स्नातक में अंग्रेजी ऑनर्स के दौरान ही हो गया लेकिन परवान चढा दिल्ली में रहने के दौरान और उन मित्रों के संपर्क में आने के बाद जिन्होंने मुझे गुनाहों का देवता , रतिनाथ की चाची , मुझे चांद चाहिए , का स्वाद लगा दिया । फ़िर तो ये लगी लगाए न लगे और बुझाए न बुझे वाली स्थिति हो गई । शायद ही कोई दिल्ली पुस्तक मेला हो जहां मैं जाकर ढेर सारी किताबें न खरीद लाया हूं । बेशक वो मेरे अलावा सबके लिए " रद्दी वाले का अच्छा खासा स्टॉक "हों लेकिन मेरे लिए किसी पूंजी से कम नहीं । एक दिन हुलस कर जोश में किताबों का कोना भी बना लिया , मगर किताब को पढ कर उनके लिए कुछ लिखने में अब तक आलसी ही निकला , जल्दी ही उस आदत को भी नियमित करता हूं । अब  तो ये इश्क ज़ारी रहेगा , माशूकाएं मिलती रहेंगी और मैं उन्हें पढता रहूंगा ..........................................

थोडी सी किताबों के लिए एक अस्थाई सा ठिकाना अपने कमरे में , बांकी सब बेचारों को संदूक की सज़ा सुनाई हुई है

साथ चलने वाले

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