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मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

जो बिलबिलाए...उहे है बिलागर ..खांटी बिलागर...



देखिये जी आप एकदमे ठीक समझ रहे हैं.....हमहुं संगम सम्मेलन का ही कौनो बवंडर पर सवार होकर एक ठो पोस्ट ठेलने की तैयारी कर बैठे हैं। देखिये देखिये अब ई मत कहियेगा कि आपहु शूरू हो गये....आप तो गईबे नहीं किये थे...अरे जाना छोडिये आप लोगन को बुलाया भी नहीं गया था जी...। अजी हम ऊ सब काहे रीपीट करेंगे जी....जब लोग बाग लिखिये रहे हैं...लिख का रहे हैं....एक दम से दाग रहे हैं...बोफ़ोर्स का मुंह खोल दिये हैं। इत्ता चर्चा तो कुंभ का नहीं हुआ होगा जतना ई सम्मेलन/संगोष्ठी/महासम्मेलन/कार्यक्रम/मेला/चौपाल...बस जी एतने आ रहा है अभी मन में......का हुआ ।

दरअसल पिछले दिन ..गाम की तरफ़ गये तो ....हम दू ठो बिलागर ...अरे दूसरे ओही चिट्ठा सिंह जी ...(अब तो सिंग भी बदल दिये हैं..काहे से राजा बाबू को एतराज न हो ) बतियाते जा रहे थे....तो चच्चा बीच में मिल गये। अब ई मत पूछियेगा कि चच्चा कौन। अरे एके गो चच्चा हैं...जिनके हम सर्टिफ़ाईड बच्चा ..माने भतीजा हैं।

पूछे लगे ," तब और बताओ..का सब चल रहा है ..का बने ...कुछ बनबो किये कि बस खलिया बंदूक ढन ढन"


हम कुछ कहते कि मित्र कह उठे ...," अजी का बात कर रहे हैं चच्चा....हम इनको अपने फ़ील्ड में ले आये हैं....लईका आपका अब आम नहीं रहा ......एक दमे खासमखास बिलागर हो गया है ॥"


आंय ई का होता है जी ...ई तो सुनने में कौनो अजगर , कारीगर, बाजीगर जैसा लग रहा है ..?


हां चच्चा होता तो कुछ अईसने टाईप का होता है ...मुदा का कहें आज कल सब इहे बन जाना चाहता है..माने जानिये कि ..आप इंसान हों न हों ....बिलागर होना जरूरी है.....काहे से कि बिलागर हो जाने के बाद आप इंसान, हैवान, शैतान, ....ई सब टाईप से मुक्त हो जाते हैं।


"अरे जादे नहीं छोडो हमको पता है ..ई पिछला दिन अभी तुम लोग अपने जैसे ही कुछ अजगर ,बाजीगर , का कुछ संगम मेला ..माने कुंभ जैसा कुछो था न जी...सुने हैं बडा ....कपडा उतारा -उतारी हुआ जी....आ हुआ का अभियो चलिये रहा है "।

"हम सिटपिटाते इससे पहिले ही ..मित्तर चिट्ठा बोल पडे," अरे चच्चा तुमका पता तो हईये नहीं है...अब ई बताओं..आदमी..अरे माने बिलागर ...ओह मान लो थोडिये देर के लिये कि जौन बिलागर सब था उ सब आदमीए था ...तो संगम जायेगा ..तो स्नान करबे करेगा न गंगा जी में...और गंगा जी में स्नान के लिये कपडवा तो उतारना ही न पडेगा जी....अब ई तो स्नेह है सबका कि ...सब एक दोसर का ही प्रेम प्यार से उतार दिया ...ई तो हम लोगन का चलता रहता है । देखो चचा ...बिलागर माने ...उ...चीज,प्राणी, जंतु,जीव ...जो बिलबिलाए...बिलबिलाते रहे। वजह होने पर भी बिना वजह भी , मुद्दों पर, बगैर मुद्दों पर , चिरकुटई पर, टिप्पणियों पर ....अब का गिनायें...बस ई समझिये कि जो बिलबिलाता हो बही ब्लागियाता भी है । बकिया सब तो ओइसे ही टाईम पास है ...।"

चचा कहां मानने वाले थे...कहे लगे .".चलो मान लिया ..मगर ई तो बताओ कि ..तुम्हरा चीफ़े गेस्ट ....जो बहुते नाम वाला था सुने हैं होस्टाईल हो गया जी....का तो कहा कि ई सब तो कचरा है जी । रे तुम लोग तो कबाडी हो गया न । "

अरे चचा तो जो लोग बुलाए थे ...उन्हीं को कहां मालूम था कि उ नाम वाले ..हमही को बेनाम कर जाएंगे ...फ़िर ठहरे चीफ़ गेस्ट....इहे गुस्ताखी तनिक इहां बिलागिंग में करते न तब देखते आप....ई जौन पोस्ट सब आ रहा है ..एकर दस गुना आता नाम से ....आ टीप आता बेनामी बन के ....नाम तो नाम ....काम भी तमाम हुई जाता उनका ।

देखिये हम जान रहे हैं ..जो इससे जादे बताए तो आप भी चचा की तरह बिलबिला के हमही को .......छोडते हैं जी ....फ़िर कहियो......

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

अनलिखी डायरी का एक पन्ना

दीवाली की अगली सुबह

सोचता हूं सिर्फ़ एक दिन या कहा जाए कि सिर्फ़ एक रात मनाए जाने वाले इस पर्व के लिये साल भर इंतजार, फ़िर महीने पहले से तैयारी ,उसकी योजना, खरीददारी और न जाने कितने ही काम। फ़िर एक रात रोशनी , धुएं, और खूब शोर शराबे के बीच सब कुछ रात के आगोश में समा कर खत्म। कमाल का त्योहार है दिवाली भी। वैसे भारत जैसे देश में रहने के बहुत सारे फ़ायदों में से एक ये भी है कि साल भर आपको अपनी खुशियां, अपना स्नेह, अपना अपनापन सब कुछ बांटने के लिये पर्व त्योहार के रूप में लगातार बहाने मिलते ही रहते हैं। शायद ही कोई महीना जाता हो जब त्योहार मनाने के लिये नहीं मिलते हों । मुझे दीपावली और छठ के बाद नव वर्ष के शुभ आगमन तक जो एक समय आता है वो इस वजह से भी अखरता है कि पर्व रहित समय होता है।

पिछले दो दिनों से ब्लोगजगत इतना दीवालीमय था कि बस लग रहा था कि रंग बिरंगी फ़ुलझडियां सारा प्रकाश यहीं बिखेर रही हैं। हम भी ब्लोग्गंग में अपने दो साल पूरे करने की खुशी को डबल करते हुए घर पर दीवाली की भी धूमधाम से तैयार चल रही थी। बचपन से शौक रहा कि कुछ न कुछ प्रयोग करते ही रहते हैं । इस बार श्रीमती जी और उनकी कुछ सहेलियों के सामने उस दिन बाजार में खरीददारी करते समय हमने हांक दी कि रंगोली बनाना कोई कठिन काम नहीं है, बस जी हुक्म हो गया कि फ़िर साबित किजीये..लिजीये हमने कुछ यूं साबित किया...देखिये ठीक बन गई न.....?



इसके बाद घर की सजावट का काम,जिसे करने में न जाने बहुत पहले से ही खुद ही एक अजब सी खुशी होती है मुझे, तो जाहिर है कि वो सब मैंने अपने हाथों से ही किया ।हां दीवाली के पटाखों की तस्वीर नहीं है..क्योंकि अव्वल तो हमने वो चलाए नहीं बच्चों ने अपने हम उम्रों के साथ मामा मामी की निगरानी में खूब चलाए।और मन गई दिवाली ।
कल रात को दो बजे तक दीपावली की रात के उत्सव और उमंग में शामिल होने के बाद स्वाभाविक था कि आज देर से उठा जाए। बाहर उठ कर आए तो लगा कि दीवाली की सुबह पर कभी गौर किया ही नहीं कि दीवाली अगली सुबह कैसी होती है..आम दिनों
की सुबह से बिल्कुल अलग। बहुत ही कम ठंडी सी सुबह में बारूद की गंध अभी भी फ़ैली हुई है। चारों तरफ़ फ़ूटे हुए पटाखों के चीथडे उडे हुए कागज । उनके बीच अलग से चमकते ..बिना फ़ूटे हुए पटाखे ...एक दम खामोश....दोहरा दुख और उदासी ओढे हुए । दोहरा इसलिये कि जब उनके भीतर झांक कर सुना तो जैसे कह रहे थे , कि कल तक अपने कुनबे , अपने कारवें के साथ बिल्कुल तैयार थे...तपे हुए..फ़टने के लिये...और आज सब चले गए छोड के..दूसरा दुख ये कि जिन बच्चों को खुशी देने आए थे वो भी नहीं दे पाए। कमाल है खुद के जीवन के बच जाने का इतना दुख तो और कहीं नहीं देखा। पटाखा कहता है मेरे जीवन का उद्देश्य तो यही था कि मेरे

वजूद का धमाके के साथ खात्मे से बच्चे की मुस्कान बढ जाए। जब यही हो न पाया तो ...पटाखा उदास हो ही रहा था कि इतने में छोटा सा शुभम आ जाता है। बडी ही खोजी नज़र से ..एक एक पटाखे को परख रहा है । गुंजाईश और संभावना तलाशी जा रही है....कितने हैं जिन्हें आज दोबारा ....।वो पटाखा भी शुभम के हाथों में पहुंच कर चमक उठता है।

छत पर पडी हुई बेतरतीब सी जली अधजली फ़ुलझडियां....काली खुरदुरी ..कल कितना चिडचिड चुडचुड करते हुए रोशनी फ़ैला रही थीं। रात को दिन बना रही थीं आज दिन में खुद ही रात जैसे काली होकर पडी हुई हैं। हवाई पटाखे ..रौकेट...और अनार के बचे हुए खोल और डंडियां..कुछ लुढके हुए.कुछ सीधे खडे,,फ़ुंके हुए..ऐसे जैसे ..कोई ज्वालामुखी अभी अभी अपना लावा उगल कर ..चुप हो गया है.....। और शायद वो लावा ही तो है जो कल रात सारे पटाखों ने उगला था। इसके बाद दीयों के पास पहुंचा.....बाती/ज्योति...कहने लगे..देखो हमने तो पूरी कोशिश की थी कि रौशनी फ़ैलाते रहें...मगर इस दीये का पेट देखो न ..कितना खाली है..सारा तेल ही सूख गया हम क्या करते। मैं सोचने लगा कि ..ये शायद ये कहने की कोशिश कर रहा है कि मैं भी इस देश के किसान की तरह हूं अभी ..बिल्कुल खाली पेट ...देखना एक दिन इसी खाली बुझे हुए दीये की तरह हो जाओगे तुम सब ....यदि इस ज्योति को भर पेट तेल नहीं मिला तो..तुम्हारा प्रकाश छिन जाएगा।

मंदिर के आगे रखा बचा हुआ प्रसाद, फ़ुल्लियां, चीनी के खिलौने, मिठाई, फ़ल और उसमें पडे हुए गेंदे के फ़ूल की पत्तियां जो न सिर्फ़ देखने में प्रसाद को बहुत सुंदर बना रही थी..बल्कि उनकी खुशबू से प्रसाद की पवित्रता भी भीनी भीनी महक रही थी।और उनके पास ही रखे हुए मिठाई के ढेर सारे डब्बे, और बहुत सारे उपहार। अजी माफ़ किजीयेगा ये मुझे भी नहीं पता कि उनमे क्या क्या आया है और अभे तो ये खुलेंगे भी नहीं। अरे भूल गये क्या अभी तो कल भैयादूज है जी ..तो उनके उपहार भी तो आने हैं....तो सब एक साथ ही खोले जाएंगे न। दीवाली की अगली सुबह कितनी अलग रही न...कुछ आम दिनों की अपेक्षा।
आप बताईये कि आपका क्या हाल रहा जी.....................................?



ये पोस्ट दीवाली के अगले दिन लगाने के लिये तैयार की थी.....मगर जाने नेट वालों को क्या दुश्मनी थी...अब जो है सो आपके सामने है....हमने भी ठान ही लिया था कि चाहे होली से दीवाली आ जाये हम तो ये पोस्ट लगा कर रहेंगे....अजी कमाल है इत्ती मेहनत से तो हमने रंगोली बनाई, मंदिर सजाया, घर सजाया और फ़िर भी...


















शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

दीपावली की शाम, और मेरे ब्लोग्गिंग के दो वर्ष पूरे ..यानि डबल बधाई..


लिजीये जी देखते देखते दो साल पूरे कर लिये इस ब्लोग्गिंग की दुनिया में। कहने वाले कहते हैं कि आभासी दुनिया है। कैसे मान लूं ..जब भी कोई खुशी गम हो तो सबसे पहले से सबसे बाद तक तो आप ही रहते हैं साथ। देखता हूं कि कोई बीमार पडता है..या किसी के यहां कोई उत्सव का अवसर आता है तो मन में मेरे भी स्पंदन तो होता ही है।
जब ये सफ़र शुरू हुआ था तो वो एक अकस्मात घटना थी । लिखते पढते और छपते हुए भी काफ़ी समय हो चला था मगर ब्लोग या कहें कि चिट्ठा से तो परिचय दूर ..उतना सुना भी नहीं था । क्या कैसे हुआ आप मेरी दो साल पहले लिखी इस पोस्ट से खुद ही अंदाजा लगा लिजीये।

मेरी दो साल पहले लिखी और ब्लोग के लिये लिखी पहली पोस्ट
यूं तो ब्लोग के बारे में काफी पहले रेडियो पर कुछ कुछ सुना था मगर पिछले दिनों कादम्बिनी के ताज़ा अंक में पूरी जानकारी मिली । अब जब कि ये पता चल गया है कि इसमे मुझे बार बार पेन चलाने कि जरूरत नहीं पड़ेगी तो समझ गया कि यही है वह जगह जिसके लिए मैं पिछले दिनों मन ही मन सोच रह था।

सुना है कि इसका नाम है चिटठा , मगर किसी ने ये नहीं बतया कि कैसा चिटठा ,फिर सोचा कि जाहिर सी बात है कि चिटठा पका हुआ ही तो लिखना होगा वरना कच्चा चिटठा तो खबर बन जायेगी और एक्सक्लूसिव न्यूज़ के रुप में किसी खबरिया चैनल पर पहुंच जायेगी और ये ब्लॉगर तो रिपोर्टर बन जाएगा। या फिर शायद ऐसा होता हो कि आप कुछ भी अपने झोली से निकालो ,उछालो ,घुमा लो, फिरा लो और उदेल दो ब्लोग कि दुनिया में बाकी भाई बंधू खुद ही उसे घिस घिस कर पका देंगे । भाई, हर कोई कुछ ना कुछ कहीं ना कहीं पका ही तो रहा है । आप सोच रहे होंगे कि आख़िर मैं चाहता क्या हूँ। कुछ नहीं । बस आपको इतना बताना चाहता हूँ कि मैं भी आ गया हूँ आपके बीच अब तैयार रहे , मैं कभी भी कुछ भी , आपको परोस दूंगा पकने के लिए या पकने के लिए ये तो आप ही तय करना हाँ फिहाल इतना जरूर कहूँगा कि मेरे साथ आप गंभीर भी होंगे और खुश भी, कभी परेशान भी होंगे और हैरान भी मगर भी मैं तो लिखता रहूंगा कभी भी कुछ भी। लिखूंगा क्या सब कुछ कहानी , कविता , लेख , चिट्ठी , और ढेर सी वो बातें जो किसी को भाषण लगती हैं तो किसी को फालतू बात।
चलिए आज इतना ही
अब जबकि दो साल बीत गये हैं तो निश्चित तौर पर बहुत से खट्टे मीठे अनुभवों के बावजूद अब ये मेरी दिनचर्या का एक अनिवार्य अंग बन चुकी है । और मेरा परिवार बढता ही जा रहा है। कुछ तो इतनी करीब आ चुके हैं कि यदि एक दो दिन में उनसे सीधे सीधे संवाद न स्थापित हो तो कुछ अधूरा सा लगता है। कुछ दिलचस्प बातें भी रही इस दौरान जो मैं आपसे बांटना चाहूंगा । जब ब्लोग्गिंग शुरू की तो कुछ लोगों ने बताया या कहूं कि चेताया कि आप सरकारी सेवा में हो न तो इसलिये अपने सही नाम और पहचान से न लिखें। हमने भी आदेश माना और झोलटनमा जी ..हां गांव में सुना हुआ एक नाम झोलटन ..या झोलटनमा....के नाम से लिखने लगे..मेरा एक अन्य ब्लोग अभी भी उसी यू आर एल से दर्ज़ है ।थोडे दिन तक अपना ये बूथा भी छुपा के रखा गया। मगर अजी हम छुपने और छुपाने में कब तक यकीन रखते ।सो जारी हो गये धडाधड।

फ़िर तो ब्लोग दर ब्लोग सिलसिला बढता गया। अभी कुछ दिनों पहले ही किसी अजीज ने पूछा ..अजी कितने ब्लोग पर लिखेंगे ..आप? मैंने कहा आप तो बस देखते जाईये और पढते जाईये। जिस दिन खराब लिखने लगें कहियेगा...उस दिन सिर्फ़ पढना ..जी सिर्फ़ पढना शुरू कर देंगे। चलिये आज के लिये इतना ही। जब इतना कह ही दिया है तो एक वादा जो बहुत पहले किया था,..और न जाने क्यों अब तक नहीं पूरा कर पाया हूं....अरे आपसे नहीं अपने आप से जी....मेरा पहला औन लाईन उपन्यास..मंदाकिनी ...जिसे जल्दी ही शुरू करूंगा ..उम्मीद है कि मेरे हर प्रयास की तरह मेरी ये कोशिश भी आपका स्नेह जरूर बटोरेगी।

तो दिवाली इस बार मेरे लिये दोहरी खुशी लेकर आई है.....आप सबको एक बार फ़िर से दीपावली की बहुत बहुत बधाई और शुभकामना।

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

टिप्पणी और टैग...बहुत महत्व के हैं ये औजार

ब्लोगजगत में रह्ते हुए आपको साल हुए हों, महीनों हुए हों या जुम्मे जुम्मे आठ दिन, टिप्पणी का महत्व तो जानते ही होंगे। बेशक ये कहने को कहा जाता है कि टिप्पणी ..ज्यादा..या कम ..अच्छी बुरी....आलोचना, प्रशंसा कैसी भी हो ...उससे ब्लोग को ..पोस्ट को और लिखने वाले लेखक ..की काबिलियत या नाकाबिलियत को नहीं आका जा सकता है। मगर इतना तो आम तौर पर होता है कि अच्छे लिखने वालों को सभी पढते भी हैं और टीपते भी हैं । मैंने आमतौर पर ...इसलिये कहा है..क्योंकि अभी ही कोई कह देता कि सबसे ज्यादा टीप तो विवाद वाले पोस्टों को मिलती है। मगर ऐसा अक्सर नहीं होता। खैर, मेरा यहां ये सब कहने लिखने का कोई मकसद नहीं है।

दरअसल पिछले दिनों जब सर्च इंजनों में न जाने क्यों ..जब अपने ही नाम को तलाश किया तो एक अजब सी बात पता चली....या कहूं कि दो बातें पता चली। उनमें से पहली तो ये कि ....मुझे परिणामों में उन ब्लोग्स का पता भी बताया गया जहां मैं टीप के आया था । यानि कि टिप्पणी देने का मतलब है कि आपका उस ब्लोग से जुड जाना...। जिस तरह से आप किसी ब्लोग पर टीप कर उससे जुड जाते हैं...उसी तरह कोई भी आपके ब्लोग को टीप के आपके ब्लोग से जुड जाता है। तो इस सूरत में..जब भी कोई खोज की जाती है आप दो परिणामों में दिखाई देंगे। है न कमाल का औजार ये टिप्पणी।

अब बात दूसरे औजार की । मैंने खुद सहित बहुत से ब्लोग्गर्स को देखा है ....जो पोस्ट को लिखते और प्रकाशित करते समय एक बात अक्सर ही भूल जाते हैं। अपनी पोस्ट को किसी भी टैग के अंतर्गत रखना। जबकि टैग ही वो सूत्र है ..जो सर्च में सबसे पहले काम करता है। आपका लिखी रचना ..जिस भी विधा में हो , जिस भी विषय पर हो, जिस भी शैली में हो, और आप उसे चाहे जिस वर्ग में रखना चाहते हों...देखना चाहते हों। उस पोस्ट के अनुरूप ...टैगों का प्रयोग जरूर करें। और यथासंभव टैग ऐसे चुनें..जो सबसे ज्यादा खोज के दौरान ढूंढे जाते हों। अरे इसका भी सरल उपाय है। आपको खुद बखुद ये पता चल जाएगा कि ये टैग कौन से हैं।आखिर आप भी तो एक पाठक हैं.......क्यूं हैं न..........?

सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

ब्लोगजगत का संक्रमणकाल: अपना सर्वस्व और सर्वश्रेष्ट देने का समय

ब्लोग्वाणी जैसे सबसे लोकप्रिय ऐग्रीगेटर के अचानक बंद हो जाने से एगबारगी तो ऐसा लगा था कि ..हिंदी ब्लोगजगत पर किसी अनजाने कीटाणु/जीवाणु, का हमला हुआ है...इस शुक्राणु का संबंध चाहे तकनीकी लोगों के दिमाग की उपज रहा हो या कि खाली दिमाग शैतान का घर जैसे वालों के मस्तिष्क वालों की खुराफ़ात मगर इसकी मारक क्षमता की चपेट में..प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पूरा ब्लोगजगत तो प्रभावित हो ही गया था । वो तो शुक्र है कि जल्दी ही ये समस्या सुलझ गयी। ब्लोगवाणी हमारे बीच दोबरा लौट आया। इस घटना के कई परिणामों में से कुछ सुखद भी निकले। जिनमें से एक था..कई नये ऐग्रीगेटर्स से पहचान और एक नये ऐग्रीगेटर, ब्लोग प्रहरी , का आगाज।

लेकिन लगता है कि ये ब्लोग्गिंग का ..अब तो हिंदी ब्लोग्गिंग का कहना भी तर्क संगत नहीं लगता..सो इस तरह कह लेते हैं कि देवनागिरी में लिखने वाले ब लोग्गर्स के लिये संक्रमण काल सा हो गया है। विवाद -प्रतिवाद, निजी आक्षेप, बेवजह तूल देने वाले मुद्दे, उसे आगे बढाने वाली पोस्टें, धर्म, लिंग, भाषा, की लडाई....वाह वाह एक साथ इतने जीवाणु/कीटाणु, हैं कि ...एक से निबटो तो दूसरे का हमला..दूसरे से ...तो तीसरे का..ताबडतोड...और तो और जो थोडी बहुत रोकने की कोशिश भी हो रही थी ...वो पोस्टें ही अपने आप में एक वायरस बन रही थीं। और ऊपर से तुर्रा ये कि ..गोया ये काफ़िला चला ही नहीं था अकेला.....तो सिलसिला इतना लंबा हो गया कि ..बदस्तूर जारी है।

इसी बीच इन्हीं हालातों के मद्देनज़र पिछले दिनों एक पोस्ट पढी ..शीर्षक था ...क्या ब्लोग्गर्स के पास लिखने के लिये विषयों का अभाव है...पोस्ट ने और उस पर टीप के रूप में दर्ज़ एक रहस्योघाटन ने ..बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। उसी वक्त लग गया था कि...ठीक ही है..अब शायद वो वक्त आ गया है कि सबको ..इन सबसे इतर जाकर..इन सबसे उपर उठकर और इन सबसे किनारा करके..कुछ संजीदा, कुछ गंभीर ,कुछ सार्थक लिखा जाये...विचार बना कि जो ब्लोग्स पहले से हैं उनपे ही ..मगर सबने सलाह दी कि उन पर उनके मिजाज के अनुरूप ही लिखा जाये ..सो एक नया ब्लोग ले कर आ रहा हूं आपके बीच। उम्मीद है कि खुद को और आपको गंभीर लेखन से रूबरू करा सकूंगा..



और मेरी आप सबसे भी यही गुजारिश है कि अपना सर्वस्व और सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करें..

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

कमाल है, हर साल पर्यावरण दिवस मनाते हैं...फ़िर ये बाढ क्यों....?



अभी तो दिल्ली की गरमी से थोडी बहुत राहत मिलनी शुरू हुई थी...थोडी सी बूंदा बांदी से लगने लगा था कि अब कम से कम इस बात का एहसास तो होगा कि सच में ही अक्तूबर का महीना आ गया है। मगर ये क्या अब सुन रहा हूं कि दक्षिण भारत में भारी बारिश से भयंकर बाढ आ गयी है। लाखों घर और नगर डूबे पडे हैं। इस बार बिहार से बंगलौर शिफ़्ट हो गये बाढ देवता.....मतलब चाहे जगह बदल लो .....मगर आओगे जरूर।


लेकिन ये क्या मतलब है जी इस बात का....जब हम हर साल इत्ते धूमधाम से विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं..कित्ता कुछ करते हैं...कित्ता भारी भारी लिखते हैं....सारी संधियों पर भी हमने साईन वाईन कर दिये हैं...और तो और नयी नयी योजनायें भी बनाते हैं...अरे उसको छोडो....अब तो हम हर साल कभी किसी नदी को ....तो कभी किसी जलीय जीव को ..राष्ट्रीय दर्ज़ा दे रहे हैं..पता है राष्ट्रीय दर्ज़ा .....बताओ भला क्या कसर रह गयी....ये मुंए.....बाढ, भूकंप, तूफ़ान, ....फ़िर भी बेशर्मों की तरह मुंह उठाये चले आते है .......क्या इन्हें नहीं पता हमारी इस डेडिकेशन का.......

तभी आकाशवाणी होती है... .बेटा डेडिकेशन ...एक बात बताओ....कभी तुम लोगों ने पेड पौधे लगाये...कभी नदियों की मरती स्थिति के लिये कुछ सोचा...पहाड जो टूट टूट कर गिर रहे हैं...ग्लेशियर पिघल रहे हैं...इन सबके लिये कभी कुछ किया...........?

देखिये अभी तो हम ..पर्यावरण दिवस मना रहे हैं...जब मौका मिलेगा...फ़ुर्सत ्होगी तब ये भी कर लेंगे...अरे हां...हमारे मंत्री जी लगाते तो हैं हर बरस पेड आपने उनकी फ़ोटो नहीं देखी क्या...और सुनिये मिस्टर हवा सांऊड जी ....ये जो आप हमें करने की नसीहत दे रहे हैं......आप अमरीका को क्यूं नही कहते...आखिर उसने ही तो सारा बेडा गर्क किया हुआ है...वो भी तो नहीं करता ये सब...

अबे ओ, ये अपने मंत्रियों का तो नाम न ले ...आज तक तूने किसी मंत्री को भूकंप मे धंसते...या बाढ में डूबते....या तूफ़ान में उड जाते देखा है....नहीं न...तो क्या हुआ , और जहां तक अमरीका की बात है तो भाई...उसने अपने यहां यदि बम बनाये हैं तो इस बात के भी पूरे इंतजाम किये हैं कि यदि कोइ दूसरा उस पर वो बम फ़ोडेगा तो वो कैसे निपटेगा...इसी तरह उसने अपने यहां ...एक आपदा प्रबंधन नाम की नीति बनाई हुई है...सो उसे चिंता नहीं है इसकी...और फ़िर वो कौन सा तुम लोगों जैसे पर्यावरण दिवस...संधि ...वैगेरह में पडता है.......? समझे .....तो मनाते रहो तुम.....और मरते रहो तुम........

आकाशवाणी बंद हो जाती है...।

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

मंत्री जी .कुछ यूं किजीये न....




जब से कैटल क्लास वाला एतिहासिक बयान थरूर जी ने दिया....उनकी तो जो फ़जीहत हुई सो हुई...बांकी मंत्रियों की भी शामत टाईप की आ गयी है....कभी बचत के नाम पर तो कभी जनता से मिलन के नाम पर ..कोई किसी झुग्गी में जाकर ..दाल ....अरे रे...नहीं नहीं ..दाल नहीं.....पता नहीं ...क्या क्या के साथ रोटी खा रह है....तो कोई...किसी के यहां पानी पी पी के पता नहीं...क्या साबित कर रहा है....ओह हो सकता है कि ..ये चांद मिंया के लिये मैसेज हो कि ..देखिये हमारे यहां पानी की कमी नहीं है...बस हमें ही इन गरीबों के पास आने की फ़ुर्सत नहीं है..। मगर ये अब उनकी फ़ूटी किस्मत का ही कमाल है कि...उनके इन प्रयासों को भी तारीफ़ कम ..ढोकसला/ढोंग और इसी तरह के तमाम विशेषणों से नवाजा जा रहा है। अब ये तो उनके कमाये हुए पुण्य का ही प्रताप है कि ..उनके काम को इस तरह से ऐसी सराहना मिल रही है। इश्वर उन्हें इसी तरह सारा क्रेडिट देता रहे। मगर मंत्री जी ....आप लोग तो बेकार इस झंझट में पडे हो । पब्लिक अब उतनी बुडबक नहीं रही है जी..। फ़ट से समझ जाती है ..कि आप लोग रामलीला खेल रहे हो ..और पब्लिक ने ....रामानंद सागर जी के रामायण के बाद इसमें इंट्रेस्ट दिखाना छोड दिया है । अरे इसमें निराश होने की बात ही नहीं है ..देखिये हमारे पास कितना सरल उपाय है आपके लिये.........

एक एक करके आप सबको अपने विभाग के हिसाब से बताते हैं.......

रक्षा मंत्री जी....आप तो बस इतना ही किजीये कि अपने पुत्र/पुत्री/भाई/भतीजे...किसी को सेना में भर्ती करवा के ..सीमा पर तैनाती करवाईये...इश्वर न करे ..वो शहीद न भी हो तो भी ..कम से कम उनका दर्द तो आपको अपने घर में ही महसूस हो सकेगा...और यदि शहीद के पिता/माता होने का गर्व आपको कभी मिल गया...तो समझ जाइए कि देश के सभी शहीदों ..को जो ये पेट्रोल पंप और ..पता नहीं कौन कौन से झुनझुने आप पकडा देते हैं न..उनकी खनक आपके कान में सुनाई देगी....बस ..इतना सा काम करना है...

शिक्षा मंत्री जी......आपके लिये तो और भी आसान है जी...बस अपने बच्चों को आप सरकारी स्कूलों में ही दाखिला करवाओ....देखना जब आप के बच्चे ...खुद आपको आंखों देखा हाल सुनायेंगे न तो...ये तो सबसे तेज़ चैनल के एक्सक्लुसिव न्यूज़ से भी ज्यादा एक्सक्लुसिव होगा...कोई दौरा नहीं...किसी रपट की जरूरत नहीं...सब अपने आप आपके सामने आ जायेगा....

परिवहन मंत्री जी और रेल मंत्री जी .....आप लोगों के लिये बस इतना ही कि ...कभी सरकारी बस ..अजी आपकी अपनी में भी कभी अपने घर से दफ़्तर जाईये...यकीन मानिये..उसी दिन जाने कितनी नयी योजनायें बना लेंगे आप....और रेल मंत्री जी के लिये भी ...आप कभी पूजा के समय में...या ऐसे ही किसी समय...लाईन में खडे होकर जेनरल का टिकट लेकर ...साधारण डिब्बे में बस एक बार..भूजा चना फ़ांकते हुए घर तक पहुंच कर दिखा दिजीये....देखिये रेल के सारे फ़ायदे....आपको नुकसान की तरह लगने लगेंगे...

अब किन किन मंत्री जी के लिये अलग अलग एप्लीकेशन भरते रहें...चलिये इन जेनरल कुछ अर्ज़ किये द्ते हैं जी..

आप सब लोग ई फ़ाईनल कर लिजीये कि ....अपने कार्यकाल के दौरान ..कम से कम इतने दिन आप अपने लोगों के बीच रहेंगे...यानि अपने कार्यक्षेत्र में...और उतने दिन रहना ही पडेगा....सबको...

संसद सत्र के लिये आप कितने /क्या /कैसे ....तैयार हैं....वो कौन कौन से मुद्दे/प्रश्न/समस्यायें/बातें हैं जो आप हमारे लिये उठाने जा रहे हैं।उस पर आपका नज़रिया/एजेंडा...क्या है..ये पहले ही बताते जाईये...

ये जो आपके पास हमारे कल्याण के लिये ..फ़ंड जैसा एक घपलेबाजी का औजार दिया गया है...उसे आप कब कैसे कहां कितना उपयोग करने जा रहे हैं.....?

बस इत्ता इत्ता काम कर लिया न तो .......ई सब उपर वाला सो काल्ड ढकोसला करने की जरूरत ही नहीं रहेगी....समझे न ......चलिये फ़िर लिखेंगे एक ठो चिट्ठी ...अभी चलते हैं...

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

विश यू आल...हैप्पी बापू डे......

अरे आप क्यूं चौंक गये...यही मेसेज आज मुझे मेरे मोबाईल पर मिला....बताईये हमारा देश कितनी शिद्दत से बापू का जन्मदिन मना रहा है...वर्ना आज की नस्ल को क्या जरूरत है कि ...वेलेंटाईन डे की तरह इसे भी सेलिब्रेट करे...अजी बापू ने कौन सा उनके लिये ..आर्थिक उदारीकरण....या मल्टी नेशनल कंपनियों ...या ऐसा ही कुछ उनके लिये करके दिया था.....और अब तो पता चला है कि देश तो देर सवेर वैसे भी आजाद होने ही वाला था...वो तो उस समय कोई था नहीं ...सो लगे हाथ उन्हें क्रेडिट दे दिया गया...और सबसे बडी कमी तो रही कि उस समय कोई एसएमएस का महत्वपूर्ण अधिकार भी तो नहीं था...तो फ़िर कैसी क्रेडिबिलिटी जी उस डिसीजन की...जिसमें एसएमएस के नैसर्गिक अधिकार का उपयोग ही नहीं किया गया ..खैर.....

दो अक्तूबर ......जब स्कूलों मे थे ..तब बडा जोश हुआ करता था...कुछ अलग ही उत्साह था...गांधी जी से जुडी हुई प्रतियोगिताओं में भागीदारी...उनके जीवन से जुडे सभी पहलुओं पर आधारित प्रश्न पहेली में जीत जाने की ललक...और भी न जाने क्या क्या..मगर उस समय से लेकर अब तक इस दिन को गांधी जयंती के रूप में जाना...पता नहीं शास्त्री जी ने क्यूं मना कर दिया था.....थोडा आगे बढा जीवन तो कुछ सात्विक टाईप के मित्रों ने समझाया कि इसका असली मतलब होता है ...ड्राई डे....आंय....अमां ये कौन सा डे हुआ ...अच्छा अच्छा बरसात के मौसम के बाद जब दिन बदलते होंगे...तो.....अबे चुप...तेरे जैसे लोगों को यही समझ में आ सकता है...तेरे लिये तो ..साल के तीन सौ पैंसठ दिन...ड्राई डे ही होते हैं....मेरे कहने का मतलब था कि ..आज के दिन टुन्न होने का कोई चांस नहीं...या तो पहले ही.......आज पहली तारीख है....... सेलिब्रेट कर लो.......या फ़िर ..छुट्टी के बाद करो......

इसका मतलब जब नौकरी में आये तो पता चला.......अक्तूबर महीने की पहली छुट्टी जो बिल्कुल कंफ़र्म है....किसी तरह से आगे पीछे हो जाने की कोई गुंजाईश नहीं....यदि आगे पीछे ..शनिवार ..रविवार पडता हो...तो समझिये...कि अगली छुट्टी आपको शास्त्री जी के जन्मदिन की मिल रही है...आप उन्हें भी याद कर सकते हो..फ़ुर्सत से .....क्योंकि एक दिन में आखिर आप कितने जनों को जबरन याद कर सकते हैं.........

अब इतने समय बाद तो हालत और भी गज़ब है जी.....वो तो कहिये कि सर्किट ने और मुन्ना भाई ने....अपने अंदाज़ में बापू ..और उनके दर्शन को युवा पीढी के सामने रखा.....लोगों को पता भी चला कि ...ये भी थे कोई ..जिन्होंने ..अपने देश के लिये कुछ न कुछ तो किया ही था...तभी तो उनके उपर इतनी मजेदार पिक्चर बन पायी है....

जहां तक मेरी अपनी बात है...तो मुझे गांधी जी के व्यक्तित्व से कहीं ज्यादा उनका दर्शन.....उनके विचार....उनके उद्देश्य....पसंद हैं...क्योंकि वे आज भी उतने ही सार्थक और सामयिक हैं ....बल्कि कहूं कि अब कुछ ज्यादा हैं......जितने उनके समय में हुआ करते थे.....मगर अफ़सोस है कि ..आने वाली नस्लें...ये सब महसूस नहीं कर पायेंगी......और इसके लिये किसी को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता...क्योंकि सब दोषी हैं........शास्त्री जयंती कभी मनाई जायेगी......इसकी आशंका हमेशा ही रही है.....मगर शायद.....कभी.....

तो आप सबको एक बार फ़िर .......हैप्पी बापू डे....एंड..हैप्पी शास्त्री दिवस.....

साथ चलने वाले

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