इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

सोमवार, 17 नवंबर 2008

सेलेब्रेटीज होते हैं ब्लॉगर

जानता हूँ, आप कहेंगे, कमाल है यार अभी तो कल ये बात छोडी थी की , दुनिया के सबसे अमीरों की सूची में एक ब्लॉगर का नाम आ गया है , और फ़िर अपना नाम बता दिया, आज टूल गए उन्हें सेलेब्रेटीज बनाने पर । आप लोग ब्लॉगर हैं न, कबी भी सीधा और सच्चा सोच ही नहीं सकते, आप लोग भावनाओं को नहीं समझ सकते हैं न, इसलिए। दरअसल ये बात कुछ और है, आप ख़ुद ही देखिये........



कल जैसे ही बेटे को स्कूल से लेकर निकला, उसने प्रश्न दागना शुरू कर दिया (वैसे यहाँ बता दूँ की मुझे अब तक ठीक ठीक नहीं पता चल है की दागने में वो आगे रहता है या उसकी अम्मा, बस इतना पता है की दोनों मिलकर मुझे पर दागते हैं )पापा, मेरे स्कूल के सारे बच्चों के पापा सेलेब्रेटीज हैं, आज मुझसे टीचर ने पूछा तो मैंने कहा की कल बताउंगा , वैसे मुझे इतना पता है की वे कोई गर हैं, शायद अजगर नहीं बाजीगर .........



अबे चुप, क्या बक रहा है तुझे कितनी बार तो बताया है की ब्लॉगर हैं, ये अजगर और बाजीगर से बिल्कुल अलग होता है बेटे, और क्या कहा सेलेब्रेटी , बेटा सही मायने में तो सबसे बड़ा सेलेब्रेटी आज ब्लॉगर ही है।



ठीक है पापा, लेकिन हो तो आप गर नस्ल के ही प्राणी न , और सेलेब्रेटीज कैसे हो ?



मैंने उसके गर -मगर पर बिना ध्यान दिए, बताना शुरू किया, देख, आज भारत की जनसख्या कितनी है, सवा अरब से भी ज्यादा, उसमें से हिन्दी बोलने, पढने, लिखने और समझने वाले कितने होंगे, करोड़ों में , उसमें से ब्लॉग्गिंग करने वाले कितने हैं सिर्फ़ हजारों में, अबे, हजारों में क्या सिर्फ़ कुछ हजार, और नियमित लिखने वाले, सिर्फ़ पाँच सौ, उसमें से एक तेरे पापा भी हैं। और ये जो तेरे, अमिताभ बच्चन, आमिर खान , जैसे लोग हैं न , वे तो सिर्फ़ अपने कुत्ते बिल्लियों के नाम बताने के लिए ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं, हम उनमें से नहीं हैं। हम लिखते है, उसे पढ़ते हैं, लोग हमारी प्रशंशा करते हैं, फ़िर हम प्रशंसा करते हैं, और ये सिलसिला चलता रहता है। और तो और ये तेरे सेलेब्रिटीज लोग तो एक दूसरे से कैसे लड़ते हैं, खुलमखुल्ला, सबके सामने, यहाँ हम किसी की आलोचना भी बड़ी ही शिष्टता से करते हैं, और कई लोग तो बेचारे इतने भद्र हैं की यदि किसी को गलियाने का मन करे तो बेनाम बन कर गलियाते हैं, ताकि दुःख न हो ये जान कर की अमुक आदमी गरिया रहा है।



बेटा बिल्कुल शुक मुनो की तरह ध्यान लगा कर सुन रहा था, " लेकिन पापा आप लोगों की चर्चा तो कहीं नहीं होती "

बेटा गए वो दिन जब हम ख़ुद ही लिखते थे और ख़ुद ही पढ़ते थे, अब तो हरेक समाचार पत्र, कोई प्रतिदिन, तो कोई साप्ताहिक रूप से हमारी और हमारे पोस्टों की चर्चा कर रहा है ,(मैंने उसे बिल्कुल भी नहीं बताया की कभी किसी ने भी मेरी चर्चा नहीं की,) और यहाँ ब्लॉगजगत पर तो हमारे पाठक कितने हैं कह ही नहीं सकते।



लेकिन हमेशा ही मैंने देखा है की जब आप पाठकों की संख्या देखते हो तो वो तो महज ४ या ५ होती है



क्या बात कर रहा है, तुझे नहीं पता, कंप्युटर हमेसा लास्ट वाला जीरो नहीं दिखाता, मतलब पचास साठ लोग रोज पढ़ते हैं, और पसंद भी करते हैं (यहाँ भी मैंने उसे बिल्कुल नहीं बताया की हम कुछ दोस्तों ने कसम खा राखी है की एक दूसरे की पोस्ट छपते ही उसपे पसंद का घंटा जरूर बजा कर आयेंगे , फ़िर बाद में उसे खूब बुरा भला कहें। )


तो बता अब कोई कह सकता है की तेरे पापा सेलेब्र्तितिज नहीं हैं।

बिल्कुल ठीक कहा पापा , कम से कम कहने पर कोई चाहे कुछ न समझे इतना तो समझ ही जायेगा की आप भी अजगर और बाजीगर की तरह के कुछ भारी भरकम और अनोखे हो.

रविवार, 16 नवंबर 2008

मुबारक हो , दुनिया के सर्वाधिक अमीरों की सूची, फोर्ब्स में एक ब्लॉगर भी

वाह, भाई, क्या धाँसू ख़बर आए आज तो, आखिरकार मेरा सपना सच हो ही गया, हाल ही में दुनिया के सर्वाधिक अमीरों की सूची जारी करने वाली पत्रिका , फोर्ब्स, ने जो सूची जारी की है, उसमें एक ब्लॉगर का भी नाम है। पहले तो एक ये बात मेरी समझ में नहीं आती कि, ये इन पत्रिका वालों को आख़िर दूसरे की कमी के बारे में पता कैसे चल जाता है, और वो भी बिल्कुल शत प्रतिशत, कमाल है मुझे आज तक अपना हिसाब किताब ठीक से समझ में नहीं आता। इस सूची में दुनिया भर के, एशिया के , भारत के , इस प्रकार से नाम दिए गए हैं, पता चला कि इसमें चौथे नंबर पर एयरटेल वाले भाईसाहब मित्तल बाबु का नाम भी है, मुझे खुशी हुए, कि धोखे से ही सही, कभी किसी डाऊनलोड के नाम पर , तो कभी रिंग टन के नाम पर हर महीने जो अंट शंट, पैसे वे काटते हैं उसका फल कहीं तो जा कर मिलता है, वरना क्या फायदा कि आदमी इतनी धोखाधड़ी भी करे और हाथ भी कुछ न लगे, खैर में तो ब्लॉगर की बात कर रहा था।

विश्वस्त सूत्रों , ( प्लीज सूत्रों के बारे में कभी ना पूछें ), से पता चला है कि , कुल सत्ताईस लाख पेज की इस किताब के आखिरी पन्ने पर और ९९७६९८४३२७६५६८०९८७७६८०६४४५७६८९७५९ वें स्थान पर हमारा अपने एक हिन्दी ब्लॉगर है । हाँ , हाँ मैं जानता हूँ कि आप सोच में पड़ गए होंगे कि आख़िर कौन है वो टैलेंटेड ब्लॉगर जिसने इतना प्रतिष्ठित स्थान हासिल किया, अब मैं अपने मुंह से अपना नाम कैसे लूँ समझ नहीं पा रहा हूँ, लेकिन लेना भी जरूरी है, वरना आप हमारे वरिष्ठ भाइयों के नाम से कन्फुज हो जायेंगे तो।
मुझे ये तो नहीं पता कि इस सूची में नाम आने के बाद किसी के ऊपर क्या फर्क पड़ता है, ये भी नहीं कि kahin इसके बाद मुझे सब्जी वाला सब कुछ सोने के भाव न देना शुरू कर दे, मगर फक्र तो होता ही है न। हाँ , हाँ मुझे मालूम है कि इसके बाद कुछ लोगों को, अनाम और बे नाम लोगों को ये शिकायत हो रही होगी कि हुंह ये क्या बात हुई आख़िर पेज पे इतने बाद नंबर आया है , उसे लेकर हाय तोबा क्यूँ मचाया जा रहा है, तो उन लोगों को मैं बता दूँ कि जब भी कोई व्यक्ति किसी भी किताब को उठाता है तो उसका पहला और आख़िरी पन्ना जरूज ही पढता है , तो जिसे, बिल गेट्स, का नाम पता होगा वो झा जी को जरूर ही जानता होगा, क्यों ठीक है न, एक और जरूरी बात ये कि इन कमबख्त बड़े लोगों, अरे जिनका नाम ऊपर है उन्हें तो हर वक्त अपने बोलीवुड के खानों की तरह अपने नंबर बढ़ने और काटने की चिंता लगी रहती है, एक हम ही हैं जिसे पता है कि चाहे जितनी तबदीली आ जाए अपना स्थान तो स्त्तेस लाखवें पेज पर फिक्स है ही।
तो बधाई हो मुझे भी और आप सबको भी आख़िर आप सबके बीच रह कर ही तो ये नामुमकिन काम मैं कर पाया वरना क्या मैं भी चाँद पर सायकल लेकर नहीं चला जाता।

मेरा अगला पन्ना :_ सेलेब्रिटी होते हैं ब्लॉगर , (आपको शक है क्या, मैं साबित कर दूंगा )

शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

पांडे V/S ठाकरे ( राजनीति का २०-२० )

अब क्षेत्रवाद का मैच ये,
और भी रोचक होगा,
नारे-दंगे, लाठी- डंडे,
सभी कहेंगे , बाप रे॥
मंजे हुए दोनों कप्तान,
इक पांडे, इक ठाकरे॥
अब जलने को तैयार रहो,
तिल तिल कर हर बार मरो,
इक डालेगा पैट्रोल, दूजा,
लगवाएगा आग रे ॥
पांडे बोले , जो बिदके,
अबकी उलटा सीधा,
तो न ताज रहें न राज रे॥
भागी सेना, पहुँची थाने,
डर और चिंता, लगी सताने,
गाने लगे, सब,
सुरक्षा का राग रे॥
गरीब भला ये क्या जाने,
आया था दो रोटी कमाने,
पीछे पड़ा , बोली-भाषा का नाग रे॥

चलिए , भगवान् करे पांडे ठाकरे टीम के इस मैच में किसी निर्दोष का विकेट न गिरे, मगर मुझे डर है की ऐसा ही होगा...

पांडे V/S ठाकरे ( राजनीति का २०-२० )

अब क्षेत्रवाद का मैच ये,
और भी रोचक होगा,
नारे-दंगे, लाठी- डंडे,
सभी कहेंगे , बाप रे॥
मंजे हुए दोनों कप्तान,
इक पांडे, इक ठाकरे॥
अब जलने को तैयार रहो,
तिल तिल कर हर बार मरो,
इक डालेगा पैट्रोल, दूजा,
लगवाएगा आग रे ॥
पांडे बोले , जो बिदके,
अबकी उलटा सीधा,
तो न ताज रहें न राज रे॥
भागी सेना, पहुँची थाने,
डर और चिंता, लगी सताने,
गाने लगे, सब,
सुरक्षा का राग रे॥
गरीब भला ये क्या जाने,
आया था दो रोटी कमाने,
पीछे पड़ा , बोली-भाषा का नाग रे॥

चलिए , भगवान् करे पांडे ठाकरे टीम के इस मैच में किसी निर्दोष का विकेट न गिरे, मगर मुझे डर है की ऐसा ही होगा...

पढियेगा जरूर , सब एक्सक्लूसिव है

का बात है झा बाबु, सब कुछ एक्सक्लूसिव है ,लगता है आप भी इंडिया टी वी से इंस्पायर हो गए हैं, जहाँ कभी भगवान् अवतार ले लेते हैं, तो कभी भूत प्रकट हो जाते हैं, और वो भी एक्सक्लूसिव, बस बेचारों को इंसानों से जुडी कोई ख़बर ही नहीं मिलती, क्यों ? कहिये क्या क्या ख़बर है आज, सुना है की आज तो आप लोगों पर एक और टैप जारी हुआ है जिसमें राज फाश किया गया है की आप भैया लोगों को केक बना कर काटा जा रहा है , ऊ भी चाकू लहरा लहरा के।

अरे नहीं भाई, इस बात को इतना सेरिअस्ली लेने का कौनो जरूरत नहीं है, दरअसल हम लोग बहुत पहले से ई बात सोचे थे की अपना प्रेम किसी न किसी माध्यम से जरूर दिखाएँगे। जैसे अब लीजिये हमारे प्रोग्राम सुनिए, हम लोग जल्दी ही एक लिट्टी बनाने जा रहे हैं, ( भैया लोग लिट्टी समझ गए होंगे ) जिसके अन्दर सुआ घुसा घुसा कर उसको इतनी देर तक आग पर पकाएंगे की पूरा प्रेम जग जाहिर हो जायेगा, मगर उसका टैप सिर्फ़ इंडिया टी वी को ही मिलेगा, आख़िर ऊ हमारे मीडिया पार्टनर हैं न।
सीरियल पिक्चर खुलवाओ न राज भाई
सर सुना है कि, कुछ सीरियल पिक्चर को लेकर भी आपकी कोई कहबर एक्सक्लूसिव नेउस है,

हाँ , भाई, दरअसल हमरे मित्र बालाजी यादव ( अरे टेली फिल्म्स वाले नहीं ) बहुत परेशान हैं भाई, आकर कहने लगे, का बताएं भैया झाजी, ई ससुरा सेरिअल्वा सब जब से बाद हुआ है घर में रोज ही क्लेश रहने लगा है,
हमें आश्चर्य हुआ, हमने कहा , क्यों अब तो उल्टे शांती रहेनी चाहिए थी।
अरे कहाँ, दरअसल पहले माता जी और श्रीमती जी सीरियल की कहानी और पात्रों को लेकर, उनके चक्कर और शादी वैगेरह को लेकर ही बात करती थी, अब कुछ आ नहीं रहा इसलिए आपस में भिड जाती हैं जब तब। हमने तो इसका उपाय भी निकाला और सबको लेकर चले गए पिक्चर देखने, कोई विद्रोही, वतन द्रोही नाम की ;पिक्चर लगी थी,
कमाल है , हाँ भाई अब इस समय कोई देशभक्त , और क्रांतिकारियों पर पिक्चर तो बनने से रहा।
अरे सुनिए तो , पिक्चर भी नहीं देख पाये, सुना है किसी ने बंद करवा दी है। पता चला कि ई सब आपके मित्र का किया धारा है, काहे , ई सब राज की बात है।

देखिये, हमें तो नहीं लगता कि ऊ ई सीरियल और पिक्चर सब खुलवा पायेंगे।ई सब से उन्क्य क्या लेना देना ?

ई तो आप हमें ठग रहे हैं, आप ही बताइये, जेट वाला हड़ताल से उनका का लेना देना था, वही खुलवाये थे न, हमें तो पता चला है कि हड़ताल खुलवाने में वो इतने एक्सपर्ट हो गए हैं कि सरकार उनको औथोराईज्द हड़ताल खोलू का लाईसंस देने जा रही है।

देखिये हम सीरियल सब तो चालू करवा देंगे ,मगर ऊ सब हिन्दी में नहीं होगा, दोस्त को हिन्दी समझ में नहीं आती है इसलिए कहिये तो मराठी में चालू करवा दें.............
बाल दिवस पर लकी नहीं लखी
इतने में मीडिया पार्टनर आ गए, कहे झा जी आज बाल दिवस पर कुछ नहीं कहे आप, देखिये तो बच्चा सब कितना लकी है आज, कितना सारा सुविधा, कितना ग्लैमर, पैसा मिल रहा है, है कि नहीं लकी।
बस बेटा बहुत हुआ, लकी नहीं लखी है ( आपको बताते चलें कि लखी एक नाबालिग बच्ची है जिसे हाल ही में उसके मालिक और मालकिन ने बुरी तरह मारा पीता, ख़बर भी सब तरफ़ आयी मगर उनका कुछ हुआ नहीं, हमेशा कि तरह ), तुम लोगों को हर घर में एक लकी के साथ बुधिया, चम्पू, छोटू, ननकू, जैसे लखी भी मिल जायेंगे।
मगर सर, आख़िर क़ानून को ये बाल मजदूर दिखाई क्यों नहीं देते ?
यार तुम भी कमाल करते हो, जब कानून को लंबे चौडे, तगडे , मुजरिम दिखाई नहीं देते तो फ़िर इन बेचारे बाल मजदूरों का तो साईज ही छोटा है।

चलिए अब बंद कीजिये ई अपना ब्रेकिंग न्यूज़

मंगलवार, 11 नवंबर 2008

इसका मतलब राहुल राज, अफज़ल से भी ज्यादा खतरनाक था !

आज सुबह ही ख़बरों में देखा , पढा और सुना कि, राहुल राज, उम्मीद है कि आप इस नव युवक की जिंदगी नहीं तो मौत की कहानी से वाकिफ जरूर होंगे, के माता पिता, और रिश्तेदार आज राष्ट्रपती से मुलाक़ात करेंगे। उनसे दरख्वास्त की जायेगी, कि उनके बेटे की मौत के पीछे के सच का पता लगाया जाए, ताकि उन्हें इन्साफ मिल सके।

बताइये, ये भला कोई बात हुई, राष्ट्रपति के पास फिलहाल इतना तो वक्त ही नहीं होगा, आख़िर उन्हें दूसरों को भी तो इन्साफ देना है, दूसरे कौन, भूल गए आप, राष्ट्रपति के पास अफजल , वही अफजल जिसने अपने साथियों के साथ मिलकर संसद पर हमला बोल दिया था, देश की छोटी बड़ी, सभी अदालतों से फांसी की सजा के बाद अब उसकी माफी की याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित पडी है, और फ़िर संसद जैसी छोटी मोटी जगह पर हमला करना, वहां तैनात कुछ पुलिस वालों, जिनके सर पर खामख्वाह ही देशभक्ति का भूत चढा था, को जान से मार देने के बावजूद उसका गुनाह इतना बड़ा नहीं था जितना कि राहुल राज का था। बताइए तो एक खाली बस को हाईजैक करने का अभूतपुर्व गुनाह किया था उसने, शायद आज तक किसी भी गुंडे , डकैत, और आतंकी ने इतना शानदार हाईजैक नहीं किया होगा, सुना है कि उसने अंधाधुंध गोलियाँ भी चलायी, कमाल है कि एक भी किसी पुलिस वाले को नहीं लगी, या शायद उसने मारे नहीं।
जो भी हो, इस घटना से दो बातें तो तय हैं, पहली ये कि राष्ट्रपति के पास इन्साफ के लिए जाने से पहले जरूरी है कि अपराध , संसद पर हमले जैसा ही और सजा फांसी जैसी छोटी ही होनी चाहिए। दूसरी , ये कि किसी भी परिस्थिति में खाली बस को हाईजैक करना सबसे बड़ा अपराध है, जो बेचारे राहुल राज से हो गया। देखना ये है कि इन्साफ किसे मिलता है ?

सुना है कि इस बार टिकट बिके हैं :- अजी किसी और के मुंह से सुना होता तो शायाद यकीन नहीं होता, हालाँकि सच होता है हमेशा , मगर फ़िर भी यकीन नहीं होता मगर इतनी वरिष्ठ महिला राजनीतिज्ञ, वो भी संगठन के इतने महतवपूर्ण पद पर बैठी हुई जब कहें, और ऐसा कहने के लिए उन्हें उसके बाद इस्तीफा तक देना पड़ जाए तो यकीन नहीं करने का तो कोई कारण ही नहीं बचता है न।
मगर सबसे महत्वपूर्ण सवाल तो ये है कि , क्या चुनाव के लिए बिके हुए टिकटों की कीमत आलो प्याज और टमाटर के कुल कीमत से भी ज्यादा था, यदि कम थी तो भी और ज्यादा थी तो भी किसी भी सूरत में ये बिल्कुल ही अन्याय था, और हाँ जिन्हें आलू, प्याज और टमाटर वाली बात से ऐतराज होगा वे निश्चित रूप से घर की सब्जी श्रीमती जी से ही मंगवाते होंगे।

संस्कृति मंत्री के संस्कार :- लीजिये अभी तो चुनाव शुरू भी नहीं हुए और हमारे जनप्रतिनिधियों, समाज सेवकों का असली चरित्र हमारे सामने आने लगा है। सुना है कि मध्य प्रदेश के संस्कृति मंत्री ने हाल ही में चुनाव दफ्तर में एक महिला अधिकारी के साथ इतने शिष्ट, सुलभ, सु संस्कृत, तरीके से व्यवहार किया कि , उन बेचारी को इसकी बाकायदा शिकायत तक दर्ज करवानी पड़ गयी। इस चुनाव में जीतने के बाद तो हर हाल में उन्हें ही संस्कृति मानती बनाया जाना चाहिए, आखिरकार राजनेताओं की सच्ची संस्कृति को उन्होंने ही तो जीवित रखा है.

सोमवार, 10 नवंबर 2008

सड़कें हमें खा गयी या हम सड़कों को ? (परिवहन दिवस पर विशेष )

आज परिवहन दिवस है, ऐसा मैंने पढ़ा है , मुझे नहीं पता की इससे किसकी सेहत पर क्या फर्क पड़ा, ये भी नहीं की आज किसी को बस में दिक्कत हुई या नहीं, या कि, कोई ट्रैफिक जाम तो नहीं लगा, मगर चूँकि पढा था तो लग रहा था कि जरूर होगा। वैसे भी सिर्फ़ प्रेम दिवस (वैलेंताईं डे ) को छोड़ कर बांकी सभी दिवस तो महज खानापूर्ती ही बन कर रह गए हैं सो ज्यादा सोचा विचारा नहीं और लगे रहे। घर पहुंचे तो अजीब माजरा देखा।

एक पक्की काली, मोटी, मजबूत , सड़क मेरे आँगन में आकर खादी थी, पहले तो मैं समझा कि शायद पत्नी ख़ुद ये उनकी कोई मित्रानी होंगी, मगर पास पहुंचा तो देखा कि सड़क थी। मैंने सोचा शायद परिवहन दिवस मानाने के लिए इस बार कोई नया आयोजन किया जा रहा है, सो औपचारिकता वश मैंने पहले यही कहना ठीक समझा ,' मुबारक हो जी, परिवहन दिवस की बहुत बहुत बधाई।"

" चुप रहो, जले पर नमक मत छिड़को, कहे की मुबारकबाद, तुम लोगों ने हमारा जीना हराम कर दिया है। एक बात बताओ ये सड़कें तुमने क्यों बनाई हैं, विकास के लिए न, परिवहन के लिए न, तो ये कौन सा नया धंधा सीख लिए है, जब भी कोई बात होती है, या नहीं भी होती है, बीवी मारे, बिजली नहीं आ रही, पानी नहीं आ रहा, तुम्हारा नेता नहीं आ रहा, पिक्चर पसंद नहीं, आरक्षण चाहिए, अमा सब के विरोद के लिए तुम लोग सारे इक्केट्ठे होकर हम सड़कों की छाती पर ही मूंग डालने आ जाते हो , तुम्हें और कोई जगह नहीं मिलती।

मैंने देखा ये क्या , आज परिवहन दिवस है तो क्या , और मेहमान है तो क्या, या तो कतई नहीं हो सकता कि कोई घर घुस कर मेरी बेईज्जत्ति ख़राब करे ,बहार से और बात है, मैं भी भड़क गया।, " रहने दो, रहने दो, तुम्हे पता है तुमाहरी वजह से हमारी जिंदगी कितनी कम हो गयी है, लो सुनो , आंकडों के मुताबिक सिर्फ़ इसी शहर में हर महीने करीब ४२ करोड़ घंटे ट्रैफिक जाम में फंस कर लोग अपना समय बरबाद कर देते हैं। सोचो कि कितनो का तो जीवन ही बचारा तुम्हारे साथ मुंह काला करते बीत जाता है।

सड़क फ़िर भड़क गयी, इसके लिए भी तो तुम ही जिम्मेदार हो, मैं तो कहती हूँ कि हम तुम्हें नहीं बल्कि तुम हमें खा रहे हो। अब मेरे आंकडे सुनो, तुम्हारे इसी शहर में रोजाना १००० -१५०० नए वाहन मेरी छाती पर उतर रहे हैं, सड़कों की कुल लम्बाई में से ७५ प्रतिशत से भी ज्यादा पर हमेशा कोई न कोई वाहन रेंग ही रहा होता है .इतने पर भी तुम मर्दूदों को चैन नहीं , अपने छोटे बच्चों को और कई बार तो ख़ुद भी, कभी पीकर, तो कभी छुट्टे सांड बन कर एक दूसरे को टक्करें मार मार कर मेरे शरीर पर अपना गंदा खून बिखेरते हो। जो ये नहीं कर पाते, तो मुंह में न जाने कौन कौन सा जहर कचरा (पान - गुटखा )खा खा कर पूरे रास्ते पिच -पिच करते रहते हो।

अब बताओ काहे का परिवहन दिवस भाई, सोचो यदि रास्तों ने बगवात कर दी तो तुम मनुष्यों को मंजिल कहाँ मिलेगी, इसलिए अब भी समय है, हमारी क़द्र करना सीखो.

रविवार, 9 नवंबर 2008

दोस्त परेशान है , बताइए क्या करे

जब कोई आपके आसपार परेशान या दुखी हो तो जाहिर है की उसके प्रभाव से आप भी बच नहीं सकते, यदि आप सचमुच इंसान हैं तो , जरूर ही। बातों बातों में ही दोस्त से पता चल की आजकल वो बेहद परेशान चल रहा है , उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा की क्या करे और कैसे इस परेशानी से निकले , हलाँकि मैंने उसे सभी मानवीय और कानूनी उपाय और रास्ते भी बता दिए हैं लेकिन मुझे नहीं लगता की वो इसमें से बाहर आ पाया है, जब मैं भी नहीं जानता कि, उसे कौन सा रास्ता अपनाना चाहिए, इश्वर करे उसे ये न पता चले कि मैंने उसकी समस्या यहाँ रख दी।

दरअसल कुछ साल पहले नौकरी की तलाश में गों से शहर आया, खूब भाग दौड़ के बाद एक अच्छी सी नौकरी भी मिल गयी, और किस्मत से अच्छी सी छोकरी भी, जी हाँ अपने दोस्त को या उनकी धर्मपत्नी जी को प्यार हो गया, परिणाम ये कि दोनों अलग क्षेत्र, अलग भाषी, और अलग संस्कृति के बावजूद, बहुत से विरोधों के बावजूद परिणय सूत्र में बाँध गए.दोनों की आपसी समझ भी अच्छी ही है, मगर आजकल स्थिति कुछ ठीक नहीं है। दोस्त के बूढे माँ बाप, जब कुछ दिनों के लिए गाओं से यहाँ शहर में अपने बेटे और बहू के पास रहने आए तो दिक्कत शुरू हो गयी। पता नहीं कौन सही है कौन ग़लत, किसका व्यवहार ठीक है किसका नहीं, दोनों के पास अपने अपने तर्क हैं, और एक लिहाज से दोनों ही कभी ठीक तो कभी ग़लत होते हैं। अब मुश्किल ये है कि दोनों ही एक दूसरे को देखना भी नहीं चाहते, नहीं सहायद मैं ग़लत कह गया, दरअसल हमारी भाभी जी को दोस्त की माताजी से बिल्कुल ही खुन्नस हो गयी है, और इसके लिए उनके पास शायद लाखों तर्क हैं। दोस्त ने प्यार से तकरार से, मान मनौव्वल से , रूठ कर और सख्ती से भी प्रयास कर देख लिया, मगर अफ़सोस कोई बात नहीं बनी। एक बार तो ऐसा समय आ गया कि दोस्त ने माँ बाप के लिए सब कुछ छोड़ने का फैसला कर लिया, मगर फ़िर अपने बच्चों के कारण ऐसा भी नहीं कर पाया।
अब हालात ये हैं कि वो कशमकश में फंसा हुआ , बेचारा सबसे पूछ रहा है कि क्या करे, माँ बाप को इस बुढापे में छोड़ दे या फ़िर बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दे।

मुझे तो सिर्फ़ एक ही रास्ता सूझा , वो ये कि , नहीं दोनों में से कुछ भी नहीं कर सकता इस लिए जब तक कर सकता है कोशिश करता रह और अपना कर्म भी , बिना कुछ सोचे और समझे।

अब ये बताइए, विशेषकर महिला समाज से तो जरूर ही जानना चाहूंगा कि दोनों ही औरतें उसकी जिम्मेदारी हैं उसका जीवन भी और दायित्व भी, तो ऐसे में वो क्या करे ..........?

दोस्त परेशान है , बताइए क्या करे

जब कोई आपके आसपार परेशान या दुखी हो तो जाहिर है की उसके प्रभाव से आप भी बच नहीं सकते, यदि आप सचमुच इंसान हैं तो , जरूर ही। बातों बातों में ही दोस्त से पता चल की आजकल वो बेहद परेशान चल रहा है , उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा की क्या करे और कैसे इस परेशानी से निकले , हलाँकि मैंने उसे सभी मानवीय और कानूनी उपाय और रास्ते भी बता दिए हैं लेकिन मुझे नहीं लगता की वो इसमें से बाहर आ पाया है, जब मैं भी नहीं जानता कि, उसे कौन सा रास्ता अपनाना चाहिए, इश्वर करे उसे ये न पता चले कि मैंने उसकी समस्या यहाँ रख दी।

दरअसल कुछ साल पहले नौकरी की तलाश में गों से शहर आया, खूब भाग दौड़ के बाद एक अच्छी सी नौकरी भी मिल गयी, और किस्मत से अच्छी सी छोकरी भी, जी हाँ अपने दोस्त को या उनकी धर्मपत्नी जी को प्यार हो गया, परिणाम ये कि दोनों अलग क्षेत्र, अलग भाषी, और अलग संस्कृति के बावजूद, बहुत से विरोधों के बावजूद परिणय सूत्र में बाँध गए.दोनों की आपसी समझ भी अच्छी ही है, मगर आजकल स्थिति कुछ ठीक नहीं है। दोस्त के बूढे माँ बाप, जब कुछ दिनों के लिए गाओं से यहाँ शहर में अपने बेटे और बहू के पास रहने आए तो दिक्कत शुरू हो गयी। पता नहीं कौन सही है कौन ग़लत, किसका व्यवहार ठीक है किसका नहीं, दोनों के पास अपने अपने तर्क हैं, और एक लिहाज से दोनों ही कभी ठीक तो कभी ग़लत होते हैं। अब मुश्किल ये है कि दोनों ही एक दूसरे को देखना भी नहीं चाहते, नहीं सहायद मैं ग़लत कह गया, दरअसल हमारी भाभी जी को दोस्त की माताजी से बिल्कुल ही खुन्नस हो गयी है, और इसके लिए उनके पास शायद लाखों तर्क हैं। दोस्त ने प्यार से तकरार से, मान मनौव्वल से , रूठ कर और सख्ती से भी प्रयास कर देख लिया, मगर अफ़सोस कोई बात नहीं बनी। एक बार तो ऐसा समय आ गया कि दोस्त ने माँ बाप के लिए सब कुछ छोड़ने का फैसला कर लिया, मगर फ़िर अपने बच्चों के कारण ऐसा भी नहीं कर पाया।
अब हालात ये हैं कि वो कशमकश में फंसा हुआ , बेचारा सबसे पूछ रहा है कि क्या करे, माँ बाप को इस बुढापे में छोड़ दे या फ़िर बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दे।

मुझे तो सिर्फ़ एक ही रास्ता सूझा , वो ये कि , नहीं दोनों में से कुछ भी नहीं कर सकता इस लिए जब तक कर सकता है कोशिश करता रह और अपना कर्म भी , बिना कुछ सोचे और समझे।

अब ये बताइए, विशेषकर महिला समाज से तो जरूर ही जानना चाहूंगा कि दोनों ही औरतें उसकी जिम्मेदारी हैं उसका जीवन भी और दायित्व भी, तो ऐसे में वो क्या करे ..........?

शनिवार, 8 नवंबर 2008

शुक्र है कि मुझे भी धमकी भरा ई मेल मिल ही गया (व्यंग्य )

न जाने कितने दिनों से यही तमन्ना थी की काश मुझे भी kabhee कोई धमकी भरा ई मेल मिल पता। हालाँकि में पूरी संजीदगी से ये बता दूँ की धमकी भरी फी मेल ( अजी मेरी धर्म पत्नी ) तो मुझे काफी पहले ही मिल चुकी है। लेकिन यहाँ तो ज़माना ई मेल का है न।

रोज सुबह उठ कर जब अखबार पढता हूँ तो यही मिलता है, की फलाना को धमकी भरा ई मेल मिला , और सिर्फ़ कुछ ही दिनों बाद पता चलता है की वो ई मेल भेजने वाला भी कहीं से पकडा गया। कमाल है मुझे धमकी भरा फी मेल भेजने वाले, ( मेरे सास -ससुर ) तो कभी नहीं पकड़े गए, खैर। बात तो ई मेल की हो रही थी। जहाँ देखो इसी बात की चर्चा थी , हम दोस्तों के बीच भी।
यार कमाल है हम भी रोज ई मेल , ई मेल करते हैं मगर कमबख्त कभी ऐसा हुआ है की गलती से कोई धमकी भरा ई मेल हमें भी मिल जाए। मैंने मित्र से कहा।
अमा तुम कौन देश के प्रधान मंत्री हो , या की कौनो गुंडे हो, एक्टर, क्रिकेटर, कुछ भी नहीं हो तो तुम्हें कौन ई मेल करेगा बे।
क्या मतलब एक आम आदमी की कोई औकात नहीं उसकी कोई वैल्यू नहीं , अब तो मेरा मन करता है की अपने सब्जी वाले को ही एक धमकी भरा ई मेल भेज दूँ की , बेटा सुधर जा यूँ ही सब्जी के भाव बह्दाता रहा तो देखना मैं बड़े बड़े गमले खरीद कर ख़ुद के लायक सब्जी उगा ही लूँगा। और मैंने कौन सा सब्जी का निर्यात करना है, घर चलाने के लिए तो उगा ही लूँगा , फ़िर सोचा की पकडा गया तो उधार की सब्जी भी बंद हो जायेगी।
लेकिन अचानक ही सपना सच हो ही गया, आज ही एक बैंक से धमकी भरा ई मेल आया है, की बेटा तुम लोगों नो यहाँ हमारे बैंक से लोन लेकर सारी ऐश जुटा ली है, उससे अमरीका सरकार तक डूबने वाली है, चुपचाप सारे पैसे लौटा दो , वरना खैर नहीं।
हमने मित्र से सलाह ली, उसने कहा, चुपचाप बैठो रहो, ख़बर गर्म है की बैंक अपनी मौत ख़ुद ही मरने वाला है, कमबख्तों के पास इतने पैसे भी नहीं बचने वाले हैं की आगे से कोई ई मेल करें।
मगर यदि बैंक बच गया तो,
तो भी चिंता नहीं, धमकी वाली ख़बर से तुम रातोंरात लेनदारों के हीरो तो बन ही जाओगे।
शुक्र है कि मुझे भी धमकी भरा ई मेल मिल ही गया।

औरत एक अंतहीन संघर्ष यात्रा


अपनी पिछले पोस्ट में नारी ने मुझे शिकायत की , कि मैंने ब्लॉग्गिंग पर लिखे और छपे अपने विस्तृत आलेख में महिला ब्लोग्गेर्स के लिए ज्यादा नहीं लिखा, हलाँकि मैंने उन्हें आश्वाशन दे दिया है कि जल्दी ही मैं उनकी ये इच्छा भी पूरी कर दूंगा, मगर फिलहाल मुझे लगा कि शायद ये उपायुक्त अवसर होगा कि महिला जीवन पर मेरा एक आलेख को मैं यहाँ पर छाप सकूं।
* छपे हुए आलेख को पढने के लिए उस पर क्लिक करें.

औरत एक अंतहीन संघर्ष यात्रा


अपनी पिछले पोस्ट में नारी ने मुझे शिकायत की , कि मैंने ब्लॉग्गिंग पर लिखे और छपे अपने विस्तृत आलेख में महिला ब्लोग्गेर्स के लिए ज्यादा नहीं लिखा, हलाँकि मैंने उन्हें आश्वाशन दे दिया है कि जल्दी ही मैं उनकी ये इच्छा भी पूरी कर दूंगा, मगर फिलहाल मुझे लगा कि शायद ये उपायुक्त अवसर होगा कि महिला जीवन पर मेरा एक आलेख को मैं यहाँ पर छाप सकूं।
* छपे हुए आलेख को पढने के लिए उस पर क्लिक करें.

शुक्रवार, 7 नवंबर 2008

काश एक बराक ओबामा यहाँ भी होते !

इन दिनों जिधर भी जाता हूँ अमेरीकी चुनाव और बराक ओबामा की जीत की ही चर्चा चल रही होती है, स्वाभाविक भी है , और सच कहूँ तो मुझे इससे कोई परहेज़ भी नहीं है, मगर थोड़ा दुःख और आश्चर्य जरूर होता है, भविष्य में हामारे चुनाव भी तो आने वाले हैं। क्या हम कभी गंभीरतापूर्वक ये सोच सकते हैं की अमेरीकी चुनाव से हमें क्या क्या सीखना चाहिए।
ऐसी ही एक चर्चा के दौरान मेरे एक मित्र ने आह भरते हुए कहा की, काश ओबामा हमारे यहाँ होते, दूसरे ने तपाक से कहा की यदि यहाँ होते तो किसी धर्म, या जाति, या रंग के नाम पर वोट मांग रहे होते। मगर सच कहूँ तो मुझे दोनों ही तर्क जज्बाती लगे, अमेरिका को ख़ुद रंग के भेद से निकलने में २०० से ज्यादा साल लग गए। मगर इतना तो जरूर है की फ़िर भी हर लिहाज़ से वे आज भी सच्चे लोकतंत्र का निर्वाह कर पा रहे हैं , या कहूँ की वे ही कर रहे हैं, हम तो बस नाटक ही कर रहे हैं। क्या हम लोग, आम लोग, कभी चुनाव की तैयारी करते हैं ? प्रश्न आ सकता है की , हम क्या तैयारी करें भाई, हमने तो वोट डालना है, सोच कर डाल देंगे। और हम बस इतना ही करते हैं, कई बात सोच कर कई बार या अधिकतर किसी न किसे प्रभाव में आकर, और अब तो हम इससे भी आगे निकल चुके हैं , पिछले चुनाव में कई जगह मतदान का प्रतिशत तो ३० से भी कम जा चुका था, वाह क्या बात है, यानि की ७० प्रतिशत लोगों को मतदान से कोई लेना देना नहीं है।

क्या इतना भी नहीं किया जा सकता की वोट मांगे वालों से चाँद प्रश्न किए जाएँ, यदि उम्मेदवार पुराना है तो उसके कार्यों का सारा लेखा जोखा , वो भी प्रमाण सहित , सिर्फ़ बातों में नहीं, भविष्य में सांसद निधि या जो भी फंड है उनकी खर्च की योजना, सिर्फ़ सामयिक मुद्दों और जरूरतों , बिजली पानी से आगे, विज्ञानं , कन्या भ्रूण हत्या , भर्ष्टाचार आदि पर अपनी तैयारी करें, फ़िर परखें। बदकिस्मती से यहाँ अब तक आमने सामने परिचर्चा, संगोष्ठी आदि की कोई व्यवस्ता हम नहीं ढूंढ पाये हैं। और सबसे अहम् दो जरूरी बातें ये की किसी भी परिस्थिति में वो अपने विचारों से , दल से, अपने लोगों को ठेंगा दिखा कर सिर्फ़ कुर्सी के लिए ही ना लड़ते मरते रहे, और इसके लिए जरूरी है की उन्हें किसी भी समय या फ़िर किसी नियत समय पर वापस बुलाने का अधिकार मिलना चाहिए।

सबसे बड़ी विडंबना तो यही है की, ये सब करेगा कौन, जिस देश की राष्ट्रपति पद, पर , सबसे प्राभाव्शाली राजनितिक दल के मुखिया के पद पर और संसद में न जाने कितनी महिलाओं के होने के बावजूद महिला आरक्षण बिल नहीं पास होने दिया जा रहा है वहां ऐसे सुधारों को कौन लागू कर सकता है।
तो हम तो सिर्फ़ इतना कर सकते हैं की चुनाव से पहले अपना होम वर्क पूरा करें, मन लगा कर सचा प्रतिनिधि चुनें, क्योंकि ये हम कर सकते हैं, शायद यहां भी कोई ओबामा मिल जाए ............

ब्लॉग्गिंग पर मारा आलेख २९ समाचार पत्रों में छपा



जैसा की बहुत पहले ही सोचा था कि जब ब्लॉग्गिंग हो ही रही है तो , इसके बारे में अन्यत्र भी चर्चा होनी चाहिए, खासकर उन माध्यमों में तो जरूर ही जहाँ मैं सक्रिय हूँ, पहले रेडियो, फ़िर प्रिंट में भी सोचा था, आखिरकार ब्लॉग्गिंग के विषय में पहला आलेख फीचर के माध्यम से अब तक २९ समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपा। सबसे अच्छी बात ये रही कि ये आलेख, हैदराबाद, श्रीगंगानगर, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार आदि कई राज्यों में छपा। मेरी कोशिश तो यही रही कि सब कुछ लिख सकूँ , पर जाहिर है कि एक ही पोस्ट में ऐसा सम्भव नहीं था, इसलिए फैसला किया है कि ,जल्द ही एक नियमित स्तम्भ , "ब्लॉग बातें " विभ्हिन्न समाचार पत्रों में दिखाई देगा, योजना को मूर्त रूप देने में लगा हूँ, आप लोगों का साथ रहा तो जल्दी ही और भी कुछ सामने आयेगा.

ब्लॉग्गिंग पर मारा आलेख २९ समाचार पत्रों में छपा



जैसा की बहुत पहले ही सोचा था कि जब ब्लॉग्गिंग हो ही रही है तो , इसके बारे में अन्यत्र भी चर्चा होनी चाहिए, खासकर उन माध्यमों में तो जरूर ही जहाँ मैं सक्रिय हूँ, पहले रेडियो, फ़िर प्रिंट में भी सोचा था, आखिरकार ब्लॉग्गिंग के विषय में पहला आलेख फीचर के माध्यम से अब तक २९ समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपा। सबसे अच्छी बात ये रही कि ये आलेख, हैदराबाद, श्रीगंगानगर, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार आदि कई राज्यों में छपा। मेरी कोशिश तो यही रही कि सब कुछ लिख सकूँ , पर जाहिर है कि एक ही पोस्ट में ऐसा सम्भव नहीं था, इसलिए फैसला किया है कि ,जल्द ही एक नियमित स्तम्भ , "ब्लॉग बातें " विभ्हिन्न समाचार पत्रों में दिखाई देगा, योजना को मूर्त रूप देने में लगा हूँ, आप लोगों का साथ रहा तो जल्दी ही और भी कुछ सामने आयेगा.

बुधवार, 5 नवंबर 2008

गंगा का राष्ट्रीयकरण कोई हल नहीं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने पता नहीं किन कारणों से गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया है। इसके साथ ही गंगा के पुनरुद्धार के लिए बहुत सी योजनायें और ढेर सारी राशि भी आवंटित की गयी है। गंगा के उद्धार और सफाई के लिए पहले से किए जा रहे सारे कार्यों , प्रयासों तथा इस फैसले से सिर्फ़ एक बड़ा अन्तर ये पडेगा की गंगा की सारी जिम्मेदारी अब केन्द्र सरकार उठाएगी। लेकिन सवाल ये है की इससे क्या और कितना फर्क पडेगा, क्योंकि अलग अलग ही सही अब तक करोड़ों, जी हाँ लाखों नहीं करोड़ों रुपये, दर्ज़नों योजनायें, और न जाने कितने संकल्प लिए गए । अन्तिम सत्य यही है की गंगा आज भी प्रदूषित है और दुःख की बात ये है की ये क्रम न सिर्फ़ जारी है बल्कि ज्यादा तेज है। और सबसे बड़ी विडंबना तो यही है , की सरकार और प्रशाशन की जिम्मेदारी, उनकी संवेदना की तो जाने दें, एक आम भारतीय को भी आज किसी गंगा , जमुना, कृष्ण, गोदावरी, या मिटटी , पेड़, हवा के प्रदूषण के प्रति जरा सी भी चिंता नहीं है। इसके बारे में सोचना या कुछ करना तो दूर उसे आज ये एहसास तक नहीं है की धीरे धीरे वो जो जहर वातावरण में घोल रहा है वो ख़ुद उसकी आनी वाली नस्लों को ही लील जायेगा। सबसे जरूरी है लोगों की मानसिकता में बदलाव लाना। इसके साथ ही जो भी इसे नुक्साब पहुंचाने में लगे हैं उनके साथ किसी अपराधी की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए। ऐसा हो पायेगा लगता नहीं है।
सिर्फ़ राश्त्रियाकर्ण करने से एडी समस्या का हल हो जाते तो बात ही क्या थी। चाहे राष्ट्र भाषा हिन्दी की बात करें, या राष्ट्रीय खेल हॉकी की, राष्ट्रीय कह भर देने से या घोषणा कर देने से क्या बदल जाता है, ये बात किसी से छुपी नहीं है। और तो आए दिन हमारे राष्ट्रीय झंडे, राष्ट्रीय चिन्ह, राष्ट्रीय गान तक का अपमान होता रहता है, कभी हम ख़ुद करते हैं कभी दूसरे कर देते हैं। इस राष्ट्रीय कारन वाली बात से कहीं फ़िर ऐसा न हो की गंगा नहीं यमुना को, या गोदावरी को क्यों नहीं राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया, वैसे लगता तो नहीं है की ऐसा होना चाहिए , मगर आज कल कुछ भी हो सकता है। यदि इस घोषणा के बाद सरकार सचमुच गंभीर होकर गंगा के उद्धार के लिए प्रयास करे और लोगों को इसके प्रति संवेदनशील किया जाए तो शायद एक दिन हम भी टेम्स, और सीन, या नील नदी की तरह गंगा को अपने पुराने और शुध्ध रूप में पा सकें। गंगा सचमुच ही मैली हो गयी है हमारे पाप धोते धोते .

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

लीजिये अब पौधे भी करेंगे ब्लॉग्गिंग

जी हाँ, आप ये कदापि न सोचें कि, मैं यूँ ही कोई रद्दी माल उठा कर आपके सामने परोस रहा हूँ। ये बिल्कुल सच है ,आप ख़ुद ही sochiye कि यदि कोई पौधा ये कहता है कि आज तो बहुत अच्छा लगा, दिन भर गुनगुनी धुप सेंक कर बड़ा अच्छा लगा , वो भी अपने ब्लॉग पर तो कैसा लगेगा, खैर आप जब तक ये सोचें कि आप उस पौधे की पोस्ट पर क्या टिप्प्न्नी करेंगे, तब तक में आपको पूरी ख़बर बताता हूँ।
दरअसल जापान में एक विशेष तकनीक विकसित की गयी है जिसके जरिये पौधा भी अपनी भावनाएं ब्लॉग के माध्यम से व्यक्त कर सकेगा। एक इन्टरनेट कैफे में लगा मदोरी सेन नामक एक पौधा नियमित रूप से इन्टरनेट पर ब्लॉग लिख रहा है। वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कार किए गए सेंसर के माध्यम से पौधे की भावनाओं को जापानी भाषा में ( यहाँ ये बता दूँ कि जापानी भाषा में इसलिए कि आंकडों के अनुसार दुनिया में सर्वाधिक पोस्ट जापानी भाषा में ही किए जाते हैं ) अनुवाद कर उसके ब्लॉग पर डाल दिया जाता है ।
अब बताइये है न कमाल की बात, यार ये जाप्नीयों के दिमाग में होता क्या है। वैसे मैं सोच रहा हूँ कि यदि मुझे भी ये प्रोग्राम मिल गया तो सबसे पहले मैं आलू , प्याज, और टमाटर के अन्दर उसे फ़िर करके पोस्ट करवाउंगा, और जरूर पूछूंगा कि भाई, कब तक तुम्हारी वजह से मीर हैसियत यूँ गरीबों वाली रहेगी।
आप भी सोचें कि आपने किस पौधे से क्या पोस्ट करवाना है,या कौन सी टिप्प्न्नी करनी हैं।

अब होगी ओबामा और ओसामा की लडाई : - मेरे मित्र पलटू राम की ये आदत कभी नहीं जायेगी, कि वो हमेशा किसी भी चीज को, घटना को, दुर्घटना को भी उल्टे होकर देखते हैं, पता नहीं शायद उल्टे पैदा हुए थे। खैर जब उनसे पूछा कि क्यों भाई सबसे शक्तिशाली आदमी के रूप में ओबामा को ही देखा जा रहा है क्या कहते हो। वो कहने लगे, यार ये तो पता नहीं मगर मुझे लगता है कि यदि ओबामा जीत गए तो ओसामा को नहीं छोडेंगे, देखो न कितना मिलता जुलता नाम है, उन्हें इसी का कोम्प्लेक्स सताता रहेगा, तो लगता है कि जल्दी ही कोई बड़ी लड़ाई छिड़ने वाली है, कमाल है ये कौन सा एंगल था यार.

लीजिये अब पौधे भी करेंगे ब्लॉग्गिंग

जी हाँ, आप ये कदापि न सोचें कि, मैं यूँ ही कोई रद्दी माल उठा कर आपके सामने परोस रहा हूँ। ये बिल्कुल सच है ,आप ख़ुद ही sochiye कि यदि कोई पौधा ये कहता है कि आज तो बहुत अच्छा लगा, दिन भर गुनगुनी धुप सेंक कर बड़ा अच्छा लगा , वो भी अपने ब्लॉग पर तो कैसा लगेगा, खैर आप जब तक ये सोचें कि आप उस पौधे की पोस्ट पर क्या टिप्प्न्नी करेंगे, तब तक में आपको पूरी ख़बर बताता हूँ।
दरअसल जापान में एक विशेष तकनीक विकसित की गयी है जिसके जरिये पौधा भी अपनी भावनाएं ब्लॉग के माध्यम से व्यक्त कर सकेगा। एक इन्टरनेट कैफे में लगा मदोरी सेन नामक एक पौधा नियमित रूप से इन्टरनेट पर ब्लॉग लिख रहा है। वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कार किए गए सेंसर के माध्यम से पौधे की भावनाओं को जापानी भाषा में ( यहाँ ये बता दूँ कि जापानी भाषा में इसलिए कि आंकडों के अनुसार दुनिया में सर्वाधिक पोस्ट जापानी भाषा में ही किए जाते हैं ) अनुवाद कर उसके ब्लॉग पर डाल दिया जाता है ।
अब बताइये है न कमाल की बात, यार ये जाप्नीयों के दिमाग में होता क्या है। वैसे मैं सोच रहा हूँ कि यदि मुझे भी ये प्रोग्राम मिल गया तो सबसे पहले मैं आलू , प्याज, और टमाटर के अन्दर उसे फ़िर करके पोस्ट करवाउंगा, और जरूर पूछूंगा कि भाई, कब तक तुम्हारी वजह से मीर हैसियत यूँ गरीबों वाली रहेगी।
आप भी सोचें कि आपने किस पौधे से क्या पोस्ट करवाना है,या कौन सी टिप्प्न्नी करनी हैं।

अब होगी ओबामा और ओसामा की लडाई : - मेरे मित्र पलटू राम की ये आदत कभी नहीं जायेगी, कि वो हमेशा किसी भी चीज को, घटना को, दुर्घटना को भी उल्टे होकर देखते हैं, पता नहीं शायद उल्टे पैदा हुए थे। खैर जब उनसे पूछा कि क्यों भाई सबसे शक्तिशाली आदमी के रूप में ओबामा को ही देखा जा रहा है क्या कहते हो। वो कहने लगे, यार ये तो पता नहीं मगर मुझे लगता है कि यदि ओबामा जीत गए तो ओसामा को नहीं छोडेंगे, देखो न कितना मिलता जुलता नाम है, उन्हें इसी का कोम्प्लेक्स सताता रहेगा, तो लगता है कि जल्दी ही कोई बड़ी लड़ाई छिड़ने वाली है, कमाल है ये कौन सा एंगल था यार.

सूर्य उपासना के दिन सूर्यपुत्री उपेक्षित

ऊर्जा के अक्षय श्रोत भास्कर देव यानि सूर्य की उपासना का शायद ये सबसे बड़ा पर्व होता है। इसे मडिया के जमाने की देन कहिएं या कुछ और , ये तो पता नहीं मगर बढ़ती मान्यताओं और विरोध के कारण ही सही छठ आज पटना- बनारस के गंगा तटों और बिहार उत्तर प्रदेश के पोखर तालाब से निकल कर दिल्ली के यमुना तट , मुंबई के जुहू बीच और कई स्वीमिंग पूलों तक पहुँच गयी है। मगर इन सबके बावजूद जो मौलिक रहा और शायद हमेशा रहेगा वो छठ पर्व की पवित्रता, सादगी और शुद्धता ।
जहाँ तक हमारी छठ की यादों की बात है तो कुछ बातें तो जरूर याद हैं, गन्ने की लम्बी छडों के साथ, माथे पर फल प्रसाद की टोकरी लेकर दादी के साथ घाट पर जाना, शारदा सिन्हा की अमृत्भारी अनोखी आवाज और शाम को पतन तो सुबह पटाखों की मौज। मुझे नहीं पता की अब गाओं में भी कितना कुछ बदल गया है, जब लोग ही नहीं रहे तो शायद कुछ तो बदला ही होगा /
इन सबसे अलग जिन बातों पर मेरा ध्यान इस बार यूँ ही चला गया वो शायद आपके जानने लायक भी हों। दिल्ली में छठ पूजन के लिए स्वाभाविक तौर पर यमुना के तटों का इस्तेमाल होता है, कहते हैं की यमुना सूर्य की पुत्री हैं, इस लिहाज़ से तो छठ का रिश्ता यमुना से और गहरा हो जाता है, और अपने तथाकथित वोट बैंक के कारण या श्याद कोई और भी कारण हो, सुना है की जल्दी ही यमुना नदी के तट पर एक सूर्य मन्दिर , खूब विशाल , बनेगा, मगर इससे विपरीत ये जानकर दुःख हुआ की ,यमुना नदी का जल इतना जहरीला हो गया है, खासकर उन इलाकों में जहाँ आबादी रहती है, और पूजा भी करती है, वहां इस बार प्रशाशन को ख़ुद ही घोषणा करनी पडी की कृपया यमुना नदी में दुबकी न लगायें, अन्यथा, कई प्रकार के असाध्य रोग हो सकते हैं, इसका ही प्रभाव ये था की केन्द्रीय शहरी राज्य मंत्री राजकुमार चौहान ने अपने क्षेत्र , पश्चिमी दिल्ली में लगभग पच्चीस करोड़ की लागत से एक कृत्रिम घाट बनवा दिया । सूर्य की उपासना के दिन , सूर्यपुत्री की इस दुर्दशा पर शायद ही कभी कोई गंभीर चिंतन होगा, क्योंकि फ़िर इसकी बात अगले छठ पर ही उठेगी। और माँ गंगा के बारे में क्या कहें, सिर्फ़ इतना की जरूर कोई देव योग की कृपा है , वरना हम इंसानों ने तो कब का उनकी मौत का इंतजाम कर दिया था।

इन त्योहारों पर यदि हम कम से कम कुछ सकारात्मक कार्य, या कोई प्रयोजन, या कोई संकल्प सिद्ध कर पाते तो शायद इन त्योहारों की सार्थकता अधिक हो जाती .

सोमवार, 3 नवंबर 2008

प्रतिशोध (मराठी- बिहारी प्रकरण पर एक कहानी या शायद हकीकत )

रघु हर साल की तरह इस बार भी दिवाली और छठ पर रमेश भैया के आने की ख़बर पक्की जाना कर बेहद खुश था। सच कहें तो उसे इन त्योहारों के आने की उतनी खुशी नहीं होती थी, जितनी रमेश भैया के आने की होती थी, और होती भी क्यों नहीं, आख़िर साल में एक बार रमेश भैया घर आते थे, और फ़िर रघु के लिए न सिर्फ़ कपड़े, और बहुत सारा समान लाते थे बल्कि उसके लिए तो हर बार एक ऐसा तोहफा जरूर होता था जो उसे चौंका देता था, पिछले दिवाली पर मिला मोबाईल अब तक नया का नया लगता है । सो इस बार भी वह कोई बहुत बढिया चीज़ मिलने की कल्पना से रोमांचित हुआ जा रहा था, आज सुबह ही रमेश भैया ने फोन करके बताया था की इस बार छुट्टी की थोड़ी दिक्कत है, इसलिए सिर्फ़ दो चार दिनों के लिए ही आ पायेंगे।

दिवाली से एक दिन पहले शाम को चौक पर पहुचने पर पता चला कि, उसके कुछ दोस्त जो रेलवे की परीक्षा देने मुंबई गए थे, उनमें से बहुतों को वहां पर मारा पीता गया, हालाँकि उसने भी ये खबर देखी सुनी थी, मगर उसे अंदाजा नहीं था कि उसमें से कुछ उसके दोस्त भी होंगे जिन्हें ये सब भुगतना पड़ा। सारे दोस्त वहां इक्कठा होकर क्षेत्रवाद, को लेकर की जा रही राजनीती और सरकार की निष्क्रियता को लेकर खासे नाराज़ थे, तभी अचानक फैसला किया गया कि इसका विरोध जताने के लिए कुछ ऐसा किया जाए कि सबका ध्यान उस और जाए, किसी ने सलाह दी कि क्यों न ढेर सारे पत्र प्रधान मंत्री , और मीडिया को भेजें जाएँ, ताकि उन्हें कुछ तो करने की हिम्मत मिले। मगर अधिकाँश लोगों ने इसे बेकार सा गांधी गिरी वाला रास्ता बता कर एक नया उपाय बताया।
अगले दिन सुबह से लेकर शाम तक सभी क्षात्रों ने वहां के स्थानीय रेलवे स्टेशन पर, आर नजदीकी सरकारी दफ्तरों पर जैसी तोड़ फोड़ मचाई उसकी गूँज तो मीडिया के माध्यम से संतरी से लेकर मंत्री तक के कान तक पहुँची। सभी क्षात्र बेहद खुश थे, कि चलो कहीं तो गुबार निकला, उन्होंने मीडिया और कैमरों के सामने जम कर नेताओं को कोसा और खूब फोड़ फाड़ की । रघु भी इन सबमें आगे बढ़ कर हिस्सा ले रहा था, शाम तक वो भी थक कर चूर चूर हो गया था। शम्म को इस विरोध प्रदर्शन के बाद अचानक उसे याद आया कि अरे, अब तक तो रमेश भैया घर पर पहुँच गए होंगे , वह तेज़ी से घर की तरफ़ बढ़ गया।

घर पहुंचा तो बाहर ही बाबूजी और माँ खड़ी थी, छोटे चाचा भी वही खड़े थे,इससे पहले कि वो कुछ पूछता बाबूजी ख़ुद ही कहने लगे,
" अरे रघु , कहाँ था रे दिन भर, रमेश अबकी बार घर नहीं आ पायेगा, क्षात्रों द्वारा ट्रेन , और पटरियों को तोडे फोडे जाने के कारण उसकी रेल को कानपुर से वापस लौटा दिया गया है, अभी अभी, फुकन चाचा के यहाँ फोन आया था, कह रहा थे कि रघु को कहियेगा, यदि कोई गाओं जाना वाला मिला तो उसका तोहफा भिजवा दूँगा। बेचारा दुखी लग रहा थे, बताओ भला, मुंबई का गुस्सा यहाँ पर निकालने का क्या मतलब और वो भी बेचारे ट्रेन , बस पर, पता नहीं का सोचते हैं ई बचवा सब।

रघु को दिवाली अचानक ही फीकी लगने लगी थी, वो सोच रहा थे कि ये कैसा प्रतिशोध लिया कि उसमें भी ख़ुद का ही नुक्सान रहा।

हाँ, यही सच है कि इन घटनाओं में न जाने कितने रमेश और रघु दुखी हुए........

रविवार, 2 नवंबर 2008

कुछ बेतुकी, और अनाप शनाप बातें

आप सोच रहे होंगे की ये क्या बात हुई ये, बताने की क्या जरूरत है कि कुछ बेतुकी बात कहने जा रहे हैं, आप वो भी आज जबकि आप तो रोज़ ही वही कहते हैं, तो मेरी विनती तो सिर्फ़ ये है कि सरकार आज कोई उचित शीर्षक नहीं मिला इन बातों को कहने के लिए सो लिख दिया, अब आप इसे झेलें,

दादा के बाद जम्बो ने भी संन्यास लिए :- ये तो पहले ही लग रहा था कि ये टेस्ट मैच इस बार बिना किसी परिणाम यानि हार जीत के ही ख़त्म हो जायेगा, मगर इसका परिणाम ऐसा निकलेगा, ये तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। टेस्ट मैच के ख़त्म होते ही अपने जम्बो जी, अनिल कुंबले जी ने घोषणा कर दी कि वे संन्यास लेने जा रहे हैं, यानि अब वे क्रिकेट नहीं खेलेंगे, दादा के बाद ये दूसरा संन्यास उनका भी थोडा चकित करने वाला था इनका भी अप्रत्याशित, दोनों के ही लिए एक बात तो कही जा सकती हैं कि खेल और कैरियर में दोनों ने वो सब कुछ हासिल किया जो किसी को भी चाहिए होता है, और भारीतय क्रिकेट के अनुरूप वो प्यार और उपेक्षा भी मिली, समय भी एक लिहाज से उपयुक्त ही था, तो दोनों के ही हमारी तरफ़ से शुबकामनाएं। हाँ लेकिन जम्बो ने जिस तरह से अचानक ये फैसला लेकर सबको सुना दिया वो बेचारे मीडिया वालों के लिए थोडा मुश्किल काम हो गया, वरना वे अपने सारी ताकत लगा कर अनिल के बारे में वो सब भी ढूंढ लाते जो शायद उन्हें भी नहीं पता होता।
और सबसे महत्वपूर्ण बात तो ये कि अब जब आस्ट्रेलिया वाले वापस जायेंगे तो जानते हैं क्या कहेंगे,जब उनसे इस दौरे की उपलब्धी के बारे में पूछा जायेगा तो,
" जी, अबसे हम हर साल भारत के दौरे पर जायेंगे और उनके एक दो खिलाडिओं को संन्यास दिला कर ही वापस आयेंगे, ये भी हमारी रणनीती का एक हिस्सा है "।

अभी और झेलिये "क्योंकि सास भी कभी बहू थी " :- अभी कल ही तो में एक पोस्ट लिख मारी थी कि अपनी बा, सास बहू वाली वोलेंत्री रिटायरमेंट लेकर जा रही हैं, और जल्दी ही ये धारावाहिक भी शायद हमारे बीच नहीं रहेगा, मैंने तो बेचारे कि दिवंगत आत्मा की शांती के लिए बाकायदा हवन भी रखवा लिए था, मगर आम आदमी के सपने कहाँ सच होते हैं जी, आज ही पता चला है कि इसकी निर्मात्री, माता एकता कपूर ने स्टार चैनल के ख़िलाफ़ ही मुकदमा ठोंक दिया है कि उनके इस धारावाहिक को जल्दी क्यों समाप्त किया जा रहा है, जी हाँ आपने बिल्कुल ठीक ही सुना है, जल्दी समाप्त किए जाने के खिलाफ ।
दरअसल उन्होंने सोच रखा था कि जब तक इस धारावाहिक के ख़िलाफ़ धरना प्रदर्शन, बैन .आदि नहीं होगा तब तक यूँ ही चलाते रहंगे, या शायद सोचा हो कि जब तक तुलसी और मिहिर, और कारन और पता नहीं कौन कौन की शादी दस दस बार तलाक बीस बीस बार और अफ्फैर भी बहुत बहुत बार नहीं दिखा देती, जब तक इस आधुनिक शान्तिनिकेतन में एक हज़ार एक लोगों की मैय्यत नहीं उठती और पता नहीं जितने भी मन्नतें हैं वो सारी नहीं पूरी हो जाती तब तक सास भी रहेगी और बहू भी और कभी भी नहीं, हमेशा हमेशा के लिए, तो तैयार हो जाएँ कुछ और दिन इसका मजा लेने के लिए।

बर्मूडा और चेकोस्लोवाकिया, ये देश हमेशा तुम्हारा ऋणी रहेगा :-
आप लोगों में से शायद कुछ लोगों को बर्मूडा का नाम ध्यान हो, मैं याद दिलाता हूँ, ये वही छोटा मगर उपकारी देश है जिस, एकमात्र देश को हमारे देश की क्रिकेट टीम ने पिछले विश्वा कप में हरा था और क्या खूब रिकोर्ड बना लिए थे, यदि ये देश न खेल रहा होता तो विश्वा कप से हम ज्यादा बेइज्जत होकर निकलते, खैर, तब सबने एक स्वर से इस देश के बलिदान और हमारे देश के प्रति इसके योगदान के लिए धन्यवाद दिया था। इदाहर कुछ दिनों से एक और देश ऐसा ही उपकार कर रहा है, आपने वो विज्ञापन देखा है जिसमें लोग मीठा इसलिए खा लेते हैं कि भारत के जीतते जीते चेकोस्लोवाकिया जीत जाता है, मुझे ये तो उस विज्ञापन देख कर नहीं पता चला कि किस खेल में भारत उससे हार गया, मगर लोगों की खुशी और मीठा खाते देख कर इस बात को जानने की कोशिश भी नहीं की, कुछ अछा ही रहा होगा।
दूसरा विज्ञापन है कि यदि आपका बच्चा यदि ठीक ठीक चेकोस्लोवाकिया बोल लेता है तो समजिये कि आपकी बीमा राशि भारी भरकम होगी, हाँ उस विज्ञापन में भी ये नहीं बताया गया कि आख़िर बच्चा ही ये बोलने की कोशिश क्यों करे जबकि मैं तो दावे के साथ कअह सकता हूँ कि हमारे तो कई बड़े, अजी बड़े छोडिये, नेता और मंतरी भी चेकोस्लोवाकिया नहीं बोल सकते, और फ़िर उस देश के नाम से बीमा का क्या सम्बन्ध। खैर जो भी इतना तो तय है कि रूस कि तरह ये दोनों देश भी हमारे अभिन्न मित्र बनते जा रहे हैं। आज ही नक्शे में दोनों को ढूँढने की कोशिश करूंगा , आप भी करें.......

शनिवार, 1 नवंबर 2008

बा कहेंगी बाय बाय (क्यांकि सास भी कभी बहु थी को श्रधांजलि )

अजी भारतीय टेलीविजन जगत में इन दिनों बस यही ख़बर सब तरफ़ फ़ैली हुई है की बा , अजी अपनी बा, क्या भाई, वही सास भी कभी बहू थी, सदियों पुराना धारावाहिक , की बा, वो अब बाय बाय कहने जा रही हैं, और खाली बैठे न्यूज चैनेल ( जैसा की वे हमेशा रहते हैं ) इस पर तरह तरह की परिचर्चाएं आयोजित करवा रहे हैं, कुछ एक्सक्लूसिव खबरें भी आ रही हैं, मसलन कहीं बा भी दादा, अजी अपने सौरभ दादा के संन्यास से प्रेरित होकर तो ऐसा नहीं कर रही हैं, वैगेरह वैगेरह।
तो फायनली उन्होंने २०५ वर्षों की जिंदगी ( नहीं उनके उम्र के बारे में ये महज एक अंदाजा भर है , क्योंकि उनकी उम्र का ठीक ठीक आकलन करने के लिए लगाए गए गणितज्ञों ने इस काम से ये कह कर पीछा छुडा लिया की इससे आसान तो शेयर मारकाट के डूबने की वजह तलाशना है ) जीने के बाद अचानक इसे छोड़ने का मन बना लिया , वैसे उन्हें ऊपर बुलाने के लिए ख़ुद उनके पति , बापूजी को नीची आना पड़ा, जब उनसे पूछा गया इस बारे में तो उन्होंने कहा , अजीब हाल वहां ऊपर सारा रेकोर्ड, अपडेट कराये, सभी जगह की बुकिंग कराये हुए भी सालों बीत गए और बा का कहीं कोई इरादा न देख मुझे मजबूर होकर ऊपर से नीचे आना पड़ा।
वैसे इसके पीची और भी कुछ वजह बतायी जा रही है, उनका कहना है की जिस तुलसी के साथ उन्होंने ये सफर शुरू किया था उसमें उन्होंने अपने आंसुओं से इतना पानी डाला की अब वो तुलसी एक बरगद के पेड़ की तरह हो गयी है, सो उनका काम ख़त्म हुआ।
एक दूसरी बात ये सूनी जा रही है की बा आजकल बहुत कन्फ्यूज हो जाती हैं, उन्हें यही पता नहीं चलता की कौन किसी पत्नी है, किउन किसका बेटा, और किसका चक्कर किसके साथ चल रहा है, कई बार तो शूटिंग के दौरान उन्होंने भाई बेहें को ही दूधो नहाओ पूतो फलो का आशीर्वाद दे दिया, वैसे इसमें बा का क्या कसूर , जब दर्शकों को भी ये पता नहीं चल रहा है,
सुना तो ये भी गया है की, बा को बुढ़िया तुलसी का रोल ऑफर किया गया, कहा गया की तुलसी तो एक ऐसा किरदार बन गया है जो कोई भी कभी भी आ कर कर सकता है, मगर दिक्कत ये आयी की मिहिर जो दिन पर दिन जवान होते जा रहे हैं वे जब कभइन कभी गलती से अभी वाली तुलसी से आशीर्वाद ले लेते हैं तो बा के तुलसी बन्ने पर क्या कर लेंगे।
एक सबसे पुख्ता ख़बर ये भी है की शायद बा को नाच बुधिये , ओल्ड बॉस जैसे नए धारावाहिक में काम करने का ऑफर मिल रहा है,

अब इतनी सारी बातों के बीच से सच कौन सा है , ये तो वक्त ही बताएगा, मगर फिलहाल तो हकीकत यही है की बा हमें बाय बाय करने जा रही हैं, हमरी गुड विशेस उनके साथ हैं

साथ चलने वाले

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...